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08 Mar 2010
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राष्ट्रपति की चिंता और उधर सांसदों की जम्हाई

यूं तो हमारे देश के लोकतंत्र का मंदिर शब्द से नवाजा जाने वाला संसद पर इतने दाग लग चुके हैं कि उसे वर्तमान हालात में धोना आसान दिखाई नहीं देता। इसके बाद भी इस मंदिर में बैठने वाले जो भी फैसला लेते हैं उसे देश की जनता कभी लाठी खाकर तो कभी आंसू के गोले के
 
EDHAR HAI
Feb 23 2010 01:08 PM
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बिना हारे अब कदम बढ़ाइए

जाता है कि जब किसी की नियत में खोट हो तो उससे सही काम करने की उम्मीद करना खुद को धोखा देने के समान होता है। ऐसी स्थिति आज भारतीय लोकतंत्र के नौकरशाही तबके में भी घर कर चुका है। नौकरशाहों की नियत आम जनता और देश के प्रति कैसी है, यह समय-समय पर दिखता रहा
 
EDHAR HAI
Feb 15 2010 12:01 PM
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पक्षी प्रेमिओं जरा इधर भी देखो

रायपुर के कोटा में एक बाज को गुलेल से मारने के बाद खाने के लिए ले जाते हुए बच्चे। इनमे स्कूल जाने वाले बच्चे भी हैं।
 
EDHAR HAI
Feb 11 2010 03:47 PM
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सरगुजा में खेतो से चूहों को उरांव जनजाति के लोग मारकर खाते हैं। चूहे खेतो के मेढ़ में बिल बनाकर रहते हैं। इसके लिए मेढों को खोदकर, चूहों को निकालते हैं और जमीन पर पटक- पटक कर मारा जाता है। मारने के बाद उन्हे रस्सी से गूथकर ले जाता एक व्यक्ति।
 
EDHAR HAI
Feb 11 2010 03:41 PM
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मीडिया पर भड़के हैं नागा बाबा

राजिम महाकुंभ मंे अलग-अलग अखाड़ों से पहुंचे नागाबाबा मीडिया पर इन दिनों खफा हैं। वे मीडिया कर्मियों के किसी भी प्रकार से फोटो लेने या वीडियों बनाने केे खिलाफ हैं। कल कुछ मीडिया कर्मियों द्वारा राजिम में शोभायात्रा के दौरान फोटो लेने पर उनके विरोध का सामना
 
EDHAR HAI
Feb 11 2010 01:22 PM
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...तो भारत और तालिबान में क्या अंतर

समाज में एक तरफ सभी रिश्तों में कटूता का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है। इससे प्रेम जैसा पवित्र रिश्ता भी अछूता नहीं रह गया है। वहीं किसी भी सभ्यता या संस्कृति का पर्व प्रेम करना सिखाये और उस पर समाज तथा धर्म के ठेकेदार विरोध कराने सड़क पर उतरे तो यह बताने के
 
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Feb 09 2010 03:40 PM
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झुग्गी वालों के बिना महलों में रौनक नहीं

देश में गरीबों की संख्या घटाने और बढ़ाने का खेल लम्बे समय से चल रहा है। वहीं गांव से पलायन कर रोटी के लिए हर तरह का अत्याचार और पीड़ा सहने वाले शहरों के झुग्गी-झोपड़ी के रहवासियों के विकास के नाम पर उन्हें वहां से हटाने की साजिश पूरे देश में चल रही है। कभी
 
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Feb 05 2010 04:12 PM
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...तो लोकतंत्र का खूटां कहलाने का कोई हक नहीं

मीड़िया पर दायित्वों का सही निर्वहन नहीं करने पर हर रोज उंगलियां उठ रही हैं। आलोचना करने वालों में पत्रकारों के अलावा समाज का वह वर्ग भी जो मीड़िया से कभी अपने काले करततूतों के उजागर होने के भय से दहशत में रहता था। ऐसी स्थिति के लिए मीड़िया हर रोज कहीं न
 
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Jan 23 2010 04:24 PM
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जंगलों से बाहर भी बदहाल राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र

राष्ट्रपति के दत्तक पु़त्र पहाड़ी कोरवाओ की संख्या छत्तीसगढ. में दस हजार से ज्यादा नहीं है। वहीं पहाड़ी कोरवाओं के विकास के लिए अब तक करोडों रुपये खर्च किया जा चुका है। इसके बाद भी पहाड़ी कोरवा विकास की मुख्य धारा से नहीं जुड़ सके हैं। वे आज भी जंगलो में कंद
 
EDHAR HAI
Jan 18 2010 04:59 PM
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नौकरशाही में तैयार हो रहा नक्सल भूमि

शाम ढलते ही सन्नाटा, चरवाहे भी गाय बैल लेकर जल्दी घर आ जाते थे और घरों के दरवाजे बंद हो जाते थे। रात में किसी का भी पदचाप सुनकर रोगंटे खडे हो जाते थे। कभी भी कहीं भी किसी की हत्या कर दी जाती थी। घर जला दिए जाते थे, मारा पीटा जाता था और लोग सब कुछ खामोस
 
EDHAR HAI
Jan 14 2010 07:17 PM
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मांदर की थाप और कुहू-कुहू

मांदर की थाप गांव के दूसरे छोर में गुंज रही थी। शैला नृत्य कर रहे लोगों ने मुझे देखा तो वे और भी मस्त होकर नाचने लगे, मांदर की थाप की आवाज बढ गई। वे मुझे भी नाचने के लिए कहने लगे। उनका जोश और उत्साह देख खुद को नहीं रोक पाया। गलियों में उनके साथ आधा घण्टे
 
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शिक्षक,छात्र और बजारू सम्मान

समाज में शिक्षकों का सम्मान आदिकाल से चला आ रहा है। अब यह सम्मान औपचारिकता भर रह गया है। बाजार वाद को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जा सकता है। इसने मानवीय संवेदनाओ तथा नैतिक मूल्यों पर प्रतिकुल प्रभाव डाला है। शिक्षा व्यवस्था भी बाजार के अधिपत्य में आ
 
EDHAR HAI
Dec 29 2009 11:44 AM
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सरकारी तंत्र का दुरूपयोग, चुनाव आयोग खामोश

छत्तीसगढ़ में इन दिनों नगरीय निकाय के चुनाव में सरकारी धन और संसाधनों का खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा है। इस ओर सरकार और चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं गंभीर नहीं हैं। पार्षद पद के लिए प्रत्याशी लाखों रुपए तक खर्च कर रहे हैं, लेकिन जब चुनाव आयोग को खर्च का ब
 
EDHAR HAI
Dec 19 2009 04:26 PM
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आनंद का मतलब सेक्स...?

मीडिया पूरी तरह बाजार में शामिल हो गया है और मीडिया संस्थान दुकान बन गए हैं। पैसे के लिए वे कुछ भी बेचने को तैयार है। संस्कृति और सभ्यता के ठेकेदार बनने वाले इस पर अंधे की भूमिका में बैठे हुए है। वे सिर्फ वेलेन्टाइन डे और फे्न्डशीप डे का ही विरोध करत
 
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कितना बचा, कितना बदला मेरा गांव

हमने कभी बस नहीं देखी थी। गांव में शादी-ब्याह होता था तो टेक्टर से बारात आती-जाती थी। एक दिन पापा के साथ गांव से शहर गया तो वहां बस देखी। उस समय कक्षा तीन में पढ़ रहा था। गांव से बस चलनी शुरू हुई। बस का नाम गरीब नवाज था। सड़कें इतनी खराब थी कि बस कुछ द
 
EDHAR HAI
Dec 12 2009 05:26 PM
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मंहगाई का ऐसों को अर्थ भी मालूम है क्या...?

वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने राज्यसभा में मंहगाई को लेकर उठे सवालों पर अपनी मानसिक स्थिति को असंतुलित दिखाते हुए जो प्रयास किया उससे आम जनता का कोई तालुकात नहीं है। उनका कहना था कि मांग और उत्पादन में असमानता के कारण ऐसे स्थिति बनी है। सवाल उठता है क
 
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सरकारों के लिए आम आदमी आज भी गाजर-मूली

चारों तरफ लाश ही लाश, अंतिम संस्कार के लिए श्मसान में भी जगह नहीं, हजारों लोग सोने के बाद कभी उठ भी नहीं पाये। यह खौफनाक मंजर भोपाल में आज से ठीक 25 साल पहले हुआ। लोगों को वह दिन आज भी जब याद आता है तो वे खामोष हो जाते हैं, आंखें डबडबा जाती है लेकिन
 
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मोमबत्ती जलाने और आंसू बहाने तक सीमित न हो संवेदना

मुम्बई में हुए आतंकी हमले के एक साल बाद आज अखबारो और मीडिया के दूसरे साधनों में इस पर जमकर चर्चा हुई है। देश की सुरक्षा व्यवस्था पर अभी भी कई सवाल उठ रहे है। आतंकी हमले में मारे गए लोगों के परिजनो को मिलने वाले न्याय पर भी अखबारों में संपादकीय और लेख
 
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Nov 26 2009 12:21 PM
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मोमबत्ती जलाने और आंसू बहाने तक सीमित न हो संवेदना

मुम्बई में हुए आतंकी हमले के एक साल बाद आज अखबारो और मीडिया के दूसरे साधनों में इस पर जमकर चर्चा हुई है। देश की सुरक्षा व्यवस्था पर अभी भी कई सवाल उठ रहे है। आतंकी हमले में मारे गए लोगों के परिजनो को पर भी अखबारों में संपादकीय और लेख छपे हैं। कहीं सु
 
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Nov 26 2009 12:21 PM
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जंगल में शहीद होने वाले क्या दोयम दर्जे के ?

की घटना के बाद देश में देशभक्ति की भावना और हिन्दुस्तानी होने का जज्बा दिखाई दिया था। शहीदों को चैक-चैहारों पर मोमबत्तियां जला कर नमन किया गया था। वैसा जज्बा जंगल में कई-कई दिनों तक आंतरिक सुरक्षा के लिए अभिशाप बन चुके नक्सलियों से लड़ने वालों के शहीद
 
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संपादक ने शादी के लिए न ली छुट्टी और न दी

पत्रकारिता क्या है और क्या हो रहा है, यह हर रोज वरिष्ठ पत्रकारों से सुनने को मिलता है। कल एक न्यूज एजेंसी के दफतर में पहुंचा तो एक परिचित वरिष्ट पत्रकार से मुलाकात हो गई। वे कुछ महिने पहले ही एक बड़े अखबार की नौकरी छोड़कर वहां से कम वेतन पर यहां काम कर
 
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अभिव्यक्ति पर रोज हो रहा शिवसेना से खतरनाक हमला

जाति-धर्म और भाषा पर राजनीति करने वालों की आंखो की मीडिया किरकिरी बन गया है। आईबीएन के न्यूज चैनल लोकमत के कार्यालय में शिव सेना के कार्यकत्ताओं ने तोडफोड की गई। इस घटना के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चाह्मण का यह बयान कि मीडिया को अपनी सुरक्ष
 
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प्यास...

भीषण गर्मी पड़ रही थी, मैं यूं ही अकेला पैदल चला जा रहा था। दूर-दूर तक कोई पेड़ या घर भी नजर नहीं आ रहा था। पैदल चलते-चलते बिल्कुल ही थक चुका था। पैर भी लड़खड़ाने लगे थे। वे आराम मांग रहे थे। प्यास से गला सूख चुका था। मुंह में लार भी नहीं बची थी कि मुंह
 
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पंचसितारा होटल में खाने वालों ने किसानों का जख्म देखा..?

देश की राजधानी दिल्ली में किसानों ने गन्ने के समर्थन मूल्य को लेकर अपने ताकत का प्रदर्शन किया, वह यह बताने के लिए काफी है कि किसानों का जख्म अब सहन से बाहर हो गया है। हालांकि आज दिल्लीवासियों को इससे परेशानी का सामना करना पड़ा। लेकिन कम से कम शहर में
 
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मीडिया में गरीबों और शोषितों की बात करने वाला बन जाता है नक्सली

राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस के अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार श्रीपाल जोशी ने कहा कि मीडिया में गरीबों, शोषितों की बात करने वाला नक्सली बन जाता है। मीडिया में तट्स्थता और निष्पक्षता का मतलव मीडिया के मालिकों का हित बनकर रह गया है। पूरी पत्रकारिता कार्पोरेट हो
 
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जंगल से पहले संसद में बैठने वालों से निपटना जरूरी

नक्सवाद की समस्या को लेकर अब से पहले सरकार इतनी गंभीर पहले क्यों नहीं थी, जितनी गंभीर वह अब दिखाई दे रही है। सरकार कभी नक्सलियों से बातचीत करने की बात करती है, तो कभी उनके आक्रामक तेवर को देखकर बुलेट के बल पर निपटने की योजना पर गंभीरता से काम करने की
 
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हर गांव में पैदा हो जाती माता राजमोहनी

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के विकास में षराब बड़ा अवरोधक बन चुका है। नये राज्य बनने के बाद यह और भी खतरनाक रूप में दिखाई देने लगा है। पिछले दिनों रायगढ़ जिले के घरघोड़ा क्षेत्र में षराब के नषे में एक व्यक्ति ने मां, पत्नि समेत बच्चों की हत्या कर आत्महत्या
 
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Nov 14 2009 08:07 PM
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इससे अच्छा है नक्सलियों का साथ

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में रहने वाली एक लड़की, जिसे मैंने कभी देखा नहीं है। उसे फोन के माध्यम से जानता हूं, वह कभी-कभी फोन कर बात करती है। कल जब उसका फोन आया तो हाल-चाल पूछने पर वह कहने लगी- मां ने आज बहुत मारा। वहीं पापा भी षराब पी
 
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डिग्री की अहमियत तुम समझते नहीं

आज पत्रकारिता विष्वविद्यालय में अपने ही बैच के एक छात्र से पत्रकारिता की डिग्री को लेकर बहस हो गई। उसका कहना था कि डिग्री मिलने पर वे इस क्षेत्र में अनुभव वाले व्यक्ति को पछाड़ कर पत्रकारिता के षिखर तक पहुंच सकते हैं। पत्रकारिता के अनुभव वाले व्यक्ति
 
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Nov 14 2009 08:07 PM
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आलीशान होटल और गाड़ी नहीं मांगते, उन्हें मंच पर समय तो दे दो

छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के नौ साल पूरे होने पर सात दिन तक चले राज्योत्सव में जनता का करोड़ों रुपए खर्च हुआ। यह वही पैसा है जिसे लोग कभी पानी के नाम पर तो कभी साफ-सफाई के नाम पर सरकार को टैक्स देते हैं। हालांकि लोगों ने भी इस आयोजन पर खूब मनोरंजन क
 
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Nov 13 2009 04:08 PM
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पहचान ढूढंते रह जाओगे

गंावों में हमारे देश की संस्कति और रहन सहन छुपी हुई है। यह ऐसा अमूल्य धरोहर है जिसे खोने के बाद नहीं पाया जा सकता और न ही हमारी विशिष्ट पहचान दुनिया में सुरक्षित रह सकती हैै। हम इसे नजर अंदाज कर रहे है। लोग शहर में घर होने की बात कर जितना गौरवान्वित
 
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Nov 10 2009 02:44 PM
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विदेश यात्रा, घर में मवेशी और इंसान पी रहे एक घाट का पानी

छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के नौ साल पर आयोजित जलसे में सरकार के लोगों ने विकास में आम लोगों की सहभागिता की बात कही। यह बात लोग पचाने को कहने पर ही नहीं बल्कि तभी से तैयार है जब राज्य का निर्माण भी नहीं हुआ था। ऐसा कहने की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है, इस
 
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खेत में टंगी खोपडी...

देश के किसान एक ओर आधुनिक तोर-तरीकों से खेती कर रहे हैं, वहीं अशिक्षा और अंधविश्वास के बीच आज भी किसानों को एक बड़ा वर्ग फंसा हुआ है। पिछले दिनों मेरा सरगुजा जाना हुआ, जहां खेतों में गाय-बैल के सिर की हड्डियों को खेतों में लकड़ी के सहारे लटकते देख बड़ा
 
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ग्रामीण पत्रकारिता के सामने बाजारवाद की चुनौती

गांव, खेत, खलिहान और भी बहुत कुछ। विकास के लिए चलाई जा रही योजनाओं का हाल, ग्रामीणों की संस्कृति और रहन-सहन आदि। ऐसी कई चीजें ग्रामीण पत्रकारिता के माध्यम से मीडिया तक पहुंच पाती है। लेकिन मीडिया गांव की खबरों को कितना महत्व दे रहा है, किसी से छूपा ह
 
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बीएसएफ में महिलाएं, पाक का इरादा नापाक

पाकिस्तान को भारत की मजबूत होती सैन्य शक्ति अब बर्दाश्त नहीं हो रही है। वह तुच्छता पर उतर आया है। पाक का यह कहना है कि भारत में जवानों की शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बीएसएफ ने महिला कर्मियों की तैनाती की है। भारत भूमि पर कई विरागनायें हुई हैं
 
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Oct 14 2009 07:44 PM
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रोज बिस्तर में बिछती मंजूला

मंजूला कभी स्कूल जाती थी, वह सबसे होनहार लड़की थी। परीक्षा में हमेशा अच्छे नम्बर लाती थी। वह जब कक्षा दसवीं में पढ़ रही थी, तभी उसके पिता की मौत हो गई। अब उसकी मां रमा पर उसे और छोटे चारों भाई-बहन को पढ़ाने-लिखाने की जिम्मेदारी आ गई। मंजूला से यह रहा नह
 
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Oct 14 2009 07:44 PM
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सिद्धांतो की पत्रकारिता के लिए समाज से नहीं मिल रही ताकत-पद्मश्री अभय छजलानी

जब तक समाज खुद जागृत नहीं होता तब तक न तो राजनीति सकारात्मक और सैद्धांतिक हो सकती है और न ही मीडिया सिद्धांतो की पत्रकारिता कर सकती है। सिद्धांतों की पत्रकारिता के लिए आज भी जगह है लेकिन समाज से ताकत नहीं मिल रही है। मानों समाज निष्क्रिय हो गया है। प
 
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छत्तीसगढ़ के उत्तर में स्थित आदिवासी बाहुल्य सरगुजा जिले की ये तस्वीरें बहुत कुछ कहती हैं, जरा देखिए तस्वीरों में आदिवासियों की जिन्दगी..
 
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टीआरपी न बढे तो यह खेल भी काम लायक है

ये क्या हो रहा है, बहस जारी रखूंगा, यह लखनऊ की सभ्यता नहीं है, जनता से बात करने फिर आऊंगा, इसके लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाये, तय नहीं कर पा रहा हूं, इस चैनल की ओर से माफी मांगता हूं । यह सब लखनऊ में स्टार न्यूज द्वारा आयोजित कौन बनेगा प्रधानमंत्री
 
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होश में आ जाओ छत्तीसगढ़िया, वक्त काफी कम है

छत्तीसगढ़ की संस्कृति खतरे की दौर से गुजर रही है। छत्तीसगढ़ के मूलनिवासियों का जड़ भी कमजोर होता दिखाई दे रहा है। मध्यप्रदेश से विभाजित होकर छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से स्थिति और भी खतरनाक हुई है। छत्तीसगढ़ियों को सामाजिक ,आर्थिक तथा राजनैतिक रूप से कम
 
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