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16 Jun 2010
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आखिरी वसीयत

तेरी गली केकोने पर घर के सामनेखड़ा वो गुलमोहर का पेड़आरामगाह है मेरीबस आखिरी आरजू आखिरी वसीयत है मेरीवहीँ बिस्तरलगा देना मेराकब्रगाह बनवा देना मेरीमुझे वहाँ सुला देनाऔर चेहरा मेराखुला रखना बाकी जिस्म सारा
 
वन्दना
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इसे क्या नाम दूं?

भोर की सुरमई लालिमा सीमुस्काती थी वोनभ में विचरण करतेउन्मुक्त खगों सीखिलखिलाती थी वोऔर सांझ के सिंदूरी रंग केझुरमुट मेंसो जाती थी वोवो
 
वन्दना
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तुम्हें याद है वो..................

तुम्हें याद है वोमौसम की पहलीबारिश में भीगनाऔर इतना भीगनाकि हाथ -पैर और होठों का नीला पड़ जानाफिर ठण्ड से ठिठुरना औरठिठुरते -ठिठुरतेतेरे आगोश मेंसिमट जाना तुम्हें याद है वोजेठ की तपती  धूप में छत पर नंगेपाँव दौड़कर आना
 
वन्दना
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एक दिन में सिमटती यादें

कहते हैं यादों का कोई मौसम नहीं होता ....... यादों की फसल हर मौसम में लहलहाती रहती है मगर ऐसा होता कहाँ है ..............ज़िन्दगी इतनी फुरसत देती ही कब है जो यादों में जिया जाये ............ बड़ी मुश्किल से कुछ गिने -चुने दिनों में यादों को समेट देती है
 
वन्दना
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यूँ आवाज़ ना दिया करो

सुनोयूँ आवाज़ ना दिया करो दिल की बढती धड़कन आँखों की शोखियाँ कपोलों पर उभरती हया की लालीकंपकंपाते अधर तेरे प्यार की चुगली कर जाते हैं कभी ख्वाब तेरेरातों में जगा जाते हैंऔर चंदा की बेबसी सेसामना करा जाते हैंतारे गिनते-
 
वन्दना
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तेरे मन का मंदिर

तेरे मन की खुली खिड़की में झाँकता अक्स मेरा तेरे मनोभावों की हर तह को खोलतापरत- दर- परततेरे अहसासोंको छूता ज्यों चाँदनी कास्पर्श हो तेरे मन की हर तह मेंप्रेम के अथाहसागर कीअनगिनतउछलती मचलतीटकराती और
 
वन्दना
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बिना बात के भी शिकायत होती है

बिना बात के भी शिकायत होती हैहुस्न वालों की भी अजीब फितरत होती हैकभी शिकवों की लम्बी फेहरिस्त होती हैकभी बिना फेहरिस्त के भी शिकायत होती हैहुस्न की ये अदा भी गज़ब होती हैजब शिकायत भी प्यार भरी होती हैतकरार में भी इकरार नज़र आता हैतब हुस्न  कुछ और
 
वन्दना
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ख्वाब को पकड़ना चाहता हूँ...........

तेरा मेरा यूँ मिलनाजैसे आकाश का धरती को तकनापूजन , अर्चन,वंदन बन आई हो मेरे जीवन में जब से दीदार किया तेरीरिमझिम सी  इठलाती ,मुस्काती चितवन का होशोहवास सब गुम हो गएतुम्हारे ही ख्यालों मेंना जाने कहाँ खो  गएये कैसी मदहोशी छाई
 
वन्दना
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मैं भीग जाता हूँ

जब भी तेरे गेसुओं से टपकती बूँदेंगिरती हैं मेरे ह्रदय नभ परमैं भीग जाता हूँ जब भी तेरे अधरों परकुछ कहते -कहतेलफ्ज़ रुक जाते हैंमैं भीग जाता हूँजब भी तेरी पेशानी परचुहचुहाती बूँदेंचाँदनी सी आभाबिखेरती हैंमैं भीग जाता हूँजब भी
 
वन्दना
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हाँ , मैंने खुशबू को क़ैद कर लिया

हाँ , मैंने खुशबू को क़ैद कर लिया तेरी सोमरस छलकाती बातों को मीठी -मीठी मुस्कानों कोहिरनी से चंचलनैनों की चितवन को बिजली से मचलते पैरों की थिरकन कोतेरे मिश्री घुले मधुर अल्फाजों को  मधुर- मधुरगुंजार करते गीतों
 
वन्दना
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बस एक बार आजा जानाँ..................

तेरी मेरी मोहब्बतखाक हो जाती गर तू वादा ना करतीइसी जन्म में मिलने का एक अरसा हुआतेरे वादे पर ऐतबार करते  - करतेपल- छिन्न युगों से लम्बे हो गए हैंमगर तेरे वादे की इम्तिहाँ ना हुईआज जान जाने को है आस की हर लौ बुझने
 
वन्दना
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मौन मुखर हो जाये

अश्कों का बहनाकोई बड़ी बात नहीं मज़ा तब है जबअश्क बहें भी और  नज़र भी ना आयेंऔर  जहाँ मौन भी नज़रों में मुखर हो जाये 
 
वन्दना
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आज्ञाकारी पुत्र ?

पिता ने पुत्र को उपदेश दिया जीवन कासन्देश दियाबेटा, काम कुछऐसा कर जाना दुनिया की यादों में बस जानापशुवत जीवन तोसब जीते हैं ज़हर का घूँट तो सब पीते हैंतुम राम -सा जीवन जी जानानाम अपना रौशन कर जानाअब पुत्र नेचिंतन-
 
वन्दना
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जब सवाल करने का हक हो ?

कोई चीत्कार सुनी नहीं मगर फिर भीचीत्कार होती है जो बिना सुने भी सुनाई देती हैअंतर्मन को झकझोरती हैसागर के फेन सा जीवन उसमें भीवक़्त के तरकश में दबी , ढकी , अंधकार में डूबी कुछ वीभत्स करतीआत्मा
 
वन्दना
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पत्थर हूँ मैं

पत्थर हूँ ना खण्ड- खण्ड होना मंजूरपर पिघलना मंजूर नहीं स्थिर , अटल रहना  मंजूर पर श्वास , गति लय मंजूर नहीं पत्थर हूँ नापत्थर- सा ही रहूँगा अच्छा है पत्थर हूँकम से कम किसी दर्द आस ,
 
वन्दना
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संजीवनी

हृदय तिमिर को  बींधतीतेरी रूह की सिसकती आवाज़जब मेरे हृदय कीमरुभूमि से टकराती हैमुझे मेरे होने का अहसास करा जाती हैजब तेरे प्रेम की स्वरलहरियाँ हवा केरथ पर सवार होमेरा नाम गुनगुना जाती हैंमुझे जीने का सबबसिखा जाती हैंजब  दीवानगी
 
वन्दना
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गर प्यार से छू ले

आज भी सिहर जाए रोम रोमगर तूप्यार से छू ले मुझेआज भीडूब जाऊँ नैनों की मदिरा में गर तूनज़र भर देख ले मुझेआज भी बंध  जाऊँबाहुपाश में तेरे गर तूस्नेहमय निमंत्रण दे उर स्पन्दनहीननहीं हैबस नेह जल
 
वन्दना
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तेरे पास

सुन तेरे चेहरे पर गुलाब सी खिली मधुर स्मित नज़र आती है मुझेजब तू दूर -बहुत दूरनिंदिया के आगोश मेंस्वप्नों के आरामगाह मेंविचरण कर रहा होता हैतेरे सीने के मचलते ज्वार यहीं भिगो जाते हैं मुझे मेरे तड़पते जज्बातों को तेरी
 
वन्दना
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अब तो आ जा .......

आ जाअब तोएक बारतड़प कीहर हदपार हो चुकी हैबिन आंसू केरोती हूँतुझ बिनकैसे जीती हूँजानता हैतू भीमगर फिर भीमुझे तड़पाकरकितना सुकूनतुझे मिलता होगाये पता है मुझेअहसास सिर्फअहसास होते हैंउनका नामनहीं होता नाइसीलिएतुझे अहसासनाम दियाऔर तूनेउसे सार्थककर दियाअहसास
 
वन्दना
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टूटे टुकड़े

१) सुनो कुछ ख्वाब बोये थे तुम्हारे साथ जीने के बंजर ज़मीन में२) वेदनाओं के ताबूत में आखिरी कील जो लगायी तुमने रूह को सुकून आ गया ३) तेरी चाहत की बैसाखियों ने अपाहिज बनाया मुझे बस लाश बनना बाकी है४) कैसे समेटेगा इन बिखरे टुकड़ों को जिन्हें कभी तू ने ही
 
वन्दना
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तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशीजब बातें करती है मुझसेबस वहीं धडकनेंरूक जाती हैंजो तुझसे नहीं कह पातींवो अफसानेमेरे कानो मेंबयां कर जाती हैंकभी तेरातितलियों सा उड़नाकभी तूफ़ान सा मचलनाकभी खग सदृशआकाश में उड़नाकभी यादों केकटहरे मेंसजायाफ्ता मुजरिम साखामोश ठहर जानाकभी मेघों सा
 
वन्दना
Mar 04 2010 05:18 PM
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किससे करें बरजोरी........कैसे खेलें होली ?

होली होलीखेलें होलीरंगों की हैबरजोरीचलो चलोसब खेलें होलीआवाज़ येआ रही हैदिल को मेरेदुखा रही हैकैसी होलीकौन सी होलीकौन से रंगों सेकरें बरजोरीकहीं है देखोरिश्तों केव्यापार की होलीकहीं है प्यार केइम्तिहान की होलीकहीं पर देखोजाति की होलीकहीं है भ्रष्टाचारकी
 
वन्दना
Feb 28 2010 11:20 AM
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कैसे खेलें होरी

तिरछी चितवनसुर्ख कपोलभीगे अधरप्रियेकैसे प्रवेश करूँह्रदय मेंपहरे तुमनेबिठा रखे हैंचितवन बांकीबींध रही हैकिस रंग सेतुम्हें सजाऊँकपोल सुर्ख किये हुए हैंकौन से नीर सेतुम्हें भिगाऊं अधर अमृत कापान किये हैंप्रियेकैसे खेलूँ होरीतुझ संग कैसेखेलूँ होरीप्रियेएक
 
वन्दना
Feb 26 2010 12:26 PM
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कमरों वाला मकान

इस मकान के कमरों मेंबिखरा अस्तित्वघर नही कहूँगीघर में कोईअपना होता हैमगर मकान मेंसिर्फ कमरे होते हैंऔर उन कमरों मेंखुद कोखोजता अस्तित्वटूट -टूट करबिखरता वजूदकभी किसी कमरे कीशोभा बनतीदिखावटी मुस्कानयूँ एक कमराजिंदा लाश का थातो किसी कमरे मेंबिस्तर बन
 
वन्दना
Feb 24 2010 12:20 PM
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देशभक्ति का दानव

देशभक्ति का दानव मुझमेंजाने क्यूँ मचलता रहता हैइसका कोई मान नहीइसकी कोई पहचान नहीफिर भी अपना राग सुनाता रहता हैसिर्फ चुनावी बिगुल बजनेपर ही सबको याद ये आता हैवरना सियासतदारों कोफूटी आँख ना भाता हैआज के युग मेंदानव ही ये कहलाता हैइसकी माला जपने वालायहाँ
 
वन्दना
Feb 19 2010 06:13 PM
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प्रेम की परिधि

मुझेरेखांकित कियाजब तुमनेअपने प्रेम कीपरिधि मेंबाँधा जब तुमनेअपने मूक प्रेमकी डोर से तुमनेमेरे भटकतेअर्धव्यास कोस्वयं के व्यास सेजोड़कर संपूर्णघेरा बना लियाजब तुमनेतब उसी परिधि मेंअपनी धुरी परघूमते- घूमतेकब मैंतेरा ही रूप हो गयीपता ही ना चलाआओ अब इसपरिधि
 
वन्दना
Feb 14 2010 07:45 PM
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चक्रव्यूह

विरह दंश सेपीड़ित धड़कनतेरे नाम से हीधड़क जाती हैसोच ज़राक्या होगाउस पल जबयुगों के चक्रव्यूहमें फँसीजन्म -जन्मान्तरोंसे भटकती रूहोंका मिलन होगाऔर दीदार कोतरसते नैनचार होंगेजब प्रेम अपनेचरम पर होगा उस चिर प्रतीक्षितक्षणिक पल मेंधड़कन रूक नही जाएगीसाँस थम
 
वन्दना
Feb 11 2010 03:03 PM
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क्या फिर ऋतुराज का आगमन हुआ है ?

सोमरस -साप्राणों कोसिंचित करतातुम्हारा ये नेहज्यों प्रोढ़ता कीदहलीज परवसंत का आगमननव कोंपल सीखिलखिलातीस्निग्ध मुस्कानज्यों वीणा के तारझनझना गए होस्नेहसिक्त नयनो सेबहता प्रेम का सागरज्यों तूफ़ान कोईदरिया मेंसिमट आया होसांसों के तटबंधोंको तोड़ते ज्वारज्यों
 
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" कल "

कलजब आई थीमैंक्यूँ नही बांधातुमनेप्रेमापाश मेंक्यूँ नहीपकड़ा दामनक्यूँ नहीडालीं पाँव मेंजंजीरेंअपने इंतज़ार कीक्यूँ नही दीदुहाईअपने जज्बातों कीक्यूँ नही सुनाईइक-इक पल मेंसौ- सौ बारमर- मर करजीने की दास्ताँअब कलफिर आऊँगीतब कह लेनाअनकही बातेंदिखा देनाअपनी
 
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बावरा मन

ये मन का उड़ता पंछीआकाश को पाना चाहता हैजिस राह की कोई मंजिल नहीउस राह को तकना चाहता हैप्रणय बंधन में बँधे मनों कोप्रेम का नव अर्थ देना चाहता हैनामुमकिन सी तमन्ना कोआइना बनाना चाहता हैप्रणय बंधन में जकड़ी बेडी कोप्रेम की हथकड़ी लगाना चाहता हैतुमसे ही हर
 
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मेरे हिस्से का आसमान

शाम केधुंधलके मेंएक टुकड़ाआसमानमेरे आँगनमें उतरामुझे पुकारामेरे हिस्से केचाँद कीसंगमरमरीदुधिया रौशनी सेमेरे आँगन कोजगमगायातारों कीटिमटिमातीमखमलीचादर परसुलायाऔर ले गयास्वप्नों केजहान मेंजहाँ बादलों का एक टुकड़ालहलहाता साआया औरमेरे वजूद परइन्द्रधनुषी रंगों
 
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प्यार , प्यार होता है -----------शरीरी नही होता

प्यार , प्यार होता हैशरीरी नही होताक्यूँ प्यार काएक ही अर्थलगाती है दुनियाप्यार बहन से, माँ से,पत्नी से , प्रेमिका से ,बेटे से , बेटी से भी होता हैमगर प्यार, प्यार होता हैशरीरी नही होताप्यार मेंरिश्ते के नाम कीपट्टी होये जरूरी तो नहीउसका अर्थ तोएक ही
 
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ज़रा सोचिये ----------ऐसा आखिर कब तक ?

लो फिरएक ख्वाहिशका जनम हो गयाएक बच्चे के जनम के साथ फिर से उसेअपनी जड़सोच के साथदुलारा जायेगाअपने अरमानो कोउसकी देह परसंवारा जायेगाइक मिटटी कापुतला समझनिखारा जायेगाउसकी इच्छाओं कागला घोंटफिर से उसेमारा जायेगाअपने सपनो कोपाने की चाहत मेंअपने स्वाभिमानकी
 
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मिलन को आतुर पंछी

आख्यालों की गुफ्तगूतुझे सुनाऊँएक वादे कीशाख पर ठहरीमोहब्बत तुझे दिखाऊँहुस्न और इश्क कीबेपनाह मोहब्बत केनगमे तुझे सुनाऊँहुस्न : इश्क , क्या तुमने कल चाँद देखा ? मैंने उसमें तुम्हें देखाइश्क : हाँ , कोशिश की लेकिन मुझे सिर्फ तुम दिखीं चाँद कहीं नहीहुस्न :
 
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यादों के लांछन -----------किस- किस पर ?

याद करते हो तुमअपने प्रेमी कोफिर क्यूँ लांछनहम पर लगाते होहम बेजुबानतुम्हारे लांछनों काजवाब नही दे सकतेकिसी की याद मेंजी तुम जलाते होमगर दोष हमाराइसमें क्या हैक्या हमने तुम्हेंये दर्द दियाक्या प्रेम का कभीकोई उपदेश दियाफिर भी बार- बारशब्द यही दोहराते होए
 
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दोबारा कैसे जियूँ

तारीखकैसे याद रखूँहर तारीखइक कहानी हैकभी गम हैकभी ख़ुशी हैतारीख की बेड़ियों सेयादों का अंकुरजो फूटाकभी तारीख मेंकराहता इंतज़ार मिलातो कभी इम्तिहानकभी दर्द कासैलाब मिलातो कभीभावनाओं का तूफ़ानकहीं खुशियों कीसौगात मिलीतो कहीं जुगनू सेचमकते पलों का हिसाबमगर फिर
 
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मैंने तो जीना कब का छोड़ दिया है

मैंने तो जीना कब काछोड़ दिया हैएक निर्जीव , स्पन्दनहीनजीवन जी रही थीफिर तुम ठहरे हुएपानी में क्यूँउम्मीदों केकंकड़ फेंकते होक्यूँ अपेक्षाओं केबीज बोते होसंवेदनाओं के बेल -बूटेसब सूख चुके हैंजानते हो , मुझे पता हैतुम कभीखरे नही उतर पाओगेमेरे सपने ना
 
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कैसा होता है वो प्रेम ?

अभी कुछ दिन पहले अमृता और इमरोज जी के बारे में कुछ पढ़ा और वो दिल में उतर गया । तभी कुछ भाव उभरे जिन्हें शब्दों में बाँधने की कोशिश की है -------------- ना वादा किया ना वादा लिया मगर फिर भी साथ चले ना इंतज़ार किया ना इंतज़ार लिया मगर फिर भी हमेशा साथ रह
 
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उसने पुकारा मुझको

कल का दिन मेरी ज़िन्दगी का वो दिन था जब मैं ज़िन्दगी के करीब था वो जिससे मैंने मिलना चाहा इक नज़र देखना चाहा लाखों पैगाम भेजे मिन्नतें की सदके किये मगर ये सोच पत्थर भी कभी पिघले हैं खामोश हो जाता था और अपनी मोहब्बत से मजबूर हो बार - बार आवाज़ दिए जाता
 
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एक कोशिश

कुछ परवाजों को पंख नही मिला करते कुछ दरख्तों पर फूल नही खिला करते अब तो कलमों की स्याही भी सूख चुकी है कोई मेरे आंसुओं को पिए ----तो क्यूँ? कोई मेरे ज़ख्मों को सिंए ----तो क्यूँ ? यादों का उधड़ना अभी बाकी है लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया तो
 
वन्दना