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बेलाग - हिन्दी राइटर्स गिल्ड

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08 Mar 2010
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अमीर खुसरो

संस्कृतछंद- भुजंगप्रयातं भवेद्‍ यश्चतुर्भि:=एक पंक्ति में १२अक्षर यगण(यमाता ।ऽऽऽ) के क्रम से।फ़ारसी बहर=फ़ऊल फेलन फ़ऊल फ़ेलन-२ज़ेहाले मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल्दोरायनैना बनाय बतियां।कि ताबे हिजरां नदारम एजां न लेहो काहे लगाय छतियां॥शबाने हिजरां दराज़ चूं जुल्फ बरोजे
Mar 08 2010 08:25 AM
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छंद-परिचय:घनाक्षरी

अपने प्रस्तुत काव्य के प्रणयन में ‘‘घनाक्षरी’’ छन्द को चुना है, ‘कवित्त’ और ‘मनहरण’ भी इसी छन्द के अन्य नाम हैं। इसमें चार पंक्तियाँ होती है और प्रत्येक पंक्ति में ३१, ३१ वर्ण होते हैं। क्रमशः ८, ८, ८, ७ पर यति और विराम का विधान है, परन्तु सिद्धहस्त
Feb 27 2010 10:08 AM
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चंद्र शेखर आज़ाद बलिदान दिवस २७ फ़रवरी

मंगलाचरणहोवे हर क्षण जन-जन का मुदित मन, देश भक्ति-भागीरथी बहे रग-रग में।सदा धर्म संस्कृति व सभ्यता का हो विकास, सत्य का ‘‘संदीप’’ जले जगमग-जग में।।चले जायें चाहे प्राण रहे किन्तु आन-बान, साहस भरा हो भगवान! पग-पग में।चन्द्रशेखर ‘आज़ाद’ जैसे वीर-पुंगव हों,
Feb 27 2010 09:51 AM
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अनुपमा सुषमा माँ !

उत्तरीअमेरिकीय द्वीप ही नहीं अपितु समस्त हिन्दी साहित्य-जगत के आधुनिक हिन्दी हस्ताक्षरों में सर्वाधिक सुवर्णमय सौम्य समीर लाल जी के ब्लाग उड़न तश्तरी - udantashtari.blogspot.com पर पढ़कर पता चला कि उनकी अपनी माँ के पावन पद्मपदों के प्रति कितनी अप्रतिम
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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दो दो घर इक आदमी रहता फ़िर भी तंग

बचपन से था ख्वाब इक उड़ूँ हवा के संग।मैं भी ज्यों आकाश में उड़ते सभी विहंग॥१॥धीरे धीरे पर हुआ मुझको भी मालूम।बिना पंख नहीं आदमी सका व्योम को चूम।।२॥मुझको जब जब दीखते नभ में वायुयान। उड़ने को व्याकुल हुआ तब तब मैं नादान॥३॥हवई जहाज में बैठ कर सात समन्दर पार।आ
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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विजयघोष बोस का

पड़ा कर्ण कुहरों में क्रन्दन करुण स्वरभारत माता का, तो हो उठा वो करुण था।हुआ नष्ट परतन्त्रता का तमतोम तभीतमतमा उठा तीव्रतेज से तरुण था॥मारे डर के जा घुसे सब वैरी विवरों में,विश्व वन्दनीय वरणीय वो वरुण था।फौज में था ओज क्रांति अरुणाई छाई खिले-खुशियों के उर
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Jan 23 2010 11:07 AM
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भारतं विभासतां

हे विभो ! भवन्तु मे भारते सुनायका:।मोद शान्तिदायका: सुसम्पदा प्रदायका:॥हस्ति-तुल्य गर्जनं सिंह तुल्य नर्दनं,कुर्वतां रणाङ्गणे शत्रु-मानमर्दनं।कण्टकेन कण्टकं ये हरन्तु सत्वरं,सन्तु ते भुवि प्रभो! क्रान्ति-गीत-गायका:॥ये सदैव तन्वतां देशभक्ति भावनांभारतं
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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कुछ घटिया प्रवासी

लोहे की चिड़िया चढ़े आये देश सुदूर।कुछ ने ढूँढा रोकड़ा और कुछ ताकें हूर॥और कुछ ताकें हूर नूर है तनिक न जिनपे।रखते हैं वो रकम हरामी मोटी गिनके।।कहना इनको भारतीय बिल्कुल ना सोहे।लठ तुड़वाओ ऎसो पे पड़वाओ लोहे॥१॥ कुछ को नहीं मालूम है यहाँ प्रवासी कुछ ।भूल भाल निज
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Jan 23 2010 10:22 AM
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दो हजार दस ईसवी हुआ दीप प्रारम्भ।

नये साल के जश्न में लोग सभी खुशहाल।दुल्हनिया उम्मीद की पहिने चोला लाल॥लालपरी की बोतलों में पानी सा लाल।लल्लू जिस पै लुटा रहे पैसा बिना मलाल॥स्वागत में नये साल के छूटी स्वतः शरम।पी बोतल बूढ़े बदन होने लगे गरम ॥हट्टी पर लहरा रहे उल्लू गाँधी छाप।जबकी बापू
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Jan 01 2010 02:44 PM
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रावण:प्रतिनारायण क्रांतिकारी महाकविता

रावणः प्रतिनारायण प्रणेता-डॉ सत्यव्रत शर्मा"अजेय" अगम अगोचर ‘‘अजेय’’ अध्यक्षर जो उज्ज्वल-उदन्त, उदीरित त्रिभुवन में मनोरमा वह मणि-मुकुट- विमण्डिता शारदा असार में भी सार भर देती है। बुद्धि का प्रसार कर देती है सृजन में हो के जुष्ट-तुष्ट, पुष्ट करती अप
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Dec 29 2009 11:49 AM
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस-शतक

पूर्ण हों प्रयास सभी, प्यास न किसी की रहे , सुधा - वृष्टि कर हर। क्षुधा हर दीजिए । ज्ञान का प्रकाश मम, मानस में होवे सदा , उर में पुनीत भावनाएं भर दीजिए । बच्चा बच्चा नेता जी सुभाषचन्द्र बोस होवे , ऐसी नव - सृष्टि प्रभो ! अब कर दीजिए । वाणी में मिठास
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Dec 29 2009 11:49 AM
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योग और लोग

यों तो योग के नाम से लगभग हर आदमी परिचित है,विशेषतया स्वास्थ्य के प्रति जागरुक प्रत्येक व्यक्ति ।लेकिन योग के जानकार या साधक दुनिया में कितने हैं गणना करना बहुत मुश्किल है,क्योंकि सारी दुनिया में आज असंख्य लोग योग की क्रियाओं, आसन,प्राणायाम एवं ध्यान
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Dec 29 2009 11:49 AM
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राष्ट्रभाषा गान

राष्ट्रभाषा गान जय जय हृदय हुलासिनी हिंदी विश्वविकासिनीभाषा अभिलाषा अखिल राष्ट्र भारत की नित्यनवलपरिभाषा कल्याणि! वाणी नव आशा जननि! जन्मभूभाषा। तव स्वाध्याय से जागें सब उन्नति पथ लागें गायें तव गुणगाथा जन गण मन उल्लासिनीहिंदी सरल सुभाषिणी भाषा जय हे!
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Dec 29 2009 11:49 AM
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हरीतिमा:आचार्य पं.हरिसिंह त्यागी

हरि-महिमा तव महिमा से दिनकर द्योतित। तव आभा से शशि है शोभित।। नक्षत्रों से गगन विरंजित। विभुवर ! तुम करते हो मण्डित।।१।। तुमने बनाई पर्वत श्रेणी। शोभित ज्यों धरती की वेणी।। कल-कल करती सरिता बहती। पल-पल तेरी महिमा कहती।।२।। है गाम्भीर्य भरा शुचि सागर।
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Dec 29 2009 11:49 AM
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शहीदे आज़म प्रणेता आचार्य पं.हरिसिंहत्यागी

शहीद-स्मृति: मातृभूमि पर प्राण न्यौछावर करने वालों, याद रहेगी युग-युग तक बलिदान-कहानी। रक्त सींचकर बल-पौरूष से मरने वालों, भूल सकेगा क्या स्वदेश, बलिदान-निशानी।।१।। प्राण तजे अपनाया तुमने, अखिल देश को, छोड़ चले घर-बार, बचाया मातृभूमि को। राष्ट्र-प्रे
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Dec 29 2009 11:49 AM
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"वेदना" प्रणेता: आचार्य पं.हरिसिंह त्यागी

फोटो पर क्लिक करें! किसी का भला क्या, बुरा कर रहा हूँ। गरल पी चुका हूँ, गरल पी रहा हूँ।। किसी को रूलाना बुरा तो है लेकिन, किसी को हँसाना बुरा क्या है, लेकिन- हँसा ही रहा हूँ स्वयं को रूलाकर, कि जख्मों पे अपने, नमक मल रहा हूँ।।१।। दृगों के कणों से विज
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Dec 29 2009 11:49 AM
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Merry Christmas! & Happy New Year two thousand ten (2010) To every beautiful lady & every handsome man.

Dear Divine Messenger Please come close, come closer.The whole world awaits your word, sing out loud so you’ll be heard.Wonder ~ full is your vibration, dance in deepone’s celebrationQuench our thirst at Christmas time with your nectar: Divine wine.We
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Dec 26 2009 01:02 AM
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Deep Day poem:I am in between

You can’t see me because I am not a shining starYou are looking in the wrong placeI am in between.I can only be seen when everything becomes unseenWhat did you mean when you asked if I’ve been here all along?Like an infinite song.Mountains are trying to
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
टैग: deepone -poetry
Sep 17 2009 11:40 AM
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हिंदी दिवस की शुभकामनाय़ें

भारतमाता के भव्यभाल की है बिन्दी हिंदीपहचान आन बान शान स्वाभिमान है।न्यारी प्राणप्यारी प्रजा सारी बलिहारी भव्य-भाषा है हमारी दिव्य-देश हिंदुस्तान है॥चमाचम चमकेगी चारु चंद्रिका सी शुचिरुचिरा गंभीरा गिरा गरिमा महान है।देवभाषा सुता भद्रभाव भूषिता है
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
टैग: कविता
Sep 15 2009 10:51 AM
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हिंदी दिवस और महाकवि घासलेट

गतवर्ष हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में समायोजित कविसम्मेलन में "ढंग का एक दोहा भी न लिख सकने की क्षमता वाले" कुछ तथाकथित महाकवियों में हुए कलयुगी महाभारत से उत्तप्तहुआ दीप इस व्यंग के माध्यम से अपनी तपिश प्रगट करता है-हो सकता है कोई अभी भी जल उठे!किंतु दीप
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
Sep 15 2009 10:49 AM
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Who is meeting in heart?

Always beating in heart,Keep repeating in heart.Deeply treating in heartWho is meeting in heart? I can feel it some how?Need to deal with it right now.Just to heal heart know-how.Love repleting in heart.We are going to meet.We are growing to
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
टैग: deepone -poetry
Sep 01 2009 11:18 AM
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Unachievable O beloved one!

Unachievable O beloved one! So uniquely unbelievablyCrystal clear your eyes are Glowing, showing all hidden love. Unconditional your pure loveSure cures, secures cordiallyEveryone’s feelings, emotionsWith up flowing love above.Unknowingly how do you do
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
टैग: deepone -poetry
Aug 28 2009 11:04 AM
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संस्कृत बोलचाल की भाषा थी भाग २

वीडियो के लिए नीचे दबाएं--- http://www.youtube.com/watch?v=WBU1homHMVs
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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मसीहा:आचार्य संदीप त्यागी

साज ही न बजता जिस पै ,वो भी कोई वीणा है, जिसमें ना चमक हो कोई,वो भी क्या नगीना है। क्या जतन बिना भी मनुवा जीना कोई जीना है।। पगले नाम जिन्दगी ना ऐश औ आराम का, मस्ती भरी सुबहा का, ना रंगीली शाम का। असलियत में जिंदगी तो खून औ पसीना है।। तिनका तिनका जोड
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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हो मुबारक साल ये तुमको नया

मार्च: 'शुभकृत्' नामक विक्रम सम्वत्सर 2066 प्रारम्भ, नवसंवत्सरोत्सव, नवपंचांग फल-श्रवण, ध्वजारोहण, वासंतिक नवरात्र प्रारम्भ, कलश (घट) स्थापना, आरोग्य व्रत, तिलक व्रत, विद्या व्रत, गुडी पडवा (महाराष्ट्र), डॉ. हेडगेवार जयंती, गौतम ऋषि जन्मतिथि, आर्य सम
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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हे ईश !

हे ईश! तेरी याद में सब कुछ भुला दिया। महिमा ने तेरी मन सुमन मेरा खिला दिया।। पाने को तुझको उम्र भर ढूंढा कहाँ नहीं। रहता तू जर्रे जर्रे में फिर क्यों मिला नहीं।। बस लेके नाम ही तेरा जीवन बिता दिया....... तूफान आँधी में सदा ’संदीप‘ ये जला । बीहड़ अँधे
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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क्रांतिकाव्य चंद्रशेखर "आज़ाद" शतक

मंगलाचरण होवे हर क्षण जन-जन का मुदित मन, देश भक्ति-भागीरथी बहे रग-रग में। सदा धर्म संस्कृति व सभ्यता का हो विकास, सत्य का ‘‘संदीप’’ जले जगमग-जग में।। चले जायें चाहे प्राण रहे किन्तु आन-बान, साहस भरा हो भगवान ! पग-पग में। चन्द्रशेखर ‘आज़ाद’ जैसे वीर-पु
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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भावों का ज्वार

भावों का ज्वार हृदय सागर में उठता है। मुखचन्द्र तुम्हारा जब खिड़की से दिखता है।। लहरों सी बाहें उठतीं जिस पल छूने को । यह चाँद सा चेहरा तभी तुम्हारा लुकता है।। हो जाता है मुझपर सवार दीवाना पन। जानम जब जुल्फों का चिलमन घन झुकता है।। आँखे कर रहीं बयां
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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मूर्खों का स्वर्ग

ठंडी ठंडी हवा हड्डियों के अंदर तक जा जाकर मज्जा तक को ऐसे जला रही थी कि जैसे कोई प्रवासी डाक्टर तल्लीनता के साथ अपनी देसी ब्याहता की हिमखण्ड से सिकाई कर रहा हो। मेरी गाड़ी में चारों पहिये यों तो टायर वर्ड से नये डल गये हैं लेकिन कार का हीटिंग सिस्टम ठ
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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प्रहरी सजग हम

प्रहरी सजग हम ,कर्णधार देश के हैं , खुद मिट जायेंगे या रिपु को मिटायेंगे। कोई मातृभूमि पर ,नजर उठायेगा तो, कर देंगे नेत्रहीन,फाँसी प झुलायेंगे।। जलते संदीप सम करते प्रकाश सदा चाहेगा बुझाना कोई उसी को बुझायेंगे। धाक पाक हम पर चाहेगा जमाना यदि कर देंगे
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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हो जाये सरकलम कलम ये नहीं रुकेगी।।

रुक जाये ये सूर्य, चाँद चाहे रुक जाये। रुक जाये ये सृष्टि चक्र चाहे रुक जाये।। रुक जाये ये वायु वेग जल का रुक जाये रुक जाये प्रश्वास श्वास चाहे रुक जाये जो मुझमें संदीप ज्योति वह नहीं बुझेगी हो जाये सरकलम कलम ये नहीं रुकेगी।। उदय अस्त न होवें चाहे सू
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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आज़ाद बलिदान दिवस

सन् इकत्तीस की है सत्ताईस फरवरी, बड़ी मनहूस न था पता ये आज़ाद को। सुखदेवराज को ले साथ अलफ्रेड पार्क, बैठ के विचारते थे दल के विषाद को।। पास से गुजरते जो देखा वीरभद्र को तो, चौंक पड़े चन्द्र तज दिया था प्रमाद को। शायद न देखा हमें, अभद्र ने यह सोच, दोनों
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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दैनिक जागरण से साभार

आज़ाद मेरे आदर्श हैं किशोरावस्था में लिखे क्रांतिकाव्य आज़ाद-शतक को पढ़्ने के लिये पुन:ब्लॉग पर आएं। Feb 26, 12:19 pm नई दिल्ली। अंग्रेजों को नाकों चने चबवाने के चंद्रशेखर आजाद के किस्से हर भारतीय जानता है। आलम ये था कि जब पंडितजी को जिंदा पकड़ने की अंग्
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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होली

सात जनम तक भी ना छुटेगा याद रहेगा सारी उमर। प्रेम रंग में रंग डालेंगे दिलवर तेरे दिल की चुनर।। कंचन काया पिचकारी की बौछारों से तर होगी। लाल गुलाल की लाली निराली गोरे गालों पर होगी।। रंग बिरंगी कर देंगे प्रियतम हम तोरी पतरी कमर ।।। भागोगे जो दूर तुम ह
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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सो रहा क्यों नौजवां ?

है अशान्त देश फिर भी सो रहा क्यों नौजवां ? बीज खुद ही दासता के बो रहा क्यओं नौजवां ? सरहदों पे शत्रुसेना युद्ध के लिए खड़ी। बिलख रही है सभ्यता व संस्कृति कहीं पड़ी।। कायरों की भाँति किन्तु रो रहा क्यों नौजवां ? शिवा प्रताप जैसे वीर लुप्त हो गये कहाँ। घ
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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प्यार करते हैं बेइन्तहा

प्यार करते हैं बेइन्तहा इम्तहां चाहे ले ले जहाँ। हम ना होंगे ज़ुदा जाने जाँ हम हैं दो जिस्म और एक जाँ॥ चाँदनी चाँद में ज्यों बसी,फूल में है ज्यों मीठी हँसी। त्योंही उर में बसी उर्वशी छोड़कर तुम ये सारा जहाँ॥ सुन हकीकत ऐ हुस्ने परी,मैं हूँ शायर हो तुम श
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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गर्म अश्कों में जल रही होंगी

गर्म अश्कों में जल रही होंगी, सुर्ख़ आँखें पिघल रही होंगी। ले मिलन की नवीन उम्मीदें, आहें दिल से निकल रही होंगी॥ नज़र से वो सभी की बच बचके, मुँह गीले सिरहाने पै रख के। पड़ीं होंगी जुदाई में तनहा, सिसकियाँ उनकी चल रही होंगी॥ सर्द रातों में ठंडे बिस्तर पर
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
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हमें मोहरा बना के चाल ना चलना प्यारे

हमें मोहरा बना के चाल ना चलना प्यारे । हम भी शतरंज के माहिर हैं संभलना प्यारे ॥ जिच को जाँचे बिना परखे बिना घोड़ों को ना छू, हाथियों से नहीं प्यादों को कुचलना प्यारे॥ मानते हैं बड़ा शातिर है तू सियासत में। देख के पर बिसात अपनी उछलना प्यारे ॥ पैनी पैनी
 
आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"