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अप्रवासी उवाच (Apravasi Uvach)

http://apravasiuvach.blogspot.com/
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31 May 2010
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नई कार

मुनरो - कार उत्पादन के ब्रह्माण्ड के केंद्र बिंदु डेटरोइट के दक्षिण में छोटा सा शहर....इस शहर की जिन्दगी स्थानीय फोर्ड प्लांट से शुरू होकर वहीं खत्म हो जातो है...वर्षों से यह प्लांट पीढ़ियों को पालता आ रहा था. इस शहर में फोर्ड के प्रति लोगों की आस्था कुछ
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बोले तो...आज अपुन का डबल हैप्पी बर्डडे है

एक लम्बे अंतराल के बाद लिखने बैठा हूँ... आज एक वर्ष पूर्व १ फरवरी के ही दिन से अपनी व्यक्तिगत ३६वीं सूर्य परिक्रमा के प्रारंभ के साथ मैंने चिठ्ठाकारिता की शुरुआत की भी थी. आज जब चिठ्ठा-जगत में लिखते-पढ़ते (लिखते कम, पढ़ते ज्यादा) भूमिरथ पर बैठकर कर
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करवा-चौथ: एक आपबीती

कुछ भारतीय चलचित्रों और कुछ उत्तर भारतीय परम्पराओं की धरोहर के नाते हमारी वर्तमान पीढी अपनी तथाकथित आधुनिकता और प्रगतिशीलता के परिवेश में भी अपनी जड़ों से जुड़े होने की चाह से मुक्त नहीं हो पाती. करवा-चौथ भी एक ऐसा ही दिन है जिस दिन कितने भी प्रगतिशील
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क्या हमने गाँधीवादी तरीकों का दुरूपयोग किया हैं?

इस माह के प्रारंभ के साथ ही सारा राष्ट्र गाँधीमय हो जाता है...अब तो बापू के जन्मतिथि को वैश्विक स्तर पर "अहिंसा दिवस" घोषित करके संयुक्त राष्ट्र ने भी गाँधी-सिद्धांतों का अनुमोदन कर दिया है. और रही सही कसर इस ब
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क्या आपके साथ भी ऐसा होता है...

कई दिनों से लिखने का प्रयास कर रहा हूँ परन्तु पता नहीं क्यों कोई भी लेख पूरा नहीं कर पा रहा हूँ... ऐसा भी नहीं कि विषय नहीं मिल रहा. विषयों की विवधता भी कम नहीं हैं, किन्तु जब भी कुछ शुरू करता हूँ अधलिखा लेख छोड़ कर उठ जाता हूँ, विचार पूर्णता और
Sep 27 2009 05:33 PM
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क्या दुनिया हिंदू हुई जाती हैं?

इस बार के "न्यूज़ वीक" के संस्करण में लिसा मिलर का एक लेख "वी आर आल हिंदू नॉव ("We Are All Hindus Now ") प्रकाशित हुआ है। इस लेख में अमेरिका में बढती सामाजिक विवधता के कारण आने वाली सामाजिक सोच और बहु-पंथ स्वीकारता के विषय में चर्चा हैं...और साथ ही इस
Sep 03 2009 07:41 AM
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विदेशी बाबाओं और तांत्रिकों का खेल

आज थोडी देर पहले यह ख़बर पढ़ी कि ब्रिटेन में बसने वाले तांत्रिक, ओझाओं और बाबाओं की अब खैर नहीं और उनके विरूद्व कड़ी कार्यवाही की जायेगी। मन ने हर्ष से किसी उच्छृंखल मृग की तरह कुचालें भरनी शुरू कर दी कि चलिए भारतीयता और पुरातन शास्त्र के ज्ञानी होने के
Aug 30 2009 10:18 PM
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नस्लभेदी माइक्रोसॉफ्ट ?

भारत में जातिप्रथा उन्मूलन को लेकर हमेशा ही विवाद बने रहते हैं। और इसमे कोई अतिशयोक्ति भी नहीं हैं कि कागजी उन्मूलन के बावजूद चुनावी गणित से लेकर सहज ग्रामीण जीवन में इसके लक्षण दिख ही जाते हैं। किंतु अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मूल रूप से नस्ल भेदी आचरण कम ही
Aug 30 2009 07:30 PM
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महापुरुषों की आलोचना और हम

आज सायंकाल मैं राजशेखर व्यास लिखित पुस्तक "सरहद पार सुभाष - क्या सच:क्या झूठ!"पढ़ रहा था। इस पुस्तक में भी नेताजी सुभाष चाँद बोस और पंडित नेहरू के रिश्तों पर चर्चा के दौरान कुछ पंक्तिया ऐसी मिली जिसमे महापुरुषों के सम्बन्ध में हमारी भारतीय मानसिकता का
Aug 29 2009 09:30 AM
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भाजपा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की विडम्बना ही हैं कि सारे के सारे मुख्या-धारा के राट्रीय राजनैतिक दल लोकतान्त्रिक दलगत ढांचे में विश्वास नहीं करते हैं। हमारी कांग्रेस जहाँ राजवंश मोह से च्युत नहीं हो पाती, वहीं बासपा बहन जी से बाहर नहीं सोच सकती हैं,
Aug 24 2009 07:27 AM
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इस छोटे से बालक से कौन डरेगा

अप्रवासी जीवन की सबसे बड़ी असमंजस भरी बात होती हैं कि "साम दाम दंड भेद" किसी भी जुगत से अपने बच्चों को अपने व्याप्त देसीपन की घुट्टी कैसे परोसी जाए। इसी ध्येय से प्रेरित होकर हम अक्सर ही बच्चों को कुछ न कुछ भारतीय परोसते रहते हैं.... फ़िर चाहे वो भारतीय
Aug 22 2009 10:30 PM
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स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।।नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमेत्वया हुन्दुभुमे सुखं वर्धितोहममहामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थेपतत्वेष कायो नमस्ते नमस्तेआज राष्ट्र उत्थान की कामना के साथ औरस्वतंत्रता पथ न्यौछावर अमर शहीदों की स्मृति के साथअपने भेदभावों को बिसराकर आओ प्रण
Aug 15 2009 10:39 AM
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दीनानाथ

उम्र के आखिरी पड़ाव की ओर बढती हुई एक काया, जिसके बाल, शरीर और चहरे की झुरियां नून- रोटी की रोज- रोंज की जदोजहद की कहानी अपने आप बयाँ करते हैं। उसके चहरे पर के झूठी खुशामद करती हुई मुस्कान हमेशा कुछ यूँ चस्पा रहती कि उसकी आँखों की ज़ुबानी अपने फरेबीपन
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हिंदू भावनाओ का तिरस्कार क्यों करती हैं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ

अभी हाल में ही स्पेन में बर्गर किंग ने माँ लक्ष्मी के साथ अपने गौ-मांस युक्त बर्गर 'Texican Whopper' का प्रचार शुरू किया ( देखें )। इस बर्गर को माँ लक्ष्मी के साथ दिखाकर टैग लाइन थी - पवित्र स्नैक। हिंदू के व्यापक विरोध के बाद ये प्रचार सामग्री आनन-फ
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ज़रदारी की स्वीकारोक्ति: पाकिस्तान का भस्मासुर

आज 'टाइम ऑफ़ इंडिया' की वेबसाइट पर यह ख़बर (" Pak created and nurtured terrorists: Zardari ") पढ़ते-पढ़ते मैं ठिठक गया। न तो इस ख़बर में कोई नई बात, न ही कुछ नवीन जानकारी। फ़िर भी जिस बात ने मुझे चौकाया वो थी पाक राष्ट्रपति के द्वारा स्वीकारोक्ति। उनक
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ढोल,गँवार ,सूद्र ,पसु ,नारी... की चौपाई अप्रवासी की दृष्टि से

अभी कुछ दिनों पूर्व ' बालसुब्रमण्यम जी' के चिठ्ठे को पढ़ रहा था। उन्होंने तुलसीदास के हिन्दी भक्तिकाल को योगदान के विषय में लिखा हैं। तुलसीदास मेरे भी प्रिय रचनाकारों में से हैं। तुलसी राम चरित मानस के साथ ही हम बड़े हुयें हैं। मुझे अपने दादाजी याद आत
Jul 05 2009 10:45 AM
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जय हो: बैले और भरतनाट्यम

ग्रीष्म काल के आगमन के साथ ही यहाँ अमेरिका में विभिन्न विद्यालयों के सत्र समाप्ति की ओर हैं। इसी क्रम में हमारी पुत्री के नृत्य कक्षाओं का भी समापन गत सप्ताह हुआ। हमारी बिटिया रानी भी दो विभिन्न नृत्य विद्यालयों में पश्चात् और भारतीय नृत्य शैलियाँ सी
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क्या सिक्किम में पुनः चुनाव होने चाहिए

अभी- अभी यह ख़बर पढ़ी कि सिक्किम डेमोक्रेटिक पार्टी [एसडीएफ] ने सिक्किम की सभी विधानसभा सीटों और एकमात्र लोकसभा सीट पर बहुमत हासिल कर लिया हैं। सम्पूर्ण सिक्किम में एक भी अन्य दल एक भी सीट न पा सका। सम्पूर्ण सिक्किम विधानसभा विपक्ष विहीन हैं। लोकतंत्र
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रसीदी

आज घर की सफाई के दौरान जब सारी सर्दियों भर की रद्दी उठा कर बेसमेंट में रखने गया तो अनायास ही उसका ख्याल आ गया। गर्मी के आगमन के साथ ही बाहर पसरी पड़ी बर्फ ने अपने पाँव सुकड़ने शुरू कर दिए थे अतः नयी नवेली कोमल धूप का आनंद लेने जबतक मैं चाय की प्याली क
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प्रधनमंत्री पद के लिए खुली बहस: किनती आवश्यक

अभी हाल में ही अडवाणी जी ने मनमोहन सिंह जी को टीवी पर खुली बहस के लिए चुनौती दी थी। वैसे तो इस बहस पर कांग्रेस की तरफ़ से आशानुरूप कोई जवाब नहीं आया। हाँ, दिग्विजय सिंह जी ने इसे सस्ती लोकप्रियता का टोटका करार दिया ( देखें ) और दूसरी ओर मल्लिका साराभ
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मत क्रय : लोकतंत्र की एक और पराजय

लोकतंत्र की अपनी श्रेष्ठताओं के बीच कई त्रुटियां भी हैं। जैसेकि संख्या-बल की महत्ता अक्सर ही नैतिक आदर्शों को हाशिये पर धकेल देती हैं। संख्या-बल के ही कारण भारतीय लोकतंत्र जातिवाद, प्रांतवाद, भाषावाद और (धार्मिक) आस्थावाद के अवसादों से ग्रस्त हैं। इस
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अपरिपक्वता की सज़ा...

वरुण गाँधी पर रासुका? भारत के चुनावी माहौल में जहाँ वोटों के लिए क्या-क्या नहीं होता ...बाहुबली और माफिया बन्धुओ से भरी संसद में जहाँ आचार संघिता की बात भी मजाक लगती हो, जहाँ चुनाव के दौरान अथवा अन्यत्र भी भारत, भारत के सविधान को राजनैतिक लाभ हेतु ने
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यह तो मेरे ख्याबों का भारत नहीं...

भारतीय लोकतंत्र का महासमर शुरू हो चुका हैं। जिस प्रकार होलिका दहन के पश्चात् होली शुरू हो जाती हैं उसी प्रकार चुनाव आयोग की घोषणा के बाद भारतीय लोकतंत्र में कीचड़ उछाल होली शुरू हो चुकी हैं... परन्तु भारतीय लोकतंत्र तो शर्मसार करने के लिए वरुण गाँधी
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कुँआनो का घाट

कुछ समय पूर्व की बात है, मैं सपरिवार अपने ही शहर में स्थित एक झील, केंसिंग्टन, पर पिकनिक मानाने गया था। वहीं झील सारे बच्चे झील के जल में क्रीडा कर रहे थे और मैं तट पर बैठ कर उनकी शैतानियों का आनंद ले रहा था। उनकी जल क्रीडा देखकर मन सहसा ही अतीत के क
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...और कुछ ब्लॉग (चिठ्ठे) कुंवारे ही रह गए

अभी कुछ दिनों पूर्व ब्लॉग वाणी पर काजल कुमार जी का एक कार्टून देखा था ( kajalkumarcartoons: कार्टून:- जब इस ब्लॉगर का पाँव भारी होता है.. ) जिसमे एक ब्लॉगर की व्यथा गाथा थी। बेचारा ब्लॉगर चिकित्सक से परामर्श ले रहा होता हैं की पोस्ट लिख कर बेचैनी रहत
Mar 23 2009 10:14 PM
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बेबी सिट्टर (बाल संरक्क्षिका)

वैलेंटाइन दिवस के उपलक्ष्य में हमारे क्षेत्र के कई जलपान गृहों ने केवल युगल जोडो के लिए विशेष समारोह का आयोजन किया था। इस कारण हमारी मित्र-मंडली एक बेबी सिट्टर की तलाश में थी। हम लोग जानकारी एकत्र कर थे। हमारे एक मित्र हैं टीपू खान जोकि कुछ समय पूर्व
Mar 23 2009 10:14 PM
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विप्र स्नानं पखे पखे

अभी कुछ देर पहले दैनिक जागरण पढ़ रहा था कि एक समाचार पढ़ते हुए ठिठक गया। समाचार ही कुछ अटपटा था - " नाराज बेटे ने किया मां के खिलाफ केस "। शीर्षक पढ़कर लगा कि अपने किसी देहात का किस्सा हैं। "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी" में आस्था रखने वाले मन सह
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पादुका महिमा

आज शाम से मन में जूता छाया हुआ हैं। कुछ गंभीर मन्नन का मन भी नहीं हैं (आख़िर रविवार की शाम जो हैं) तो सोचा इसी विषय पर विचार उद्धत करुँ। अब आप भी सोचेंगे कि बैठे बठाये यह जूता चर्चा कहाँ से आ गयी। चलिए इस संशय को भी दूर कर दूँ । हुआ यूँ कि हम आपनी सा
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अभिनन्दन के वैश्विक तरीके और अप्रवासी जीवन

अब जब ब्लॉग ( चिठ्ठा) लिखना शुरू करही दिया हैं तो हमने सोचा कि चलो देखे दीन- दुनिया में लोग क्या लिख रहे हैं। अपने इसी बंजारेपन में भटकते हुए हम ममता जी के एक लेख से टकराए। ममता जी उत्तर प्रदेश से निकल कर गोआ के सामाजिक परिवेश में रचने बसने के लिए प्
Mar 23 2009 10:14 PM
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मिथुन दा की अपील: एक सार्थक शुरुआत

अभी-अभी कुछ देर पहले "डांस इंडिया डांस" की जनता चुनाव के लिए खुली पहली कड़ी देखी। यहाँ हमारे क्षेत्र में केबल पर केवल भारतीय चैनल के नाम पर जी टीवी आता हैं। पिछले कई रियलिटी शो में मैं देखता आया हूँ कि प्रतियोगियों के चयन में क्षेत्रवाद जमकर हावी रहत
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दिल में होली जल रही हैं...

सर्वप्रथम सुश्री पाठकों और सम्पूर्ण चिठ्ठा-जगत को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ। हाय! अप्रवासी जीवन.... होली आई और चुपचाप चली जा रही हैं...न कोई हुडदंग न ही होली की उमंग... कार्यालय में बैठकर अपने संगणक पर देश-दुनिया से आयी बधाई याँ पढ़ रहें हैं और वही न
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नेताओ को परखने की कसौटी

मैंने Lee Iacocca (ली आईकोक्का) की लिखित पुस्तक "वेयर हव आल द लीडर्स ग़ौन?" (Where have all the Leaders Gone?) अभी हाल में ही पढ़ी। यह ली आईकोक्का ही वह महाशय हैं जिन्होंने डूबने की कगार पर बैठी क्र्य्स्लेर (Chrysler) कंपनी को सन् १९८० में न केवल उबारा
Mar 22 2009 06:18 AM
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लालू जी का कंप्यूटरवा

मित्रों, आमतौर पर, मैं इस तरह के विषय अपने चिठ्ठे पर प्रकाशित नहीं करता किंतु हमारे प्यारे टीपू खान साहब ने मुझे कुछ देर पहले एक मेल भेजी थी। (ये वही टीपू भाई हैं जिनका जिक्र मैंने आपसे बेबी सीटर वाली घटना में किया था।) उन्होंने लालू जी के संगणक की क
Mar 22 2009 06:18 AM
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राणा सांगा के पास डॉक्टर नहीं था क्या?

मैं आमतौर पर शाम को ऑफिस से आकर, चाय की चुस्कियों के साथ अपनी थकान मिटाता हूँ । डेटरोइट की हाड-कंपा देने वाली बर्फीली सर्दी में गरम चाय का आनंद ही अलग होता हैं। इसी समय ज़ी चैनल पर अन्तराष्ट्रीय दर्शको के लिए ख़बर भी आती हैं जोकि सोने पे सुहागा का काम
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...वो स्कूल छोड़कर देखी पहली पिक्चर

अनिल पुसदकर जी ने अपने नए चिठ्ठे " स्कूल से भाग कर जहां क्रिकेट खेलते समय पकड़ाया था आज वहां का ……………। "से हमे भी हमारे बचपन के दिन याद दिला दिए और साथ ही हिम्मत बढाई कि हम भी अपने बचपन कि एक घटना ब्लॉग जगत और साथ ही अपने परिवार (हमारी पत्नी एवं अन्य
Mar 22 2009 06:18 AM
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बेवफाई मेरी आदत नहीं, मजबूरी हैं!!

हम बेवफा हरगिज़ न थे, पर हम वफ़ा कर न सके हमको मिली उसकी सज़ा, हम जो खता कर ना सके हम बेवफा हरगिज़ न थे, पर हम वफ़ा कर न सके फ़िल्म शालीमार का यह प्रसिद्ध किशोर दा का गीत किसे याद न होगा। कुछ दिनों पूर्व दैनिक जागरण का एक लेख पढ़ रहा था कि " क्यों सोचते
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दिल में होली जल रही हैं...

सर्वप्रथम सुश्री पाठकों और सम्पूर्ण चिठ्ठा-जगत को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ। हाय! अप्रवासी जीवन.... होली आई और चुपचाप चली जा रही हैं...न कोई हुडदंग न ही होली की उमंग... कार्यालय में बैठकर अपने संगणक पर देश-दुनिया से आयी बधाई याँ पढ़ रहें हैं और वही न
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नेताओ को परखने की कसौटी

मैंने Lee Iacocca (ली आईकोक्का) की लिखित पुस्तक "वेयर हव आल द लीडर्स ग़ौन?" (Where have all the Leaders Gone?) अभी हाल में ही पढ़ी। यह ली आईकोक्का ही वह महाशय हैं जिन्होंने डूबने की कगार पर बैठी क्र्य्स्लेर (Chrysler) कंपनी को सन् १९८० में न केवल उबारा
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लालू जी का कंप्यूटरवा

मित्रों, आमतौर पर, मैं इस तरह के विषय अपने चिठ्ठे पर प्रकाशित नहीं करता किंतु हमारे प्यारे टीपू खान साहब ने मुझे कुछ देर पहले एक मेल भेजी थी। (ये वही टीपू भाई हैं जिनका जिक्र मैंने आपसे बेबी सीटर वाली घटना में किया था।) उन्होंने लालू जी के संगणक की क
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राणा सांगा के पास डॉक्टर नहीं था क्या?

मैं आमतौर पर शाम को ऑफिस से आकर, चाय की चुस्कियों के साथ अपनी थकान मिटाता हूँ । डेटरोइट की हाड-कंपा देने वाली बर्फीली सर्दी में गरम चाय का आनंद ही अलग होता हैं। इसी समय ज़ी चैनल पर अन्तराष्ट्रीय दर्शको के लिए ख़बर भी आती हैं जोकि सोने पे सुहागा का काम