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तेरे नाम........यही तो है।

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18 Apr 2010
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सानिया मलिक!!!!!!!?????

 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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तेरे नाम........यही तो है।

अभी ना जाओ की तारों का दिल धडकता है, तमाम रात पडी है, जरा ठहर जाओ॥ ****************************गोविन्द K.
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
Dec 29 2009 11:53 AM
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इस तरह तो किसी को........

जानवर*~*~*~*~*~*~* टुटा हुआ शीशा फिर जोड़ा नहीं जाता आँख से निकला हुआ आँसू फिर वापस नहीं आता तुम तो कह कर भुल चुके हो सब कुछ लेकिन मुझसे वो पल भुलाया नहीं जाता तेरी मोहब्बत ने जंजीरे डाली है ऐसी कि छुड़ाना भी चाहुँ तो छुड़ाया नहीं जाता महफिल में भी मुझ
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
Dec 29 2009 11:53 AM
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जब भी टुटेगा......

जानवर*~*~*~*~*~*~* रोना भी जो चाहें तो वो रोने नहीं देता, वो शख्स तो पलकें भी भिगोने नहीं देता... वो रोज रुलाता है हमें ख्वाब में आकर, सोना भी जो चाहें तो वो सोने नहीं देता..... ये किस के इशारे पर उमड़ आये है बादल, है कौन जो बारिश कभी होने नहीं देता..
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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तुम्हारे बिना ये भी तो...........

जानवर *~*~*~*~*~*~* दिल जलेगा तो जमाने में उजाला होगा, हुस्न जर्रों का सितारों से निराला होगा. कौन जाने ये मुहब्बत कि सज़ा है की सिला, हम “साहिल" पर पहुँचे तो किनारा ना मिला. बुझ गया चाँद किसी दर्द भरे दिल की तरह, रात का रंग अभी और भी काला होगा, देखना
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
Dec 29 2009 11:53 AM
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कभी तो........

जानवर~*~*~*~*~* रात में ख्यालों में आती हो तुम, कभी सामने आकर भी देखो! हम से बातें तो रोज करते हो तुम, कभी हमारी तरफ मुस्कराकर भी देखो! हमारी नज़र बहुत कुछ कह देती है, कभी हमें नज़रों से समझ कर तो देखो! हमसे दोस्ती का रिश्ता है तुम्हारा, कभी हम से दिल
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
Dec 29 2009 11:53 AM
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जब भी तुम्हारी याद.......

जानवर~*~*~*~*~*~ ऎ बेवफा जिन्दगी क्यों मुझसे दगा करती हो? जो भी बना अपना, उसे पराया करती हो, चाहा जो मुस्कुराना तो आँखे भीगोती हो. अब यहाँ कोई नहीं, क्यों इन्तजार करवाती हो? कौन है यहाँ जो सुलझाये उलझी जुल्फ़ें, क्यों टूटे दिलों को युं जलाती हो? अगर ग
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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ऐसा तो नहीं होता है???

जानवर*~*~*~*~**~*~*~* धुंआ बना कर फिज़ा में उड़ा दिया मुझको, मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको. खड़ा हुं आज भी रोटी के चार टुकड़ों के लिये, सवाल यह है किताबों ने क्या दिया मुझको??? सफैद रंग कि चादर लपैट कर मुझ पर, बिजुका की तरह खैत पर किस ने सजा दिया
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
Dec 29 2009 11:53 AM
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सिर्फ एक बार....

जानवर* ~* ~* ~* ~* ~* तेरे होठों की हंसी बनने का ख्वाब है, तेरे आगोश मे सिमट जाने का ख्वाब है, तु लाख बचाले दामन इश्क़ के हाथों, आंसमां बनके तुझ पर छा जाने का ख्वाब है, आजमाईश यु तो अच्छी नहीं होती इश्क़ की, तु चाहे तो तेरी तकदीर बनाने क ख्वाब है, वो म
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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वो भी एक वक्त था.....

मैंने कहा था ना कि मैं तुम्हारे ख्वाबों में आऊँगी, इसी कारण सजने को- कल बाग में गई थी मैं, मेंहदी लाने। निगोड़े काँटे, शायद दिल नहीं है उनमें, चुभ कर मुझमें, मुझे रोक रहे थे। लेकिन तुमसे वादा किया था ना मैंने, इसलिए बिना मेंहदी लिए मैं लौटती कैसे। फिर
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
Dec 29 2009 11:53 AM
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<<<<<गोविन्द K.>>>>>>

जानवर*~*~*~* चलो फिर ख्वाब देखते है दिल कि ज़मीन में उम्मीद के कुछ बीज बोते है बे मन्ज़िल सफर में गुबार से अटे चेहरे को धोते है चलो हम फिर से कोई ख्वाब देखते है गुलशन-ए-दिल में नये मौसम उगाते है किनारों की ख्वाहिश में भीगे बदन को फिर से सुखाते है फिर क
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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तु जो नहीं..........कुछ भी नहीं

*~*~*~*~*~*~*जानवर*~*~*~*~*~*~*अगर गुफ्तगु का आगाज में करताझिझकती, बिगड़ती मगर मान जातीजो मैं बढ़ कर उसके कदम रोक लेतावो पांव पटकती मगर मान जातीअगर चंद कलियाँ उसे पैश करतावो दामन झटकती मगर मान जातीमैं कहता ‘चलों तुम को घुमा कर लाता हुँ’अकड़ती, झिझकती मगर
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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हा फिर भी ऐसा ही हो..........

*~*~*~*~*~*~*जानवर*~*~*~*~*~*~*फूल को छुने की खातिर कांटो से जख्मी होते हैजो झोली में आ गिरते थे उन्हें छुने से डर जाते हैजब बारिश बरसा करती थी...हम छतरी में छुप जाते थेऔर जलती धुप में नंगे पांव हम छत पर उछला करते थेजब पास वो होता था तो हम देख उस उसको ना
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
Jul 25 2009 05:40 PM
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इसीलिये तो........

जानवर*~*~*~*~*~*~* जमीन थी मेरी......मगर आसमां उसका का था इसी लिये मुझे खुद पर........ गुमान उसका था मैं अब जो धुप में जलता हुं......उसी का है करम मैं जिसकी छांव में था.......वो पेड़ का था वो जिसके वास्ते लड़ता रहता था मैं सबसे मेरे खिलाफ़ ही...........
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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तेरे नाम........यही तो है।

जानवर*~*~*~*~*~*~* जब तेरी याद में यह दिल मचल जाता है आँख बन्द करता हूं और अश्क निकल जाता है तेरी तस्वीर को सीने से लगा कर जब मैं खुब रो लेता हुँ तो दिल बहल जाता है मेरे जिस हाथ ने थामा था कभी तेरा हाथ दिल पर वो हाथ रखुं, दिल संभल जाता है तेरी “खुशबु
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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तुम्हें मैं याद आती हुँ?

जानवर*~*~*~* अजब पागल सी लड़की है, मुझे हर खत में लिखती है “मुझे तुम याद करते हो? तुम्हें मैं याद आती हूँ?" मेरी बातें सताती है, मेरी नींदें जगाती है, मेरी आँखे रुलाती है, दिसम्बर की सुनहरी धूप में अब भी टहलते हो? किसी खामोश रास्ते से कोई आवाज आती है?
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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अगर तुम...एक बार....

जानवर*~*~*~*~*~*~* मेरी जिन्दगी का तसव्वुर मेरे हाथ की लकीरे, इन्हें काश तुम बदलते तो कुछ और बात होती. ये खुले-खुले से गेसू, इन्हें लाख तुम संवारो, मेरे हाथ से संवरते तो कुछ और बात होती. मैं तेरा आईना था, मैं तेरा आईना हुँ, मेरे सामने संवरते तो कुछ औ
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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कोई तो बात है......

जानवर *~*~*~*~*~*~* गमों की जमीन पर कोई “खुशी" का मचान नहीं है, क्या हुं? कौन हुं मैं? मुझे अपनी पहचान नहीं है, काश!!! उड़ पाता कहीं ऊँचे अपने यह पँख फ़ैला कर, अफ़सोस!!! मेरे मुकद्दर में कहीं आसमां नहीं है, भीड़ में रह कर भी रहा हुँ सदा तन्हा मैं, मेरे ल
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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ये सोचना की मैं.......

जानवर*~*~*~*~*~*~*~*~*~* कहीं चांद रातों में खो गया, कहीं चांदनी भी भटक गई, मैं चराग, वो भी बुझा हुआ, मेरी रात कैसे चमक गई? मेरी दास्तान को आरजु थी, तेरी नरम पलकों की छांव में, मेरे साथ था तुझे जागना, तेरी आँख कैसे झपक गई? भला हम मिले भी तो क्या मिले
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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कैसे भी हो.....

जानवर~*~*~*~*~* बहारों में पतझड़ के साये है, नजारों पर अन्धेरे से छाये है, फुलों के दामन में कांटे है, बागों में फैले सन्नाटे है, कोयल की कूक अनजानी है, हंसी की आँखों में पानी है, खुशनुमा झोंकों में महक नहीं, आसमां में पंछियों की चहक नहीं, ख्यालों की
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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तुम ही तो थे.........

जानवर *~*~*~*~*~*~*~* तुम क्या जानों यादों में खो कर आँखें कितना रोती है, दिल में अपने दर्द समा कर आँखें कितना रोती है, तुम क्या जानों सावन का मौसम कितनी आग लगाता है, बारिश कि बुदों को छुकर आँखें कितना रोती है, अब तो छोटी सी बात पर भी यह दिल भर सा जा
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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वो महाराणा प्रताप कठे?

वों महाराणा प्रताप कठे? हळदीघाटी में समर में लड़यो, वो चेतक रो असवार कठे? मायड़ थारो वो पुत कठे?, वो एकलिंग दीवान कठे? वो मेवाड़ी सिरमौर कठे?, वो महाराणा प्रताप कठे? मैं बाचों है
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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बस अब आ भी जाओ......

जिस को देखूं साथ तुम्हारे , मुझ को राधा दिखती है, दूर कहीं इक मीरा बैठी, गीत तुम्हारे लिखती है। तुम को सोचा करती है, आँखों में पानी भरती है, उस पानी से लिखती है, लिख के ख़ुद ही पढ़ती है। यूँ ही पूजा करते करते, कितने ही युग बीत गाये, आँखें बंद किए आँख
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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तुम फ़िर भी......

जानवर************** कहा था ना इस तरह सोते हुए छोड़ कर मत जाना मुझे बेशक जगा देना, बता देते मुहब्बत के सफ़र मे साथ मेरे चल नहीं सकते, जुदाई के सफर में साथ मेरे चल नहीं सकते, तुम्हें रास्ता बदलना है मेरी हद से निकलना है, तुम्हें किस बात का डर था, तुम्हें
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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श्रीकृष्ण/ देवल आशीष की नज़र में

विश्व को मोहमयी महिमा के असंख्य स्वरुप दिखा गया कान्हा, सारथी तो कभी प्रेमी बना तो कभी गुरु धर्म निभा गया कान्हा, रूप विराट धरा तो धरा तो धरा हर लोक पे छा गया कान्हा, रूप किया लघु तो इतना के यशोदा की गोद में आ गया कान्हा, चोरी छुपे चढ़ बैठा अटारी पे
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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तुम तो ऐसे नहीं थे.......

जानवर*~*~*~*~*~* यही वफ़ा का सिला है, तो कोई बात नहीं, ये दर्द तुमने दिया है, तो कोई बात नहीं. यहीं बहुत है की तुम देखते हो "साहिल" से, मेरी कश्ती डूब रही है, तो कोई बात नहीं. रखा था आशियाना-ए-दिल में छूपा कर तुमको, वो घर तुमने छोड़ दिया है, तो कोई बात
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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ख्वाहिश.....

जानवर*~*~*~*~*~*~* काश मैं तेरे हसीन हाथों का कँगन होता, तु बड़े चाव से.....बड़े मन के साथ, अपनी नाजुक सी कलाई में चढ़ाती मुझको, और बेताबी से फुरसत के लम्हों में, तु किसी सोच में डूबकर जो घुमाती मुझको, मैं तेरे हाथ की "खुशबू" से महक-सा जाता, जब कभी मुड़
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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दु:ख

जानवर******* दु:ख अनमोल होते है, कुदरत कि दौलत है, कभी कुछ देकर जाते है, कभी सब छीन ले जाते है, कभी बैचेन करते है, कभी जीना सिखाते है, कभी बनाते है जब आंसू उम्र भर लहु के रुलाते है, कभी लबों की हँसी बन कर, नई दुनियाँ सजाते है, कभी मीठी कसक बन कर, अंज
 
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी