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फुरसत के रातदिन

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25 Apr 2010
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GHAZAL

छोड़ कर हम अना और हनक जाएँगेतेरे कूचे से पर बेधड़क जाएँगेक्या करें देख कर सब चटक जाएँगेदीदा ए कू ए जाँ में खटक जाएँगे जां निसारी मिरी चर्ख है इब्तिदामेरे आहबाब भी ता-फलक जाएँगेदिल ए मजरूह में तेरी यादों की मयदिल छलक जाएगा हम छलक जाएँगेशीश महलों में जो
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"आवारगी"

आख़िर उमर सारी युंही करता रहा आवारगीफ़ितरत में मेरी आफ़तों से रब्त या आवारगीतेरी बसर के रहगुज़र दिल की सदा हमने सुनीता-उम्र इक लंबा सफ़र जीता रहा आवारगीकुछ कैफियत की रात थी फिक्रे सुखन भी साथ थीहमने कही इक बात ये बस बाखुदा आवारगीबेमंज़िलो आराम शब ना आशना
 
अभिषेक'शफक़'
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आवारगी

आख़िर उमर सारी युंही करता रहा आवारगीफ़ितरत में मेरी आफ़तों से रब्त या आवारगीतेरी बसर के रहगुज़र दिल की सदा हमने सुनीता-उम्र इक लंबा सफ़र जीता रहा आवारगीकुछ कैफियत की रात थी फिक्रे सुखन भी साथ थीहमने कही इक बात ये बस बाखुदा आवारगीबेमंज़िलो आराम शब ना आशना
 
अभिषेक'शफक़'
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आवारगी

आख़िर उमर सारी युंही करता रहा आवारगीफ़ितरत में मेरी आफ़तों से रब्त या आवारगीतेरी बसर के रहगुज़र दिल की सदा हमने सुनीता-उम्र इक लंबा सफ़र जीता रहा आवारगीकुछ कैफियत की रात थी फिक्रे सुखन भी साथ थीहमने कही इक बात ये बस बाखुदा आवारगीबेमंज़िलो आराम शब ना आशना
 
अभिषेक'शफक़'
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तसव्वुर

युंही कभी मुझे तुझ पर यकीं नहीं होतायुंही कभी तेरी हस्ती सराब लगती हैकि जैसे तू मिरी जाना मिरा तसव्वुर है कि जैसे तू मिरी जाना मिरा तसव्वुर है ..तेरे गुदाज़ बदन की जो ये इबारत हैयही गुमान है बस मेरी ही मुहब्बत हैजो रंग मेरी निगाहों से भी झलकते हैंये और
 
अभिषेक'शफक़'
Sep 18 2009 12:17 PM
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इश्क़ की बातें

ना जाने कितनी हो चुकी हैं जोश की बातें अब इश्क़ में कुछ चाहिए भी होश की बातें हमको बदलना इश्क़ में सब ठीक ठाक है उनपे जो आई बात तो गुलपोश की बातें महफ़िल में अजनबी की तरह आप जो मिले आती हैं बहुत याद वो आगोश की बातें वालिद हैं आपके की नुकता ची के हैं
 
अभिषेक'शफक़'
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अफसुर्दादिली

ये सपनों को हमारे छीन लेंगे फलक से यूँ सितारे छीन लेंगे यक़ीनन तुमसे मेरे और मुझसे तुम्हारे हर नज़ारे छीन लेंगे ज़माना है बड़ा बेदर्द सुन लो हमारे सब इशारे छीन लेंगे मैं अंजाम-ए-मुहब्बत जानता हूँ कि कश्ती से किनारे छीन लेंगे अब अपनी जीत तो मुमकिन नही
 
अभिषेक'शफक़'
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लगता नहीं अब जी मेरा ..

लगता नहीं अब जी मेरा, मेरे हमनफस कहीं और चल जहाँ दिल-ए-ज़ार को हो सुकूं किसी ऐसी बस्ती की ओर चल दिखावे के रिश्तों से दूर हट ज़रा दूर हट ज़रा बच के चल जहाँ मेरी रूह को हो सुकूं किसी ऐसी बस्ती की ओर चल ये नहीं है अब तेरा रह गुज़र कहीं और चल कहीं और चल
 
अभिषेक'शफक़'
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ज़रा ठहर जाओ

अभी चराग़ जले हैं ज़रा ठहर जाओ दिल-ए-नादान मिले हैं ज़रा ठहर जाओ गुल-ए-गुलज़ार हुई है यहाँ की हर टहनी कई गुलाब खिले हैं ज़रा ठहर जाओ | पड़े हुए हैं मेरे बोसे तेरी राहों में कदम संभाल के रखो ज़रा ठहर जाओ तिरे ख्वाबों से हर एक खार को हटा दूँगा उनकी ताब
 
अभिषेक'शफक़'
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"इश्क और हया"

हया कहती है तो इस बात पे ता'ज्जुब कैसा इश्क़ फिर गर्द-ए-राह है यही किस्मत इसकी सिवा ज़िल्लत के इसकी जीस्त में कुछ भी तो नहीं ये सरे राह पड़ा है तो इस से हुब कैसा | इसकी खुद्दारियों ने सर कभी झुकने ना दिया ये पस-ए-संगेमरमर रहनेवाले क्या जानें इसके तो
 
अभिषेक'शफक़'
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कसम को तोड़ देता मैं

गर अपने कसमे वादों की मुझे परवाह ना होती तुम्हारी ज़ब्त करने की कसम को तोड़ देता मैं तुम्हारे एक इशारे भर पे मैने हाथ बाँधे हैं नहीं तो इस कज़ा के रुख़ को भी बस मोड़ देता मैं | मेरे गमखाना-ए-दिल में फकत तेरी ही यादें हैं फकत तेरे वो शिकवे हैं फकत मेर
 
अभिषेक"शफक़"
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गुलाबी रंग हैं मेरे

नया रस्ता नयी बातें यही सब संग हैं मेरे तेरी खुशबू की बरसातें गुलाबी रंग हैं मेरे खुमारे शब अभी बाकी है देखो मेरी आँखों में कि कुछ अंगड़ाईयाँ लेता हूँ अब ये ढंग हैं मेरे कई खत और तेरी याद का अजमत ख़ज़ाना है यही बाकी है अब यारा बज़ार-ए-तंग हैं मेरे मे
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हौसले को आज़माना छोड़ दे ...

हौसले को आज़माना छोड़ दे आसमाँ बिजली गिराना छोड़ दे बेसबब उनको न इतना याद कर ज़िंदगी अब जी दुखाना छोड़ दे रूठ मत मुझसे पाशेमा हूँ बहुत आइने नज़रें चुराना छोड़ दे रौशनी है ज़िंदगानी में बहुत आँधियों से दिल लगाना छोड़ दे आए है तेरे लबों की याद सी शबनम-
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तिरे दर से उठे बगैर

काटी है पूरी उम्र तिरे दर से उठे बगैर अब जाऊं कैसे मैं तिरे घर से मिले बगैर ज़िंदगी भी हू-ब-हू पहियों के जैसी है चलते हैं साथ साथ बस यूँ ही तेरे बगैर रंजे फुरावा दिल तिरी यादों में डूब कर पाएगा तू भी चैन ना मुझसे मिले बगैर तंगी-ए-किस्मत है औ तूफान ते
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शायरी गयी शायद

बयाज़े शेर तेरे साथ ही गयी शायद मुझे अज़ीज़ थी जो शायरी गयी शायद कभी कभार ही वो नज्में अब उतरती हैं तुम्हारे साथ मेरी माहिरी गयी शायद मैं कबसे रूठा हूँ तुझसे मेरी जाने वफ़ा कि अब ये लगता है दोस्ती गयी शायद बुझा हूँ मेह से मैं एक चराग़ की माफिक मेरा य
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तर-ए-शबनम सलाम किसका था

वो खूबसूरत कलाम किसका था तर-ए-शबनम सलाम किसका था हवा में उंगलियों से लिख के जिसे मिटा भी दिया वो नाम किसका था दुआ निकली है जिसके अंदर से खत पड़ा था बेनाम किसका था माना सज़ा के मुस्तहिक़ ठहरे कत्ल का इल्ज़ाम किसका था शक्ल तो भीड़ की नहीं होती वो नकाब
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वाबस्ता तेरे ज़िक्र से मेरे ख़याल सारे

वाबस्ता* तेरे ज़िक्र से मेरे ख़याल सारे लिखती है ये कलम भी तेरे जमाल सारे देखा मेरा जलाल ज़िंदगी के इम्तेहां ने तू ही मेरा जवाब है तू ही सवाल सारे ख्वाब में माँगी थी काग़ज़ की एक कश्ती मेरी आँख से गिरे हैं तेरे शलाल सारे मैने तुझे भुलाया कितनी ही शिद
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मुझे रास्ते ही अज़ीज़ हैं मुझे मंज़िलों की खबर नहीं

मुझे रास्ते ही अज़ीज़ हैं मुझे मंज़िलों की खबर नहीं मेरा कारवां मेरा दोस्त है मुझे बस्तियों की फिकर नहीं कभी मैने तुझसे गिला किया कभी तूने मुझको भुला दिया हम यार हैं के रक़ीब हैं या तेरी दुआ में असर नहीं लो ये मौज और ये कश्तीयाँ मुझे मेरे हाल पे छोड़
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जाँबाज़ कबूतर

कबूतर वैसे तो शांति का प्रतीक है| पर फिर भी दुश्मन पहले हमारे देश के जाँबाज़ कबूतरों से दो-दो हाथ करे फिर सेना से निपटे| तैश से बाज़ ना आएँगे कबूतर अपने बाज़ से पंख लड़ाएंगे कबूतर अपने देश की ओर जो दुश्मन ने की नज़र टेढ़ी खाक में उसे मिलाएँगे कबूतर अ
Feb 05 2009 09:59 PM
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तू नहीं तो तेरी याद ही काफ़ी है

तू नहीं तो तेरी याद ही काफ़ी है इक उमर के लिए इंतज़ार काफ़ी है खामोशी उसकी मेरी शोख बातों पर हमें तो इतना ही ऐतबार काफ़ी है मेरे ज़िक्र पर आँखें छलकी होंगी उसका बागीचा गुलज़ार काफ़ी है लोग कैसे कैसे सवाल करते हैं उसका दिल पहले आज़ार काफ़ी है ना फ़िज़
Feb 05 2009 09:59 PM
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खुशबू जो तेरी ज़ुल्फ के रेशों से उड़ी है

खुशबू जो तेरी ज़ुल्फ के रेशों से उड़ी है उल्फ़त की एक कली मेरे दिल में भी खिली है आँचल के तेरे रंग फ़िज़ाओं में घुले हैं मुद्दत के बाद शाम आज मुझसे मिली है बढ़ जाए ना ये आग के जल जायें हम दोनो मेरे दिल की तिशनगी को जो हवा ये मिली है रुक रुक के बरसना
Feb 05 2009 09:59 PM
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किसी से कुछ ना हुआ

किनारे पर कई थे लोग देखने वाले, मगर मै डूब गया और किसी से कुछ ना हुआ लगी जब आग तो सोचा उदास जंगल ने हवा के साथ रखी दोस्ती से कुछ ना हुआ हमें ये ख़ौफ़ की मिट्टी के हैं मका अपने उन्हे ये रंज की बहती नदी से कुछ ना हुआ बिखर गये हो शफक़ तुम तो मोतियो की त
Feb 05 2009 09:59 PM
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बेरूख़ी

एहसास हुआ आईने में देखने के बाद एक उम्र कट गयी है उनसे बेरूख़ी के बाद ज़मीन और फलक का भी रिश्ता अजीब है टूटे हुए दो दिल हैं उनसे बेरूख़ी के बाद मोहब्बत में फासलों की जाने कैसी रीत है चर्चा रहा ये आम उनसे बेरूख़ी के बाद हो उसका माफ़ हर गुनाह वो मेरा अ
Feb 05 2009 09:59 PM
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मुझे रास्ते ही अज़ीज़ हैं ................

मुझे रास्ते ही अज़ीज़ हैं मुझे मंज़िलों की खबर नहीं मेरा कारवां मेरा दोस्त है मुझे बस्तियों की फिकर नहीं कभी मैने तुझसे गिला किया कभी तूने मुझको भुला दिया हम यार हैं के रक़ीब हैं या तेरी दुआ में असर नहीं लो ये मौज और ये कश्तीयाँ मुझे मेरे हाल पे छोड़
Feb 05 2009 09:59 PM
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आप हम और ये नदी

आज अपने इश्क़ की मौसम ने दे दी यूँ खबर फूल से होने लगे हैं.... आप हम और ये नदी हम ने अभी सोचा न था की आ गयी मंज़िल क़रीब कुछ रास्ता खोने लगे हैं…. आप हम और ये नदी लग गया इल्ज़ाम जब, नीयत पर हमारी - आपकी क्या बारीशों में धो रहे हैं.... आप हम और ये नदी
Feb 05 2009 09:59 PM