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मेरी आवाज़

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19 Apr 2010
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. मैं और तन्हाई - भाग ३.

. मैं और तन्हाई - भाग १. मैं और तन्हाई - भाग 2मुझे देख अकेला तन्हाई चोरी से क्यों तू चली आई नहीं तेरा मेरा साथ कभी मेरे पास तो होंगे अपने सभी नही चाहिए मुझे तुमसे साथी जाओ ढूंढो अपने नाती नहीं मुझे चाहिए साथ तेरा मेरे पास तो है घर-बार मेरा मैं इंसां और
 
सीमा सचदेव
Apr 19 2010 06:32 PM
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मैं और तन्हाई - भाग २

मैं और तन्हाई - भाग १ काला अंधियारा सन्नाटाइक आहट नें उसको काटान जाने कहां से आई थीइक धुंधली सी परछाई थीबोली मैं साथ निभाऊंगीतुम्हें छोड कभी न जाऊंगीमैं चिल्लाई और झल्लाईपर ढीठ थी कितनी परछाईमैं रोती रही वो हंसती रहीहंस-हंस कर मुझको डसती रहीछलनी कर गई
 
सीमा सचदेव
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मां - चन्द क्षणिकाएं

१.मां मैं जब भी मिलती हूं तुमसेपहले से कमजोर ही दिखती हूं तुम्हेंयह तुम्हारी नज़र का धोखा हैया नज़र कमजोर है२.मां तुम बातों ही बातों मेंउगलवा लेना चाहती होमेरे सीने में दफ़न सच्चाई कोकितनी भोली औरमासूम हो तुम३.दूर से आवाज़ सुनजान लेती हो सबकुछतुम्हारा
 
सीमा सचदेव
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बिखर गया जो तार-तार अहसास कहां से लाऊं

बिखर गया जो तार-तारअहसास कहां से लाऊं तोड दिया खुद तुमने जोविश्वास कहां से लाऊंन दर्द रहा दिल में कोईन रही कोई इसमें धडकनपाहन से सीने में तो अबन विचलित होता है ये मनन आह रही इसमें कोईतो प्यास कहां से लाऊंतुम्हीं बताओ पहला वोअहसास कहां से लाऊंनैनों से नीर
 
सीमा सचदेव
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माला की माया- हास्य कविता

माला की माया नेऐसा बवंडर मचायाहर सांसद क्याआम जन भी चिल्लायाचौंधिया गईं आंखेंकैमरों की भीदेखते ही माला की चमकपास में होते तोशायद पकडते लपकफ़टी की फ़टी आंखें औरमुंह में पानी भर आयामाला की माया नेऐसा रंग दिखायाकि हर कोई ललचायादूर ही के दर्शन सेमैं बेहोश हो
 
सीमा सचदेव
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मैं और तन्हाई - भाग १

इक रात थी काली अंधियारीजीने की चाह से मैं हारीन खुला था आगे कोई पथलगा, थम गया है जीवन-रथन पास में था मेरे कोईमैं बिलख-बिलख कर बस रोईइक साथ में थे आंसु और गमनैना रहते थे हर दम नमफ़िर एक घडी ऐसी आईआंखें भी मेरी पथराईमैं गम थी या गम ही मैं थाकोई भेद न था ,
 
सीमा सचदेव
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हर दिन नारी दिवस बना लो

१.नारी तुम प्रेम हो आस्था हो विश्वास हो ,टूटी हुई उम्मीदों की एकमात्र आस होहर जन का तुम्हीं तो आधार होनफ़रत की दुनिया में मात्र तुम्हीं प्यार होउठो अपने अस्तित्त्व को संभालोकेवल एक दिन ही नहीं ,हर दिन नारी दिवस बना लो२. नारी तुम जननी होसष्टि में
 
सीमा सचदेव
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हर दिन नारी दिवस बना लो

१.नारी तुम प्रेम हो आस्था हो विश्वास हो ,टूटी हुई उम्मीदों की एकमात्र आस होहर जन का तुम्हीं तो आधार होनफ़रत की दुनिया में मात्र तुम्हीं प्यार होउठो अपने अस्तित्त्व को संभालोकेवल एक दिन ही नहीं ,हर दिन नारी दिवस बना लो२. नारी तुम जननी होसष्टि में
 
सीमा सचदेव
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Mar 08 2010 12:33 PM
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एक नागिन की दास्तां.....

घने जंगल में गहरे तरु की छाया मेंदुखियारी एक नागिन नें कुण्डली मारीअपने ही जायों को फ़ंसायाअनमने मन से खाया औरकोख से निकाल पेट में पायाखाते-खाते समझायाअरे क्यों आए दुनिया मेंदुनियादारी निभानेखुद शिकार बनने या बनानेनहीं जानते थे तुमहर कदम पर कांटे
 
सीमा सचदेव
Feb 01 2010 01:44 PM
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मृग-तृष्णा

मृग-तृष्णा एक दिन पडी थी माँ की कोख मे अँधेरे मे सिमटी सोई चाह कर भी कभी न रोई एक आशा थी मन मे कि आगे उजाला है जीवन मे एक दिन मिटेगा तम काला होगा जीवन मे उजाला मिल गई एक दिन मंजिल धड़का उसका भी दुनिया मे दिल फिर हुआ दुनिया से सामना पडा फिर से स्वयं को
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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चुनाव अभियान

जैसे ही चुनाव आयोग ने चुनाव आचार सन्हिता का बिगुल बजाया तो नेता जी के शैतानी दिमाग़ ने अपना अलग रास्ता बनाया और नेता जी को समझाया अब छोडो मेरा साथ ,मेरा कहना और कुछ दिन केवल दिल के अधीन ही रहना नेता जी जो कभी-कभी कविता लिखने का शौंक फरमाते थे और कभी-
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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जीवन एक कैनवस

दिन -रात,सुख-दुख ,खुशी -गम निरन्तर भरते रहते अपने रन्ग बनती -बिगडती उभरती-मिटती तस्वीरो मे समय के साथ परिपक्व होती लकीरो मे स्याह बालो मे गहराई आँखो मे अनुभव से परिपूर्ण विचारो मे बदलते वक़्त के साथ कभी निखरते जिसमे स्माए हो रन्ग बिरन्गे फूल कभी धुँधल
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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मै नारी.........

अंतर्राष्ट्रीय नारी दिवस पर विश्व भर की सभी महिलाओं को हार्दिक बधाई एवम शुभ-कामनाएं नारी दिवस का नारा १. जब नारी में शक्ति सारी फिर क्यों नारी हो बेचारी २. नारी का जो करे अपमान जान उसे नर पशु समान ३.हर आंगन की शोभा नारी उससे ही बसे दुनिया प्यारी ४.रा
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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वह सुंदर नहीँ हो सकती

वह सुंदर नहीँ हो सकती अपनी ही सोचों में गुम एक मध्मय-वर्गीय परिवार की लड़की सुशील गुणवती पढ़ी-लिखी कमाऊ-घरेलू होशियार संस्कारी ईश्वर में आस्था तीखा नाक नुकीली आँखें चौड़ा माथा लंबा कद दुबली-पतली गोरा-रंग छोटा परिवार अच्छा खानदान शौहरत इज़्ज़त जवानी स
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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अज्ञात कन्या का मर्म

अज्ञात कन्या का मर्म (राष्ट्रीय कन्या दिवस विशेष) अज्ञात कन्या का मर्म भिनभिनाती मखियाँ कुलबुलाते कीडे सूँघते कुत्ते कचरादान के गर्भ मे कीचड़ से लथपथ फिर से पनपी एक नासमझ जिन्दा लाश छोटे-छोटे हाथों से मृत्यु देवी को धकेलती न जाने कहाँ से आया दुबले-पत
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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जब तक रहेगा समोसे मे आलू -एक व्यंग्य कविता

जब तक रहेगा समोसे मे आलू रात को सोते हुए अजीब सा ख्याल कौंध आया और मैने ................ मिनी स्करट पहने हीर को रोते हुए पाया मैने पूछा ! यह अश्रुजल क्यों है तुम्हारी आँखों में? तुमतो एक हो लाखों में तुम्हे प्यार तो दुनिया भर का मिला है तुम को तो प्य
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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कौन है वो

कौन है वो वो जो बैठी है चौराहे पर वो जो ताकती है इधर-उधर वो जिसकी भूखी है निगाहे वो जो पी रही पीडा के आँसु वो जो मिटा रही हवस की भूख वो जो खुद हरदम भूखी वो जिसकी मर चुकी सारी चाहते वो जो जीती है दूसरो की खातिर वो जिसका कोई मूल्य नही वो जो अर्धनग्न है
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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परछाई

परछाई घूरती हुई क्रूर निगाहे झपट लेने को लालायित पसरा केवल स्वार्थ दुर्विचार,आडम्बर नही बचा इससे कोई घर बोई थी प्यार की फसल मिला नफरत का फल सच्चाई की जमीन को रौन्दता झूट का हल मिठास मे छिपा जानलेवा जहर भूखी निगाहो मे लालच का कहर रह गया केवल अकेलापन क
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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जीवन एक कैनवस

जीवन एक कैनवस दिन -रात,सुख-दुख ,खुशी -गम निरन्तर भरते रहते अपने रन्ग बनती -बिगडती उभरती-मिटती तस्वीरो मे समय के साथ परिपक्व होती लकीरो मे स्याह बालो मे गहराई आँखो मे अनुभव से परिपूर्ण विचारो मे बदलते वक़्त के साथ कभी निखरते जिसमे स्माए हो रन्ग बिरन्गे
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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माँ (बारह क्षणिकाएँ)

माँ (बारह क्षणिकाएँ) आजकल माँ बहुत बतियाती है जब भी फोन करो आस-पडोस की भी बाते सुनाती है २. न जाने क्यो लगता है माँ की आँखे नम है उसे कही न कही कुछ खो देने का गम है ३. सुबह सबसे पहले उठ कर सारा काम निपटाती है मेरी काम वाली आई कि नही इसकी चिन्ता लगाती
 
सीमा सचदेव
Dec 29 2009 11:50 AM
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जमाना अब भी वही है

वर्षों से सुनते आ रहे हैं दादा-दादी,नाना-नानी,माँ-बाप और अब कहते हैं अपने बच्चों से कि जमाना बदल गया है बदल गई है वो तस्वीर, वो सोच, वो रहन-सहन, वो ख़ान-पान, वो दोस्त, वो सभ्यता, वो संस्कृति, वो रीति-रिवाज़ सब कुछ............. सब कुछ वैसा नहीँ , जैसा
 
सीमा सचदेव
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अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस पर एक कविता

प्यास चौराहे पर खडा विचारे बन्द मार्ग सारे के सारे मुड जाता है उसी दिशा मे जिधर से भी कोई उसे पुकारे न कोई समझ न सोच रही है बन गई दिनचर्या ही यही है जिम्मेदारी सिर पर भारी चलता है जैसे कोई लारी दूध के कर्ज़ की सुने दुहाई कभी जीवन सन्गिनी भरमाई माँगे र
 
सीमा सचदेव
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मुझे मां से जलन है ........

मां जलन है मुझे तुमसे अपनी ही मां से तुम्हारी ममतामई आंखों से जो मुझे देखने भर से लडने की हिम्मत देती हैं । जलन है मुझे तुम्हारी उंगलियो के स्पर्श से जो बालों को छूते ही नई दुनिया का अहसास कराती हैं जलन है मुझे तुम्हारी गोदि से जिसमें सर रखते ही हर ग
 
सीमा सचदेव
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मुझे मां से जलन है ........

मां जलन है मुझे तुमसे अपनी ही मां से तुम्हारी ममतामई आंखों से जो मुझे देखने भर से लडने की हिम्मत देती हैं । जलन है मुझे तुम्हारी उंगलियो के स्पर्श से जो बालों को छूते ही नई दुनिया का अहसास कराती हैं जलन है मुझे तुम्हारी गोदि से जिसमें सर रखते ही हर ग
 
सीमा सचदेव
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जूते का निशाना

जूते ने अब जो अपना सर उठाया है पैरों से निकल जो बाहर को आया है अपनी हस्ती को मिटाया है तो पूरी दुनिया में छाया है जिसकी नियति थी पैरों तले रहना अब बन गया लोकप्रियता का गहना पैरों से निकाल जूता सभा में चलाते हैं चन्द पलों मे दुनिया में छा जाते हैं विद
 
सीमा सचदेव
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जूते का निशाना

जूते ने अब जो अपना सर उठाया है पैरों से निकल जो बाहर को आया है अपनी हस्ती को मिटाया है तो पूरी दुनिया में छाया है जिसकी नियति थी पैरों तले रहना अब बन गया लोकप्रियता का गहना पैरों से निकाल जूता सभा में चलाते हैं चन्द पलों मे दुनिया में छा जाते हैं विद
 
सीमा सचदेव
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मतदान अभियान

मेरी आवाज़ पर पधारने के लिए धन्यवाद
 
सीमा सचदेव
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नही जाना मुझे रवि के पार

जब से कविता लिखने का मोह मन में पाला है या कहें कि होश संभाला है सुनती आई बडी पुरानी वाणी एक कवि की जीवन कहानी जहां रवि नहीं जा पाता है वहां कवि पहुँच जाता है बुन लेता है कल्पनाओं की चादर चढा लेता है भावनाओं का मुल्लमा गढ लेता है नए शब्द हृदय के गर्भ
 
सीमा सचदेव
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नारी-परीक्षा

नारी-परीक्षा मत लेना कोई परीक्षा अब मेरे सब्र की बहुत सह लिया अब न सहेन्गे हम अपने आप को सीता न कहेन्गे न ही तुम राम हो जो तोड सको शिव-धनुष या फिर डाल सको पत्थरो मे जान नही बन्धना अब मुझे किसी लक्षमण रेखा मे यह रेखाएँ पार कर ली थी सीता ने भले ही गुजर
 
सीमा सचदेव
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महानगर की होली

महानगर की होली होली आई होली आई मुन्ने की नजरें ललचाई देख पिचकारी और गुलाल पाया जा घर में धमाल ले दो मुझको भी गुलाल करूँगा रंगों से कमाल माँ ने ला दी एक पिचकारी पानी ही से भर दी सारी साथ में दी दी चेतावनी देखो वेस्ट न करना पानी साठ रुपये का लीटर बीस प
 
सीमा सचदेव
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मै नारी........

अंतर्राष्ट्रीय नारी दिवस पर विश्व भर की सभी महिलाओं को हार्दिक बधाई एवम शुभ-कामनाएं नारी दिवस का नारा १. जब नारी में शक्ति सारी फिर क्यों नारी हो बेचारी २. नारी का जो करे अपमान जान उसे नर पशु समान ३.हर आंगन की शोभा नारी उससे ही बसे दुनिया प्यारी ४.रा
 
सीमा सचदेव
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हुआ क्या जो रात हुई

हुआ क्या जो रात हुई, नई कौन सी बात हुई दिन को ले गई सुख की आँधी, दुखों की बरसात हुई पर क्या दुख केवल दुख है, बरसात भी तो अनुपम सुख है बढ़ जाती है गरिमा दुख की, जब सुख की चलती है आँधी पर क्या बरसात के आने पर, कहीं टिक पाती है आँधी आँधी एक हवा का झोंका
 
सीमा सचदेव
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एयरो इण्डिया शो की झलकियां

नमस्कार ,इस बार ११ फरवरी से १५ फरवरी तक बंगलोर में हुए सातवें एयरो इण्डिया शो में मुझे भी एक दिन जाने का सौभाग्य मिला एयरो इण्डिया शो के लिए पहले काफी सुन रखा था , लेकिन देखने का अवसर पहली बार मिला क्योंकि हमने टिकट दस दिन पहले से ही बुक करवा ली थी ,
 
सीमा सचदेव
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मुझे जीने दो

मुझे जीने दो मुझे जीना है मुझे जीने दो हे जननी तुम तो समझो मुझे दुनिया मे आने तो दो तुम जननी हो माँ केवल एक बार तो मान लो मेरा भी कहना नही सह सकती मैं और बार-बार अब और नही मर सकती मैं कोई तो मुझे दे दो घर में शरण अपावन नही हैं मेरे चरण क्यों हर बार म
 
सीमा सचदेव
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झोंपड़ी में सूर्य-देवता

झोंपड़ी में सूर्य-देवता पुल के नीचे सड़क के बाजु में तीलो की झोंपड़ी के अंदर खेलते............. दो बूढ़े बच्चे एक नग्न और दूजा अर्ध-नग्न दीन-दुनिया से बेख़बर ललचाई नज़रों से देखते......... फल वाले को आने-जाने वाले को हाथ फैलाते..... कुछ भी पाने को फल
 
सीमा सचदेव