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आर्यश्री Aaryashri

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14 Jun 2010
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कोई लगता दिल को प्यारा !

कोई लगता दिल को प्यारा लेकिन मै बोल ना पाता हूँ डरता हूँ वह सुन्दर है बहुत जाने क्या भाव लाये मन में लेकिन उसको जब देखता हूँ खुद को मै भूल सा जाता हूँ | (कोई लगता दिल को प्यारा .........मै देखता हूँ हर रोज उसे लेकिन कुछ रोज ही होगा ये जाने फिर कब मै उसे
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रोचक हरिद्वार यात्रा और माँ गंगा की आरती !

ये सत्य है की जब भक्त सच्चे मन से भगवान को बुलाते हैं तो भगवान किसी ना किसी रूप में उनकी पीड़ा हर लेते है, ठीक ऐसे ही जब उनकी प्रेरणा होती है तो भक्त बिना किसी योजना के उनके दरबार में पहुँच ही जाता है!ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ मै अपनी पी. एच. डी. की थीसिस
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ये कैसा गणतंत्र है !

हँस रही हैं मुश्किलें, फेल हुआ तंत्र है, ये कैसा गणतंत्र है, ये देश का गणतंत्र है| झूठ के बाजारों में बिक रहा 'स्वतन्त्र' है, ये कैसा गणतंत्र है, ये देश का गणतंत्र है| बढ़ रही महंगाई , आम जन हुआ परतंत्र है, ये कैसा गणतंत्र है, ये देश का गणतंत्र है| नेताओं
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क्या मुसलमान कभी हिन्दू की तरह सोचेंगे ?

अभी ब्लाग जगत में चल रही बड़े छोटे ब्लागरों की स्वाभिमान की लडाई पर सबका ध्यान आकृष्ट किया जा रहा है, जिसका कोई अर्थ समझ में नहीं आता है| लगता है हम भी झूठी टिप्पणिया बटोरने के चक्कर में व्यवसायिक पत्रकारों की तरह होते जा रहे हैं| जबकि लगातार हो रहे कुछ
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राजीव शुक्ला का दोहरा चरित्र !

मुझे यह बताने की जरुरत नहीं की यह कौन हैं ? अरे वही जो खेलते हैं -पत्रकारिता से , देश की राजनीति से, क्रिकेट से और कितना गिने ! सबका ठेका हमने ही थोड़े ले रखा है इसका सर्वाधिकार तो उन्ही के पास सुरक्षित है | अब आते हैं असल मुद्दे पर, अगर आप ने नहीं पढ़ा
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किस्तों में जिंदगी जीते हैं यहाँ लोग

1. आज के दौर में इन्सान कहाँ खोया है वह खुद को भूलकर क्यों गहरी नीद सोया है क्यों उठता नहीं है आज के दौर में वह शायद बूढ़े शरीर में वह दर्द लिए रोया है फिर ये आज का नौजवां कहाँ गुम है कुछ ना पूछो! वह इश्क के बाजार में खोया है. 2. किस्तों में जिंदगी जीते
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रस्मे - उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसे

रस्मे - उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसेगम के इस बाग में हम फूल खिलाएं कैसे |फेर ली नज़रें उसने इतनी नफ़रत सेप्यार से उसको बुलाएं तो बुलाएं कैसे |हर कदम उसकी आहटे सुनतामुड़ के जब देखता वह नहीं होताअब तो खामोश हो गए हैं सभी कोई जो उसको सुनाये तो सुनाएं कैसे
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हमारे नेता !

1भूख बेचता हूँ मै भूख बेचता हूँ है कोई बाकी मै खूब बेचता हूँ कटने से पहले सुनो कौन हूँ मै मै हूँ नेता ! जो लहू बेचता हूँ 2देश की आन से तौबा देश की मन से तौबा देख ये लोग कैसे हैं जिन्हें इमान से तौबा ना पूछ इनको क्या कहते हैं इस जहाँ में ये देश के नेता
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बुद्ध पूर्णिमा

जब अंधकार की काली छाया मन के भूतल को तोड़ती है समाज की बेढंग तरंगे जब जल के रुख को मोड़ती हैंहर रोज हमें होने का कुछ मतलब ना समझ में आता है एक अप्रितिम उज्जवल किरण सा कोई हमें राह दिखाने आता हैछोड़ मायावी दुनिया को जब देह का तात्पर्य समझ में आता है वह
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माथे की बिन्दी- हिन्दी (संविधान, संसद और हम)

एक प्रतिष्ठित पत्रिका में हिन्दी के ऊपर देश के कुछ बुद्धिजीवियों का विचार पढ़ा, आश्‍चर्य तब अधिक हुआ जब कुछ युवाओं के साथ अन्य तथाकथित बुद्धिजीवियों नें हिन्दी की जगह अंग्रेजी की पैरवी की। हम इस स्थिति के लिए दोष किसे दें। संविधान को, संसद को, सरकार को,
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क्यों चाहता है वो ! हर बार ये जीवन

जीवन एक अपार सच्चाईकुछ जुड़े हुए नए से ख्वाब कुछ टूटे हुए खाली लम्हे सबकुछ पाकर भी कुछ न पाया सबकुछ खोकर भी कुछ न खोया हर शब्द का झंकार ये जीवन वीणा की रग का हर तार ये जीवनकुछ बसा हुआ कुछ उजड़ा ये जीवन हर एक साँस में बसा जीवन हर एक साँस पर मरा जीवन कुछ
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कलम के गद्दारों को जिन्दा गड़वा दो

मानवता की धमनी में जबजाति धर्म का विष बहता होछोड़ गरीबों की चिंतापूंजीवादी पुराण को बाचाता हो संविधान का अम्बेडकर जब सडकों पर जूता सिलता हो आजादी का भगत सिंह जब कूड़े का जूठा पत्तल चाटता हो माथे की बिंदी हिंदी ही जबघर की बनवासिनी सीता होइस शासन की कुशासन
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एक छोटी सी !

एक छोटी सी भूलजो भयंकर परिणाम देएक छोटी से बूंदजो जीवन को थाम दे। एक छोटी सी चिंगारी जो महलों को अंजाम दे एक छोटी सी चुभन जो इंसा की जान लेएक छोटी सी सनकजो कितनो की मान लेएक छोटी सी बातजो हजारों सवाल दे ऐसी ही छोटी -छोटी बातें जो जीवन को संग्राम दे ना हो
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जवानी !

लाशों का बवंडर भी जिन्हें रुला नहीं पाती, धधकते सीने की आग समंदर भी बुझा नहीं पाती. जब बदलाव के लिए ये नौजवान खड़े होते हैं , इनके पैरों को ये सियासत भी हिला नहीं पाती. अदभुत अदम्य शाहस बलिदान जिसकी थाती, अकल्पनीय सोच, मर जाने की परिपाटी .बदल देता है राज
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थू है उनपर !

माफ़ करें किन्तु यह शीर्षक उन लोगों के लिए है जो मानसिक दिवालेपन के कारण अपने एक बड़े ही संजीदा ब्लाग लेखक फिरदौस जी को अनाप सनाप लिखकर अपनी गन्दगी को फैला रहे हैं. वर्त्तमान में इस बेनामी लोगों कीबाढ़ सी आ गयी है जिनकी कोई पहचान नहीं है और गलत नामों से
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खेल से बड़े शहीद कि शहीदों से बड़े खेल !

इस देश में जब एक खिलाडी ओलम्पिक में सोना जीतता है तो सरकार उसे 3 करोण देती है लेकिन वही जब जवान नक्सली हमले में शहीद होते हैं तो सरकार 1 लाख देती है. आगे क्या कहें.........आप ही बताएं|रत्नेश त्रिपाठी
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स्वर्गीय एम् ऍफ़ हुसैन बनाम कलाकार सिद्धार्थ

हमारे देश में गाय प्राचीन काल से ही पवित्र मानी जाती रही है, लेकिन आज गाय कभी कचरे के ढेर पर तो कभी तंग गलियों में भटकती नजर आती है। अपने चित्रों द डेकोरेटेड काव के माध्यम से कलाकार सिद्धार्थ ने दुनियाभर में गायों की दुर्दशा को दर्शाया है। रेलीगेयर आर्ट
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असहिष्णुता की कैंची

काफी समय से मैं नेताओं एवं वीआईपी महानुभावों से प्रश्न कर रही हूं कि आखिर क्यों वे किसी भी उद्घाटन कार्यक्रम में अथवा समारोह में जाते ही कैंची पकड़कर रिबन काटते लगते हैं। पर आज तक किसी ने भी इसका उत्तर नहीं दिया। जिस प्रकार गोरों के राज में भारत में
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हे श्याम!

हे श्याम! तेरी लकुटी कमरिया कहाँ गयो हेरायोदशा देख तू ग्वालबाल की जल में दूध मेरायोजल में दूध मेरायो समय ये कैसो आयोदूध दही ते छाडी दे, पनीर भी अशुद्ध बनायोकर ये बुरे काम गर्व से खुद को ग्वाल कहायोकहे रत्नेश हे श्याम ये वंश का बेडा पर लगायोबेडा पर लगायो
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ढोल गवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी

ढोल गवार शुद्र पशु नारीसकल ताड़ना के अधिकारीइसे विवादित बनाने वाले तथाकथित वेवकूफ बुद्धिजीवीयों कि व्याख्या सत्य से कितनी दूर है वह इस मूल अर्थ सेस्पष्ट होता है.यहाँ ताड़ना का अर्थ है पहचानना या परखना, तुलसीदास कहते हैं अगर हम ढोल के व्यवहार (सुर) को
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शत शत नमन!

आईये देश के वीर सपूत भगत सिंह, राजगुरु व सुकदेव को साथ साथ उन सभी क्रांतिकरियो को श्रद्धा सुमन अर्पित करें और उन्ही कि तरह कुछ निर्णायक करने कि ओर कदम बढ़ाएं. और एक साथ कहें वन्दे मातरम!रत्नेश त्रिपाठी
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भारतीय नववर्ष क्यों मनाएं!

भारतवर्ष वह पावन भूमि है जिसने सम्पूर्ण भ्रह्माण्ड को अपने ज्ञान से आलोकित किया है, इसने जो ज्ञान का निदर्शन प्रस्तुत किया है, वह केवल भारतवर्ष में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का पोषक है. यहाँ संस्कृति का प्रत्येक पहलू प्रकृति और विज्ञान का
Mar 16 2010 10:24 AM
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भारतीय नववर्ष क्यों मनाएं!

भारतवर्ष वह पावन भूमि है जिसने सम्पूर्ण भ्रह्माण्ड को अपने ज्ञान से आलोकित किया है, इसने जो ज्ञान का निदर्शन प्रस्तुत किया है, वह केवल भारतवर्ष में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का पोषक है. यहाँ संस्कृति का प्रत्येक पहलू प्रकृति और विज्ञान का
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जबाब ढूंढ़ते कुछ ज्वलंत प्रश्न

हमारे मित्र श्री अश्वनी मिश्र जी ने कुछ सवाल मेल के द्वारा मेरे ऊपर दाग दिया और उन प्रश्नों जा जबाब माँगा, उनके प्रश्न को हुबहू प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिनका जबाब मिलना ही चाहिए,प्रश्न हैं ;- आपका निर्णय अफजल गुरू देशभक्त है, भगत सिंह व साध्वी आतंकवादी
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नाम खोजती एक कविता

तुझको कैसे बतलाये हम, जाने क्या-क्या भूल गए,तेरी आँखे याद रही बस, तेरा चेहरा भूल गए .हँसना अपनी फितरत है, सो हँस कर आंसू पीते हैं,तेरी खातिर कितना तडपे, तुझे बताना भूल गए.कल तक तुझको मिल जाएगी, चिट्ठी डाल के सोचा थाघर पहुंचे तो याद आया, पता तो लिखना भूल
Mar 07 2010 07:17 PM
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हमारी प्राचीनता और विश्व

विगत 19-20 फरवरी 2010 को दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी हुयी, विषय था '' पूर्वी उत्तर प्रदेश का पुरातात्विक गौरव'' इतिहास का शोधार्थी होने और सेमिनार की व्यवस्था की दृष्टि से मुझे विश्वविद्यालय द्वारा बुलाया गया, इस
Feb 22 2010 08:14 PM
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सभी ब्लागर भाईयों को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं

सभी ब्लागर भाईयों को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं!ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम !उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्योर्मुर्क्षीय मामृतात !!ॐ नमः शिवायसाथ ही साथ इस देश की युवा पीढ़ी जो अपने जीवन मूल्य भूलकर केवल सवार्थी प्यार की खातिर वेलेंटाईन डे जैसे
Feb 12 2010 11:06 AM
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शिर्डी, त्रयम्बकेश्वर व महाकालेश्वर की पावन यात्रा का वृतांत

दिल्ली की जानलेवा ठण्ड में बने इस कार्यक्रम ने जीवन को नए अनुभवों से अवगत कराया, वैसे तो तीर्थयात्राएँ इसी उम्र में बहुत कर ली है, लेकिन इस तीर्थयात्रा का अपना अलग ही महत्व समझ में आया.11 जनवरी को हम कपकपाती ठण्ड से निकलकर टीशर्ट में गर्मी का अनुभव करते
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उस दिन मेरे गीतों का त्यौहार मनाया जायेगा

जिस दिन वेद मन्त्रों से धरती को सजाया जायेगाउस दिन मेरे गीतों का त्यौहार मनाया जायेगाखेतों में सोना उपजेगा, झूमेगी डाली -डालीवीरानों कि कोख से पैदा जिस दिन होगी हरियालीविधवाओं के सूने मस्तक पर फहरेगी जब लाली,निर्धन कि कुटिया में जिस दिन दीप जलाया
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इसे पढ़े जरुर? क्योंकि मुझे अपने सवालों का जबाब चाहिए!

नव वर्ष जहाँ तक मै जानता हूँ हम सभी इस देश से प्यार करते हैं, इससे प्यार करने का तर्क चाहे जो भी हो. खास करके इस ब्लाग कि दुनिया में रोजमर्रा हो रहे मेरे अनुभवों से भी मुझे यह स्पष्ट होता है कि हम आपस में चाहे कितनी ही बहस करें किन्तु देश पर मर मिटने
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परतंत्रता का प्रतीक, न्यू इयर

यहाँ मै दैनिक जागरण में छपी पंजाब सरकार कि मंत्री लक्ष्मीकांत चावला का अंग्रेजियत नव वर्ष पर एक बहुत ही अच्छा आलेख आया है जिसे मै जस का तस प्रस्तुत कर रहा हूँ.... एक बार फिर अधिकांश भारतवासी, हमारी सरकार, हमारा टेलीविजन नववर्ष का स्वागत करने की तैयार
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जाड़े कि रातें

बड़े होने का दर्द आज इतना है कि याद आती हैं वो जाड़े कि रातें कभी रजाई तो कभी माँ का आँचल दादी कि कहानी वाली जाड़े कि रातें कभी सांप तो कभी भूतों वाली बातें बड़ी डरावनी भी थी जाड़े कि रातें जलाकर अलाव बैठती थी टोली अपनी नयी बदमाशियां सिखाती वो जाड़े
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अम्मा !

एक कहानी अजीब सी बहुत सा सवाल लिए और उत्तर केवल एक, केवल एक? फिर वह कहानी क्या है? और उन बहुत सारे प्रश्नों का एक उत्तर क्या है ? कहानी है परिवार की, हमारे विचार की आज के समाज के व्यवहार की कोई किसी से खुश नहीं है पति पत्नी से नाखुश, स्त्री पुरुष से
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बेहयी संसद को ढोती नासमझ जनता!

यह लोकतंत्र है, तभी तो पूरा तंत्र जनता पर चढ़ा बैठा है, मै बात कर रहा हूँ महगाई की. चाहे पूरा देश इससे तबाह हो लेकिन संसद महगाई से अछूती है, महगाई क्या होती है हमारे सांसद नहीं जानते, आइये इस सच्चाई की तह में जाएँ - आज २१-१२-२००९ के दैनिक जागरण का मे
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काकोरी कांड बलिदान दिवस

आज हम सभी देशवाशी उन क्रन्तिकारी वीरों को याद करें और नमन करें जिन्होंने इस देश के लिए अपने जीवन का बलिदान किया, १९ दिसंबर, काकोरी कांड के नायक पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह जैसे वीरों के 82 वें बलिदान दिवस पर उनको हमारा
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सपने की हकीकत

क्या होते हैं सपने? क्यों दिखतें हैं सपने? क्या सपने हकीकत कि परछाई हैं या परछाईयों कि हकीकत जिनका चोला ओढ़े हम सपने देखते हैं, और वह सपने ही रह जाते हैं , नीद टूटते ही सब कुछ खत्म सिर्फ हकीकत और फिर भविष्य के सपने सपने तब खतरनाक होते हैं जब जागते हुए
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इतनी दूर तक जगने वाले

इतनी दूर तक जगने वाले सोने कि तू बात न कर जीवन तो एक दरिया है पर डूबने कि तू बात न कर माना कि गम के बादल हैं मज़बूरी है बरस रही एक-एक बूंद कि खातिर सीप जीवन कि तरस रही बस तू पर्वत सा बन जा यूँ बहने कि बात न कर . इतनी दूर....... सुबह तो फिर भी आती है प
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मै चाहता हूँ!

मै चाहता हूँ गजलों का कारवां बना दूँ , लेकिन कोई तो हो जो नग्मे निगार हो. टूटते पत्तों से भी जी जाते हैं कितने , बस आस इतनी कि आने वाली बहार हो. उसकी बात, उसका पता हो न हो, लेकिन वो है! बस इतना ही ऐतबार हो. प्यार कि बात पे नफ़रत उगल देते हैं लोग लेकिन
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जिद!

यह हार एक विराम है, जीवन महा संग्राम है तिल-तिल मिटूंगा पर दया कि भीख मै लूँगा नहीं, वरदान मागूँगा नहीं-वरदान मागूँगा नहीं. स्मृति सुखंद प्रहरों के लिए अपने खंडहरों के लिए यह जान लो मै विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं वरदान मागूँगा नहीं-वरदान मागूँगा नह
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खूनी हस्ताक्षर !

वह खून कहो किस मतलब का जिसमे उबाल का नाम नहीं वह खून कहो किस मतलब का aa सके देश के काम नहीं वह खून कहो किस मतलब का जिसमे जीवन न खानी है जो परवश होकर बहता है वह खून नहीं वो पानी है उस दिन लोगों ने सही-सही खून कि कीमत पहचानी थी जिस दिन सुभाष ने वर्मा म