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कही अनकही

http://dr-dushyant.blogspot.com/
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23 May 2010
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चेतन भगत की मासूम अनभिज्ञता और मेरा मत खाप पंचायतों के पक्ष में !

चेतन भगत को मैं इसलिए बहुत पसंद करता हूं कि उन्होने भारत में लेखकीय गरिमा को नई उचाइयां दी है, हालांकि मैं वाकिफ हूं कि वे अंग्रेजी साहित्य के वेदप्रकाश शर्मा हैं और ये भी जानता हूं कि साहित्यिक मर्तबे में अमित चौधरी चेतन से कहीं आगे हैं, चाहे उनकी
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कहानी - प्रेम की उप-कथा

हिंदी की जानी मानी साहित्यिक पत्रिका कथादेश के मई अंक में मेरी कहानी आई है, आपसे बांट रहा हूं - जब दोस्ती प्रेम मे धीरे-धीरे तब्दील हो जाती है तो दोस्ती के अधिकार और आदते-प्रक्रियाएँ खत्म थोड़े ना होते है वहाँ तो एक समानता का रिश्ता होता है..... थोड़ा
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समय जब लिखता है इतिहास

हाल ही एक किताब आई है- गांधी: नेक्ड एम्बिशन, जो ब्रिटिश लेखक जेड एडम्स ने लिखी है, इसमें गांधी के यौन व्यवहार पर खुलकर बात की गई है। ऑस्टे्रलिया के गांधीवादी दोस्त अब्बास रजा अल्वी का ई-मेल आया, उनकी चिंता वाजिब है। दरअसल एक किताब आई है जो ब्रिटिश लेखक
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ऑरकुट भर आकाश है, ट्विटर भर संसार

इस नई चौपाल ने नई बहस, नई आजादी, नई चुनौतियों को जन्म दिया है, कोई भी नया संचार माध्यम अच्छे के साथ बुरी संभावनाओं को भी अपने भीतर लिए हुए होता है, तो यह चौपाल भी इसका कतई अपवाद नहीं है और इसमें कुछ नया भी नहीं है। अब यह तो यकीनन इस्तेमाल करने वाले पर ही
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एक कविता सा कुछ

कविता लिखना इतना अनायास होता है कि खुद मैं बहुत बार हैरानी करता हूं और फिर यह यकीन भी पुख्ता हो जाता है कि कविता दरअसल इलहाम होती है ऐसी ही एक ताजा इलहामी कविता पेशे नजर है-बुझे से दिन और उदास शामेंबिखरे सपने हैं उजाड से आशियाने में जैसे टूटी हांडी में
Apr 21 2010 04:16 PM
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आठ मार्च

आठ मार्च मैं भूलकर भी नहीं भूलता, 9 साल पुराने एक ऐसे ही आठ मार्च की याद, और अपने बनाए एक कच्चे से पर सच्चे से रेखाचित्र को बांट रहा हूं -
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मित्थल मौसी का परिवार पुराण यानी जब समय हमारा बोलता है...

इससे गुजरना अनायास अपने अतीत और एक अनुशासन के तौर पर इतिहास से गुजरना है, मुकम्मल तरीके से, अंदर गहरे तक उतरते, डूबते हुए, कभी हंसते हुए, कभी मुस्कुराते हुए तो कभी रोते हुए। हार्पर हिंदी ने इसे छापा है, उनके साहस को सलाम करना पड़ेगा क्योकि यह किसी नामचीन
Mar 07 2010 01:30 PM
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संस्कृति मीमांसा में मेरी प्रेम कविताएँ

painting by alfred gokel,courtesy -google राजाराम भादू जी के संपादन में िनकल रही संस्कृति मीमांसा के जनवरी-फरवरी अंक में मेरी उन १०४ में से बारह कविताएँ चुनकर छापी हैं जॊ दरअसल मेरे प्रेम में टूटन के बाद दूसरे प‌क्ष की ऒर से हैं. छपने की कहानी जरा इस तरह
Feb 16 2010 12:29 PM
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मेरी प्रेम कवितायें

दोस्तों की मांग पर पेश है मैसूर में कृत्या अंतरराष्टीय काव्योत्सव-2010 में पढी प्रेम कविताएं -- 1 तुम्हारे मिलने से मिली सूरज की किरण मेरी आँखों में हो गयी शामिल और मेरी रोशनी असीम हो गयी सच तुम मिली और मैं उजालों से भर गया इस अंधेरी रात में मरुस्थल में
Feb 12 2010 05:51 PM
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अदब से बात अदब की

लगभग हर नियमित दर्शक-श्रोता की स्मृति में कोई ना कोई सत्र सकारात्मक रूप से अंकित ना हुआ हो, किसी न किसी लेखक से संवाद, दर्शन या पास में बैठने का अनुभव गौरवमिश्रित खुशी का वाइज नहीं बना हो, ऐसा मुझे नहीं लगता, तो क्या इसे कम बड़ी जमीनी उपलब्धि माना जाना
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गुनगुनी धूप में सर्द सचाइयां

जयपुर की सुहानी सुबह में देश का मशहूर और बेहतरीन अदाकार खुद पर लिखी किताब पर बात कर रहा था और साथ थी किताब की लेखक और उनकी पत्नी नंदिता पुरी, दोनों से मुखातिब नमिता भेद्रे। शुरूआत बहुत अनौपचारिक सी, ओम पुरी अपनी सीट से उठकर नंदिता के पास आकर माइक चेक
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हरीश भादानीजी को साहित्य अकादमी पुरस्कार विवाद!

फेसबुक पर मेजर रतन जांगिड बनाम हरीश भादानी को साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर छिडी बहस को यथारूप में यहां देना जरूरी लग रहा है जो 14 जनवरी को सुबह शुरू हुई और चर्चा पूरे राजस्थन में हुई बहुत दोस्तो ने कहा कि जो लोग फेसबुक पर नहीं है वो इससे वेचित रहे
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मेरी प्रेमिका के विवाह की ’खुशखबरी’

मेरे लगभग डेढ दशक के दोस्त जो मुझे भाई साहब कहता था, की छः साल की मेरी प्रेमिका से 28 दिसंबर को शादी होने की खबर आई है। वही दोस्त जिसने मेरे ब्रेकअप में बहुत ’मदद’ की। मेरे ब्रेकअप के साढे तीन साल बाद आई खबर संतोषजनक है कि मेरे ब्रेकअप में मेरा कोई कुसूर
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जुबानें ज्ञान की खिडकियां है ज्ञान नहीं

माफ कीजिए अंग्रेजी के वेदप्रकाश शर्मा या सुरेंद्रमोहन पाठक यानी चेतन भगत हिंदी के अखबारों में गर्व से लिख रहे हों तो जुबान के नाम पर नए दशक का व्यवहार और संसार हमारे सामने खुलकर नहीं आ जाता क्या! गुजरते साल की आखिरी शाम ताजा धुले लिहाफ में कालिंगवुड की
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इस दौर के लिए अफ़सोस भी..शुकराना भी

चुनाव निपट गए.. कुछ नेता निपट गए और मुद्दे की बात जनता फिर निपट गयी । दुनिया भर की मंदी के बीच भारत में फैलते चुनावी कारोबार को देखकर एकबार लगा मंदी हमारे यहाँ तो है ही नहीं। यही मुगालता पाल लें, चलिए कुछ देर के लिए, पर कबूतर के बिल्ली को देखकर आँख ब
Dec 29 2009 11:45 AM
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तू ज्योंदा रहे मेरे शहर

आज सुबह उठा तो मेरे शहर -जो है भी और नहीं भी यानी श्री गंगानगर से एक एसएमएस ने बेहतर दिन की दुआ दी. ये आज खास इसलिए कि शहर बहुत याद आया ..हालाँकि वो दिन शायद ही हो जब मुझे उस शहर की याद न आती हो .. यूँ मेरे बचपन की स्म्रतियों में हनुमानगढ़ जिले का पी
Dec 29 2009 11:45 AM
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मेरा भी है कश्मीर

याद प्योम एक हफ्ते से मैं कश्मीर मय हूँ हालाँकि जिस काम से वाबस्ता हूँ उसके तहत कश्मीर अंक की योजना मेरे जेहन में तभी से आकार लेने लगी थी जब उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में वहाँ निजाम बदलने की ख़बर आयी ॥कश्मीर में निजाम का सिर्फ़ चेहरा बदला है या वाकई क
Dec 29 2009 11:45 AM
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बधाई पल्लव

प्रिय मित्र पल्लव को भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता की तरफ़ से राष्ट्रिय युवा साहित्यिक पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है ॥एक प्यारे इंसान की अनथक मेहनत और समर्पण का सम्मान है ये..सफर की शुरुआत भर है..यकीन मानिए..अभी कई गढ़ टूटेंगे .. ये भोर की पहली किरण
Dec 29 2009 11:45 AM
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ये काला दिन है जब केवल जाट ही किसान है

बात अपने बचपन से शुरू करता हूँ..अपने अध्यापक पिता से बाल सुलभ जिज्ञासा में पूछा था कि 'पापा गाँव के चौधरी जब ख़ुद खेती नहीं करते खेत तो कोई चौथिया तीजिया पांचिया जोतता है फ़िर ये ख़ुद को किसान कैसे कहते हैं.किसान तो वही होता है ना जो खेती करता है' तब
Dec 29 2009 11:45 AM
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वसुंधरा की हार जनता की जीत है

राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री इस मायने में भी पहली थी कि जनता के बीच अपने को मुख्यमंत्री बनाने के लिए निर्लज्जता से वोट मांगे ..शायद उन्हें शर्म आती थी कि वो सिर्फ़ भाजपा के लिए वोट मांगे..इतना अहम् भगवान् दुश्मन को भी न दे॥ कल दोपहर बाद जब ये स
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2009 की एक फिल्म जो 2010 के लिए है

अपूर्वा याज्ञिक की फिल्म सच दिखाकर झकझोरती है, और चेताती है तो सिखाती भी है और अंतत: सार्थक विमर्श खड़ा करती है, इसलिए इसे देखना एक अच्छी किताब पढने का आनंद लेना है साल 2009 गुजर गया जैसे हर साल गुजरता है, 2010 शुरू हो रहा है ठीक वैसे ही जैसे हर नया
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समय का पहिया घूमे रे...

बजाज कंपनी ने स्कूटर ना बनाने का फैसला किया है, यह भारतीय मध्यम वर्ग के जीवन में एक बदलाव के हथियार का इतिहास बनना नहीं है क्या? बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज... यह विज्ञापन देख और सुनकर बचपन गुजारने वाली पीढी अब जवान होकर युवतर हो रही है, म
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पाउलो कोएलो- शब्द जब जिंदगियां बदल देते हैं

पोर्तोबॅलो की जादूगरनीÓ के शिल्प में खास बात यह है कि नायिका एथिना के जीवन प्रसंगों को उससे जुड़े लोगों के मुंह से क्रमश: कहलवाया है हार्पर हिंदी से पाउलो कोएलो या पॉलो क्वेल्हो की हिंदी में तीसरी किताब आई हैं- 'पोर्तोबॅलो की जादूगरनीÓ। वो मुझे हमारे
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मैं भी जाने वाला हूं, मुझ पर किससे लिखवाओगे -हरीश भादानी

राजस्थान की माटी से निपजे ऐसे विरले शब्दशिल्पी जिसने इलाहाबाद , दिल्ली और भोपाल के कुछ साहित्यिक लोगों के मिथ्या दर्प और तथाकथित एकाधिपत्य का सार्थक व सफल भंजन किया था , का जाना दुखद तो है , पर उनकी शाब्दिक उपस्थिति हमें गौरवान्वित करती रहेगी। शुक्रव
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साधारण के असाधारण लेखक - संजीव

जिस समय कथाकार संजीव से मेरा पहला संपर्क हुआ, वे रसायनविद् थे, और मैं इतिहास का विद्यार्थी। तब उनके उपन्यास सूत्रधार को पढ़ा था, पहली नजर में कोई अद्भुत, असाधारण रचना नहीं लगी। बाद में यह अहसास हुआ कि उसकी साधारणता में ही सारा जादू है। हाल ही उनकी समस्त
Sep 05 2009 12:48 PM
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जिन्ना उर्फ़ इतिहास से डर क्यों लगता है?

जसवंत सिंह की किताब पढ डालिए, दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार और नेहरू स्मृति पुस्तकालय तथा लंदन स्थित इडिया हाउस लाइब्रेरी में उपलब्ध मूल दस्तावेजों को खंगालिए और सच से सामना कीजिए, बस इतनी सी जरूरत है। हो सकता है कुछ ऐसा निकल जाए जो इन सब धारणाओ को
Aug 29 2009 05:01 PM
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दोराहे को समझने की जद्दोजहद में

मीरा कान्त की किताब 'उर्फ़ हिटलर 'ये किताब यहूदियों पर हिटलर के जुल्मो सितम, उसके प्रचार मंत्री गोएबल्स के उन्मादी कारनामों को महसूस कराती हुई बीच बीच में असली भारत को निम्न मध्यमवर्गीय कथा के जरिये पेश करती है ....मीरा कांत के दो साल पहले आए उपन्यास
Aug 11 2009 12:52 PM
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मैंने राजमाता गायत्री देवी को छुआ था

कल जब जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी का निधन हो गया हैं, मुझे अपने पत्रकारीय जीवन के महत्वपूर्ण साक्षात्कारों में से एक को आप से बांटने का मन है।सन् 2004, वो मई के पहले हफ्ते की एक दोपहर थी, उमस भरी। कुल जमा छत्तीस दिन के बाद मुझे लिलीपुल से जयपुर
Jul 30 2009 04:39 PM
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कलम को सलाम कीजिए

रामचंद्र गुहा का प्रकाशक पेंग्विन से करार हुआ है जिसके तहत वे इस साल उनके लिए 97 लाख रुपये में सात किताबें लिखेंगे, यह करार भारतीय लेखन जगत में एक इतिहास का रचा जाना है तो उचित लेखकीय मानदेय का उदाहरण भी।एक बड़ी खबर यह है कि प्रसिद्ध इतिहासकार और
Jul 27 2009 03:30 PM
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इनसान परेशान यहां भी है, वहां भी

यह महज किताब नहीं है, दरअसल अतीत की वो खिड़की है जिससे भारतीय उपमहाद्वीप का भविष्य झांकता है... हार्पर कॉलिन्स से एक किताब आयी है, जिसका संपादन इरा पांडे ने किया है। हिन्दी पाठकों को पता होगा ही कि वे प्रसिद्ध लेखिका शिवानी की बेटी हैं। इस ताजा किताब
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आज तीस जून है

आज तीस जून है ... तीन साल पूरे हो गए हैं एक घटना को ...पर जो अब भी ताजा है वक्त को गुजरना है लम्हों को सहना है और दिल को तड़पना है ... वो खुश होंगे .आज उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी उपाधि मिलने की पूर्व पीठिका बननी है ..फिर उपाधि मिलना औपचारिकता मात्र हो
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आलोक श्रीवास्तव की आमीन का सफर मुसलसल जारी

कुछ लोगों की सृजनात्मकता से ईर्ष्या होती है , उनमे पहली पंक्ति में हैं - भाई आलोक श्रीवास्तव ..उनकी शायरी के पहले मजमुए 'आमीन' का दिग्विजय अभियान जारी है ...पूरी खबर के लिए एक क्लिक तो कर ही लें... http://qalam1.blogspot.com/
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सौ साल की गवाही में एक किताब

हिंद स्वराज आज एक किताब के बहाने उसके समय पर बात कर रहा हूं। पंद्रह साल पहले, पहली बार जब मेरा हिंद स्वराज नाम की किताब से राब्ता कायम हुआ था, गांधी को तार्किक रूप से समझना और उनके प्रति अपनी अगाध भक्ति के तार्किक आधार खोजना शुरू कर रहा था, उस वक्त क
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तारीख लिखो तो ऐसे लिखो

ये पुस्तक समीक्षा कतई नहीं है न ही व्यक्ति परिचय है, किताब के बहाने व्यक्ति और व्यक्ति के बहाने किताब पर भी बात नहीं है। सच पूछें तो इन दिनों एक किताब ने नींद हराम कर रखी है, किताब है झुरावौ जिसका शाब्दिक अर्थ है विलाप, और मैं सचमुच विलाप की अवस्था म
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एक वादे का पूरा होना

साल भर बाद एक वादा पूरा किया ...भाई आलोक प्रकाश पुतुल ( मेरे जिन्दगी के तीन आलोकों में से एक - पहले बड़े भाई कुख्यात विख्यात आलोक तोमर, दूसरे शायर भाई आलोक श्रीवास्तव और ये तीसरे हैं रायपुर वाले आलोक पुतुल) से कहा था कि कविता कहानी से इतर कुछ दूंगा .
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बहुत दिनों बाद एक कविता

शीर्षक विहीन एक उदास सी शाम बैठी है बिजली के तारों पर गुनगुनाती है कोई साठ के दशक का हिन्दी फिल्मी गीत दूर कल्पना में एक गाव की एक ध्वनि सुनती है तो टूटता है क्रम उसी पल सड़क के कोलाहल में सूरज शाम के कानो में आकर कहता है कब से बैठी हो . जाओ... कुछ का
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तिब्बत का दर्द अपना भी है...

बचपन से हम तिब्बत को संसार की छत के रूप में पढ़ते हैं फिर वो भूगोल से हमारे इतिहास के अध्ययन में शामिल होता है तो कभी दयानंद सरस्वती उसे आर्यों का मूल निवास स्थान बताते हैं तो कभी उसे बोद्धों के एक प्रमुख केंद्र के रूप में जानते हैं और राहुल संकृत्या
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प्रभु जोशी - तुम चन्दन हम पानी

कलम पर पढ़ें जाने माने चित्रकार और कथाकार प्रभु जोशी के काम और शख्सियत पर मेरी एक टिप्पणी -जो कल पत्रिका के इंदौर संस्करण में प्रकाशित हुई है रंगों और शब्दों के बीच की आवाजाही का पड़ाव जयपुर
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रही परदे में न अब वो पर्दानशीं .....

स्लमडॉग मिलिनेयर और ऑस्कर पर अमिताभ बच्चन तक की राय इस तरह बदली कि दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है। मैं न तो डॉग शब्द की मीमांसा करने जा रहा हूँ ना भारत की छवि पर कोई स्यापा कर रहा हूँ कि भारत की बुराई से ही पुरस्कार मिलते हैं॥चाहे साहित्य हो या सिन