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17 Jun 2010
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“कहीं सो न जाना!”

चमक और दमक में, कहीं खो न जाना!कलम के मुसाफिर, कहीं सो न  जाना! जलाना पड़ेगा तुझे, दीप जगमग, दिखाना पड़ेगा जगत को सही मग, तुझे सभ्यता की, अलख है जगाना!! कलम के मुसाफिर...................!! सिक्कों की खातिर कलम बेचना मत,कलम में छिपी है ज़माने की
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“बादल तो बादल होते हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक)

सूचनाः- 17 जून से 19 जून तक लुधियाना में रहूँगा! 21 जून को ही ब्लॉगिस्तान  में वापिस लौटूँगा! मेरा एक पुराना गीत बादल तो बादल होते हैं ।भरी हुई छागल होते हैं।। तन में जल का सिन्धु समेटे,नभ में कृष्ण दिखाई देते, लेकिन धुआँ-धुआँ होते हैं ।बादल तो
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘आदमी का अब जनाजा, जा रहा संसार से’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

“25 साल पुरानी मेरी एक रचना” आदमी के प्यार को, रोता रहा है आदमी। आदमी के भार को, ढोता रहा है आदमी।। आदमी का विश्व में, बाजार गन्दा हो रहा। आदमी का आदमी के साथ, धन्धा हो रहा।।  आदमी ही आदमी का, भूलता इतिहास है। आदमी को आदमीयत का नही आभास है।।
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“पिता और बच्चा-William Butler Yeats” (अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

Father and Child a poem  by William Butler Yeats अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक” जब-जब भी प्रतिबन्धों कारहस्य खोला हैनारी बँधी हुई है इनसे  बालक ने यह बोला हैअच्छी महिलाएँ भी पुरुषों के अधीन हैंकहने का स्वाधीन मगर सब
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“टीस” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

(नोट-कलाई में मोच आ जाने के कारण केवल आपको पढ़ ही रहा हूँ! चाह कर भी टिप्पणी नही कर पा रहा हूँ! किसी तरह से कृतिदेव मे लिखी हुई इस रचना को किसी से यूनिकोड में बदलवा कर यह रचना लगवा दी है!)  टीस उठ रही है तन-मन में, पोर-पोर में दर्द भरा है! बाहर से
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“जाना अपने घर, कल - परसो!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

♥ एक पुरानी रचना ♥नभ में कितने घन-श्याम घिरे, बरसी न अभी जी भर बदली। मुस्कान सघन-घन दे न सके,  मुरझाई आशाओं की कली।------------प्यासा चातक, प्यासी धरती, प्यास लिए, अब फसल चली। प्यासी निशा - दिवस प्यासे, प्यासी हर सुबह-औ-शाम
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“वो चमन चाहिए!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

♥ एक पुराना गीत  ♥मन-सुमन हों खिले, उर से उर हों मिले, लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए। ज्ञान-गंगा बहे, शन्ति और सुख रहे- मुस्कराता हुआ वो वतन चाहिए।।  दीप आशाओं के हर कुटी में जलें, राम-लछमन से बालक, घरों में पलें, प्यार ही
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“ऊष्म और संयुक्ताक्षर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“ष” “ष” से बन जाता षटकोण! षड्दर्शन, षड्दृष्टिकोण!  षट्-विद्याओं को धारणकर, बन जाओ अर्जुन और द्रोण!! “श” “श” से शंकर हैं भगवान! शम्भू जी हैं कृपानिधान! खाओ शहद, शरीफा मीठा, कभी न कहलाना शैतान!!   “स” “स” से संविधान, सरकार, संसद में
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“व्यञ्जनावली-अन्तस्थ” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“य” “य” से यति वो ही कहलाते!जो नित यज्ञ-हवन करवाते!वातावरण शुद्ध हो जाता,कष्ट-क्लेश इससे मिट जाते! “र” “र” रसना को लो जान! रथ को हाँक रहे भगवान! खट्टा, मीठा और चरपरा, सबकी है इसको पहचान! “ल” “ल” से लड्डू और लंगूर! लट्टू घूम रहा भरपूर! काले मुँह वाले वानर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“व्यञ्जनावली-पवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कल अन्तस्थ और परसों ऊष्म पर मुक्तक लगाने है!उसके बाद फिर से अपने रंग में आ जाऊँगा!"प""प" से पर्वत और पतंग!पत्थर हैं पहाड़ के अंग!मानो तो ये महादेव हैं, बहुत निराले इनके ढंग!! "फ"फ से फल गुण का भण्डार!फल सबसे अच्छा आहार!फ से बन जाता फव्वारा,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“व्यञ्जनावली-टवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"ट""ट" से टहनी और टमाटर! अंग्रेजी भाषा है टर-टर! हिन्दी वैज्ञानिक भाषा है, सम्बोधन में होता आदर!! "ठ""ठ" से ठेंगा और ठठेरा! दुनिया में ठलुओं का डेरा! ठग लोगों को बहकाता है, तोड़ डालना इसका घेरा!! "ड""ड" से बनता डम्बिल-डण्डा! डलिया में मत रखना अण्डा!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“व्यञ्जनावली-चवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"च""च" से चन्दा-चम्मच-चमचम!चरखा सूत कातता हरदम!सरदी, गरमी और वर्षा का, बदल-बदल कर आता मौसम!! "छ""छ" से छतरी सदा लगाओ!छत पर मत तुम पतंग उड़ाओ!छम-छम बारिश जब आती हो, झट इसके नीचे छिप जाओ!! "ज""ज" से जड़ और लिखो जहाज!सागर पार करो तुम आज!पानी पर सरपट चलता
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“व्यञ्जनावलि-कवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

♥ व्यञ्जनावलि-कवर्ग ♥"क""क" से कलम हाथ में लेकर! लिख सकते हैं कमल-कबूतर!! "क" पहला व्यञ्जन हिन्दी का, भूल न जाना इसे मित्रवर!! "ख"  "ख" से खम्बा और खलिहान! खेत जोतता श्रमिक किसान!! "ख" से खरहा और खरगोश, झाड़ी जिसका विमल वितान!! "ग""ग" से गङ्गा, गहरी
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“स्वरावलि” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

"अ" ‘‘अ‘’ से अल्पज्ञ सब, ओम् सर्वज्ञ है। ओम् का जाप, सबसे बड़ा यज्ञ है।। ‘‘आ’’ ‘‘आ’’ से आदि न जिसका, कोई अन्त है। सारी दुनिया का आराध्य, वह सन्त है।। ‘‘इ’’ ‘‘इ’’ से इमली खटाई भरी, खान है। खट्टा होना खतरनाक, पहचान
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“अब आ जाओ कृष्ण-कन्हैया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

धूल भरी क्यों आज गगन में? क्यों है अँधियारा उपवन में?  सूरज क्यों दिन में शर्माया? भरी दुपहरी में क्यों छाया? चन्दा गुम क्यों बिना अमावस? नजर नही आती क्यों पावस? क्यों है धरती रूखी-रूखी? क्यों है खेती सूखी-सूखी? छागल क्यों हो गई विदेशी? पागल क्यों
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“बेमौसम वीरान हो गये!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

गुमनामों की इस बस्ती में, नेकनाम बदनाम हो गये! जो मक्कारी में अव्वल थे, वो अव्वल सरनाम हो गये! जो करते हैं दगा-फरेबी, वो पाते हैं दूध-जलेबी, सच्चाई के सारे जेवर, महफिल में नीलाम हो गये! न्यायालय में न्याय बिक रहा, सरे-आम अन्याय टिक रहा, पंच और सरपंच
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“आओ चलें गाँव की ओर!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

छोड़ नगर का मोह, आओ चलें गाँव की ओर! मन से त्यागें ऊहापोह, आओ चलें गाँव की ओर! ताल-तलैय्या, नदिया-नाले, गाय चराये बनकर ग्वाले, जगायें अपनापन व्यामोह, आओ चलें गाँव की ओर! खेतों में हल लेकर जायें, भाभी भोजन लेकर आयें, मट्ठा बाट रहा है जोह! आओ चलें गाँव की
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"आम रसीले भोले-भाले!!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

पकने को तैयार खड़े हैं! शाखाओं पर लदे पड़े हैं!!झूमर बनकर लटक रहे हैं! झूम-झूम कर मटक रहे हैं!! कोई दशहरी कोई लँगड़ा! फजरी कितना मोटा तगड़ा!! बम्बइया की शान निराली! तोतापरी बहुत मतवाली!! कुछ गुलाब की खुशबू वाले! आम रसीले भोले-भाले!!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“महत्वपूर्ण-सूचना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“मेरे मोबाइल से गालियाँ सुनाई दीं” मित्रों! अलीगढ़ बारात में गया था! 28-05-2010 को रात्रि में 8:30 और 9:00 बजे के मध्य मेरा मोबाइल किसी मनचले पाकेटमार ने उड़ा लिया! उसके बाद मेरे दूसरे मोबाइल नं.-09997996437 पर गालियाँ सुनाई दी! बाद में कई मित्रों का फोन
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“नाइस-सुमन को सुझाव” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

 "नाइस-सुमन"सुमन स्वयं तुम नाइस हो,नाइस लिखना अब छोड़ो!अपनी शब्दों की माला में,नया शब्द अब जोड़ो!!ऊब गये सब देख-देख यह,कोई नव्य प्रयोग करो!पीछा छोड़ो अब तो इसका,नया वाक्य उपयोग करो!!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“रचनाएँ रचवाती हो!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

रोज-रोज सपनों में आकर, छवि अपनी दिखलाती हो! शब्दों का भण्डार दिखाकर, रचनाएँ रचवाती हो!! कभी हँस पर, कभी मोर पर, जीवन के हर एक मोड़ पर, भटके राही का माता तुम, पथ प्रशस्त कर जाती हो! शब्दों का भण्डार दिखाकर, रचनाएँ रचवाती हो!! मैं हूँ मूढ़, निपट अज्ञानी,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“हृदय से नमन है हमारा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

धरा है तुम्हारी, गगन है तुम्हारा! तुम्हें प्यार करता है, संसार सारा!! तुम्हारी चमक से चमकता है सूरज, तुम्हारी दमक से दमकता है चन्दा। तुम्ही दे रहे हो निबल को सहारा! तुम्हें प्यार करता है, संसार सारा!! तुम्हारी चहक से ही चलता पवन है, तुम्हारी महक से ही
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“600वाँ पुष्प-एक पुरानी रचना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

तन्हाई के आलम में पल-पल, जब उनकी याद सताती है! दिन कट जाता जैसे-तैसे, पर रात बहुत तड़पाती है!! गुलशन से चुराया था जिनको, जुल्फों में सजाया था उनको, दो दिन की जुदाई भी हमसे, अब सहन नही हो पाती है!  दिन कट जाता जैसे-तैसे, पर रात बहुत तड़पाती है!! हम
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
May 25 2010 10:42 PM
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“मौसम नैनीताल का” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

गरमी में ठण्डक पहुँचाता, मौसम नैनीताल का! मस्त नज़ारा मन बहलाता, माल-रोड के माल का!!  नौका का आनन्द निराला, क्षण में घन छा जाता काला, शीतल पवन ठिठुरता सा तन, याद दिलाता शॉल का! लू के गरम थपेड़े खा कर, आम झूलते हैं डाली पर, इन्हें देख कर मुँह में
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“जीवन जीने की आशा है” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जीवन इक खेल तमाशा है,जीवन जीने की आशा है।जिसने जग में जीवन पाया,आया अदभुत् सा गान लिए।मुस्कान लिए अरमान लिए,जग में जीने की शान लिए।इस बालक से जब यह पूछा,बतलाओ तो जीवन क्या है?बोला दुनिया परिभाषा है ,सारा जीवन एक भाषा है।जीवन इक खेल तमाशा है,जीवन जीने की
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"ग़ज़ल"वफा की राह में, घर से निकल पड़े हम तो,डगर में फैले हुए झाड़ और खार मिले!खुशी की चाह में, भटके गली-गली हम तो,उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले!!हमारे साथ तो बस दिल की दौलतें ही थी,खुदा की बख्शी हुई चन्द नेमते ही थी,मगर यहाँ तो हमें सिर्फ खरीदार
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“परछाँई की तासीर बदल जाती है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आमन्त्रण में बल हो तो , तस्वीर बदल जाती है। पत्थर भी भगवान बनें, तकदीर बदल जाती है।। अपने अधरों को सीं कर, इक मौन निमन्त्रण दे दो, नयनों की भाषा से ही- मुझको आमन्त्रण दे दो, भँवरे की बिन गुंजन ही- तदवीर बदल जाती है। आमन्त्रण में बल हो तो , तस्वीर बदल
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“कर देंगे गुलशन वीराना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

किया बहुत था प्यार हमेशा हमने सौतेलों को, किन्तु उन्होंने हमको भाई नहीं माना! -- लाड़-चाव से हाथ थाम कर चलना  जिन्हें सिखाया था, जीवन में आगे बढ़ने का  पथ जिनको दिखलाया था, हमने उन्हें अनुज माना था, किन्तु
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“जीवन एक पाठशाला है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक)

ऐसा कोई शख़्श नही है, आसमान से जो आया हो! ऐसा कोई नक्श नही है, जिसने मन नही भरमाया हो!! जो कुछ भी जिसने सीखा है, दुनिया ने ही सिखलाया है, सजना और सवँरना सबको, दर्पण ने ही बतलाया है, ऐसा कोई अक्स नही है, जिसने नूर नही पाया हो! ऐसा कोई नक्श नही है, जिसने
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“उम्र तमाम हो गई” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक)

पथ पर आगे बढ़ते-बढ़ते, अब जीवन की शाम हो गई! पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते, सारी उम्र तमाम हो गई!! जितना आगे कदम बढ़ाया, मंजिल ने उतना भटकाया,  मन के मनके जपते-जपते,  माला ही भगवान हो गई! पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते, यों ही उम्र तमाम हो गई!! चिढ़ा रही मुँह
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“न्याय करेगा कौन?” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

वानर बैठा है कुर्सी पर,  हुई बिल्लियाँ मौन!  अन्धा है कानून हमारा,  न्याय करेगा कौन? लुटी लाज है मिटी शर्म है, अनाचार में लिप्त कर्म है, बन्दीघर में बन्द धर्म है, रिश्वत का बाजार गर्म है, हुई योग्यता गौण! अन्धा है कानून हमारा,  न्याय
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“गरल ही गरल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

अब हवाओं में फैला गरल ही गरल।क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में मैं गजल।।गन्ध से अब, सुमन की-सुमन है डराभाई-चारे में, कितना जहर है भरा,वैद्य ऐसे कहाँ, जो पिलायें सुधा-अब तो हर मर्ज की है, दवा ही अजल।क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में मैं गजल।।धर्म की कैद में,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“मखमली लिबास” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  भोले पंछियों के पंख,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“सूखे हुए छुहारे, उनको लुभा गये हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“प्रियवर अलबेला खत्री जी को समर्पित” अंगूर के सभी गुण, किशमिश में आ गये हैं! सूखे हुए छुहारे, उनको लुभा गये हैं!! बूढ़े हुए तो क्या है, मन में भरा है यौवन, गीतों के जाम में ही, ढाला हुआ है जीवन, इस उम्र में भी हम तो, दुनिया को भा गये हैं! सूखे हुए
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“आदमी की हबस” (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

“एक पुरानी कविता”जिन्दगी क्या मौत पर भी, अब हबस छाने लगी। आदमी को, आदमी की हबस ही खाने लगी।।हबस के कारण, यहाँ गणतन्त्रता भी सो गई। दासता सी आज, आजादी निबल को हो गई।।पालिकाओं और सदन में, हबस का ही शोर है। हबस के कारण, बशर लगने लगा अब चोर है।।उच्च-शिक्षा
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मोक्ष के लक्ष को मापने के लिए, जाने कितने जनम और मरण चाहिए । प्यार का राग आलापने के लिए,शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।लैला-मजनूँ को गुजरे जमाना हुआ,किस्सा-ए हीर-रांझा पुराना हुआ, प्रीत की पोथियाँ बाँचने के लिए- ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए । प्यार का
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"मेरा हिन्दुस्तान!" (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

नेताओं का बदल गया है, धर्म और ईमान, जितने बड़े करें घोटाले, उतने बनें महान, सारा जग करता गुणगान, ये है मेरा हिन्दुस्तान। भूखी-नंगी जनता को, भाषण से ही भरमाता, प्रश्न उठाने को संसद में, भारी नोट कमाता, कोठी, बंगला, कार विदेशी, पाल रहा ये श्वान, सारा जग
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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हो गया क्यों देश ऐसा ? (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कल्पनाएँ डर गयी हैं, भावनाएँ मर गयीं हैं,देख कर परिवेश ऐसा।हो गया क्यों देश ऐसा??पक्षियों का चह-चहाना , लग रहा चीत्कार सा है।षट्पदों का गीत गाना ,आज हा-हा कार सा है।गीत उर में रो रहे हैं, शब्द सारे सो रहे हैं,देख कर परिवेश ऐसा। हो गया क्यों देश ऐसा??एकता
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“एक पुराना मुक्तक” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“आज नेट की चाल बहुत मद्धिम है” इसलिए बस ये मुक्तक ही देख लीजिए!  दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी-खाद मिला करती है।चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती हैसूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है-यौवन ढल जाने पर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक