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29 May 2010
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पक्की जमानत

कौशल बाबू कम बोलते हैं मगर पक्की बात करते है. हम रोज शाम को टेनिस कोर्ट में मिलते हैं. अब उम्र इतनी हो चुकी है कि मैच की जगह गेम से ही हार जीत तय कर लेते हैं और कोर्ट के सामने करीने से रखी हुई कुर्सियों का क्रम बिगाड़ कर अपनी पंचायत आरम्भ कर लिया करते
 
Kishore Choudhary
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अंजलि, तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खाते हैं

निस्तब्ध कोठरी के कोनों से निकलकर अँधेरा बीच आँगन में पसरा हुआ था। दीवारों से सटी चुप्पी से अंदाजा लगाना भी मुश्किल था कि यहाँ पांच लोग बैठे है. उनमे एक ही साम्य था कि वे सभी एक लड़की को जानते थे या उसकी ज़िन्दगी को कहीं से छू गए थे. चमकदार सड़क से होता
 
Kishore Choudhary
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गली के छोर पर अँधेरे में डूबी खिड़की

[ मेरी ये छोटी सी कहानी, जापान के साहित्यिक आकाश के अमिट नक्षत्र रियुनोसुके अकूतागावा को आज उनके जन्म दिवस पर समर्पित है. यह असंभव है कि मैं राशोमोन जैसी कहानी लिख सकूँगा मगर आपकी प्रेरणा मेरे भीतर हमेशा ज़िन्दा रहेगी ]गली के आर - पार अँधेरा और रोशनी अपने
 
Kishore Choudhary
Mar 01 2010 07:53 AM
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सोचता हूँ कि ये आखिरी मुलाकात हो तो बेहतर है

पहली मुलाकातसजला से मेरी पहली मुलाकात बाल स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम के तहत संचालित केंद्र पर हुए थी. वह क्रीम कलर की साड़ी पहने हुए दो अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्तानुमा महिलाओं से बातें कर रही थी. मैंने कई जगहों पर पता करने के बाद उसका सेल नंबर लिया था और
 
Kishore Choudhary
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बिल्लियाँ

विशाखा, नौजवान लड़कियों के सामने काले अंधेरे दिनों के बारे में सोचती है। महीनों बाद कोई ट्रक घर के आगे आके रुकता है, बच्चे खुशियों से भरे दौड़ते हैं अपने पिता के गले में बाहें डालने को आतुर। ट्रक की सीट से टिकी रहने वाली पीठ, कांडला पोर्ट पर बोरियां
 
Kishore Choudhary
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तन्हा तन्हा मत सोचा कर...

पेशानी-ऐ-हयात में कुछ ऐसे बल पड़े, हंसने को जी जो चाहा तो आंसू निकल पड़े, रहने दो ना बुझाओ मेरे आशियाँ की आग, इस कशमकश में आपका दामन ना जल पड़े।" इन्ही शेर के साथ ग़ज़ल आरम्भ होती और सलीम के चेहरे पर मोनालीसा मुस्कान उतर आती मैं उसके चहरे पर कई भाव देखता
 
Kishore Choudhary
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चलो कहीं चलते हैं...

चेतक सर्किल से कुछ फर्लांग की दूरी पर एक चौड़ी गली में हम वीडियो कोच बस की प्रतीक्षा कर रहे थे. पददलित सड़कें अपने काले रंग में उघड़ आई थी और दूर खड़े पहाड़ों का अँधेरा आस पास बने छोटे छोटे घरों की चिमनियों को हराने में लगा था. दिन इस कदर थक चुका था कि
 
Kishore Choudhary
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खुशबू बारिश की नहीं, मिट्टी की है ...

धुंए से भरी शाम अधखुले रोशनदानों से जो भीतर आने लगती तो दबे पाँव उदासी घर में इस तरह पसर जाती जैसे ये उसी का घर हो. दरवाजे से देखो तो दूर सामने राजपरिवार का विशाल महल दिखाई पड़ता जबकि पीछे की खिड़की कुछ इस तरह का दृश्य उत्पन्न करती जैसे विराट निर्जन
 
Kishore Choudhary
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दोस्तों ब्लॉग छोड़ कर मत जाओ, कौन लिखेगा कि वक्त ऐसा क्यों है ?

टूटने बिखरने के ब्योरे दर्ज कर पाना मेरे लिए सदा दुष्कर कार्य रहा है, मेरी प्रतिभा एक सामान्य बालक, युवा और फिर अधेड़ होने की ओर अग्रसर आम आदमी जैसी ही है. मेरी ज्ञानेन्द्रियाँ भी मुझे विशिष्ट नहीं बनाती है छठवे, सातवे और उससे आगे के सेन्स मुझ तक अभी
 
Kishore Choudhary
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उदास रात में झींगुरों का करुण राग

झींगुर सन्नाटे को तोड़ते थे और बुनते भी थे. ये उसके भीतर के शोर की लय में विघ्न उत्पन्न किया करते थे. उनसे ऊब कम और चिढ़ अधिक हुआ करती थी. चिन-चिन की इस आवाज़ को बंद करने के लिये वह अपने कानों पर हाथ रखती फ़िर उन्हें तकिये से दबा देती. इसके बाद भी जब भीत
 
Kishore Choudhary
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गिरगिट आस पास ही है

मेरी ज़िन्दगी में नमक की तरह शामिल शाम अक्सर दिन भर के उबाऊ चेहरों और सड़े-गले पुराने संवादों को चबाने में मदद किया करती थी. अगस्त के उस दिन की धूप बहुत अकेली थी और पेड़ों के पार छीजते हुए उजाले में मेरा मन डूबता जा रहा था. दुनिया को नामुराद घोषित करने
 
Kishore Choudhary
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तुम्हें मेरी आँखों में क्या दीखता है ...

कुछ खोजती हुई सी आँखों से उसने अनिमेष को देखा. पुराने दिनों की याद हो आई, धुंधली और संक्षिप्त यादें. जिनमें रेत के उड़ते हुए बगुले थे, धूप में साए थे मगर बहुत छोटे, नौजवान लड़के थे अपनी बाईक पर गरम हवा को पछाड़ते, दोस्ती को ज़िन्दा रखने के लिए स्कूल की
 
Kishore Choudhary
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कहानी पूरी हुई ... खुशबू...

मित्रों, ब्लोग के हिसाब से कहानी बहुत लम्बी थी और फ़िर आपसे कोई नाराजगी भी न थी कि इतना पकाया जाये... तो संजय भाई से चर्चा हुई कि आपकी परेशानी को टुकड़ों मे बांटा जाये.कहानी "खुशबू बारिश की नहीं, मिट्टी की है" का शेष भाग प्रस्तुत है क्षमा याचना के साथ....
 
Kishore Choudhary
Oct 13 2009 10:37 PM
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मेजर को सामने से गोली लगी थी

उस दिन दोपहर के दो बजे थे और सड़क के किनारे लगी गाड़ियों की एक लम्बी पंक्ति में लोगों के हाथ हवा में लहरा रहे थे वे किसी एक अभिवादन का उत्तर पाते ही दुगने जोश से सलाम बजा रहे थे. हम लोग भी सरकारी जिप्सी से बाहर निकल आये, दिल कहता था कि ये जाम भले ही सद
 
Kishore Choudhary
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विम्मी

हेलो रवि... अपने जीवन में भूत और भविष्य के सभी संबंधों में तुम ही बच गए थे जिसको बताये बिना मैं अन्तिम निर्णय करती हूँ तो सम्भव है कि अनजाने आगामी क्षणों में एक अपराधबोध मुझे घेर ले।" ये कहते हुए विम्मी चुप सी हो गई और सेलफोन के भीतर रवि, उसके इस दृढ
 
Kishore Choudhary
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परमिंदर के इंतजार में ठहरा हुआ समय

पोल के साथ कामुक चेष्टाओं वाले नृत्य और 'टोईंग' अधोवस्त्रों के काल से भी कई साल पूर्व एक पूरी पीढी बचपन से पीछा छुड़ाने के लिए छटपटा रही थी, ये उन्ही दिनों की बात है। बेचैनी हर तरफ़ थी अवसाद एक प्रमुख बीमारी बन कर उभर चुका था। स्त्री-पुरूष उम्र के चाह
 
Kishore Choudhary
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रोजनामचे में दर्ज एक रूसी लड़की

मेरी दोस्त यूलिया, इस पत्र को पढो जो तुमने मुझे 1990 में लिखा था। मेरे नाम तुम्हारा पहला पत्र। ॥ॐ॥ प्रिय मित्र किशोर, लेनिनग्राद से यूलिया का सप्रेम नमस्ते। आपका पता मुझे विक्टोरिया शिलिना ने दिया। मैं उसकी सहेली हूँ। मेरा नाम यूलिया है, मेरी आयु 19
 
Kishore Choudhary
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मौसम का कुसूर था कि जाने उनकी उम्र थी

कई बार इच्छा होती कि हेमिंग्वे के ऐ फेयरवेल टू आर्म्स के नायक फैडरिक हेनरी की तरह सब चीज़ों से दूर रह कर सिर्फ़ उस विचार पर ध्यान दूँ कि "I was born to eat, drink and sleep." पर कमबख्त ये गरमी के दिन कुछ इस तरह आते हैं कि विदेशी बबूलों पर मिमझर भी नही
 
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सड़क जो हाशिये से कम चौड़ी है

ऐसा कैसे हो सकता ? ये सोचता हुआ महीप सिंह अपना मुंह धोये बिना इधर उधर देखता हुआ अखबार ढूँढने लगा। बच्चों की नींद अभी खुली नहीं थी वे आँगन में घड़ी की सुईयों के रूप में अलग-अलग दिशाओं का बोध कराने की स्थिति में सो रहे थे। बच्चे रात को सोते समय घूर्णन
 
Kishore choudhary
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रास्ता भूलने के दिन

ये कत्ल करने की साजिशों के दिन थे अंधेरों ने रोशनी के कमजोर हिस्सों में सेंध लगा कर काले घने अंधियारे के साम्राज्य की नींव में कुछ और ईंटें जमा ली थी, चार महीने पहले मैं जिस आदमी को अचरज भरी निगाहों से देख रहा कि महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राद्याप
 
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हम जो अंडे देते थे वे फार्मी थे

रंग बिरंगी चुनर ओढे गाँव से आई गोरी इस क़स्बे को अचरज भरी निगाहों से देखती हुई कभी किसी ठेले वाले कभी गाय से टकरा जाती और हाय राम कहते हुए ख़ुद को संभालती हुई पुनः दुकानों के आगे रखे सामान में खो जाती उसका आदमी एक साथ तीन किलो सूखी लाल मिर्च खरीदने क
 
Kishore choudhary
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आदमी भाप होने से डरता हुआ

नई नौकरी हो तो उसके लिए कितनी भी दूर जाना मुश्किल नही लगता वैसे भी हर कोई पढ़ लिख कर नौकरी और फ़िर घर बनाने के सपने को लेकर ही जीता है किंतु मैं तो पिछले तीन साल से तेल उत्पादन करने वाली कंपनी में काम कर रही थी और आज इस नई जगह जाने के लिए विमान से उतरी
 
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कामान्ध राजा और रेगिस्तान की छिपकली

सखी, तुम्हारी कौमार्य अवस्था के कारण इस कथा को सुनते समय मन में श्लील-अश्लील के राग उत्पन्न हो सकते हैं किंतु ये महज मनोवेग हैं और परिस्थितियों के अनुरूप बदलते रहते हैं। आज ग्यारहवीं सदी के इक्कीसवे वर्ष के मध्याह्न माह के पुष्य नक्षत्र के अमृत सिद्ध
 
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देयर इज स्टिल समवन हू लव्ज यू

मन के दौड़ते घोड़ों का रमझोल अनियंत्रित निरंकुश सा बीते दिनों के दृश्यों को इतनी तीव्र गति से बदल रहा था कि कोई स्पष्ट घटना स्थिर नहीं हो पा रही थी, डिजिटल पटल पर आ रहे संकेतों में अवरोध उत्पन्न होने पर दिखाई पड़ने वाले पिक्सल की तरह सब कुछ उलझा-उलझा ग
 
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रात की नीम अंधेरी बाँहें

क्या स्नेहा नहीं जानती थी कि कितनी दुविधा में ये कदम उसकी ओर बढ़ रहे थे, बीते दिनों कि बेड़ियाँ आसानी से किसे मुक्त होने देती है अगर वह जानती थी तो फ़िर किस मिटटी की बनी थी जो इतना अपनापन दिखाने के बाद भी निरपेक्ष बनी रह जाती हर बार। श्याम वर्ण सुघड़ स्
 
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सड़क और पगडण्डी के बीच

पगडण्डी जैसी सड़क पर राहुल नितांत अकेला चल रहा था दस मिनट के दौरान एक भी साया उसके पास से नहीं गुजरा, खामोशी ऐसी कि कानों में सीटियों बज रही थी, धूप ढलने को थी फ़िर भी काट रही थी, ये रास्ता शहर से शोर्य कॉलोनी तक जाता था हालाँकि यहाँ सब कुछ सामान्य था
 
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नथमल का भूरिया ऊंट

भूरे और सलेटी रंग की जिप्सी में मेरे बैठने के अंदाज़ को देखते हुए अरुण डबराल साहब बोले "आप तो दीखते ही ऊंट जैसे है" उनकी ऑफिस के कामों में भी अनओफ्फिसिअल बने रहने की इस अदा पर मैं मुस्कुराया और ड्राईवर ने गाड़ी को मुख्य द्वार की ओर बढाया, सुरक्षा प्रहर
 
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अपने अर्थात मुस्कुराते मकडी के जाल

फरिश्तों ने अपनी सारी जादुई शक्ति और परियों ने मोह लेने का हुनर जीतू को दे दिया तभी तो वह अपनी छत से आश्चर्यों को सजीव घटित होते हुए देखा रहा था। पड़ोस के घर का स्नानघर चौबीस इंच टीवीनुमा दिखाई दे रहा था स्नानघर में विद्या बालन के रूप सौन्दर्य को मात
 
Kishore Choudhary
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ओस की बूँदें

कणिका ने कहा " मुझे बताओ करना क्या है?" रजत के तर्कों और उसकी भावनाओं के बीच एक अतार्किक द्वंद्व फ़ोन पर एक घंटे से ज्यादा समय ले चुका था, अस्पताल के आई सी यू वार्ड के बाहर लगी जाली को पकड़े पकडे उंगुलियों में लाल निशाँ पड़ चुके थे और वह अपने हाथ को
 
Kishore Choudhary