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प्राची व उसके पार...

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07 Jun 2010
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बहाने कम नहीं होते.

(चित्र साभार: युवा उदीयमान चित्रकार एवं मित्र 'संजय बथ्याल') मेरी नाकामियों को गर, तेरे मरहम नहीं होते,बग़ावत के ये मेरे सुर, कभी पंचम नहीं होते.ख़फा है ज़िन्दगी तुम बिन, मग़र दिल मुस्कुराता है,जहाँ मौज़ूद हो तुम, बस वहीँ पे ग़म नहीं
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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मेरे भाई ! सुनो...

जो रानीखेत में अब तक, मेरे हमदम नहीं होते,बर्फ, बादल, हवा, बरिश, हसीं मौसम नहीं होते.फ़लक में कैद हैं बादल, हरे हों किस तरह चेहरे?फ़कत दो बूँद आंसू से,ये सेहरा नम नहीं होते.रूहानी सी दुआ हैं, आपकी अंगड़ाईयाँ बेशक.बदन से टूटकर फ़िर क्यूँ, ये तारे कम नहीं
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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और जब सारे युद्ध समाप्त हो जायेंगे.

विश्व के चिरंजीवी योद्धाओं,मेरे,और मुझ जैसे कुछ,बहुत थोड़े...कायर, मतलबी, लोगों के लिए,क्या संभव है, आपका युद्ध विराम?...युद्ध विराम,उन लोगों के लिए,जिनका पुरुषार्थ मर चुका है?जानते हैं हम,आदि मानव काल से आज तक,शिकार से विचार तक,भालों से परमाणु
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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तमन्ना है बस एक मुसलसल तमन्ना...

नयी चाहतों की बदलती तमन्ना.खिले दिल, धड़कते गुलों सी तमन्ना.कोई ख्वाहिशों पे ना परदे लगाये,दुपट्टे के पीछे मचलती तमन्ना.चलो साग़रो को नया नाम दे दें.नशा, दर्द, चाहत, कहानी, तमन्ना.मेरी कैफ़ियत हैं, या चेहरा तुम्हारा?गुलाबी कभी, लाल होती तमन्ना.उठाई है
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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२८ साल

उम्र के इस पड़ाव में,जब आपकी जी हुई ज़िन्दगी दुनियाँ के लिए 'कुछ नहीं' सी है,बेशक दुनियाँ से आपको (कम के कम इस वक्त तक तो) कोई सरोकार नहीं (था).तब बैठ जाते हैं,एकांत में आप.ये अंतस का एकांत...अनेक के बीच स्वेच्छा का एकांत...(सनद रहे, स्वेच्छाएं अत्यंत
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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टू बी ऑर नॉट टू बी

बयासी रुपये का आर्चीज़ का ग्रीटिंग कार्ड. जो मेरी खुद की दुकान होने की वजह से मुझे लागत मूल्य में पड़ा था. १२ रुपये का नगद फायदा.३ महीने बीत गए, अभी कल की ही तो बात लगती है जब मैं तुमसे  मिला था.मुझे लगता है, तुम्हें सोचते
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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प्राची व उसके पार...

घोड़ा कैसे चलता है? वादा किया था न तुमसे...ऐसे ही शुरुआत होगी मेरी पहली किताब की?"अच्छा, लिखूंगा क्या उसमें?""कुछ भी लिख दो, कौनसा कोई पढने वाला है?""और तुम?""मैं पढूंगी ना...""अच्छा? वाह ! पूरी ?""अब इसका वादा मैं नहीं कर सकती."".....""हाँ बाबा पूरी,
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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एक चिट्ठी जो कल मिली

जितनी भी कॉल आती हैं यू. एस. से उनमें कम से कम नब्बे प्रतिशत कॉल स्त्रियों की होती हैं .लगता है कि उत्तरी अमेरिका में पुरुषों की संख्या में तेज़ी से गिरावट आ रही है और ये समस्या मेरे लिए किसी भी 'माओवादी' , 'जैसिका मर्डर मिस्ट्री ' , 'ग्लोबल वार्मिंग' ,
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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आत्महत्याएं -भाग एक

पर्स खोलो,खोलो तो सही...हाँ अब दिखाओ,कहीं इसमें २० का वो खूनी नोट तो नहीं पड़ा है?आइन्दा २० के नोट मत लेना किसी से...कैसा है ना ? देख के ही डर लगती है...दो २० के नोट पड़े हुए...दारु जो उसकी ज़रूरत थी,खाना जो उसके ३ बच्चों की...फ़िर भी,मेघालय सरकार
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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पागल

घोड़ा कैसे चलता है? वादा किया था न तुमसे...ऐसे ही शुरुआत होगी मेरी पहली किताब की?'अच्छा, लिखूंगा क्या उसमें?''कुछ भी लिख दो, कौनसा कोई पढने वाला है?''और तुम?''मैं पढूंगी ना...''अच्छा? वाह ! पूरी ?''अब इसका वादा मैं नहीं कर सकती.''.....''हाँ बाबा पूरी,
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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वो क्या बेच रहा है ?

लावो लावो,हाँआं...वहां नहींहियाँ रखो.अरे ...संभाल के,हस्ते काहे हैं?अभी धूल लगा है बस...थोड़ी झाडियेगा...फू-फू...थ... थ... थ...हलके हात से,बड़ा संभाल के रखे हैं...अरे नाहीकैसन बात करते हो?तीस साल से कोई खोट नाही आया...न नमैय्या कसम...वा वा?अब कैसे ?अब
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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वीयर्ड कन्फेशनस

वीयर्ड कन्फेशनस मैं डरता हूँ अपनी परेशानियों से,मैं अपने डर से परेशान हूँ.मैं परेशान हूँ ज़िन्दगी से ,मैं मौत से डरता हूँ.मैं परेशान हूँ असफलताओं से,और सफलता मुझे विचलित कर सकती है जानता हूँ.मैं परेशान हूँ इश्वर के लिए,उसके अस्तित्व से डरता हूँ.तब
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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ओ मेरे कवि !

युद्ध: कुछ प्रभाव. (पाश द्वारा)१)  झूठ बोलते हैं,ये हवाई जहाज़, बच्चों !(इनको) सच ना माननातुम खेलते रहोघर बनाने का खेल...२) रेडियो से कहोकसम खाकर तो कहेधरती गर माँ होती है तो किसकी?ये पाकिस्तानियों की क्या हुई?और भारतवालों की क्या लगी?तर्ज़-ए-ज़फ़ा
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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ऑफिस - ओ... फिश !!

(इस प्रेम कहानी में लड़की पाकिस्तान नहीं रहती है, लड़का गरीब नहीं है, दोनों के बीच जात-पात का भी कोई बंधन भी नहीं है, प्रेम त्रिकोण-चतुष्कोण भी नहीं है क्यूंकि अनंत कोण अगर हो जायें तो वृत्त बन जाता है, कहानी का कोई स्थूल खलनायक भी नहीं है, और प्रेमिका के
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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एवें ही

बेतखल्लुस अब भी क्यूँ बैठा है तू इस बज़्म में,जिसमें हर तदबीर तेरी नातवां सी हो गयी.कोई घर कितना सौभाग्यशाली हो सकता है?अच्छी बात है पुस्तक मेले दिल्ली में होते हैं और संयोग ये कि मैं भी दिल्ली में रहता हूँ, तिस पर बेचुलर हूँ .मनु जी, गौतम दाज्यू, मुफलिस
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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स्वांग

सोहन मुंह ढक के सोया था. सोहन की आमा (दादी) ने सग्गड़ (अंगीठी) में हाथ तताते (गर्म करते) हुए उसकी माँ, परुली से कहा भी था..."उठा रे इसको.ब्याल (शाम) पड़ी भी कोई सोने वाला हुआ भला?और इस सग्गड़ में २ घुटरूल (कोयले और गोबर के उपले) और डाल दे और आचमन का पानी
 
दर्पण साह 'दर्शन'
Feb 25 2010 06:24 PM
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अलविदा प्रिये

आज मैं,'तुमको'और 'तुम्हारे लिए' भीअंतिम कविता (सा कुछ) लिख रहा हूँ,आज मैं स्वीकार करना चाहता हूँ,खुद से,और तुमसे भी.......तुमसे इसलिए कि तुम मेरा एक मात्र निजी सरोकार हो....कि मैं स्व आहुति दे दूंगा.हो सकता है मैं पागल घोषित कर दिया जाऊं.या इससे भी
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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Feb 25 2010 06:23 PM
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दो कविताएँ

कवि की अंतिम इच्छा (पाश को...)निकास की देहरी पर बैठी,रात का,अलसाई सुबह की प्रथम प्रहर से,'आलिंगन'...निषिद्ध हो !ये,प्रेमाभिव्यक्ति का समय...कतई नहीं है .ये समय बिलकुल ठीक है... दिलों में उठते कारखानी - धुओं को,बुझाने वालों,या...उसे फूंक फूंक कर,आँखें
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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आम होने के प्रति...

मैं एक आम आदमी हूँ,बहुत ज़्यादा आम.मन जब भी होता है,ए-४ शीट में...दुनियाँ के सभी दर्द उकेरने का,तुम्हारे और मेरे आंसू...कागज़ गुलाबी बना देते हैं.मैं एक आम कवि हूँ.उस लगभग ढहती हुई दिवार से सटाकर...जब अंगीकार करता हूँ तुम्हें ,तुम्हारी पीठ से छुप जाती
 
दर्पण साह 'दर्शन'
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Feb 19 2010 07:19 PM
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ग़ालिब,जेस्सिका और मैं भी

यहाँ,भावनाओं की रेश ड्राइविंग में ,'सीट बेल्ट' पहना हुआ,शॉक रेजिसटेंस दिल ,उछल के ...बाहर नहीं निकलता.आंसू भी ,'एटीकेट' के 'नेपकिन' में......सूख जाते हैं.ये जिंदा सड़कों के नीचे,मरे हुए कोलतारों की दिल्ली है.यहाँ हर रिश्ते का एक बारकोड हैहर प्रेम का एक
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सौ दु:खों का एक सुख

रिस्पॉन्ड-इस्केप से जारी...चहा ठंडी, सोहन..."बोज्यू से जब दस साल का था तब मिला था, पांच साल तक बोज्यू दारु में और बाकी के पांच साल इजा में ही डूबे रहे, एक 'आम इंसान' थे.एक आम ज़िन्दगी जी और आम तरीके की मृत्यु.३-४ वर्ष हो गए, बीच'आ खंडा ( बीच वाले कमरे )
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२३ सितम्बर का equinox

२३ सितम्बर को दिन और रात बराबर होते हैं सुना था.*शायद मेरे जन्म से भी इसका कोई सम्बन्ध हो ! न पूरी तरह से विकसित दिमाग न दिल.इन्ही अर्धविकसित अंगों से सोच समझ के कुछ क्षणिकाएं आपकी नज़र हैं:'बोन्जाई'बौना होता 'अस्तित्व'... आवश्यकता कहाँ द्वार
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रिस्पॉन्ड-इस्केप

स्वांग से जारी...लेखक का एक बहुत अच्छा मित्र है.समीक्षक नाम है उसका,कहानी की किसी गली में भागते हुए लेखक का पीछे से ही हाथ पकड़ लिया उसने..."रुको! सुनो!! मेरी मायोपिक नजर मे इस लेखक को पलायनवादी नही होना चाहिये..पलायन का संबंध लेखन से नही जीवन से होता
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स्वांग

क्या देखा था लेखक ने आस्था चैनल में?"पीड़ा होती है तो आत्मा को शरीर से अलग कर लो, दूर हट जाओ, और पीड़ा को आते और जाते दूर से देखो."किन्तु यदि ये पीड़ा अनवरत हो तो? जाए ही न तो?? शरीर कब तक आत्मा से अलग रह सकता है.और आत्मा ? वो भी तड़पती होगी मिलने को,
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खोजा गूगल में,फिर गूगल इमेज़ेस,अब तुझे ,ढूँढ रहा हूँ...गूगल मेप में.बर्लिन की दिवार,बाबरी मस्ज़िद का गुम्बद,बुरका ओढ़े बुद्ध,किसी 'कथित' तानाशाह की...कथित मूर्त 'आत्मश्लाघा'कोई तेल का कुआँ,मोहनजोदड़ो... पाकिस्तान वाला भी.हूवर डेम से पहले की 'लॉस वेगास
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कुफ्र की बातें

बर्फ की कुछ फ़ाहें जब बहुत धीरे, नीचे आती हैं, किसी एक फाह को उडती हवा से तुम सोचकर, हाथ फैला देता हूँ तुम उडती, मुझसे दूर जाती हो...मैं भागता झुकता हाथ के बल तुम्हें पा लेता हूँ . तुम पिघल रही हो, निराकार सी होके.मुख से भाप निकलती है...क़ाश तुम यहाँ
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Work On Progress

ढूँढना है तुम्हें, रहस्य... बुद्ध की मुस्कान का, राम की नम आँखों का, येशु के सब्र का. जबकि मुझे... देखना है अभी, खुद को ही पूरा. मिलेगी कोई सभ्यता पुरानी. इसलिए, खोज रहा हूँ खुद को. खुदाई में मिल रही हैं, कई चीज़ें. कई अनपढ़ लिपियाँ, और अनगढ़ लफ्ज़.
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एक पुराना मौसम, एक पुरानी नज़्म...

Above song is one of my favourite song, and may be the inspiration for the following as well:रात ये बुझने न पाए , जुगनूँ संभालिये,चाँद को आँखों में रख के दिन निकालिए ।रात आखिर रात है, पलकों में खो जानी है ,और शामें रोज़ थक के यादों में सो जानी है । ये
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Dec 28 2009 09:36 PM
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गीत

नच रे गुजरिया , बजी बसुरिया ,हम तोहे से प्रेम करे ।ओ मेरी मुनिया , वही है गुनिया,जो तोहे पे नैन धरे ।।हमरा जीवन पड़ा है सूखा,तोहरे नैना काहे बरसे ?उ तो तोहरा घुंघटा उठ गवा ,नहीं तो हमहू सदियों तरसे।।कहीं जो बदरिया , हुई बावरिया ,वो तुझपे ही बरस पड़े ।नच
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Dec 28 2009 09:35 PM
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...मुझपे उधार रहे.

आज कुछ रिश्तों से पुराना हिसाब हो , चलो !!प्रिये ,मैं आज वापिस करता हूँ तुम्हारी 'एक आंसू' की मुस्कान ,दे दो तुम भी मुझे मेरे बालों से बनी गोल -गोल अंगूठियाँतुम्हारी हर बात की चिंगोटीयाँ मगर उधार रही .दोस्त,वो रंगीन महफिलें याद हैं मैंने तुम्हें दी
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Dec 28 2009 09:31 PM
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शिकार भौकते नहीं !

रेडियो टूटा हुआ ,उसके ६ बड़े बड़े सेल ,धूप की गर्मी से रोज़ चार्ज होते थे,और जब डालते थे उसको,Murphy के रेडियो में ,बच्चा अपने होठ से ऊँगली लगाकर,बोलने लगता.__________________________________________मीडियम वेव एक सौ दो आशारिया चार सात,ये आकशवाणी का
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खुशबूएं

वो फूल तोड़ती....तो खुशबूएं,उससे लिपट जाती ।उसने कहा तो था,चाँद से...तोड़ने आऊँगी तुम्हें,और ओढ़ लूंगी ......तुम्हरी चांदनी को
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Taylor's theorem

किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है प्रेम के गणित की आसान (?) गुना भाग और dynamics के गतिशील सवालों के 'बीच' फंसा एक 'इंटरमिडीएट' का छात्र ."बेटा किताबों को देखन अलग बात है और उन्हें पढना अलग,दियर इज हेल लॉट ऑफ़ डिफरेंस बिटवीन रीडिंग एंड लर्निंग , सीइंग एंड
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Dec 28 2009 09:18 PM
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One 'Life' @ Call Center (Continued from Taylor's theorem.)

आभारी हूँ : a)संपादन :निर्मला जी का b)सभी शेर :सर गौतम राजरिशी जी के ब्लोगिया रोग के सौजन्य से, उन्हें बिना बताये. c)गूगल इंडिक ट्रांस्लितेरेशन (ये उसी का ट्रांस्लितेरेशन हैं )...Continued from "Taylor's theorem." तारीखें बदलीं थी बस,आज दस साल
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Dec 28 2009 09:18 PM
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क्षणिकाएं

कल , जो चीज़ , 'स्टेट्स सिम्बल' थी , वो आज 'ज़रूरत' है, आज... 'स्टेट्स सिम्बल', 'ज़रूरत ' है . एक  तरफ़ा  प्यार अब वो... लगभग रोज़, कपडे बदलता है . जबकि ये , अपने पुराने कपड़े धोती हुई दिखती है रोज़, दोनों बदल गए हैं. Breaking News. विश्वस्त स
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ब्लॉग्गिंग की सालगिरह (पुनरावलोकन) - 5

उधार  आज कुछ रिश्तों से पुराना हिसाब हो , चलो !! प्रिये ,मैं आज वापिस करता हूँ तुम्हारी 'एक आंसू' की मुस्कान , दे दो तुम भी मुझे मेरे बालों से बनी गोल -गोल अंगूठियाँ तुम्हारी हर बात की चिंगोटीयाँ मगर उधार रही . दोस्त,वो रंगीन महफिलें याद हैं मैं
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ब्लॉग्गिंग की सालगिरह (पुनरावलोकन) - 4

ग़ज़ल-२  ५  दुर्योधन है , ओसामा है , कंस कभी कहलाता है , रंगमंच का पात्र वही है रूप बदल सा जाता है . मन है एक पखेरू, जिसको तर्क यही समझाता है, सात समुन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है, आने वाला बीत गया, 'कल-का-पल' भी कल, 'कल' होगा, इस क्ष
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ब्लॉग्गिंग की सालगिरह (पुनरावलोकन) - 4

मेरी पहली पोस्ट, ( तब मालूम नहीं था ग़ज़ल क्या होती है, इसलिए ये तो स्वयं सिद्ध है की ब्लॉग्गिंग में आकर ही 'गीत' और 'नज़्म' के बीच  का अंतर पता चला. इस साल अंतर पता चला है, अगले साल तक लिखना भी आ जाये) शायद... हर शख्स यहाँ पहचाना, फिर क्यू
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ब्लॉग्गिंग की सालगिरह (पूर्वावलोकन) -3

ग़ज़ल-१  १   अब मुसाफिर जग गया तो, सो रही हैं मंजिलें, लौट के आती नहीं हैं, खो रही हैं मंजिलें। इक सफ़र है ज़िन्दगी औ, मौत उसका अंत है, दूर अब इतनी नहीं, बस, वो रही हैं मंजिलें। याद है अब भी मुझे इन, मंजिलों का रूठना, लो गले लग के मेरे