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15 Jun 2010
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vikram7

दिलीप जी ने कल अपनी टिप्पणी में कहा" kalam bhi chalaate rahiye sir... " चाहता तो मै भी यही हूँ,पर यह स्वास्थ साथ ही नही दे रहा। न कुछ लिख पाता हूँ,न दूसरो के ब्लॉग ही देख पाता हूँ। अपनी पुरानी दो लाइनो के माध्यम से यही कहूगा...... अर्थ हीन सम्वादों का
 
vikram7
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जीवन का सफर .......

जीवन का सफर चलता ही रहें ,चलना हैं इसका कामकहीं तेरे नाम ,कहीं मेरे नाम ,कहीं और किसी के नामहर राही की अपनी राहे, हैं अपनी अलग पहचानमंजिल अपनी ख़ुद ही चुनते, पर डगर बडी अनजानखो जाती सारी पहचाने, जो किया कहीं विश्रामकहीं तेरे नाम ,कहीं मेरे नाम ,कहीं और
 
vikram7
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अल्ला मेघ दे...........

अल्ला मेघ दे पानी दे, जीवन कर धानी ,मौला मेघ देइक जिन्दगानी दे कोई कहानी दे,कोई कहानी,अल्ला मेघ देनयनों के कोर सूखेआँचल के छोर सूखेमन के चकोर छूटेआशा की डोर टूटेमन को पीर दे नीर दे, नीर दो खारे,अल्ला मेघ देतरुवर के पात जैसेमेरे हैं गात वॆसेकोई पतझड
 
vikram7
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मैनें अपने कल को देखा....

मैनें अपने कल को देखाउन्मादित सपनों के छल सेआहत था झुठलाये सच सेतृष्णा की परछाई से,उसको मैने लड़ते देखामैने अपने कल को देखावर्त्तमान से जो कुछ पायाउससे लगता था घबडायाबीते कल की ओर पलट कर,जाने की कोशिश में देखामैने अपने कल को देखाजीवन-मरण संधि रेखा परराह
 
vikram7
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वह सुनयना थी ...............

वह सुनयना थीकभी चोरी-चोरी मेरे कमरे मे आतीनटखट बदमाशमेरी पेन्सिले़ उठा ले जातीऔर दीवाल के पास बैठकरअपनी नन्ही उगलियों से, भीती में चित्र बनातीअनगिनत-अनसमझ, कभी रोती कभी गातीवह फिर आयी थी मेरे कमरे मेंमुझे देख सकुचाई थीनव-पल्लव सी अपार शोभा लिए,पलक संपुटो
 
vikram7
Jun 01 2010 05:09 PM
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जीवन का यह सच भी देखा...........

जीवन का यह सच भी देखाउत्तर नहीं प्रश्न इतने हैंवृक्ष एक पर साख कई हैंअनचाहे हालातों से भी, हाथ मिलाते सबको देखाजीवन का यह सच भी देखादाता की वापिका हैं गहरीकाल-प्रबल हैं उसका प्रहरीलघु-अंजलि में भर लेने की ,चाहत में जग को मैं देखाजीवन का यह सच भी देखाजब
 
vikram7
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vikram7

मनु दाश जी उडिया के जाने माने कवियों में से एक है। अग्रेजी, उडिया के अति संवेदनशील कवि की हिन्दी रुपान्तरण की प्रथम पुस्तक ''खैर, अगली वार फिर आऊँगी'' पढने का अवसर मिला । प्रस्तुत है मनु दाश जी की एक कविता। कैंसर वार्ड में दीवाली कोई मोमबत्ती जलाई नहीं
 
vikram7
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डूबा सूरज साँझ हों गई ......

डूबा सूरज साँझ हों गई पंक्षी नीडो में जा पहुचेसुन बच्चो की ची ची चे चेवे भूले दिन के कष्ट सभी , यह स्वर लहरी सुख धाम दे गयीडूबा सूरज साँझ हों गयीजो पंथी राहों में होगेजल्दी जल्दी चलते होगेप्रिय जन चिंतित हों जायेगे , यदि पथ में उनको रात हों गयीडूबा सूरज
 
vikram7
Mar 06 2010 07:06 PM
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ओंस जब बन बूंद ...............

ऑस जब बन बूँद बहती, पात का कम्पन ह्रदय मे छा रहा है नीर का देखा रुदन किसने यहां पे ,पीर वो भी संग ले के जा रहा हैलोग जो हैं अब तलक मुझसे मिले ,शब्द से रिश्तो में अंतर आ रहा हैअर्थ अपने जिन्दगी का ढूँढ़ने में, व्यर्थ ही जीवन यहाँ पे जा रहा हैइन उनीदी आँख
 
vikram7
Mar 04 2010 05:47 PM
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बड़ा कौन ............

जीवन मे कभी कभी ऎसे प्रंसग भी आते हैं, जो हमारे अन्तर मन को छूने के साथ साथ अविस्मर्णीय व कुछ सोचने के लिये मजबूर कर देते हैं. ऎसी ही एक घटना का उल्लेख मै यहां पर कर रहा हूँ.होलिका उत्सव का समय था,भीखू नाम का व्यक्ति अपनी उन्नीस वर्षीय बेटी मीनू के साथ
 
vikram7
Mar 02 2010 08:08 PM
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दिल में इक राहत सी है...

दिनांक १.२.२०१० को इलाहाबाद जाते वक्त व्योहारी के पास मेरी कार सड़क से करीब २५ फीट नीचे गिर जा गिरी। ईश्वर की कृपा से हम लोग बच तो गए,पर मेरी धर्मपत्नी सुमन सिंह को काफी चोट आयी। इस संकट की घड़ी में मै शहडोल जिला प्रशासन का,खासकर एस.डी.एम.श्री राय जी
 
vikram7
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शुभकामनायें

होल़ी की हार्दिक शुभकामनाऐं
 
vikram7
Mar 01 2010 01:28 PM
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गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
 
vikram7
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कारवाँ बन जायेगा,........

कारवाँ बन जायेगा,चलते चले बस जाइयेमंजिले ख़ुद ही कहेगी,स्वागतम् हैं आइयेपीर को भी प्यार से,वेइंतिहाँ सहलाइयेआशिकी में डूबते,उसको भी अपने पाइयेहैं नजारे ही नहीं,काफी समझ भी जाइयेदेखने वाले के नजरों,में जुनूँ भी चाहियेबुत नहीं कोई फरिश्ते,वे वजह मत जाइयेरो
 
vikram7
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क्यूँ तुम मंद-मंद हसती हों

क्यूँ तुम मंद-मंद हसती हों मधु-बन की हों चंचल हिरणी बन बैठी मेरी चित- हरणी कर तुम ये मृदु-हास , मेरे जीवन में कितने रंग भरती हों क्यू तुम मंद-मंद ह्सती हों तुम हों मैं हूँ स्थल निर्जन बहक न जाये ये तापस मन अपने नयनो की मदिरा से, सुध बुध क्यू मेरे हरत
 
vikram7
Dec 29 2009 11:41 AM
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एक उदासी इन्ही उनीदीं .पलकों के कर नाम .......

अस्वस्था के कारण लेखन कार्य से दूर रहा,आज अपनी एक पुरानी रचना पुन: प्रकाशित कर रहा हूँ ,शायद पसंद आये। एक उदासी इन्ही उनीदीं .पलकों के कर नाम मैनें आज बिता डाली फिर,जीवन की इक शाम रजनी का तम रवि को तकता हौले- हौले दर्द सिमटता एक करूण शाश्वत जल-धरा,है
 
vikram7
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कहाँ नयन मेरे रोते हैं

कहाँ नयन मेरे रोते हैं पलक रोम में लख कुछ बूदें या टूटे पा मेरे घरौंदे सोच रहे हों बस इतने से ,नहीं रात भर हम सोते हैं जो जोडा था वह तोड़ा हैं मिथ्या सपनों को छोडा हैं पा करके अति ख़ुशी नयन ये,कभी-कभी नम भी होते हैं बीते पल के पीछे जाना हैं मृग-जल से
 
vikram7
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शुभकामनायें

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामानायें
 
vikram7
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तिमिर बहुत गहरा होता है..........

तिमिर बहुत गहरा होता है रात चाद जब नभ मे खोता तारों की झुरुमुट मे सोता मेरी भी बाहों मे कोई,अनजाना सा भय होता है यादों के जब दीप जलाता उतना ही है तम गहराता छुप गोदी मे मॆ सो जाता ,शून्य नही देखो आता है कही नीद की मदिरा पाता पी उसको हर आश भुलाता रक्त
 
vikram7
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ओ मधुमास मेरे ..........

ओ मधुमास मेरे जीवन केक्यूँ इतने सकुचे सकुचे होशिशिर गया फिर भी सहमे होकहा बसंती हवा रह गयी.क्या दिन आये नहीं फाग केजीवन की इन कलिकाओं मेंमेरे मन की आशाओं मेकब पराग भर पावोगे तुम ,शिशिर-समीरण से बच करकेअधर मेरे अतृप्त बडे हैंखाली सब मधुकोष पड़े हैंकौन ले
 
vikram7
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दर्द को दिल में उतर जाने दो.......

दर्द को दिल में उतर जाने दोआज उनको भी कहर ढाने दोरात हर चाँद से होती नहीं मसरुफे-सुखनस्याह रंगो के नजारे भी नजर आने दोएक अनजानी सी तनहाई, सदा रहती हैआज महफिल में उसे नज्म कोई गाने दोजिनने दरियाओं के मंजर ही नहीं देखे हैंउन सफीनो पे-भी अफसोस जरा करने
 
vikram7
Sep 09 2009 11:58 AM
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है कौन कर रहा प्रलय गान....

है कौन कर रहा प्रलय गानभय-ग्रसित हो गए तरु के गातहो शिथिल झर रहे उसके पात सकुचे सहमें तरु के पंछी,गिर गिर कर तजनें लगे प्राणहै कौन कर रहा प्रलय गानअविचल सुमेरु भी विकल हुयेझरनों के स्वर भी मंद हुयेस्तब्ध हुआ चंचल समीर,खो बैठा अपना दिशा ज्ञानहै कौन कर रहा
 
vikram7
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कहाँ गये हैं, ये काले घन.......

कहाँ गये हैं,ये काले घन वह वर्षा ,बूदों की टपटप द्रुत लहरीले जल की कलकलग्वाले की बाँसुरी सुनाती ,नही कोई अब प्यारी सी घुनकहाँ गये हैं,ये काले घनगान कहाँ हैं ,घन गर्जन केचिहुँक न सुनते खग-शावक केनभ में नही दमकती दामिनि,कहाँ गई जो थी घन की धनकहाँ गये हैं
 
vikram7
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अर्थ हीन .......

आज एक पुरानी रचना पु:न प्रकाशित कर रहा हूँ, शायद आप को पसंद आये अर्थ हीन सम्वादों का सिलसिलामै तोडना नही चाहताशायद इसी बहानेमै तुम्हे छोडना नही चाहताविक्रम
 
vikram7
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होती है जब भी शाम सखे....

होती है जब भी शाम सखेतरु पातों को करके कंचनसरिता को दे सिन्दूरी तनजाने से पहले करता है,रवि धरती का ऋँगार सखेहोती है जब भी शाम सखेनीडो मे सबको पहुचातारवि अस्ताचल को हैं जातापश्चिम की गोदी मे छुप कर वह करता हैं ,विश्राँम सखेहोती है जब भी शाम सखेमेरी आशा की
 
vikram7
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दे पिला अब .........

दे पिला अब शाकिया,रंग शाम के भर जाम में जाने कब वो मांग बैठे,खूने दिल पैगाम में जिन्दगी का हॆ वजू, जीने के इस अंदाज मेंइक शमां बन कर जले, गर दूसरो की राह मेंसाज कोई लय नहीं हैं ,लय बसा हर साज मेंहर नई सुबहो छिपी हैं ,इक गुजरती रात मेंहैं मुझे भी देखना,
 
vikram7
Aug 29 2009 12:25 AM
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गीत नया गायेगे..................

न तू न मैं न ये न वो ,संग चलकरगीत नया गायेगे , हम आज मिलकरबहार की पुकार हॆ, आजा सथियाप्यार के लिये ही,मैने दिल दिया लियातू से मैं, मैं से तू , आज बन कर गीत............................................आज देखो फिर से राझा-हीर मिल गये नयन के रास्ते दिलो के
 
vikram7
Aug 28 2009 10:05 PM
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आ साथी,अब दीप जलाएँ ......

आ साथी, अब दीप जलाएँलगी निशा होने है, गहरीघोर तिमिर होगा अब प्रहरीअपनी अभिलाषाओं को फिर से,निंद्रा-पथ की राह दिखाएँआ साथी, अब दीप जलाएँहै पावस की रात अँधेरीघन-बूँदों की सुन कर लोरीशायद नीड़-नयन में लौटे,हमसे रुठी कुछ आशाएँआ साथी,अब दीप जलाएँआयेगी उषा की
 
vikram7
Aug 25 2009 09:49 PM
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आ कुछ दूर चलें,फिर सोचे.......

आ कुछ दूर चलें,फिर सोचेंअमराई की घनी छाँव मेंनदी किनारे बधीं नाव मेंबैठ निशा के इस दो पल में,बीते लम्हों की हम सोचेंआ कुछ दूर चलें,फिर सोचेंमन आंगन उपवन जैसा थाप्रणय स्वप्न से भरा हुआ थातरुणाई के उन गीतों से,आ अपने तन मन को सीचेंआ कुछ दूर चलें,फिर
 
vikram7
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सच नही कोई परिंदा, जाल मे फँस जायेगा ...

सच नही कोई परिंदा, जाल मे फँस जायेगाकर हलाले-पाक उसको चाक कर खा जायेगारख जुबाँ फिर भी यहाँ तू , बे-जुबाँ हो जायेगादेखकर शमसीर यदि तू , सच नहीं कह पायेगादिल्लगी में दिलकशी हो , दिल कहाँ फिर जायेगाप्यार और नफरत में यारा , फर्क क्या रह जायेगाप्यार अपने
 
vikram7
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आइये आसुओं से समुंदर रचे.....

उम्र क्या चीज हैं,रश्म क्या चीज हैंआशिकी दो दिलो की बड़ी चीज हैंआइये आसुओं से समुंदर रचें इश्क में जो करें वो बड़ी चीज हैंक्यूँ ऐ नजरे खफा मुझसे रहने लगींचुपके चुपके मेरी राह ताकने लगींआइये इक कशिश बनके दिल मे रहेंदर्दे दिल की तडफ भी बडी चीज हॆहम नजर जो
 
vikram7
Aug 21 2009 05:12 PM
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मैं जीवन का बोधि-सत्व क्याँ खो बैठा हूँ.....

मैं जीवन का बोधि-सत्व क्याँ खो बैठा हूँया जीवन के सार-तत्व में आ बैठा हूँमैं अनंत की नीहारिका में अब क्या ढूढूँस्वंम पल्लवित सम्बोधन में खो बैठा हूँराग और अनुराग लिये मैं जी लेता हूँजीवन का यह जहर निरंतर पी लेता हूँसत्यहीन क्या सृजन कभी भी संभव
 
vikram7
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आ फिर राग बसंती ..........

आ फिर राग बसंती छेड़े है विहान भी रंग ,रंगीला मलय पवन का राग नशीला शरमाई सी मुझको तकती,तेरे नयनों को अब छेड़े आ फिर राग बसंती छेड़े कितने मधु-रितु ,साथ पुराना सुखद बहुत ये ,साथ निभाना तेरे मदमाते अधरों के,जाम अभी भी मुझको छेड़े आ फिर राग बसंती छेड़े ईश विनय,
 
vikram7
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आजादी के लिये.......

आजादी के लिये मौत को,हँस कर जिनने झेलायाद दिलाने उनकी फिर से आई है ये बेलाआइये याद उनकी करें साथियोंइस वतन के लिये भी जिये साथियोवे तो हिन्दू भी थे,ऒर मुसलामा भी थेपारसी सिक्ख देखो ईसाई भी थेपर सही बात ये है मेरे दोस्तोसबसे पहले वतन के सिपाही वो थेनाम से
 
vikram7
Aug 15 2009 11:52 AM
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चलो आज कुछ नया करे हम

चलो आज कुछ नया करे हमइसी पुराने तन को धर करसडे घुने से मन को लेकरजीवन की अन्तिम बेला मे,आज नया प्रस्थान करे हमचलो आज कुछ नया करे हमवही शशंकित आशाये धरघने पराये पन से डर करसासों की इस पगडन्डी से,हट कर कोई राह चुने हमचलो आज कुछ नया करे हमतृप्ति कहाँ होती
 
vikram7
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मैं अधेरों में घिरा, पर दिल में इक राहत सी है...

मैं अधेरों में घिरा, पर दिल में इक राहत सी है जो शमां मैने जलाई ,वह अभी महफिल में है गम भी हस कर झेलना ,फितरत में दिल के है शुमार आशनाई सी मुझे ,होने लगी है इनसे यार महाफिलो में चुप ही रहने की मेरी आदत सी
 
vikram7
Aug 13 2009 12:33 AM
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vikram7

पंक्षी आता हैंशिला खंड में बैठअपने परों को फडफडाता हैंसूरजसमेटने लगता हैंअपनी स्वर्णिम छविजा छुपता हैंपश्चिम के आँचल मेंनिशा गहरा जाती हैंपंक्षी सो जाता हैंपरों को समेट अपने घोसले मेंछा जाता हैं सन्नाटाहाँ नहीं रुकताझरने का बहनापवन का चलनापंक्षी निकालता
 
vikram7
Aug 12 2009 01:20 PM
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स्वप्न से अनुराग कैसा .......

स्वप्न से अनुराग कैसाकल्पनाओं का सफर हैभावनाओ का समर हैहै क्षणिक उन्माद नयनों का,नही ये सत्य जैसास्वप्न से अनुराग कैसाविषमताओं से भरा हैह्रदय को इसने छला हैनीद के हाथो विनिर्मित ,गीत का यह भाव कैसास्वप्न से अनुराग कैसाभाग्य कब इससे बना हैकर्म न इससे जनां
 
vikram7
Aug 10 2009 07:33 PM
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आज रात कुछ थमी-थमी सी

आज रात कुछ थमी-थमी सीस्वप्न न जानें कैसे भटकेनयनों की कोरो से छलकेदूर स्वान की स्वर भेदी से ,हर आशाये डरी-डरी सीदर्दो का वह उडनखटोलाले कर मेरे मन को डोलास्याह रात की जल-धरा से ,मेरी गागर भरी-भरी सीशंकाओ का कसता धेराकैसा होगा मेरा सवेरामंजिल के सिरहाने पर
 
vikram7
Aug 09 2009 04:57 PM
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वसीयत ........

कौन मैं हूँ प्रिय क्या चाहते हों परिचय तुम्हारे उत्तराधिकारी से समझ आगंतुक का मनतब्य मैने कहाँ तुम्हारे एक रोटी के टुकडे की कीमत मैने बाजार में अपनी अस्मत बेच कर चुकाई हैं क्या तुम्हे अभी संतुष्टि नहीं हों पायी हैं वह हँसा और बोला जो तुमने चुकाया वह
 
vikram7