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शब्द-योग

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31 May 2010
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बचपन प्यार और गोबर

बचपन में हम पर्याप्त मात्रा में छोटे एवं भारी तदाद में मासूम पाए जातेथे। हालांकि मोहल्लेवालों के विचार भी हमसे पर्याप्त मात्रा में अलग थे।रिश्तेदारों को हमारे इस मासूम वाले भाग पर भयंकर आपत्ति थी। उनकीआपत्ति हम आज तक दूर नहीं कर पाए हैं। एकाध बार किसी के
 
अनुज
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हमारी पहली हवाई यात्रा

हवाई जहाज से यात्रा करना आज भी देश में अभिजात्यपने की निशानी माना जाता है। कल भी माना जाता था। बल्कि तब तो यात्रा अभिजात्य लोग ही करते थे। जैसे देश में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति अभिजात्य होना चाहता है, हम भी होना चाहते थे, बल्कि हम तो बचपन से ही इस
 
अनुज
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प्रो.टंगड़ीमारः एक स्कैच

वैसे उनका असली नाम टीएम मोरले है लेकिन सारा कॉलेज उन्हें प्रो. टीएम साहब के नाम से जानता है, ठीक उसी तरह जिस तरह अजीत को सारा शहर लायन के नाम से जानता था। तेजराम मोती प्रकाश मोरले नहीं बल्कि ‘टंगड़ीमार’ मोरले उर्फ प्रो. टीएम साहब। उनके मैनेजमेंट कौशल के
 
अनुज
May 15 2010 05:47 PM
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परमार्थ के लिए हारी टीम इंडिया

और लो साहब, अगर-मगर के साथ हम टी-20 वर्ल्डकप से हारकर बाहर हो गए। एक बोझ सा उतर गया। टीम से अपेक्षाओं का, देशवासियों पर से टीम को जिताने के लिए टीवी के सामने जुटे रहने का। अब दोनों ही गमगीन रहने के खेल में लगे हैं।खिलाड़ी तो फिर भी 10-12 एड, कुछ रियलटी
 
अनुज
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पश्चिम को हमारी देन

हम प्राचीनकाल से ही पश्चिमी मुल्कों को कुछ न कुछ देते चले आ रहे हैं। उस दिशा में हमारी ढेरों देनें हैं। जैसे पहले भारत जगतगुरु रहा है। कब रहा है ठीक-ठीक कालखंड का अंदाजा नहीं है। लेकिन रहा है। किताबों में लिखा है। अक्षर झूठ नहीं बोलते हैं, वगैरहा। तो जब
 
अनुज
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राजनीति की ‘हाईटेक रणनीति’

--अनुज खरेहाईटेक होना, खालिस हाईटेक होना है, बस। आदमी बैठे-ठाले कुछ नहीं कर रहा तो हाईटेक हो ही सकता है। गांठ से कुछ जाता नहीं। हाईटेक होने के कई फायदे हैं। चूंकि हाईटेक होने की एक हाईक्वालिटी ये भी है कि समस्याएं खत्म हो जाती हैं। आप खास हो जाते हैं, आम
 
अनुज
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स्विस बैंक का तोता और देसी अभियान

स्विस बैंक हमारे लिए फंतासी है। मिस्ट्री है। चंद्रकांता संतति है। विक्रम वेताल है। अलीबाबा चालीस चोर है। खुल जा सिमसिम है। ना जानें क्या-क्या है। दशकों से यह शब्द हर भारतीय को झकझोर रहा है। हमारी कल्पनाओं में इसकी भव्य इमारत विचरती रहती है। किसी अंधेरे
 
अनुज
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May 10 2010 05:15 PM
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शराफत की केंचुली

देश में मूल रूप से शराफत की दो किस्में पाई जाती हैं। एक अभी वाली, एक पुराने जमाने वाली। पुराने जमाने वाली में एक अतिरिक्त समस्या यह भी थी कि उसे लगातार ओढ़े रहना पड़ता था। लगातार ओढ़े-ओढ़े एक दिन शराफत कवच की तरह शरीर से चिपक जाती थी। फिर आदमी भले ही उसे
 
अनुज
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निंदारस का नया वर्जन

दूसरों की बुराई अर्थात निंदा करने की कला पतनातीत है। गारंटीड। न पहले जैसे परम कमीने रहे, न चरम किस्म की बुराई करने वाले। ले-देकर सब औसत लोग ही बचे हैं। हर क्षेत्र की तरह। खोखले। मुंह झुठल्ले। निंदा तक पेट से नहीं कर पाते। ऊपर से निंदा की ‘नैतिकता’ का
 
अनुज
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देश की अस्मिता वगैरहा को ललकारते हुए

इतिहास में जितने भी लोग दर्ज हुए वे हमेशा हमे प्रेरित करते रहे हैं कि भैइया तुम भी दर्ज हो। देश को महान बनाने की दिशा में तुम भी कुछ योगदान दो। ऐसी स्थिति में हम भी कभी-कभी दर्ज होने और योगदान देने के प्रति क्रियाशील हो जाते हैं। हालांकि क्रियाशीलता का
 
अनुज
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May 03 2010 01:52 PM
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बैठे-बिठाए हो जाना बुद्धिजीवी

विचार का भुर्ता बनाए सो बुद्धिजीवी। जो विचार से निकले ज्ञान को सामने वाले पर दे मारे। नहीं ले तो उसे जमकर कोसने में लग जाए। सामने वाला बिदककर भागे तो फिर उसे बिठाके दचक डाले। ज्ञान के नाखूनों से हर मनुष्य का मूं भंभोड़ दे। एक विचार की दाल न गले तो तो हार
 
अनुज
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भ्रष्टाचार पर एक सहज भाषण

आज में आम आदमी के अंदर छुपी हुई भ्रष्टाचारिय प्रतिभा पर भाषण देना चाहूंगा। देकर रहूंगा। कोई मुझे रोक नहीं सकता है। बड़े बोल बोलने और भाषण देने से इस देश में आज तक किसी को रोका नहीं गया है। सब अपनी बारी के इंतेजार में दम साधे खड़े रहते हैं। अत: मुझे कोई
 
अनुज
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सरकार, योजनाएं और दलदल

विकास और सशक्तिकरण हर सरकार को मंगतई मंगता है। अप्रैल वगैरह आने के बाद विकास करने की तलब खाज की तरह जानलेवा हो जाती है। सरकार का हर अंग हर विषय को खुजा-खुजाकर प्रगति-उत्थान की योजनाओं अर्थात् विकास के लिए हर संभव तरीके से तैयार करता है। योजनाएं हर सरकार
 
अनुज
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‘जो जनता नईं पचा पाएगी मेवे की गुझियां’

कथा अद्भुत है। प्रसंग होली का है। किस्सा भोपाल का है। कुछ यूं है कि भंग की तरंग में डूबे सूरमा भोपाली होली पर शहर घूमने निकले हैं। तरंग में हैं सूरमा इसलिए आज हांक नहीं रहे हैं सच बोल रहे हैं। रास्ते में कहीं उनके पुराने शार्गिद बाबूभाई मिल जाते हैं।
 
अनुज
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कस्बाई कवि सम्मेलन वाया फ्लैशबैक

पहले क्या कवि होते थे, क्या कविताएं होती थीं, क्या कवि सम्मेलन होते थे, कसम से। वाह...!, वाह...! ,तय करना मुश्किल होता था कि ऐसा सुनाने वालों के पहले दांत तोड़ें कि ऐसा नामुराद लिखने वालों के हाथ कि आयोजकों को ही लंगड़ा बना दें। हालांकि तीनों में से यादा
 
अनुज
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Mar 07 2010 12:38 PM
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स्वतंत्रता दिवस का महत्व

एक बार फिर स्वतंत्रता दिवस आ गया। आजादी के बाद से लगातार आ रहा है, फिर भी पहचानना पड़ता है। १५ अगस्त हमारा राष्ट्रीय पर्व है। इसका बहुत महत्व है। इसका सबसे ज्यादा महत्व फिल्मवालों के लिए है। यदि यह दिन नहीं होता तो वे देशभक्ति की बातें किस माध्यम से
 
अनुज
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हर बजट की एक आम कहानी

एक बजट होता है। एक राज्य होता है। राज्य का एक बजट होता है। हर राज्य का एक बजट होता है। हर राज्य में एक मुख्यमंत्री होता है। हर राज्य में एक वित्तमंत्री भी होता है। मुख्यमंत्री वित्तमंत्री से बजट बनाने को कहता है। वित्तमंत्री बजट बनाता है। बजट में राज
 
अनुज
Dec 29 2009 11:53 AM
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आज के मास्साब और छात्र-एक चिंतन

क्लास को पढ़ाने वाला मास्साब होता है। क्लास में पढ़ने वाला छात्र होता है। पढ़ाना कला है, पढ़ना कलाकारी। पढ़ने और पढ़ाने के बीच संबंध कालाबाजी का होता है। मास्साब को लगता है कि वो पढ़ा रहा है। छात्रों को लगता है कि वे पढ़ रहे हैं। दोनों वर्ग इस उद्यम
 
अनुज
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प्यार और पाठ्यक्रम...

अथक प्रयास हुए तो प्यार हो गया। जेब भरी रही तो प्यार कुलांचे मारता रहा। गाड़ी में पेट्रोल रहा तो प्यार लांग ड्राइव पर भी जाता रहा। रेस्त्रां में फ्रेंड सर्किल से भी इंट्रोडच्यूस करवाया जाता रहा। आजकल प्यार कुछ उदास है। घर से मनीआर्डर नहीं आया है। प्य
 
अनुज
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कुछ ऐसा है, हमारी हार का गहन दर्शन भिया..

और लो साहब, अगर-मगर के साथ हम लगभग चैंपियन ट्राफी से हारकर बाहर हो गए। एक बोझ सा उतर गया। टीम से अपेक्षाओं का, देशवासियों पर से टीम को जिताने के लिए टीवी के सामने जुटे रहने का। अब दोनों ही गमगीन रहने के खेल में लगे हैं। खिलाड़ी तो फिर भी 10-12 एड, कु
 
अनुज
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कुछ ऐसा है, हमारी हार का गहन दर्शन भिया..

और लो साहब, अगर-मगर के साथ हम लगभग चैंपियन ट्राफी से हारकर बाहर हो गए। एक बोझ सा उतर गया। टीम से अपेक्षाओं का, देशवासियों पर से टीम को जिताने के लिए टीवी के सामने जुटे रहने का। अब दोनों ही गमगीन रहने के खेल में लगे हैं। खिलाड़ी तो फिर भी 10-12 एड, कु
 
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एक आधुनिक मनीषी ने जब गृहत्याग किया?

सांसारिकता से उनका मन उचट गया है। वे कई दिनों से गृहत्याग की तैयारियों में लगे हैं। गृहत्याग से लेकर आत्मज्ञान और जनकल्याण तक उनके पास संन्यास का पूरा ब्लू प्रिंट तैयार है। एक दिव्य रात्रि को, दिव्य घड़ी में, दिव्य बोतल के घूंट पे घूंट उतारते हुए, दि
 
अनुज
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स्मृति शेष बनाने की दिशा में चिल्लर चिंतन

चूंकि जीवन के बड़े-बड़े प्रश्न स्मृति शेष हो चुके हैं। ईमानदारी स्मृति शेष हो चुकी है। सरकारी दफ्तरों में कार्य संस्कृति स्मृति शेष हो चुकी है। देशभक्ति शेषाय रही हो। नैतिकता अपनी स्मृतियों में ही गुम हो चुकी हो। मानवता शेष की स्मृतियों में ही बची हो
 
अनुज
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बादलों से विनय, बरस जाओ, पकौड़ों की खातिर..

इधर कईयक दिनों से मेरी बादलों पर नजर है। नजर इसलिए है कि इधर वे बरसें, उधर मैं पकौड़े खाऊं। बादलों और पकौड़ों का बड़ा गहन संबंध है। बिलकुल वैसा ही जैसा घोड़े का चने, चने का बेसन, बेसन का पकौड़ों से होता है, जन्म-जन्मांतरों का। बारिश के दिनों में ये संबंध
 
अनुज
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Jul 31 2009 02:46 PM
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नारी धर्म उर्फ संदेह परमोधर्म:

देश की प्रत्येक नारी को अपने पति पर संदेह करना ही चाहिए। उसके हर ज्ञात-अज्ञात कारण पर संदेह रखना ही चाहिए। संदेह करने के हर कारण पर संदेह करना चाहिए। जहां संदेह करने का कारण न भी हो वहां भी संदेह करना चाहिए। घरेलू कामों में रत रहकर भी निरंतर संदेह की
 
अनुज
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वरिष्ठता की बीमारी...

वरिष्ठता की बीमारी न तो स्वाइन फ्लू की तरह खतरनाक है न ही सर्दी-खांसी की तरह आम है। लेकिन अपनी तरह की अलग ही सामाजिक-मनोवैज्ञानिक किस्म की बीमारी है। अभी तक इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि इस बीमारी के बारे में यह बात सामने नहीं आई है कि यह संक्रा
 
अनुज
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भाई साब आधारित व्यवस्था ...

भाई साब आधारित व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि यह भाई साब आधारित ही होती है। यानी की भाई साब से चल कर भाई साब पर ही खत्म होती है। यह व्यवस्था सबसे विकसित रूप में नेताओं में ही दिखाई देती है। एक भाई साब ढेर सारे कार्यकर्तानुमा चमचे या चमचेनुम
 
अनुज
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बीहड़ में कूदने के इत्ते सारे कारण...

अनुज खरे मेरे पास इत्ते सारे रेडीमेड कारण हैं चंबल के बीहड़ में कूदने के । कारण नंबर एक तो यही है कि इस समय चंबल में डकैतों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। चूंकि अधिकांश शहरों में ही सैटल हो गए हैं सो मेरे लिए मैदान साफ है। शहरों में भी इनमे
 
अनुज
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उत्तर आधुनिक नैतिक कथाएं

एक) नारद ऋषि कहीं राह चलते मिले स्वर्ग में घुसने के आकांक्षी एक मनुष्य को समझा रहे हैं। हे लेमैन अर्थात् आम आदमी, स्वर्ग के अधिपति का सिंहासन का डोलाना इतना आसान नहीं है। तुम विस्तृत तरीके जानना ही चाहते हो तो पहले कर्णपटल के मैल को कर्ण खखरोंचिका अर
 
अनुज
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जूता: एक मौलिक पीएचडी प्रस्ताव

हाल ही में पत्रकारों ने अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से लेकर भारतीय गृहमंत्री चिदंबरम तक पर जूते चलाएं हैं। कुछ अन्यों ने भी इसी माध्यम से हल्के-फुल्के ढंग से दूसरों को कूटा है। जूते के इसी बढ़ते प्रयोग को लेकर मुझे कई तरह की संभावनाएं दिखाई देने लगी हैं।
 
अनुज
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यारा दा ठर्रापना. . .

आज आपको ठर्रापने के कुछ नितांत निजी किस्से सुनाता हूं। ठर्रापना नहीं समझे, यह बुंदेलखंड का लोकल टशन है, स्थानीय फ्लेवर भई। हालांकि डर है कि किसी स्थानीय भाई ने घटनाक्रम को पहचान लिया और इसी विशेषता के अंतर्गत मुझ पर कुछ प्यार-श्यार सा जता दिया तो आगे
 
अनुज
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जूनियर ट्रेनी ‘भाई ’ चाहिए, बोले तो फटाफट

ऐसे ही मंदी चलती रही, अमेरिका में यूं ही बैंक डूबते रहे, सत्यम घोटाले होते रहे तो फिर नौकरियां केवल ‘इन ’ही कंपनियों में ही निकलेगी। ‘ इन कंपनियों ’में जब नौकरियां निकलेंगी तो कैसा होगा प्रश्नपत्र-इंटरव्यू, कोचिंगों में कैसे पढ़ाया जाएगा। जरा नजर डाल
 
अनुज
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जब हमने प्यार करने की ठानी..

अंतत: हमने प्यार करने की ठान ली। ठानने की देर थी कि चारों ओर दुंदुभियां बजने लगीं, आकाश मार्ग से पुष्पवर्षा का क्रम शुरू हो गया। नक्षत्र-सितारे तत्काल ही जगह बदलने लगे। कहीं किसी घर में किसी कोमलांगी ने धीरे से चेहरे से लट हटाकर-- हिश्श-- कहा। इन पार
 
अनुज
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वक्त के इस दौर में....

ठुकराए गए लोग बहिष्कृत लोग उजाड़े गए लोग भटके हुए लोग अस्मिता खो चुके लोग पहचान से जूझते लोग फिर लौटते हैं जड़ों की तरफ जहां खंगालते हैं अपना अस्तित्व अपनी पहचान अपना आधार वक्त के इस दौर में खोखली जड़ें खुद ढूंढ रही हैं अपनी पहचान अब कहां मिलते हैं क
 
अनुज
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खो गई हैं ख्वाहिशें

खामोशियां टकराती हैं सूनी आंखों से कहीं तो कोई तिनका आस का नजर आए कहीं तो किसी चेहरे पर दिखे हमदर्दी कहीं तो कोई सैलाब इंकलाब का लाए कहीं तो भिंचें मुट्ठियां, सितम पर कहीं तो कोई गीत अमन का गाए कहीं तो बेबसी के खिलाफ जिंदा हो कौमें कहीं तो कोई लाचारग
 
अनुज
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खूब सौंधी सी मेरी अम्मा

ममता के एक धागे से घर गूंथती मेरी अम्मा तन गला मनके बन जाती त्याग-तपस्या मेरी अम्मा दवा दर्द में, दुख में छांव खुश में खुशियां मेरी अम्मा रोटी संग गुड़, वो दाल में घी खूब सौंधी सी मेरी अम्मा चौका बासन छौंक लगाती खट्टी इमली सी मेरी अम्मा प्यार जताती,
 
अनुज
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कैसे जहां में आ गए हम

किलकारियां भी डराती हों हंसी भी बिखेरती हो मायूसी, गर्मजोशी से गायब जैसे गर्माहट, आंसुओं पर भी होता शुबा, प्यार पर शक का आलम, खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम । भावनाएं लगे डराने रिश्ते करें परेशान, दुख करें हंसी पैदा, निश्छलता पर लगा हो पहरा, करुणा क
 
अनुज
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खुशहाली का गांव

दुख की हैं सौ बस्तियां, इक खुशियों का गांव, किलकारी में ढूंढ ले, तू ममता की छांव । सुख के पीछे भागना दुख का रोजगार, चिड़िया के इक दाने में, चाहत का संसार । जिंदगी का हो दीया, इंसानियत की बाती, अच्छाई की लौ यूं दमके, जैसे घर में बूढ़ी दादी । पीपल का पत
 
अनुज
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शीशी भरी गुलाब की...

गाडी के कार्बोरेटर, तुझे हुआ क्या है, आखिर इस धकाधक धुएं की वजह क्या है।’ मैं आजकल कुछ भयंकर सी खोजबीन में लगा हूं। हालांकि मेरी खोजबीन का ताल्लुक अदीबो-अदब, शेरो-शायरी की दुनिया से है। आपको भी कुछ अजीब सा लग रहा होगा कि शेरो-शायरी में क्या भयंकर खोज
 
अनुज
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ये अपुन का बजट है मामू

बजट : ए टेलीफिल्म समयावधि : अनंतकाल तक कभी भी देख लें। वैधानिक चेतावनी : ढेर सारे सास-बहूनुमा सीरियलों से अघाए धैर्यशील प्राणियों के लिए बिल्कुल नया रियलटी शो पेश है। पात्रों का चयन देश-काल की सीमा से परे जाकर किया गया है। पात्रों की वर्तमान देश के न
 
अनुज