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कवितायन

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14 Jun 2010
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जंगली होता आदमी

शायद, अब बकरियाँ सीख लेंअपने दाँतों को पैना करना और काट लें सड़कों पे भागते आदमी कोशायद,अब मुर्गें भी सीख लें अपने पंजों में जान डालना और पकड़ बनाना मजबूत नाखूनों के सहारे कुछ ऐसी की नोंच सके आदमी का चेहरा जंगल,तो पहले भी महफूज नही था बिल्कुल शायद इसिलिये
 
मुकेश कुमार तिवारी
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पर्यावरण दिवस विशेष : पेड़ तब भी नही सुखाता

कल ०५ जून विश्व पर्यावरण दिवस है, खूब शोर होगा, अपीले होंगी, पौधे रोपे जायेंगे, तस्वीरे खिंचेगी लोग जबरिया मुस्कुराते हुये न जाने क्या भाषण पेलेंगे और हो जायेगा इस बार भी पर्यावरण दिवस..........चिडियों,ने जब बदल लिया होअपना आशियाना /छांव ने तलाश लिया
 
मुकेश कुमार तिवारी
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रात और मेरे बीच

रात,से एक अजीब सा रिश्ता है मेरा वह रखती है सहेजकर गलियों में बिखरे शब्दों को मेरे लिये जो लोग अपनी कहानी पूरा करने के पहले छोड़ गये थे औरउंड़ेल देती है मेरे सामने उस प्रहर जब कोई नही होता हमारे बीच / साथ मैं,उन्ही शब्दों से लिखता हूँ जब गीत कोई तो महसूस
 
मुकेश कुमार तिवारी
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फिर भी ड़र तो लगता ही है न ?

मैंने,सीखा वक्त के साथ दीवार के पार देखना/देख लेना चेहरे के पीछे चेहरा सूरज, जहाँ डूबता प्रतीत होता है वहाँ की गहराई नाप लेना मैंने, यह भी सीखा कि जिंदा रहने के लिये जो जरूरी है कैसे किया जाये? जिन्दा बने रहने के लिये जो भी जरूरी हो सीखा,तो यह भी था कि
 
मुकेश कुमार तिवारी
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नींद को थपकियाँ देते हुये

मुझे,यह भ्रम अक्सर होता है किकोई मेरे दरवाजे पर दे रहा है दस्तक या कभी रात यह भी महसूस होता है कि पुकारा है किसी ने मेरा नाम लेकर या कोई मेरा पीछा कर रहा है बड़ी देर से मुझे सुनायी देती हैं अन्जानी आहटें रह रहकर या किसी मोड़ पर ठिठक जाते हैं कदम मुड़ने से
 
मुकेश कुमार तिवारी
Apr 16 2010 06:11 AM
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आग, के साथ रहते हुये

आग,जब छटपटा रही थी पत्त्थरों में कैद तब आदमी अपने तलुओं में महसूस करता थाजलन / खुजली और मान लेता था आग को आग होने के लियेजिस दिन,आग ने दहलीज लांघी हवा से आवारापन सीखा उतर आयी आदमी की जिन्दगी में तब से आदमी नही जानता है कि क्यों उसकी बगलों में बढ़ते हैं
 
मुकेश कुमार तिवारी
Mar 05 2010 03:20 PM
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मेरा तुम्हारा क्षितिज

मेरी,कुछ अपनी क्षमता थी / कुछ अपना नज़रिया / और कुछ आकलन तुमसे जुड़ने के बाद मुझे लगा था किमैं,कर पाऊंगा विस्तार अपनी सीमाओं का और व्यापक / पैनी / समग्र तुममेरे विचारों को मार रहे हो गर्भ में हीजहाँ वो आकार लेते रहे थे और अपने नज़रिये को थोप रहे हो मैं,यह
 
मुकेश कुमार तिवारी
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ज़मीन से कटा हुआ आदमी

हवा,जिसे हम महसूस कर लेते हैंबहते हुये / शरीर को छूकर गुजरते हुये या कभी सूखते हुये पसीने की ठण्डक में ना,तो मैंने उसे देखा है ना ही आपने देखा होगा वही हवा, जब भर जाती है इन्सान में तो नज़र आती है उनकी बातों में जो ज़मीन के ऊपर ही उतराते हुये ना किसी के
 
मुकेश कुमार तिवारी
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कोई अकेला तो नही बूढ़ा होता

हमारे बीच वो सब था जो कि होना चाहिये जिससे किसी रिश्ते को कोई नाम दिया जा सकता है वो, सब भी था जो बांधे रखता है एक डोर में उलहानों की लालिमा में सजी सुबह से लेकर नाराजियों की उबासियाँ लेती अलसाई दोपहरी / तानों से बोझिल उदास शाम तक और इन सबके बावजूद ज
 
मुकेश कुमार तिवारी
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जब जिन्दगी लगी दाँव पर

अपनी सौंवी पोस्ट के बाद एक नये स्ट्रांस के साथ पारी की प्रारंभ कर रहा हूँ इस आशा के साथ कि एकाग्रचित्त रह सकूं और आपके स्नेह का पात्र भी। सादर, मुकेश कुमार तिवारी ---------------------------------------------------------------- संभावनायें, जब भी लौटी
 
मुकेश कुमार तिवारी
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अपनी सौंवी पोस्ट पर

शतक / सैकड़ा / शतांक केवल लुभाता भर नही है बल्कि एकाग्रता बढ़ाता है, जिम्मेदारियों को महसूसना सिखाता है, निरन्तरता बनाये रखने की प्रेरणा देता है। अपनी सौंवी पोस्ट पर मैं सभी ब्लॉग साथियों का शुक्रगुजार हूँ कि आपकी सुलभ प्रेरणा, प्रतिक्रियायें मेरा मार्
 
मुकेश कुमार तिवारी
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शर्ट पर ठहरी हुई सिलवट

उस, भीड़ भरी गली जिसमें मैं यूँ ही ठेला जा रहा था जैसे हम अक्सर गुजार देते हैं जिन्दगी ना कुछ अपनी / ना अपना कोई कन्ट्रोल बस बहाव के साथ चलते रहने की मजबूरी तुम, उस दिन मुझे फिर दिखायी दिये थे उसी भीड़ भरे रैले में फिसलते हुये उंगलियों से छूटती गई तुम्
 
मुकेश कुमार तिवारी
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कविता : पहला सौदा

मेरी पहली बैंगलोर यात्रा का एक वाकिया जिसने जिन्दगी के प्रति मेरे नज़रिये को काफी प्रभावित किया था, आज बस यूँ ही बाँटना चाहता हूँ आप सबसे, होन सकता है कि ऐसे ही किसी दौर से आप भी गुजरे हों? मुकेश कुमार तिवारी ---------------------------------------- र
 
मुकेश कुमार तिवारी
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छांव के पैबंद

खजूर, सीधे, तने हुये धरती के सीने पर या मुड़े हुये बेतरतीब अलसाये से जब भी मैनें देखा उन्हें उनींदे अधूरे ख्वाबों सा लगे आसमानी बुलंदी को छूने के पहले / ठिठके हुये हौंसले से जलती दुपहरी में छांव के पैबंद से लगे जब से, ख्वाब जागने लगे हैं रातों में बैच
 
मुकेश कुमार तिवारी
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माया, नज़रिया और ज्ञान

हम, सिर्फ पैकिंग बदलने को बदलाव / परिवर्तन का नाम दे देते हैं और खुद भी भ्रमित हो जाते हैं शायद, माया इसी को कहते हैं हम, जितना देख पाते हैं बस वहीं समेट लेते हैं दुनिया को और सिखाते हैं क्षितिज की परिभाषा शायद, नज़रिया इसी को कहते हैं हम, जितना जानते
 
मुकेश कुमार तिवारी
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बिस्तर में सिमटे हुये प्रश्न

क्यों? देर रात घर लौटने के बाद भी मन उदिग्न रहता है और बिस्तर में भी वो सारे प्रश्न जिनके उत्तर मैं खोज नही पाया आजतक दग्ध करते हैं क्यों? ऐसा लगता है कि काश यह रात ना होती तो मैं ठहरता नही खोजता समाधानों को / आजमाता और लिख पाता कोई कहानी नई वो सारे
 
मुकेश कुमार तिवारी
Oct 14 2009 07:40 PM
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मैं, पहले तो ऐसा ना था

यह वाकिया एक न्यूरोसाईकेट्रिक फिजिशियन के क्लीनिक को विजिट करने पर जो कुछ देखा था/महसूस किया था वो सब आपके सामने है। मुझे भी ऐसा लगने लगा है कि इस आपा-धापी के युग में हमारी संवेदनायें मरती जा रही हैं और हम केवल अपने में ही सिमट रहे हैं :- वो, लड़की अक
 
मुकेश कुमार तिवारी
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गज़ल : सीने में उबलता तेज़ाब रख

मन में सुलगते जवाब रख दिल में अपने हिसाब रख वक्त का घोड़ा किस तरह दौड़े पैरों में अपने रकाब रख तेरी आँखें वो लोग पढ़ लेंगे ख्वाबों पे अपने नकाब रख मय क्या जो सुबह उतर जाये इरादों में हौंसले की शराब रख झूठ का गर्द चेहरा जर्द कर देगा बातों में सच का हिज़ाब
 
मुकेश कुमार तिवारी
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तुम क्यों नही पैदा करती कोई नाद?

तुम, आँखों में झांकते हुयेपढ़ लेती हो विचारों को इसके पहले कि वो बदल सकें शब्द मेंशब्दों को जैसे पहचान लेती हो तुम्हारे कानों तक पहुँचने के पहले और अपनी पूरी ताकत झोंक देती हो उस शब्द को बेअसर करने के लिये तुम,रोक देना चाहती हो कि शब्द बदल सकें पानी में
 
मुकेश कुमार तिवारी
Sep 25 2009 06:54 PM
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गज़ल : जज्बात भरी कहानी छोड़

कुछ अपनी शैतानी छोड़ कुछ अपनी हैवानी छोड़आपाधापी बहुत हो चुकी कोई शाम सुहानी छोड़चिंता किसकी मिटी जहाँ में इक उजली पेशानी छोड़ कौन बदल पाया है नसीबा जिद अपनी बेमानी छोड़ रेत समय की क्या लिक्खूंहसरत भरी जवानी छोड़एक दिन तुझको भी जाना हैअपनी कोई निशानी छोड़ बेदिल
 
मुकेश कुमार तिवारी
Sep 21 2009 11:10 AM
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....बने रहने के लिये

अपने आस-पास बनी हुई या चलती हुई व्यवस्था में, मैं कबि जब अपने को खोजता हूँ तो निरर्थक सा महसूस करता हुँ या समय से पीछे चलता हुआ एक ऐसी मौजूदगी जो गैरजरूरी रूप से मौजूद है और वही घुटन जब शब्दों के साँचे में ढलती है तो ........मैं,उस व्यवस्था में उतना ही
 
मुकेश कुमार तिवारी
Sep 12 2009 04:58 PM
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हथेलियों से गुम होती रेखाएँ

आगरा केवल ताज ही नही अपने पेठों के लिये भी मशहूर है, पेठे जिनकी मिठास मुँह में घुलने के बाद भी बड़ी देर तक बनी रहती है। उसी पेठे को एक दूसरी नज़र से देखने का प्रयास किया है, आशा करता हूँ कि आप पसंद करेंगे.........मुकेश
 
मुकेश कुमार तिवारी
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गज़ल : वो जब भी मुझे देखता है

जरूर कुछ ना कुछ तो कहीं जलता है आँखें मसलता है वो जब भी मुझे देखता है दर-ओ-दीवार पीते हैं कोहराम रात-दिन इक समंदर मेरे घर से होकर गुजरता है फासले अब भी दरम्याँ हैं बहुत वो गुंजाईश रखकर ही गले मिलता है उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे ना जाने कौन
 
मुकेश कुमार तिवारी
Sep 03 2009 07:08 PM
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प्रतीक्षारत तुलसी

यह कविता ब्लॉग पर प्रकाशन के पूर्व पत्रिका "वात्सल्य निर्झर" के अगस्त माह के अंक में प्रकाशित हुई थी। यह पत्रिका पूज्य दीदीमाँ साध्वी ऋतुंभरा जी के आशीर्वाद से उनके संस्थान "वात्सल्य ग्राम" द्वारा किया जाता है।यहाँ पुनर्प्रकाशन एवं पेज का डिजाईन पत्रिका
 
मुकेश कुमार तिवारी
Aug 31 2009 10:16 AM
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बहस

किसी,मुद्दे पर जारी बहसजब छोडती है बौद्धिक स्तर कोतो उतर आती है तू तू-मैं मैं परऔर फिर हाथापाई परकोई कभी भी और कहीं से भी भाग लेने लगता है बहस मेंजैसे किसी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में चढते उतरते हैं लोगमुद्दे का गद्दापहले बदलता है तकिये मेंअंततः हवा मे़ उडने
 
मुकेश कुमार तिवारी
Aug 26 2009 11:11 AM
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इंसानों के बारे में

मुझे,यह लगता था कि इंसान बातों को समझता है और अपने तर्कों को औज़ार बनाया था उनसे बातें करने कोमुझे,यह भी लगता था किसभी इंसान दिल से अच्छे होतें हैं केवल परिस्थितियाँ उन्हें बद, बुरा या नेता बनाती हैं और मैं सबसे दिल खोल के मिलना चाहता था मैनें,यही सीखा था
 
मुकेश कुमार तिवारी
Aug 22 2009 12:23 PM
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टारगेट के पीछे भागते

आज,फिर पूरा दिन गुजर गया टारगेट के पीछे भागते दिन है कि जैसे पूरा था ही नही अधूरा सा दिन बस पलों में सिमट आया धुंधलके में टारगेट वहीं था और हमारे बीच दूरियाँ रात की तरह गहराती जा रही थी सारा,सामर्थ्य झोंक कर भी मैंविफलता के साये में ढूंढ रहा था कोई सुकून
 
मुकेश कुमार तिवारी
Aug 18 2009 07:24 PM
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पहिला साल पहिला पड़ाव_ ब्लॉगिंग का एक साल पूरा होने पर

जन्मदिवस जब भी आता है, खुशियाँ समेटे हुये आता है और हम तो वैसे भी भाग्यशाली हैं साल में कुल जमा तीन ठौं जन्मदिवस मनाते रहे अब तक। पहिला चैत्र मास शुक्ल पक्ष की नवमी को गोबर से लीपी हुई जगह, आटे से बनाये चौक, गौरी पूजा, गुलगुलों का भोग और मीठा दूध बुआ के
 
मुकेश कुमार तिवारी
Aug 13 2009 05:29 PM
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अपनी सीमाओं से परे

मुझे,सुबह कोई,साजिश रचती हुई लगती हैछोटी होती परछाईयों का खौफ़ दिल बैठाता हैयूँ लगता है किमेरे सपनों से दुश्मनी पाले बैठा है कोईदुनिया भागते हुये लगती हैऔर मैं जकड़ा जाता हूँअपने ही साये मेंमुझे,दिन में ड़र लगता हैघर से बाहर निकलने मेंसिहरन महसूस होती
 
मुकेश कुमार तिवारी
Aug 08 2009 10:40 AM
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वो, मुझसे करती है शिकायत

कविता सदा ही अपने आस-पास से प्रेरणा देती रही है मुझे, मेरी बिटिया " अदिती " एक दिन मेरी शिकायत मुझसे से ही करती है कि मैंने क्यों उसको लेकर कुछ नही लिखा आज तक? यह कविता इस शिकायत के बाद लिखी है कि वह ऐसा क्यों महसूस करती है, कि मुझे छोटी बिटिया "श्रेया"
 
मुकेश कुमार तिवारी
Aug 04 2009 02:28 PM
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उसकी, उंगली कट गई है !!!

उसकी,उंगली कट गई हैमशीन में आकरउनकीपूरी शाम चिंता में गुजर रही हैजो मशीनों से कोसों दूर होते हैंकिसी भी,एक्सीडेंट को यदि, वह इंडस्ट्रीयल हो तो९६ फीसदी गलती इंसानी होती हैबची ४ फीसदी ही मशीन / स्थितियों / परिस्थितियों के हिस्से में आती है मीटिंग रुम में
 
मुकेश कुमार तिवारी
Aug 01 2009 02:53 PM
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उम्र को पीछे छोड़ देने की चाहत

सारे,घर को नचाने वालीजिससे पूछे बिना एक पत्ता भी ना हिलता होआंगन मेंया जिससे दर्पण, समर्पण कर बैठा होजब खडी होती हैमॉल्स में किसी कॉस्मेटिक काऊंटर परठिठकी सीबेचारी लगती हैसेल्सगर्ल,अपना काम बडी ही खूबी से कर रही होती हैएक सपना सजों देने काउसकी आंखों
 
मुकेश कुमार तिवारी
Jul 29 2009 12:39 PM
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बाट जोहते हुये

जबसे,परिवार छोटे और मॉड्यूलर हुये हैंछाते भी सिमटने लगे हैं आकार मेंछाता,अब कम ही देखने में आता है काला, सारस सा गर्दन मोड़े हुये बड़ा इतना की घुटनों के नीचे तक कपड़े भीगने से बचें रहेवैसे भी अब इतने बड़े कपड़े पहनता कौन हैयह छाते,पुरखों से हस्तांरित होते
 
मुकेश कुमार तिवारी
Jul 25 2009 11:53 AM
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कैसी लगती हो.....?

तुम, जब मुस्कुराती हो और मेरे कंधे पर सिर टिकाते हुये बात करती हो कुछ शिकायत भी अच्छी लगती हो तुम, जब शाम से ही मेरा इंतजार करती हो और मेरे आते ही समा जाती हो मेरी बांहो में अच्छी लगती हो तुम, जब बिलखने लगती हो नाराज किसी बात पर और मेरी किसी भी बात क
 
मुकेश कुमार तिवारी
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शब्दों की तलाश में

मैं, नही चाहता कि तुम किसी दिन भूल जाओ अपना नाम भी और गुमसुम बैठी रहो ताकते शून्य में और चेहरे पर उभर आयें आंसुओं की लकीरें किसी, प्रश्‍न के जवाब में तुम्हें तलाशने हो शब्द फिर थक-हार चुप बैठ जाना हो या बड़ी देर बाद कुछ कहो और, किसी प्रतिप्रश्‍न के जव
 
मुकेश कुमार तिवारी
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घर

घर, जिसकी दीवारों से सीलता हो बुजर्गों का आशीर्वाद उखड़ते प्लास्तर से झांकती हो दुआयें छतों से टपकता हो अपनापन या दहलीज लांघकर आ जाती हो बरकत, बारिश के पानी के साथ घर, जिसे नया बनाने के लिये माँ ने पापा से कितनी ही लड़ाईयाँ लड़ी हो कभी-कभी आँसू भी बहाये
 
मुकेश कुमार तिवारी
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मकां को कभी घर बनाया होता

यह मैं भली भांति जानता हुँ, कि मेरे शौक में अकविता-कविता लिखना रहा है। धीरे-धीरे अंतरजाल पर गज़अलों को पढते हुये और गुरूजी श्री पंकज सुबीर सा. की कक्षाओं से जो कुछ सीखा उसे आजमाने की कोशिश की है। आप सभी के विचार / सुझाव चाहूँगा। सादर, मुकेश कुमार तिव
 
मुकेश कुमार तिवारी
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एक, मुट्ठी धूप

एक, मुट्ठी धूप की तलाश में पूरी जिन्दगी गुजर गई हथेलियाँ नही थाम पायी अपने हिस्से में आई धूप यादों के सिलसिले सी बस बरसती चली गई मुसलसल स्याह नम अंधेरों में घुली हवा बुझा रही थी आग जहाँ भी थी / जितनी भी गुनगुनी धूप, जब सरकी उंगलियों की दरारों से तो द
 
मुकेश कुमार तिवारी
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सुबह का इंतजार

रात, के बाद सुबह आती है यह मेरा भी विश्वास था अपने हिस्से की रात को किसी भी तरह मैं बदल देना चाहता था सुबह में सूरज, को अपने आँगन में उगाने के लिये नींद के चाक पर मैंने गढे सपनें सुबह के अंधेरे को सारी रात जगाया सूरज जैसे निकलना ही नही चाहता हो अपनी
 
मुकेश कुमार तिवारी
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भाग्य की तलाश

भाग्य, को तलाशा मैंने अपनी हथेलियों पर फिर उन रेखाओं में खोजा जो मेरे बचपन की किसी तस्वीर में तो हैं फिलहाल नदारद शायद घिस आई हैं भाग्य, को फिर तलाशा मैंने पेशानी पर सलवटों में छिपी परेशानियाँ मिली उलझनों की इबारत में दर्ज चिंतायें मिली वो लकीरें जो
 
मुकेश कुमार तिवारी