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कुन्दकुन्द कहान

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08 Mar 2010
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कुन्दकुन्द कहान

૧1૧૦૭-૦૬-૧૯૭૮બુધવાર જ્યેષ્ઠ સુદ ૨વિ. સં. ૨૦૩૪1Aગુજરાતીસાંભળો ડાઉનલોડ૨2૧૨૦૮-૦૬-૧૯૭૮ગુરૂવાર જ્યેષ્ઠ સુદ ૩વિ. સં. ૨૦૩૪1Aગુજરાતીસાંભળો ડાઉનલોડ૩3૨૦૯-૦૬-૧૯૭૮શુક્રવાર જ્યેષ્ઠ સુદ ૪વિ. સં. ૨૦૩૪1Aગુજરાતીસાંભળો ડાઉનલોડ૪4૩૧૦-૦૬-૧૯૭૮શનિવાર જ્યેષ્ઠ સુદ ૫વિ. સં.
 
प्रदीप मानोरिया
Feb 11 2010 06:01 PM
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भगवान् आत्मा

अनंत सिद्धों को तेरी पर्याय में स्थापित किया है , अब तेरा चार गति में रुलना नहीं रहेगा ,अब तुम अल्पज्ञ भी नहीं रह सकोगे अपने सर्वज्ञ स्वभाव से ही तुम सर्वज्ञ हो जाओगे | सभी जीव साधर्मी हैं विरोधी कोई नहीं सर्व जीव पूर्णानंद को प्राप्त हो ! कोई जीव अप
 
प्रदीप मानोरिया
Dec 29 2009 12:02 PM
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जिन स्वरूपी प्रभु हो तुम

जो जिनेन्द्र है वैसा ही मैं हूँ ऐसा मनन करो ; अरे.. रे.. रे.. मैं अल्पज्ञ हूँ मेरे में ऐसी कोई ताकत होती होगी ?? ये बात रहने दे भाई !! मैं पूर्ण परमात्मा होने लायक हूँ --- ऐसा भी नहीं किंतु मैं तो पूर्ण परमात्मा अभी ही हूँ ऐसा मनन करो !! आहा .. हां..
 
प्रदीप मानोरिया
Dec 29 2009 12:02 PM
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मैं स्वयं महिमावंत हूँ

बाहर की महिमा छोड़ ;वहाँ क्या है ? इसलिए पर की महिमा और आकर्षण छोड़कर एक बार परम ब्रह्म प्रभु निज आत्मा की महिमा लाकर अपने ज्ञान उपयोग को वहाँ जोड़ दे तो तेरी चार गति का भ्रमण मिट जायेगा प्रथम तो मैं ज़रा भी पर का (अन्य का) नहीं और अन्य भी मेरा तनिक भी
 
प्रदीप मानोरिया
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स्वाधीनता ही सुख है

अपनी स्वाधीनता की बात जब तक रूचि में नहीं बैठे ,तब तक स्वभाव की सनमुखता नहीं हो सकती , और तब तक आत्मा का हित भी नहीं होता .......! हे जीव अभी भी वक्त है ...| पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी
 
प्रदीप मानोरिया
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होता स्वयं जगत परिणाम

क्रमबद्ध को मानते ही फेरफार (बदलाव) करने की दृष्टि छूट जाती हैं सामान्य द्रव्य पर दृष्टि जाती ही है , यही पुरुषार्थ है ....! करने फरने का है ही कहाँ ? करुँ करुँ की दृष्टी ही छोडनी है और अपने ज्ञायक भाव से जोड़नी है | मनुष्य भव में यही एक काम करने योग
 
प्रदीप मानोरिया
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मैं जानने वाला हूँ

आबाल -गोपाल सब ही वास्तव में जानने वाले को ही जानते हैं | लेकिन इसको जानने का जोर दिखता नहीं , इससे यह राग, द्वेष,पुस्तक,वाणी हैं इसलिए मुझे इनका ज्ञान होता है , ऐसा इसका जोर (झुकाव) पर में ही जाता है , श्रद्धा में अपने ज्ञान सामर्थ्य का विश्वास ही न
 
प्रदीप मानोरिया
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परिणाम - परिणाम स्वतंत्र और क्रमबद्ध है

निर्मल परिणाम हो अथवा कि मलिन परिणाम वह उसके स्वकाल में ही होता है , वह परिणाम के उत्पन्न होने का जन्मक्षण है | वास्तव में जो कुछ भी होता है उसके तुम जानने वाले हो करने वाले नहीं अत: ऐसा कैसे और क्यों होता है ? इसका प्रश्न ही कहाँ है ...!! पूज्य गुरु
 
प्रदीप मानोरिया
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आत्मा और शरीर अत्यन्त भिन्न हैं

भगवान् आत्मा केवलज्ञान की मूर्ती है और यह शरीर तो जड़ -धूल है मिट्टी है शरीर को आत्मा का स्पर्श ही कहाँ है !! पूज्य गुरुदेव कानजी स्वामी
 
प्रदीप मानोरिया
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ज्ञायक ही कारण परमात्मा है

विकारीपन (विकारत्व) तो आत्मा में नहीं किंतु अल्पज्ञता भी वास्तव में आत्मा में नही ..., पहली ही चोट में सिद्धत्व की स्थापना जो करेगा उसको ही सम्यक दर्शन होता है | आत्मा तो त्रिकाली ध्रुवस्वभाव परम पारनामिक भावः ही आत्मा है . संवर निर्जरा मोक्ष पर्याय
 
प्रदीप मानोरिया
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भगवान् स्वरुप

सिद्ध भगवान् जानने वाले देखने वाले हैं ऐसे ही तुम भी जानने वाले देखने वाले हो ! पूरे अधूरे का प्रश्न ही कहाँ है ! अपने जानने वाले देखने वाले स्वरुप से खिसक कर जो तुम कर्तात्वा में ही रुक गए हो इसलिए ही सिद्ध भगवान् से अलग हो ! पूज्य गुरुदेव श्री कानज
 
प्रदीप मानोरिया
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मैं ही परमात्मा हूँ

सब परिणमन श्रेणीबद्ध है , इसलिए तुम तो मात्र जानने वाले हो पूर्ण जाननहार इसमें विकार और अपूर्णता क्या ? ! एक रूप परिपूर्ण ही हो ! ........ परिपूर्ण परमात्मा हो !!!!! मैं ही परमात्मा हूँ ऐसा स्वीकार कर ! राग की क्रिया करने वाले क्या वो तुम हो ? अज्ञान
 
प्रदीप मानोरिया
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स्वभाव का लक्ष्य ही आदरणीय है

आत्म स्वभाव के लक्ष्य वाला जीवन ही आदरणीय है , इसके सिवाय दूसरा जीवन आदरणीय गिनने में आया नहीं | विकल्प में स्वयं का अस्तित्व मानने से और महातम्य भाव से ही मिथ्यात्व है | पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी
 
प्रदीप मानोरिया
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guru kahan upkaar mahan

 
प्रदीप मानोरिया
Jan 13 2009 08:20 PM