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15 Jun 2010
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मैं लौट कर नहीं आऊंगा

कलएक लम्हा टूटागिरने लगा मैंने लपकापकड़ा हाथ में कहारुक तो ज़रा कहाँ जा रहा है?वो बोला रुक नहीं सकतामुझे तो मिटना हैतुम जी लो जितना जीसकते हो भर लोअंक मेंहर क्षण कोजितना भरसकते होसंजो लोहर ख्वाब कोजितना
 
वन्दना
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राष्ट्रमंडल खेलों का असर ?

राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन पहली बार वर्ष 1930 में हेमिल्‍टन शहर,  ओंटेरियो( कनाडा) में आयोजित किया गया था. तब इस खेल आयोजन का नाम ब्रिटिश एम्पायर गेम्स था. इसके खेल आयोजन का मूल विचार एक भारतीय का था जिनका नाम एशली कूपर था. उन्होंने इस खेल आयोजन को
 
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वो जो कभी दोस्त बनकर आया था.............

वो जो कभीदोस्त बन कर आया थादोस्ती का हर फ़र्ज़ निभाया थादोस्ती की कसमेंखाता थादोस्ती पर जानलुटाता थाकब पथप्रदर्शकबन गया कब आलोचक बन गयाकब दोस्ती को एक नाम देने का सोचने लगा सिर्फ अपने ख्यालों में ही 
 
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ये कैसा प्रेम का पंछी है....................

वो रोज मुझे ये कहता है प्रेम वो मुझसेकरता हैमैं रोज उसेये कहती हूँ  प्रेम तो बस इक धोखा हैवो रोज मुझेसमझाता हैप्रेम के पाठ पढ़ाता हैमैं रोज उसेबतलाती हूँये प्रेम हवा काझोंका हैजो आकर गुजर जाता हैकभी ठहर कहीं नहीं पाता
 
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धागा हूँ मैं

धागा हूँ मैं मुझे माला बना प्रीत के मनके पिरोनेह की गाँठें लगा खुद को सुमरनी का मोती बना मेरे किनारों को स्वयं से मिला कुछ इस तरहधागे को माला बनाअस्तित्व धागे कामाला बने माला की सम्पूर्णता में सजे जहाँ धागा
 
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खुद से निगाह मिला ना पाया

सुनोउदासी का लहराता सायाक्या तूने नहीं देखा?जिसे कभी तूकँवल कहा करता थाउस रुखसार पर डला ख़ामोशी कानकाब हटाया तो होता हर तरफ टूटी -बिखरी निराशा में डूबीआहें और ख्वाबों को ही पाया होताहर पग पर सिर्फ ज़ख्मो के ही निशाँटिमटिमाये होते हर तरफ तबाही कामंजर ही
 
वन्दना
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महिला ब्लॉगर्स का सन्देश जलजला जी के नाम

कोई मिस्टर जलजला एकाध दिन से स्वयम्भू चुनावाधिकारी बनकर.श्रेष्ठ महिला ब्लोगर के लिए, कुछ महिलाओं के नाम प्रस्तावित कर रहें हैं. (उनके द्वारा दिया गया शब्द, उच्चारित करना भी हमें स्वीकार्य नहीं है) पर ये मिस्टर जलजला एक बरसाती बुलबुला से ज्यादा कुछ नहीं
 
वन्दना
May 17 2010 06:00 PM
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प्रश्नचिन्ह?

हर शख्सएक प्रश्नचिन्ह सा नज़र आता हैना जाने कितने सवालोंसे जूझता हल की तलाशमें निकला  प्रश्नों के व्यूह्जाल मेंउलझता जाता हैऔर प्रश्नों के जवाब मेंप्रश्नों से हीटकराता है और फिरप्रश्नों के मकडजाल मेंफँसा खुदएक
 
वन्दना
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मातृ ऋण से कुछ तो खुद को उॠण कर लेना

मत करोमेरा वंदन अभिनन्दनमत करोयाद तुमसिर्फ एक दिन मत दो सम्मान अभीफर्क नहीं पड़ता अभी तो मैंअपना बोझ उठा लूँगीतुम पर जान न्यौछावरकर दूंगी अपनी दुआओं में सिर्फ तुम्हाराही नाम लूँगी अभी तो शक्तिहै मुझमें  अभी
 
वन्दना
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नारी या भोग्या ?

नारी तुम्हारा अस्तित्व क्या है?हर युग मेंजन -जन के अंतस में व्याप्त तुम्हारी भोग्याकी छवि  से कब मुक्तहो पाई हो हर युग में ही कुचली गयींमसली गयींतोड़ी गयींफेंकी गयींकब तुम्हारे अस्तित्व को स्वीकारा गया कब
 
वन्दना
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क्षणिकाएं

तेरा चहकना महकना ,मचलनाखिलखिलाना कुछ यूँ लुभाता हैजैसे कोई नदिया तूफानी सागर के सीने परअठखेलियाँ कर रही हो तेरे पहलू में सिर रखकरसुकून पानाअब किस्मत नहींतुझे याद रखनाया भूल जानाअब बस में नहींदीदार तेरा हो अक्स मेरा होरूह तेरी
 
वन्दना
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अधूरे ख्याल

यूँ  ही भटकते- भटकतेकभी- कभीअधकचरे , अधपके अधूरे ख्यालातदस्तक देते हैं और फिर ख्यालोंकी भीड़ में खो जाते हैंऔर हम फिरउन्हें ख्यालों मेंढूंढते हैंमगर कभी  खोया हुआ मिला है क्याजो मिल पाता ये अधूरे ख्यालक्यूँ अंधेरों
 
वन्दना
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कहा था ना .............२०० वीं पोस्ट

देखा कहा था नाकभी मैंने एक वक़्त आएगाजब तेरे अरमाँ जवाँ होंगे और मेरेवक़्त की कब्र में तेरे ही हाथों दफ़न हो चुके होंगेउस वक़्तकैसे , फिर सेजिंदा करेगा मृत जज्बातों को कहा था ना एक दिन आवाज़ देगा
 
वन्दना
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मन का पंछी

ना जाने वो कौन सी बंदिश हैजिसे तोड़ नहीं पाताये मन पंछी- साक़ैद में फ़डफ़डाता उड़ना चाहकर भी उड़ नहीं पातासिसकता तड़पता मचलतापल- पलमगर फिर भीउड़ने की चाहतना जाने कौन से गर्तमें दब गयीकिस खोह मेंछुप गयीऔर
 
वन्दना
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यादों का विकल्प

यादों की कहानी यादों के फ़साने हर दिल ने गायेहर दिलजले नेजीने का सबब बनायायादों का ही कफ़न सजायाकिसी ने खुद को नशे में डुबायातो किसी ने ज़िन्दगी को कर्मभूमि बनायामगर यादों से कभी बच ना पाया दिल-ओ-दिमाग कोयादों की
 
वन्दना
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क्षणिकाएं

आज तो चाँदनी भी जल रही हैचाँद के आगोश को तड़प रही हैमोहब्बत केदंश झेल रही हैफिर भीउफ़ ना कर रही है  हर कश पर ख़त्म होती धुंआ बन उडती ज़िन्दगी गली के एक छोर पर खडीखामोश ज़िन्दगीफिर भीदूसरे छोर तक ना
 
वन्दना
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मैं हिन्दुस्तानी हूँ

मै हिन्दुस्तानी हूँ  मजहब की दीवार कभी गिरा नहीं पाया किसी गिरते को कभी उठा नहीं पायानफरतों के बीज पीढ़ियों में डालकर इंसानियत का दावा करने वाला मैं हिन्दुस्तानी हूँभाषा को अपना मजहब बनायादेश को फिर भाषा
 
वन्दना
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ॐ जय ब्लोग्वान

ॐ जय ब्लोग्वानी प्रभु जय ब्लोग्वानीजो कोई तुमको ध्याताहॉट में स्थान पाता ॐ जय ब्लोग्वानी .........घर , परिवार , नौकरी सब दॉव पर लगा देता  खाना, पीना ,सोना ब्लॉगर सब भूल जाता उलटी सीढ़ी टिप्पणियाँ करके बस टी आर पी
 
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कोई तो जगे

अँधा हूँ मगरआँख वालों कोआईना बेचता हूँशायद अपना अक्सनज़र आ जायेकिसी कोगूंगा हूँ मगरजुबान वालों कोशब्द बेचता हूँशायद कोई जुबाँके ताले खोलेकोई तो सत्यकी चादर ओढ़ेबहरा हूँ मगरकान वालों कोगीत सुनाता हूँशायद सुनकर किसी का तोखुदा जगेकोई तो वक़्त कीआवाज़ सुने
 
वन्दना
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कचोट

बरसों साथ रहकर भीतेरा मेरा अनजाना रिश्तादेह की दहलीज पर हीक्यूँ सिमट गयामन के आँगन तक की राहकोई मुश्किल तो ना थीमौन का शून्य हीअस्तित्व को बाँटता रहाप्रगाढ़ स्नेह के बंधन कोकम आँकता रहाअर्धांगिनी शब्द कोखूँटी पर टाँकता रहाअर्ध अंग के महत्त्वको नकारता
 
वन्दना
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नारी को नारी रहने दो

वो तो सीता ही थीवो तो लक्ष्मी ही थीत्याग , तपस्याप्रेम समर्पण कीबेड़ियों में जकड़ी ही थीअपने अरमानो की राखओढ़ पड़ी ही थीफिर क्यूँ तुमने मजबूर कियासीता से मेडोना बनने कोक्यूँ तुमको बाहर हीउर्वशी रम्भा दिखाई देती थींजब तुमने मजबूर कियाउसने आगे कदम बढाया
 
वन्दना
Mar 06 2010 12:24 PM
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मुर्गा कटता रहता है

चल पागलमोहब्बत करनीभी नहीं आतीझूठे वादे करकेकोई वादा पूरा न करनाजन्मों के इंतज़ारकी बातें करकेइस जन्म में भीइंतज़ार न करनामुरझाये गुल को भीगुलाब बता देनाखाली पास- बुक कोअम्बानी की बता देनाउधार की गाड़ी कोअपना बना लेनाये है आज का चलनऔर तू है पागलमोहब्बत के
 
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नखरे वारे सजन

ओ रे सजन, प्यारे सजननखरे वारे सजनफाग का महिना आ गया हैहोरी का रंग भा गया हैतन मन ऐसे भीग रहे हैंप्रेम रस में सींच रहे हैंयूँ ना करो बरजोरीगोरी से न करो ठिठोलीबैयाँ ऐसे ना पकड़ो सजनारंग अबीर मलो मुख पे नाऐसे करो ना बरजोरीनाजुक कलइयां है मोरीसजना ऐसे मचल
 
वन्दना
Feb 25 2010 06:08 PM
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आईने कैसे- कैसे

आईना ना देखो यारोंअक्स से बू आती हैआईने में क़ैद अक्स सेखुद को मिलाओ तो ज़रागर खुद को पहचान लो तोआईना खामोश हो जायेहर आईना अपना सा नज़र आता हैक्या करूँ महबूब मेरेहर आईने मेंतेरा ही चेहरा नज़र आता हैमुझे आईना दिखाने वालेकभी उस आईने में झाँका होतातो तेरा अक्स
 
वन्दना
Feb 20 2010 05:52 PM
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एक बेचारा -------शायरी का मारा

दोस्तों ,अभी -अभी एक मेल मुझे श्री प्रवीण पथिक जी से प्राप्त हुई और ये मेल उनके दोस्त श्री आनंद पाठक जी द्वारा रचित है और उनकी आज्ञा से मैं इसे अपने ब्लॉग पर लगा रही हूँ । एक हास्य व्यंग्य है जो मुझे इतना अच्छा लगा कि सोचा सभी दोस्तों से इसे साझा किया
 
वन्दना
Feb 17 2010 11:37 AM
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फूलझड़ी

चैट के माध्यम सेआशिकी झाड़ने वालोंबच के रहनाजिस दिन कोईसिरफिरी टकरा जाएगीआशिकी की सारीभूतनियाँ उतार जाएगीजेब के पैसे जबडकार जाएगीतब घरवाली भीहाथ से निकल जाएगी वैलेन्टाइन की मालाजपने वाले एक बार में हीतेरा वैलेन्टाइन मना जाएगी फिर हर औरत में तुम्हेंमाँ ,
 
वन्दना
Feb 13 2010 04:46 PM
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बस इतना सा ............

मैं नही कहताआसमाँ से चाँदतोड़कर लाऊँगा नहीं कहतातारों सेमाँग सजाऊँगामैं नही कहतातेरे लिएआग का दरियापार कर जाऊंगानहीं कहतातूफानों कारुख मोड़ दूँगाकोई वादानही करताकोई कसमनही उठाताबसधड़कन कीहर तालके साथपलकों कीगिरती -उठतीचिलमन के साथसाँसों कीनिर्बाध गतिके
 
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क्षणिकाएं

तुम मानो या ना मानोमुझे पता हैप्यार करती हो मुझेतुम स्वीकारो या ना स्वीकारोमुझे पता हैतुम्हारा हूँ मैंअश्क भी आते नहीदर्द भी होता नहीतू पास होकर भीअब पास होता नहीइक आती सांस के साथतेरे आने की आस बँधीऔर जाती सांस के साथहर आस टूट गयीतेरी पुकार में ही दम ना
 
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मत हवा दो

भड़कती चिंगारीधधकता ज्वालामुखीहर सीने में हैमत हवा दोचिंगारी गर शोला बन जाएगीकहर बन बरस जाएगीज्वालामुखी गर जो फट जायेगासैलाब इक ले आएगामत हवा दोहवा का रुखज़रा तो देखा करोकुछ तो सोचासमझा करोमत आदमी केसब्र का इम्तिहान लोगर एक बारआदमी , आदमी बन गयाशोलो को
 
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मन की गलियाँ

मन कीविहंगम गलियाँऔर उसकेहर मोड़ परहर कोने मेंइक अहसासतेरे होने काबस और क्या चाहिएजीने के लिएवहाँ हमतुझसे बतियाते हैंऔर चले जाते हैंफिर उन्ही गलियों केकिसी मोड़ परऔर खोजते हैंउसमें खुद कोना तुझसे बिछड़ते हैंना खुद से मिल पाते हैंऔर मन की गलियों कीइन
 
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मत करो ऐसा ...........

मैं कोई वस्तु नहीक्यूँ मेरी बोली लगाते होदुनिया की इस मंडी मेंक्यूँ खरीदी बेचीं जाती हूँकभी धर्म के ठेकेदारों नेमेरी बलि चढ़ाई हैकभी समाज के ठेकेदारों नेमेरी बोली लगायी हैमैं भी इक इंसान हूँमुझमें भी खुदा बसता हैउसी खुदा की नेमत हूँजिसकी करते तुम आशनाई
 
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कुछ ख्याल

पति होने का धर्मउसने कुछ ऐसे निभायाइक हँसते , मुस्कुरातेज़िन्दगी की उमंगों सेभरपूर गुल कोनिर्जीव, बेजान बनायातूतेरा ख्यालऔरतेरी ज़िन्दगीसब तेराइसमें'मैं ' कहाँ हूँ ?जो दिखाई ना देवो अश्कजो सुनाई ना देवो शब्दऔर दोनों का दर्दकभी झांकनाउनके आईने मेंवहां
 
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गिले -शिकवे

इक प्यासी रूह को सुकून कब मिला है घुटन की दलदल में फंसी ज़िन्दगी का यही सिला है चेहरे पर उभरती लकीरों में दर्द का ही सिलसिला है कुछ पल ठहर जाऊं कहीं ज़िन्दगी का बस यही गिला है
 
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दबी चिंगारी को हवा मत दो............६ दिसम्बर

मरा इक शख्स था हुए बरबाद न जाने कितने थे उस एक चेहरे को ढूंढती निगाहें आज न जाने कितनी हैं गम का वो सूखा ठहरा आज भी हर इक निगाह में है सियासत की ज़मीन पर बिखरी लाशें हजारों हैं राम के नाम पर राम की ज़मीन हुई लाल है धर्म के नाम पर ठगी ज़िन्दगी आज नारा
 
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कैसे करूँ नमन ---------२६/११

शहीदों को नमन किया श्रद्धांजलि अर्पित की और हो गया कर्तव्य पूरा ए मेरे देशवासियों किस हाल में है मेरे घर के वासी कभी जाकर पूछना हाल उनका बेटे की आंखों में ठहरे इंतज़ार को एक बार कुरेदना तो सही सावन की बरसात तो ठहर भी जाती है मगर इस बरसात का बाँध कहाँ
 
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मत ढूँढ बाहर

उस एक स्वरुप में क्यूँ न खोजा तूने जो दूसरे में पाना चाहता है मानव तू क्यूँ भटकना चाहता है भावों के दलदल में क्यूँ धँसता जाता है तेरे हर ख्वाब की ताबीर वहीँ है हर चाहत का हासिल वही है हर राह की मंजिल वही है फिर क्यूँ तू मरुभूमि में जल के कण ढूंढ़ना च
 
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ज़ख्मों का बाज़ार

ज़ख्मों को प्यार हमने दिया तेरे दिए हर ज़ख्म को दुलार हमने दिया ज़ख्मों का बाज़ार हमने भी लगा रखा है एक बार हाथ लगाओ तो सही ज़ख्मों को देख मुस्कुराओ तो सही हर ज़ख्म से आवाज़ ये आएगी यार मेरे , तुम एक नया ज़ख्म और दे जाओ तो सही आओ प्यार मेरे , ज़ख्मो को न
 
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कोई तो कारण रहा होगा

क्यूँ तेरी याद फिर आई है लगता है तुमने मुझे पुकारा है किस दर्द ने फिर दस्तक दी है तभी तो हूक मेरे दिल में भी उठी है तेरे गम से जुदा मेरा दर्द कब था तेरी इक आह पर दर्द मेरा सिसकता है लगता है फिर कोई ज़ख्म उधड गया है तभी तो तेरी इक सिसकी पर रूह मेरी कसम
 
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ये कैसा है पोरुष तेरा

ये कैसा है पोरुष तेरा ये कैसा है दंभ अबला की लुटती लाज देख जो बहरा बन , मूक हो नज़र चुरा चला जाए करुण पुकार भी न जिसका ह्रदय विदीर्ण कर पाए फिर ये कैसा है पोरुष तेरा ये कैसा है दंभ अत्याचारों की बानगी देख असहाय , निर्दोष की हृदयविदारक चीख सुन भी जो सि
 
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तेरे आने से

कभी मिलोगी?साँस छूटने से पहले मुझसेपकडोगी हाथ मेरामौत का हाथ पकड़ने से पहलेबस इतनी सी इल्तिजा हैइक नज़र देख लूँ तुमकोऔर सुकून की नींद सो जाऊँफिर न जगाने आए कोईकब्र पर मेरीकोई फूल भी न चढायेतमाम हसरतें, आरजुएंइक दीदार के साथतमाम हो जाएँगीमेरा उम्र भर का
 
वन्दना
Sep 27 2009 11:01 AM