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अनुभूतियाँ

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18 Jun 2010
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जब प्यार का सावन

जब प्यार का सावन, तेरी लाती हैं चिट्ठियाँ छूते ही नज़रों के बरस जाती हैं चिट्ठियाँ हर शब्द में मुस्कान है, कागज़ है नम मगर रोते हुए हँसती हो, बतलाती हैं चिट्ठियाँ कोई पता ना नाम है जिनके नसीब में कोरे लिफाफे की वे तड़पाती हैं चिट्ठियाँ पहचान लेतीं छू के
 
प्रताप नारायण सिंह
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सेहरा के ज़िस्म पर कोई दरिया उतर गया

सेहरा के ज़िस्म पर कोई दरिया उतर गयाअच्छा हुआ वो आँख मेरी नम जो कर गयारिश्ता मिरा सराब से गहरा रहा बहुत (सराब= मरीचिका) वो भी चला था साथ मेरे मैं जिधर गयामैंने तो कोई आइना तोड़ा नहीं कभीजाने न फिर भी अक़्स मेरा क्यूँ बिखर गयाआदत ही तीरगी की ऐसी है पड़ गई
 
प्रताप नारायण सिंह
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जंगल की हवा अब तो शहरों में भी चलती है

पुर-दर्द निदा और बू-ए-ग़ोश्त उभरती है जंगल की हवा अब तो शहरों में भी चलती है आतिश से मुफ़लिसी की, जल जाए लकीरे-बख़्त भूनी हुई मछली भी, हाथों से फिसलती है वो रोटियाँ बुनता है बदन भूख का ढ़कने को शब-सर्द जुलाहे की, घुटनों में गुजरती है अब चाँद सितारे भी हैं
 
प्रताप नारायण सिंह
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आँचल माँ का

हर शै थी अन्जान यहाँ मैं सिर्फ जानता आँचल माँ का उन नन्ही आँखों की धरती, आसमान था आँचल माँ का हर पीड़ा, दुःख, डर मिट जाता उस वितान के नीचे आकर बचपन के माथे पर उभरा हर गुमान था आँचल माँ का तरुणाई की आँखों में जब सपनों के अंकुर फूटे उनके पोषण हेतु हवा, जल
 
प्रताप नारायण सिंह
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आँच गर ज्यादा करोगे रोटियाँ जल जाएँगी

मत हवा दो, अध-बुझी चिंगारियाँ जल जाएँगी आग जो भड़की दिलों में, पीढ़ियाँ जल जाएँगीख़ुद-परस्ती की शमाँ से यूँ न घर रोशन करोबेगुनाहों की अनेकों बस्तियाँ जल जाएँगी फेंकते हो प्यार के दरिया में नफरत की मशाल ! लग गई जो आग सारी कश्तियाँ जल जाएँगीबैठ ऊँची
 
प्रताप नारायण सिंह
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ये चाँद जो उजला दिखता है

ये चाँद जो उजला दिखता हैबस तेरी नज़र का धोखा है है सारी उमर बहता रहता आँखों में कहीं इक दरिया हैपहचान इन्हें कैसे होगी हर आँख चढ़ा इक चश्मा हैतू देख के दाना चुगना रे ! वो जाल बिछाए बैठा हैहर रात बिताता आँखों मेंयह शहर भी मुझ सा तनहा हैजीने की उसे है चाह
 
प्रताप नारायण सिंह
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इस तरह दिल की लगी अपनी बुझाता है

इस तरह दिल की लगी अपनी बुझाता हैदिल्लगी के वास्ते मुझको बुलाता हैपैर रख काँधों पे वो ऊँचा उठा कितनाशौक़ से ख़ुद दास्ताँ अपनी सुनाता हैअजनबी हूँ शहर में किस ओर मैं जाऊँ जिससे पूछो वो अलग रस्ता बताता हैमिल न पाया जो कभी ख़ुद से न दुनिया सेरोज ही भगवान से सबको
 
प्रताप नारायण सिंह
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एक लमहा ज़िन्दगी की वो कहानी कह गया

एक लमहा ज़िन्दगी की वो कहानी कह गयादूर तक बस राह में आलम ख़ला का रह गयाजो चला था खूँ जिगर से उमड़ के तूफ़ान साआते आते आँख तक वो सिर्फ पानी रह गयाहो गयीं तनहा मेरी पलकें भी अब तो एकदमहमनफ़स इक ख्वाब ही था, आज लेकिन वह गया उम्र भर देता रहा जो हर परिंदे को
 
प्रताप नारायण सिंह
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प्रीति के दोहे

प्रीति हिया ऐसी जगी, भागा भेद-विवेक हर अमूर्त औ' मूर्त में, रुप दृष्टिगत एक रामायण, गीता तुम्ही, तुम ही वेद, पुराण पढूँ, गुनूँ आठो पहर, तुममें ही निर्वाण नेह-सुधा की अब्धि तुम, सुख-माणिक भण्डार डूब डूब चुनता रहूँ, भरूँ हृदय आगार सुबह, तुम्हारी ही हँसी,
 
प्रताप नारायण सिंह
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प्रणय राग

मनुष्य न तो केवल प्राण है और न ही केवल शरीर, अपितु दोनों का संगम है. प्राण और शरीर दोनों ही मिलकर अस्तित्व और चेतना का निर्माण करते हैं. इसीलिए दोनों का आकर्षण और भोग सदा से ही विद्यमान रहा है. प्रेम में भी दोनों की ही भागीदारी होती है और दोनों जुड़कर ही
 
प्रताप नारायण सिंह
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पल भर को तुम मुड़कर तकना

अंतिम पल हैं; जाते जाते पल भर को तुम मुड़कर तकना आँसू के कुछ कतरे तन पर ओस सरीखे पड़े हुए हैं फूल तुम्हारे मुस्कानों के अंग हमारे जड़े हुए हैं सपनों के नन्हे नन्हे से कितने पौधे खड़े हुए हैं कभी किसी एकाकी पल में जिनको बोया मेरे अँगना पल भर को तुम मुड़
 
प्रताप नारायण सिंह
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अंतहीन संघर्ष

एक अजगर एक प्रेत और एक गिद्ध तीनो ही जन्म लेते हैं आदमी के साथ ही आदमी के भीतर ही अजगर, जो भी पाता है खा जाता है उम्र भर खाता रहता है परन्तु सदा ही भूखा रहता है प्रेत, भिन्न भिन्न आकृतियाँ गढ़ता है सारी उम्र डराता है रचाता है अनेकों ढोंग इधर उधर भगात
 
प्रताप नारायण सिंह
Dec 29 2009 11:44 AM
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राँझे फना होते हैं अब भी प्यार में

आजमाना था कि कितना जोर है पतवार में । नाव हमने डाल दी, चढ़ती नदी की धार में। तुम बड़े नादान हो जो रूह लेकर आ गए, सिर्फ कीमत जिस्म की है अब यहाँ बाज़ार में। रात के अंतिम पहर तक सिसकियाँ आती रहीं, एक बरगद कट रहा था, काठ की दरकार में। पीटते हो ढोल जाने क
 
प्रताप नारायण सिंह
Dec 29 2009 11:44 AM
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तप्त तन मन की धरा को तुम सजल कर दो

छाकर मेरे उर व्योम पर तुम मेघ सा, बरसो । तप्त तन मन की धरा को तुम सजल कर दो । कंठ को मेरे, सुकोमल निज करों का हार दे दो । कर्ण को मेरे, प्रतीक्षित शब्द का उपहार दे दो । सुप्त मेरी धमनियों में रक्त का संचार कर दो , गर्म अपनी साँस, मेरी साँस में भर दो
 
प्रताप नारायण सिंह
Dec 29 2009 11:44 AM
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अहर्निश

मैं जानता हूँ कुछ फर्क नहीं पड़ता मेरे चीखने से, चिल्लाने से, जीवन के शतरंज पर शब्दों की गोटियाँ चराने से। कुछ भी तो फर्क नहीं पड़ता, जलती क्षुधाओं को बेबस आँसुओं को कलपते तन-मन को शब्दों की चाशनी में पकाने से। मैं यह भी जानता हूँ कि जो उबलता है अन्द
 
प्रताप नारायण सिंह
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जन्मों तेरा ही नाम लिया है

जन्मों तेरा ही नाम लिया है मैंने जां, तब तेरी उल्फ़त को जिया है मैंने ज़िंदा रहे ये रूह तेरे आने तक बस इसलिए घावों को सिया है मैंने ये तिश्नगी शादाब रहे, इस खातिर सावन कई, आँखों से पिया है मैंने आकर मुझे जो आज छुआ है तुमने ख़्वाबों को फिर से पंख दिया ह
 
प्रताप नारायण सिंह
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दोहे

जो माटी से तन बना, महता कम ना होत बिन दीया कैसे भला, जलती कोई जोत पोथी सब कंठस्थ, पर, खुली न मन की गाँठ नलिका* पर लटका हुआ, तोता करता पाठ मिलन विरह दोनों सुखद, प्रेम करे यदि वास कस्तूरी सा, हृदय में, फैले मधुर सुवास सुलगे भुस तो देर तक, धुँआ भरे आकास
 
प्रताप नारायण सिंह
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इरादतन मैंने किया

इरादतन मैंने किया; इल्ज़ाम लेने दो मेरे गुनाहों को मेरा अब नाम लेने दो चलना अगर आता उफ़क भी पार कर लेता बैसाखियों को धड़कने तो थाम लेने दो झुक कर जरा सिर से हटा दो सख्त मिट्टी को इस बीज को भी इक नया आयाम लेने दो दुश्वार ना हो जाय, चलना दोपहर में कल इन
 
प्रताप नारायण सिंह
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दिल लगाने से हम तो डरते हैं

दिल लगाने से हम तो डरते हैं । ग़म उठाने से हम तो डरते हैं । कुछ भरम दिल के टूट ना जाएँ , आज़माने से हम तो डरते हैं । कब किसी बात का हो अफ़साना, इस ज़माने से हम तो डरते हैं । फिर रुला दें तुझे न वे नग्में, गुनगुनाने से हम तो डरते हैं । हो न जाओ सनम! क
 
प्रताप नारायण सिंह
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मेरे जज़्बात तुम बिन कम न होते

मेरे जज़्बात तुम बिन कम न होते। ख़ुशी से रूबरू पर हम न होते। रुतें आतीं तेरे बिन भी जहां में, बहारों के मगर मौसम न होते। कभी ना रंगे-उल्फ़त देख पाता, अगर इस दिल के तुम हमदम न होते। ख़लाओं में भटकती ज़ीस्त तुम बिन, किसी मंज़िल के राही हम न होते। शुआ-ए-रुख
 
प्रताप नारायण सिंह
Oct 14 2009 07:41 PM
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मेरा गुलसितां था नया नया

थी अभी कली तो चटक रही, अभी फूल था बस अधखिला क्यूँ ख़बर खिज़ाओं को मिल गई, मेरा गुलसितां था नया नया जो न मंज़िलें हैं नसीब में, मुझको न कोई मलाल है बस ख़त्म हो न कभी मेरे कदमो तले है जो रास्ता उस शाम पाकड़ के तले तुमने गले जो लगाया था इन सर्दियों में हर
 
प्रताप नारायण सिंह
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नम हैं आँखें और हमारे दिल जले हुए

नम हैं आँखें औ' हमारे दिल जले हुएचल रहे हम फिर भी लेकिन लब सिले हुए आईने को देख रोया जार जार मैंमुद्दतें थीं हो चुकीं ख़ुद से मिले हुए आस उड़ने की लिए, बस मैं खड़ा रहाआसमाँ तो था खुला, "पर" थे सिले हुए कबसे आई है नहीं तेरी हँसी यहाँएक अर्सा हो गया अब गुल
 
प्रताप नारायण सिंह
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जब पास हमारे तुम होती हो

कितना अच्छा होता है जबपास हमारे तुम होती होत्राण सदृश, अस्तित्व तुम्हारा, मुझको ढँक लेता हैदुःख, चिंता के हर प्रवेग को बाधित कर देता हैप्राणों को कर प्रणय सिन्धु, सुख की तरिणी खेता है मेरे हिय की हर पीड़ा कापल में क्षय तुम कर देती होकितना अच्छा होता है
 
प्रताप नारायण सिंह
Sep 23 2009 11:54 AM
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सत्य ! तुम्हें मैं जीना चाहता हूँ ।

सत्य !तुम्हें मैं जीना चाहता हूँ ।चेतनता के प्रथम पग पर हीमुझे ओढ़ा दिए गएआवरणों के रंध्रों में छुपेतृष्णा के असंख्य नन्हे विषधरोंके निरंतर तीक्ष्ण होते गए विषदंतों सेक्षत विक्षत,अचेतना के भँवर में डूबते उतराते,तुम्हारे गात कोअपनी आँखों में भरना चाहता
 
प्रताप नारायण सिंह
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जुगनुओं के ताप से कोई फसल पकती नहीं

आह हाथों की लकीरों को बदल सकती नहींजुगनुओं के ताप से कोई फसल पकती नहीं यूँ कभी कुछ देर मन बहला भले देती है यहनाव कागज़ की नदी तो पार कर सकती नहीं कालिखें कितनी पुतेंगी और अब इतिहास परबह रही खूँ की नदी जो, क्यों कभी रुकती नहींजबसे ख़ुद की है दिखी तस्वीर
 
प्रताप नारायण सिंह
Sep 14 2009 02:07 PM
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अभिसार

वह पूनम की रजनी थीकुछ उजली सी, कुछ नम सीतुम चन्दा सी उतरी थीफिर बरसी थी सावन सीवह दिवस आज भी पलताहै हर पल उर में मेरेजब मयूख बन छिन्न किएजीवन के सघन अँधेरेअब हर पल सिंचित करतींउपवन को मृदुल फुहारेंसावन रहता नभ मेरेझरतीं हैं रस की धारेंअब चाँद उतरकर नभ
 
प्रताप नारायण सिंह
Sep 09 2009 12:34 PM
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आगे कहानी और है

यह नहीं, मैंने लिखी जो, वह कहानी "और है"स्याह पर्दे में बिलखती यह जवानी "और है" मत उतारो काठ की नावें नदी में साथियों !उठ रहे शोले धधकते, आज पानी "और है" नींद में चलते हुए ठोकर लगी, जाना तभीख्वाब तो कुछ और थे पर जिंदगानी "और है" लग रहा, ये आ रहीं छूकर
 
प्रताप नारायण सिंह
Sep 09 2009 12:05 PM
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दर्दे मोहब्बत भी दिलकश ही तो होता है

तनहाई के आँचल में कुछ यादें पिरोता हैयह दर्दे मोहब्बत भी दिलकश ही तो होता हैजब रात के साए में, है चाँद जवाँ होताइक बीता हुआ लम्हां कुछ ख्वाब सँजोता है"वे" नर्म बिछौनो पर करवट ही बदलते हैं"वो" सख्त जमीं पर भी बेसुध होके सोता है"जीने के नहीं काबिल दुनिया
 
प्रताप नारायण सिंह
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उस झील के तट पे, कोई पत्थर नहीं है

गम नहीं कि राह में मेरी, गुलों का घर नहीं है ।बस्तियाँ काँटों की हैं, पर हाथ में नश्तर नहीं है ।है अजब ही खेल ऐ मौला ! तुम्हारा इस जहां में,डूबता कोई, किसी को बूँद तक मयसर नहीं है ।उन सवालों को भला क्यों, फिर से तुम दुहरा रही हो,ज़िंदगी ! जिनका हमारे पास
 
प्रताप नारायण सिंह
Aug 26 2009 02:09 PM
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दोहे -प्रेम और श्रृंगार के

अन्दर मेरे तुम प्रिये , बाहर तुम ही होयजित देखूँ तित तू दिखे , और न दूजा कोयमैं तो, अब मैं ना रहा, तुम-मय भीतर वाह्यतेरा ही मन प्रान प्रिये , जब से कन्ठ लगायअंध कूप में था पड़ा, लिये सघन अँधियारअमिट उजाला छा गया, झाँके वे इक बारतम ही तम फैला रहा, अवनि और
 
प्रताप नारायण सिंह
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अभीष्ट

तुम्हारे घन-केश कीशीतल छाँव को हीमान लिया थामैंने अपना अभीष्ट,जब तकनहीं भींगा थातुम्हारे हृदयाकाश से झरतेशीतल फुहारों में ।तुम्हारीसीप सी सुन्दर,झील जैसी गहरीपनीली आँखों में हीडूब जाने का स्वप्न देखा था,जब तकअनजान थातुम्हारे अंतह में उमड़तेअनंतअथाहस्नेह
 
प्रताप नारायण सिंह
Aug 03 2009 01:53 PM
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बाँध लो मुझे

बाँध लो मुझे,नहीं चाहिए छुटकारा। खींच लो मुझे ,अपने अंदर,अतल गहराइयों में,कि चाह कर भी न उबर सकूँ। छू लो मुझेइस तरह कि पिघल जाए मेरा अस्तित्वकिसी तरल जैसा,और बूँद बूँदसमाहित हो जाए तुममे ही। उड़ जाएँभाप बनकर,मेरी सारी दूसरी इच्छाएँ । ढँक लो मुझेइस तरहकि
 
प्रताप नारायण सिंह
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एक नज़्म

मेरा प्यार तुम, मेरी जान तुम, तुम ही तो हो मेरी जिन्दगी। मेरे हमनफस तेरे साए में, पलती है मेरी हर खुशी। शब-ए-गम लिए था मैँ चल रहा सूने सफर में अब तलक, तुम आ मिली सरे राह जो, छायी फिजाँ में रोशनी। तेरे इश्क की परछाइयाँ, मेरे ज़ख्म-ए -दिल को सूकून दें,
 
प्रताप नारायण सिंह
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ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से !

डा.राम कुमार वर्मा के एक निबंध से प्रेरित; स्थायी पंक्ति उसी निबंध का शीर्षक है ) ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से ! भाँति भाँति के दरवाजों से, मन में तू पग धरती है तरह तरह के रूप बदलकर, अंतह में तू जलती है बढ़ जाती जब तेरी ज्वाला, दग्ध हृदय का आँगन होता
 
प्रताप नारायण सिंह
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तुम सदा ही गीत बनकर

तुम सदा ही गीत बनकर शब्द में ढलती रहो तुम सदा ही प्रीत बनकर हृदय में पलती रहो हर मरुस्थल राह का बहु पुष्प से भर जाएगा संग मेरे, तुम सदा यदि बाँह धर चलती रहो मैं अकेला ही सफर में आज तक चलता रहा शाप कोई, प्राण में, बड़वाग्नि सा जलता रहा हर तपन, हर पीर,
 
प्रताप नारायण सिंह
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मेरा पूर्ण तुम हो

मेरे मस्तक पर उभरता मान हो तुम! मेरे प्राणों का सतत उत्थान हो तुम ! मेरे होने का निरंतर भान देता, चेतना में वास करता गर्व तुम हो ! प्रिये! मेरा दर्प तुम हो ! मेरे अंतह की सकल तुम कामना हो! मेरे जीवन की अखंडित साधना हो! ज्वार सी उठती हृदय के सिन्धु मे
 
प्रताप नारायण सिंह
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बादल सुभाग के

घिर आये हैं मेरे बादल सुभाग के साँवले सलोने से। कन्ठ से उभरते हैं सातों सुर एक साथ झंकृत हो उठता है अन्तः का तार तार। अधरों पर खेलती मोहक-अति चंचला भरती है राह में किरणे समुज्ज्वला। सघन हो बरसते हैं अमृत के बूँद बूँद मन का पपीहा अघाए बिन पीता है रात
 
प्रताप नारायण सिंह
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रुद्र का तृतीय नेत्र खोलना

प्रशस्त शस्त शैल मध्य चिर विविक्त कन्दरा शिला प्रगल्भ पुष्ट, व्याघ्र चर्म था बिछा हुआ अनादि आदि देव थे समाधि में रमे हुए सती वियोग का अथाह दाह प्राण में लिए विरक्त, भक्त, सृष्टि के सभी क्रिया कलाप से हरे त्रिलोक-ताप जो, जले विछोह ताप से समाधि साध कर
 
प्रताप नारायण सिंह
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ऐसा नहीं कि तेरी दुआ में असर नहीं

ऐसा नहीं कि तेरी दुआ में असर नहीं शब ही हमारी ऐसी कि जिसकी सहर नहीं जो बिन खिले ही फूल कभी शाख से गिरे किस्मत यही थी उनकी, खिजा का कहर नहीं मैं जानता था, राह में दरिया है आग का बेबस बहुत चला था, मगर बेखबर नहीं इल्जाम लोग देते तुम्हे बेवफाई का इजहार-ए
 
प्रताप नारायण सिंह
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न बीतने वाली रात

हमारे तुम्हारे बीच का फासला बहुत लम्बा था मैं कितना भी चलता नहीं पहुच पाता जब तक कि तुम कदम न उठाते। चांदनी में नहाना और बात है पर उचककर चाँद को छुआ नहीं जाता। मेरे हौसले के क्षत विक्षत पैरों से अविरल बहते रक्त को मेरी आस की कातर नजरें सुखा नहीं पा र
 
प्रताप नारायण सिंह