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31 Dec 2009
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सारे माहौल को जाने क्या हो गया

सारे माहौल को जाने क्या हो गया जिंदा रहना भी अब तो सज़ा हो गया एक मगरूर तारा बहुत दिन हुए आसमानों से गिर कर फ़ना हो गया अब किनारों के मिलने की उम्मीद क्या दोनों जानब बड़ा फासला हो गया रात भर खेमा - ऐ - दिल में हलचल रही जाने बस्ती में क्या हादसा हो गय
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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रहनुमा साथ छोड़ देता है

रहनुमा साथ छोड़ देता है रास्ता साथ छोड़ता ही नही नई तहजीब में पला बच्चा अब खिलोनो से खेलता ही नही सब की आखो में अश्क भर आए इक मेरा दर्द बोलता ही नही धुंधले चेहरों का उफ़ घना जंगल बच निकलने का रास्ता ही नही इख तला फात दूर हो कैसे वो मेरी तरह सोचता ही न
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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आपसे प्यार होता जाता है

आपसे प्यार होता जाता है कम दुश्वार होता जाता है अक्ल करती है जितनी तदबीरे इश्क बीमार होता जाता है कोई लग्जिश न यार हो जाए शौक आजार होता जाता है जिस कदर हाल - ऐ - दिल छुपाते है साफ इज़हार होता जाता है ज़ख्म - ऐ - एहसास की खलिश से ' अदम ' फूल भी खर होत
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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यही नही की सदाए लगा के देखते है

यही नही की सदाए लगा के देखते है कुए में कौन है पत्थर हटा के देखते है गुलाम अब न हवेली से आयेगे लेकिन हुजुर अब भी ताली बजा के देखते है अजाफा होता है कितना हमारी इज्ज़त में रईस - ऐ - शहर को घर पर बुला कर देखते है अजहर इनायती
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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कही ऐसा न हो दामन जला लो

कही ऐसा न हो दामन जला लो हमारे आसूओं पर खाक डालो मानना भी ज़रूरी है तो फ़िर तुम हमें सब से खफा हो के माना लो बहुत रोई हुई लगती है ये आँखे मेरी खातिर ज़रा काजल लगा लो अकेलेपन से खौफ़ आता है मुझको कहाँ हो मेरे ख्वाबो खयालो बहुत मायूस बैठा हु मै तुमसे कभी
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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चाँद है अफताब है यह लोग

चाँद है अफताब है यह लोग जिंदगी का निसाब है यह लोग देख इनकी दराज जुल्फों को रहमतों का सहाब है यह लोग ऐसे चलते है जिस तरह चश्मे जमजमे है , ख्वाब है यह लोग लोग और इतने गुलबदन तौबा क्या सराया गुलाब है यह लोग लोग और वाकई हसी इतने वाकिया है की ख्वाब है यह
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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ज़ख्मो को न आँचल से हवा दो

ज़ख्मो को न आँचल से हवा दो गर कुछ दे सकते हो वफ़ा दो गरीब के बीमार बच्चे को रोटी दो न की दवा दो बेशर्म हो चली जिंदगी पर रहम करो रहनुमाओ , हया दो तानाशाही में कुचलते आदमी को हा ! आम आदमी को जुबा दो विद्रोह कर उठे जुलम के खिलाफ उसे हिम्मत दो न की सज़ा द
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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जो यह शर्ते-तालुक है की है हम को जुदा रहना

जो यह शर्ते - तालुक है की है हम को जुदा रहना तो ख्वाबो में भी क्यो आओ , खयालो में भी क्या रहना शज़र ज़ख्मी उम्मीदों की अभी तक लहलहाते है इन्हे पतझड़ के मौसम में भी आता है हरा रहना पुराने ख्वाब पलकों से झटक दो , सोचते क्या हो मुकदर खुशक पतों का है शाख
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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अबादतो की तरह मै यह काम करता हूँ

अबादतो की तरह मै यह काम करता हूँ मेरा उसूल है पहले सलाम करता हूँ मखालफत से मेरी शख्सियत सवरती है मै दुश्मनों का बड़ा एहेतराम करता हूँ मै अपनी जेब में अपना पता नही रखता सफर में सिर्फ़ यही एह्तमाम करता हूँ मै डर गया हूँ बहुत सायादार पेडो से ज़रा सी धुप
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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दोस्ती जब किसी से की जाए, दुश्मनों की भी राय ली जाए

दोस्ती जब किसी से की जाए दुश्मनों की भी राय ली जाए मौत का ज़हर है फिजाओ में अब कहा जाके साँस ली जाए बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ ये नदी कैसे पर की जाए मेरे माजी के ज़ख्म भरने लगे आज फ़िर कोई भूल की जाए बोतले खोल के तो पी बरसो आज दिल खोल के पी जाए
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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तनहा चला हूँ मै रहगुज़र में

तनहा चला हूँ मै रहगुज़र में भटक न जाऊ कही सफर में दिल चिराग बन के जला है अब तो चले आओ मेरे घर में कोई न सुने फरियाद मेरी पत्थर ही मिले है तेरे शहर में कहते हो तुम की खुदा याद रखू तुम ही खुदा हो मेरी नज़र में गुलो की थी उम्मीद उससे ' दयाल ' खर बिखेर दि
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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धुप छ्त पर जब चडी होगी

धुप छ्त पर जब चडी होगी चांदनी पिछवाडे खड़ी होगी झिलमिला उठी अँधेरी रात हाथ बच्चे के फुलझडी होगी पहाडी रात को दौड़ गई आँख चाँद से जा लड़ी होगी गाड़ी सिग्नल पर खड़ी होगी कैसी इन्तिज़ार की घड़ी होगी अशोक प्लेटो
 
Rahul kundra
Dec 29 2009 11:41 AM
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मौन

बैठ ले कुछ देर,आओ, एक पथ के पथिक सेप्रिय, अंत और अनंत के,तम-गहन-जीवन घेर। मौन मधु हो जाएभाषा मुकता की आड़ में,मन सरलता की बाड़ मेंजल-बिन्दु-सा बह जाए । सरल, अति स्वछंदजीवन, प्रात के लघु पात सेउत्थान-पतनाघात सेरह जाए चुप, निर्द्वंद्व । सूर्यकांत त्रिपाठी
 
Rahul kundra
Sep 08 2009 02:46 PM
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कत्ल करके लग रहे वो बेखबर से

कत्ल करके लग रहे वो बेखबर सेलो हमी अब चल दिए है इस शहर सेसीख कर आए कहाँ से ढंग नया तुमघर जलाते हो निगाहों के शरर सेआंधिया-दर-आंधिया, हरसू अँधेराबन गया माहोल कैसा इक ख़बर सेटुकड़े टुकड़े हो चली है जिन्दगानीहै परेशां आदमी अपने सफर सेलिख रहा है हर किसी का वो
 
Rahul kundra
Jul 29 2009 10:15 AM
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डूबते तारो ने क्या-क्या रंग दिखलाये हमें

डूबते तारो ने क्या - क्या रंग दिखलाये हमें कुछ पुराने नक्श जो रह - रह के याद आए हमें किस में जुर्रत है की उतरे पानियों की दरमिया किस को ख्वाहिश है जो अब के रह पर लाये हमें हम यह क्या जाने की क्यो सब्रो सको जाता रहा तू जो इक दिन पास आ बैठे तो समझाए हम
 
Rahul kundra
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होंठो पर सजा के अपने वो जो गुनगुना गई मुझको

होंठो पर सजा के अपने वो जो गुनगुना गई मुझको इक लफ्ज़ था भुला हुआ ग़ज़ल बना गई मुझको किस - किस तूफा के बीच से बचा लाया न दिल को अपने कितनी यकता वो निगाहे हुस्न , जोकि पा गई मुझको न किसी की याद , कोई खुशी न कोई रंज - ओ - गम यह किस मुकाम पर हयात ले कर आ
 
Rahul kundra
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अब आँखों में नही सैलाब कोई

अब आँखों में नही सैलाब कोई मुझे लौटा दे मेरे ख्वाब कोई अजब मजबूरिया थी चुप रही मै मुझे करता रहा आदाब कोई मै तूफानों से बचना चाहती थी मगर दरिया न था पायाब कोई नसीम निकहत
 
Rahul kundra
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बिखरे मोती

कभी करीब कभी दूर हो के रोते है मोहब्बतों के भी मौसम अजीब होते है अजहर इनायती
 
Rahul kundra
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फ़िर अजनबी फिजाओ से जोड़ा गया मुझे

फ़िर अजनबी फिजाओ से जोड़ा गया मुझे मै फूल थी जो शाख से तोडा गया मुझे मिटटी के बर्तनों की तरह साडी जिंदगी तोडा गया मुझे कभी जोड़ा गया मुझे हाथो में सौप कर मेरे कागज़ की एक नाव दरिया के तेज़ धार पर छोडा गया मुझे खुशबू की तरह जीना भी आसान तो नही फूलो से कत
 
Rahul kundra
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डूब गई जिंदगी क्यो ज़हर में

डूब गई जिंदगी क्यो ज़हर में होता कोई अपना इस शहर में चांदनी के पंख कट गए होंगे इतना अँधेरा न था इस दहर में यह मौसम पगला गया कैसे धुल एक भी नही इस शज़र में सर पिटती रही होंगी हवाए डूब गया सितारा किस नज़र में यह अचानक कारवा को क्या हुआ रोने की बात न थी
 
Rahul kundra
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मुझको उस शाखे गुल से प्यार नही

मुझको उस शाखे गुल से प्यार नही जिस पे बस गुल ही गुल हो खार नही मौत का ऐतबार है मुझको जिंदगी तेरा ऐतबार नही दोस्त दुश्मन सभी तो छोड़ गए अब किसी का भी इन्तिज़ार नही रुसवा हो जाता वरना दुनिया में बच गया कोई राजदार नही कट ही जायेगी जिंदगी ऐ अश्क गम न कर को
 
Rahul kundra
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वह जान के भी अनजान बना रहा

वह जान के भी अनजान बना रहा दिलो का फासला सुनसान बना रहा कितना जाहिल निकला मेरा दोस्त रकीब के घर मेहमान बना रहा यह कैसी मोहबत है अजनबी ज़ख्म भर गया निशान बना रहा सैलाब में डूब गया शहर लेकिन पत्थर का बुत भगवान बना रहा न लुना न इच्छरा न पूरण भगत ख्वाब फ़
 
Rahul kundra
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कैसे कैसे हादसे सहते रहे

कैसे कैसे हादसे सहते रहे फ़िर भी जीते रहे हसते रहे उसके आ जाने की उम्मीदे लिए रास्ता मुड - मुड के हम तकते रहे वक्त तो गुजरा मगर कुछ इस तरह हम चिरागों की तरह जलते रहे कितने चेहरे थे हमारे आस - पास तुम ही तुम दिल में मगर बसते रहे
 
Rahul kundra
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या तो मिट जाइये या मिटा दीजिये

या तो मिट जाइये या मिटा दीजिये कीजिये जब भी सौदा खरा कीजिये अब जफा कीजिये या वफ़ा कीजिये आखिरी वक्त है बस दुआ कीजिये अपने चेहरे से जुल्फे हटा दीजिये और फ़िर चाँद का सामना कीजिये हर तरफ़ फूल ही फूल खिल जायेगे आप ऐसे ही हसते रहा कीजिये आप की ये हसी जैसे
 
Rahul kundra
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चेहरों पर चेहरे लगाते है लोग

चेहरों पर चेहरे लगाते है लोग हस कर गम को छिपाते है लोग मिलने - जुलने वालो की भीड़ में कुछ ही साथ निभाते है लोग सुकून देते है जो साथ रह कर जाने पर कसक दे जाते है लोग जिक्र जब होता है बीते लम्हों का याद बहुत आते है लोग ग़ज़ल में ढाली है हकीकत ' सर ' ने
 
Rahul kundra
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ऐ बशर ! ऐ बशर ! ऐ बशर !

ऐ बशर ! ऐ बशर ! ऐ बशर ! काम कर , काम कर , काम कर बे खतर , बे खतर . बे खतर बे समर, बे समर, बे समर, खौफ है तुझको किस बात का ? खाक है ये सरापा तेरा असलियत है तेरी आत्मा मौत से जो न होगी फ़ना जिगर जालंधरी
 
Rahul kundra
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आदमी आदमी को क्या देगा

आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा इसे खुदा देगा जितना देगा तू उसके बन्दों को वो तुम्हे उससे भी सवा देगा जब दुआ में तेरी असर ही नही बद्दुआ तू किसी को क्या देगा दाग कितने है तेरे चेहरे पर आइना देख सब दिखा देगा छोड़ कर मुझको इतना खुश न हो उमर भर दुःख ये
 
Rahul kundra
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बाहर से यारी भीतर मनमुटाव है

बाहर से यारी भीतर मनमुटाव है यहाँ के चलन का अजब रख - रखाव है छोड़ जाए महफिल तो भूल जाते है लोग अपनों का अपनों पर ऐसा ही घाव है अनेको तूफान तो सतह पर खामोश है समंदर में लगता बहुत गहरा तनाव है तन्हा हुए इश्क में दुनिया से बेखबर ठोकरे खाई बेशुमार फ़िर भी
 
Rahul kundra
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मायूस हो तेरी महफिल से कोई फ़िर गया

मायूस हो तेरी महफिल से कोई फ़िर गया रात के आँचल से एक सितारा झर गया एक लम्हे के लिए उमर भर बैठा रहा और फ़िर वो शख्स न जाने किधर गया तमाम रास्ते दौड़ता अकेला कम्बखत दरिया पहाड़ छोड़ सीधा समंदर गया चोगान में आग बुझाये बैठा है काफिला रास्ता जिसका सेहरा की
 
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जिंदा लबो पे ये ताले कैसे

जिंदा लबो पे ये ताले कैसे ये जलसा गुंगो के हवाले कैसे चोटी तक पहुचा ज़हर तो एहसास हुआ ये साँप आस्तीन में हमने पाले कैसे घर से नही निकले जो लोग अभी तलक ताज्जुब है उनके पैरो में छाले कैसे जूते और टोपी में ताल्लुक ठीक नही कोई शख्स इरादों को संभाले कैसे
 
Rahul kundra
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आँखों में जिसके खौफ का साया बना रहा

आँखों में जिसके खौफ का साया बना रहा वो शख्स इसके बाद भी अपना बना रहा अपने तमाम रिश्ते ही छुटे हुए लगे मेरा वजूद मुझसे ही तन्हा बना रहा अब उसके इन्तिखाब का होता कहाँ यकी दिल में था , जिसके ख्वाब का चेहरा बना रहा शामिल रही सफर में भी अपनी उदासिया चाहत
 
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दर्द की स्याही से लिखा ये मेरा नसीब था

दर्द की स्याही से लिखा ये मेरा नसीब था बिक गई मेरी मोहब्बत में गरीब था पल भर को तो हम भी न संभल पाए थे गुजरा ही वो हादसा हम पर अजीब था तमाम उमर जिंदगी समझ जिसे चाहा वो आखिरी सफर में भी न मेरे करीब था खुशिया बाट्ता रहा में सबसे जिंदगी की अब गम के अंधे
 
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अपने-आपको सताया न करो

अपने - आपको सताया न करो दिल किसी से लगाया न करो मोहब्बत करो शौक से करो फ़िर बाद में पछताया न करो फूक डाले जो अपना ही घर ऐसे चिरागों को जलाया न करो बहने दो आँखों से आसू दर्द सिने में छुपाया न करो किसी की जान भी जा सकती है सबके सामने मुस्कराया न करो दिल
 
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शब-ऐ-गम से जो हो खौफ अगर

शब - ऐ - गम से जो हो खौफ अगर इक शमा - ऐ - उम्मीद जलाया कीजिये यू तन्हाइयो से न कभी घबराइए किसी गैर को अपना बनाया कीजिये न कीजिये गिला औरो की बेवफाई का आप अपना वायदा निभाया कीजिये तय कीजिये गैरो की खुशी खातिर अपनी हसी में गम को छुपाया कीजिये चाहे कभी
 
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अगर आप हमको मिल गए होते

अगर आप हमको मिल गए होते बाग़ में फूल खिल गए होते आपने यू ही घूर कर देखा होंठ तो यू भी सिल गए होते काश हम आप इस तरह मिलते जैसे दो वक्त मिल गए होते हमको अहद- ऐ - खिरद मिले ही नही वरना कुछ मुन फईल मिल गए होते उनकी आँखे ही कज लगर थी ' अदम ' दिल के परदे त
 
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आँखों में रात ख्वाब का खंज़र उतर गया

आँखों में रात ख्वाब का खंज़र उतर गया यानि सहर से पहले चिरागे सहर गया इस फ़िक्र ही में अपनी तो गुजरी तमाम उमर में उसको था पसंद तो क्यो छोड़ कर गया आंसू मेरे तो मेरे ही दामन में आए थे आकाश कैसे इतने सितारों से भर गया कोई दुआ कभी तो हमारी कबूल कर वरना कहे
 
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ऊपर क्या, नीचे भी देखा करिए साहिब

ऊपर क्या , नीचे भी देखा करिए साहिब अपनी परछाई से कभी न डरिए साहिब पुरी उमर आदमी बनना हमने सिखा अर्थ देवता का हमसे मत कहिये साहिब वो जो हाथ जोड़ कर रोज़ मिला करते है उनके हाथो में तलवार न रखिए साहिब सरिता के तट पर तो चल कर सबने देखा सरिता की लहरों पर
 
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बनती-बिगड़ती डगर क्युं है

बनती - बिगड़ती डगर क्युं है मेरे ख्वाबो में तेरा घर क्युं है यू तो शहर खंडहर निकला कब्रिस्तान संगमरमर क्युं है आपके हाथो में तो गुलेल भी नही पंछी का मगर गिरा पर क्युं है सफर तो तय कर लिया लेकिन कश्ती को साहिल से डर क्युं है ' प्लेटो ' के लिए खुल गए क
 
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कातिल से अपनी जान का सौदा करेगे हम

कातिल से अपनी जान का सौदा करेगे हम मकतल में फ़िर लहू से उजाला करेंगे हम शीशे में अपने आप को देखा करेगे हम फ़िर दुसरो पे तंज उछाला करेगे हम यादो की कहकशा से पुकारोगे जब हमे ख्वाबो के रथ पर बैठ के आया करेगे हम ( रेहाना शाहीन )
 
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हर तरफ़ आह आह है जैसे

हर तरफ़ आह आह है जैसे ये जहां कत्लगाह है जैसे अब सदाकत गुनाह है जैसे झूठ से ही निबाह है जैसे इश्क की इब्तिदा में ऐसा लगा सीधी - सादी सी राह है जैसे हर किसी ने किया यहाँ सिजदा आरजू खानकाह है जैसे खौफ से हम सिमट गए इतना कोई फरदे - तबाह है जैसे पेश आता
 
Rahul kundra