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घोस्ट बस्टर का ब्लॉग

http://pret-vinashak.blogspot.com/
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13 Jan 2010
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और अब एक बेहद आसान सांकेतिक विज्ञान पहेली तस्लीम वाले जाकिर भाई के लिये

भई अपन तो गच्चा खा गये सांकेतिक का संकेत समझने में. जाकिर भैय्या कहते हैं कि दैनिक हिन्दुस्तान ने बताया कि किसी ऑस्ट्रेलियन मौसम विज्ञानी ने बोला करके कि ओजोन का होल सिकुड़ चला है. उसी रपट से एक चित्र उन्होंने अपनी पहेली के लिये चुन लिया. अब दैनिक
टैग: पहेली
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सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के पन्नों से भारत के आगामी वामपंथी सुशासन की एक झलक

बात पुरानी है, मगर इतनी भी नहीं कि स्मृति पटल से ओझल हो सके, उम्र कम थी, पर इतनी भी नहीं कि कुछ समझ न आए. स्थान था बीजिंग, वही बीजिंग जहाँ इस साल ओलंपिक गेम्स की चकाचौंध हम सबने देखी. इसी शहर के एक मुख्य स्थान थेन आनमन चौक पर जून १९८९ में जो कुछ हुआ
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... मेरो दर्द न जाने कोय. एक बेचारे पुरूष की दर्द भरी आह, मगर सुनेगा कौन?

लोग अक्सर महसूस करते हैं, और गाहे बगाहे थोड़ी हिम्मत जुटाकर शिकायत भी कर ही लेते हैं कि ब्लॉग जगत में किसी भी मुद्दे पर सहानुभूति का रुख महिलाओं की और कुछ ज्यादा ही झुका हुआ नजर आता है. बेचारे पुरुषों को अपनी बात ठीक से रखने का मौका ही नहीं मिलता. बस
Dec 29 2009 11:54 AM
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ऑपेरा ब्राउजर हमारी पहली पसंद क्यों है?

काफ़ी सारी काम की जानकारियाँ जो साइटमीटर उपलब्ध करवाता है , उनमें से एक है आपके ब्लॉग पर आने वाले ट्रैफिक का ब्राउजर उपयोग . हमने पाया कि इस ब्लॉग पर आने वाले ६० % लोग इंटरनेट एक्सप्लोरर का प्रयोग कर रहे हैं . और भी ज्यादा अचरज यह देखकर हुआ कि ४१ % ल
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ग्वालियर पुस्तक मेले की सैर और कुछ खरीदी

कई वर्षों से लगातार यही सुनने में आ रहा है कि पुस्तकों में आम पाठकों की रुचि तेजी से समाप्त होती जा रही है. खास तौर पर हिन्दी की किताबों का तो बुरा हाल है. हाल ही में दिल्ली पुस्तक मेले में पाठकों की कम उपस्थिति से उपजे निराशाजनक परिदृश्य की जानकारी देती
टैग: कविता
Sep 13 2009 08:14 AM
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लगता है अब हमें भी टिप्पणी मॉडरेशन चालू कर ही लेना चाहिये

इससे पहले कि पूरी बात का खुलासा हो, "अपने" चंद अश़आर पेश करने की अनुमति चाहूंगा. चुपके चुपके से रात और दिन टसुओं का बहाना याद हैगाहमको तो अभी तक आशिकी का वो जमाना याद हैगा.हमें पता है कि आपका दिल वाह-वाह करने को मचल उठा होगा. पर दाद देने की जल्दी मत
टैग: कविता
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पापा की बिटिया और ट्रेन-पकड़-शौर्य गाथा (भोपाल यात्रा - अंतिम भाग)

घर से रेल्वे स्टेशन का रास्ता होगा यही कोई बीस मिनिट का. स्वतन्त्रता दिवस पर काफ़ी सारा बाज़ार बन्द था, सड़कों पर ज्यादा आवाजाही नहीं थी. पन्द्रह मिनिट में ये सफ़र पूरा कर लेने की उम्मीद लेकर २:१० पर घर से निकला गया. ट्रेन २:४० पर थी. लगा था कि इतना समय
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बोट क्लब, मल्होत्रा जी और १५ अगस्त पर डांस पे चांस (भोपाल यात्रा - ३)

रात भर रुक-रुक कर हल्की फ़ुहार पड़ती रही. खिड़की से ठंडी हवा के मस्त मद्धम झोंके आकर तन को हिलोरते रहे और भोर की पहली किरण के साथ जब निद्रा देवी की शरण से बाहर आये तो विगत दिवस की यात्राओं की थकान छू हो चुकी थी. रात मोबाइल को ड्यूटी पर तैनात करके सोये थे कि
Aug 26 2009 09:15 AM
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फ़ा़टकचंद और झंडूलाल (भोपाल यात्रा - २)

१४ अगस्त, शुक्रवार,दोपहर ०२:२० बजे'लगभग' सही समय पर चली ट्रेन 'एकदम' सही समय पर भोपाल स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर दाखिल हुई. ड्राइवर ने इस यात्रा में अंतिम बार ब्रेक का उपयोग किया और रेलगाड़ी ने प्लेटफ़ॉर्म नम्बर एक पर अपना पड़ाव डाल दिया. इस बार घर से रवाना
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क्या घोस्ट बस्टर को "सूरमा भोपाली" सम्मान नहीं मिलना चाहिये?

ऊँ श्री फ़ुरसतियाय नमःगई जून में जब हफ़्ते भर की इन्दौर, उज्जैन और भोपाल की यात्रा से लौटे थे तो मनभर मंसूबे बांधे थे कि इस बार एक यात्रा विवरण लिखकर ब्लॉग पर चिपका ही देंगे. मगर जैसा कि हर उच्च कोटि के विचार के साथ होता आया है, क्रियान्वयन की राह में सतत
Aug 19 2009 07:59 PM
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गुनगुनी धूप में गुटरगूं - संचार क्रांति से हानि (और लाभ भी)

वीरू अब पानी की टंकी पर नहीं चढ़ते। शहर की लगभग हर चौथी इमारत की छत पर उग आये वैध - अवैध मोबाइल टॉवर बेहतर विकल्प बनकर उभरे हैं। संचार - क्रांति के प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर गर्व से तने हुए इन टॉवर्स ने चिट्ठी - पत्री को लगभग पूरी तरह चलन से बाहर कर ही दि
Jan 10 2009 12:57 PM
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मुसलमान नहीं, इस्लाम दोषी है.

डॉ. कोनराड एल्स्ट विश्व भर में अपनी तार्किकता और ज्ञान के लिए प्रसिद्धि पा चुके हैं. पूरी दुनिया के अनेक बड़े मंचों से वे अपने पेपर्स पढ़ते रहे हैं. भारतीय राजनीति और साम्प्रदायिक समस्या पर लिखी उनकी पुस्तकें बुद्धिजीवी हलकों में बहुत मकबूल हुई हैं औ
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मार्क्सवाद एक मृतप्रायः आपराधिक विचारधारा है

डॉ. कोनराड एल्स्ट (Dr. Koenraad Elst) का जन्म ७ अगस्त, १९५९ को ल्युवेन, बेल्जियम में एक फ्लेमिश (यानी डच स्पीकिंग बेल्जियन) केथोलिक परिवार में हुआ था. उन्होंने ल्युवेन की केथोलिक यूनिवर्सिटी से दर्शन शास्त्र, चाइनीज और इंडो-इरानियन स्टडी में स्नातक क
Oct 17 2008 11:12 PM
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शाबाशी दीजिये. आज मैंने तीन क़ानून तोडे.

पिछले पाँच दिन में दो बार रेलवे स्टेशन जाना हुआ और ट्रेनों की लेट लतीफी से दोनों ही बार दो घंटे से अधिक वहां खर्च हुए . स्मोकिंग बैन लागू होने के बाद किसी बड़े सार्वजनिक स्थल पर जाने का पहला मौका था तो मैंने ध्यान से परिसर का मुआयना किया और यह देखकर
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मैं जिंदगी से आँख चुराता चला गया, बस मौत को गले से लगाता चला गया.

कॉलेज का द्वितीय या शायद तृतीय वर्ष था. चार - पाँच मित्र एम् ई वान् वल्केन्बर्ग की नेटवर्क एनालसिस बुक की किसी समस्या में उलझे हुए थे. शर्त थी कि कौन पहले सही हल ढूंढ निकालता है. प्रश्न कुछ ज्यादा ही कठिन रहा होगा, इसलिए ब्रेन स्टोर्मिंग सेशन कुछ लंब
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तैयार रहिये अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों की बरसात के लिए

ब्लॉग जगत में टिप्पणियों की महत्ता से सभी परिचित हैं. एक ब्लॉगर के लिए पाठकों की (पढिये दूसरे ब्लॉगरों की, विशुद्ध पाठक कौन धरे हैं यहाँ?) टिप्पणियों का क्या महत्त्व है, ये किसी से छुपा नहीं है. कई लोग तो खुलकर स्वीकार करते हैं पोस्ट लिखने के तुरन्त
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कोई चुप कराओ इस दुष्ट को. ये हमारी दूकान उजाड़ देगा.

कोसी की बाढ़ की विनाशलीला देखी होगी आपने. हेलीकाप्टर से राहत सामग्री गिराई गयी. लोग दो-दो, तीन-तीन दिन से भूखे, आगे फ़िर कब सरकारी मदद आए, कुछ पता नहीं. ऐसे में जिसके हाथ जितना लग सके, झपट लो. पड़ोसी का ख्याल करोगे तो अपने घर-परिवार को कैसे संभालोगे?
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क्या क्या राज खोलती है आपकी ब्लॉगर प्रोफाइल?

कुछ लोग इस भ्रम में लगते हैं कि ब्लॉगर प्रोफाइल पर उनके जीमेल अकाउंट क्रियेशन की तारीख अंकित होती है. मैं इस भ्रम का कुछ निवारण करने की कोशिश करता हूँ. सबसे पहली बात तो ये समझ लिया जाए कि जीमेल अकाउंट और ब्लॉगर अकाउंट दो एकदम अलग चीजें हैं. केवल जीमे
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दुआओं में भी क्या कमाल का असर होता है. मान गए.

ताजा और मुख्य ख़बर ये है कि लोगों की दुआएं रंग लाईं और अनुराग अन्वेषी जी के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के लक्षण देखे गए. कल तक ज्ञानदत्त पाण्डेय जी पर अनर्गल आरोप लगा रहे अनुराग जी बाद में सिटपिटाते हुए अपने कहे से मुकरने का प्रयास करते पाये गए. लेकि
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अनुराग अन्वेषी जी का बेसुरा(ग) अन्वेषण

अनुराग जी , पिछली पोस्ट पर आपकी टिप्पणी का शुक्रिया. सचमुच बड़ा मजेदार रहा आपका कमेन्ट पढ़ना. ये देखना भी अच्छा लगा कि चलिए किसी ने तो कोरी भावनाओं में ना बहकर दिमाग से काम लेने की कोशिश की. लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि कुल मिलाकर आपके ब्लॉगि
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कौन लिख रहा है रख्शंदा के नाम से?

बौखलाहट बताती है कि दाल में कुछ काला जरूर है. आप बड़े जतन से एक फर्जी आइडेंटिटी रचते हैं. महीनों के कड़े परिश्रम से उसे लोकप्रिय बनाते हैं, लोग धीरे-धीरे आपके झांसे में आना शुरू होते हैं. और फ़िर एक दिन अचानक कहीं से आपकी हरकत का भंडाफोड़ हो जाता है. ब
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अभय जी, आतंकवादियों को हीरो साबित करना कहाँ तक सही है?

हिन्दी चिट्ठाजगत में शायद ही कोई हो जो ईस्वामी की विविध विषयों पर गहरी पकड़ और भाषा में विचारों की अद्भुत सम्प्रेक्षणीयता का कायल न हो. मेरी पिछली पोस्ट पर उनके कमेन्ट में भी यह गुण साफ़ झलकते हैं. लेकिन उनकी और श्री अशोक पाण्डेय जी की टिप्पणियां बताती
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क्या श्री अभय तिवारी एक प्रो-मुस्लिम प्रोपेगेंडिस्ट हैं?

मध्य पूर्व के इजराइल-अरब विवाद की थोड़ी सी भी जानकारी रखने वाले के लिए अभय जी के इस विषय पर लिखे ब्लॉग लेखों की स्तरहीनता को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है. ये लेख न सिर्फ़ पूरी तरह एकतरफा दृष्टिकोण से लिखे गए हैं बल्कि अपनी बात को सही साबित करने के लि
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कृष्ण चन्दर, अमृता प्रीतम, आलू और प्याज

पुस्तकों से अपना पुराना अनुराग रहा है. हालांकि अब कुछ तो समयाभाव और कुछ रुचियों के डायवर्सिफिकेशन के चलते पढ़ना काफ़ी कम हो गया है. एक समय था जब दिन भर में दो नॉवेल्स आसानी से निपटा डालते थे. और अब हाल ये कि दो हफ्ते में एक भी पूरा कर लें तो बड़ी
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वर्षा की रिमझिम फुहारों के बीच एक प्रेमी का विरह विलाप

विगत तीन चार वर्षों के अनुभव के आधार पर आशंका तो यही बनी थी कि इस बार भी इन्द्र देव ज्यादा मेहरबान होने वाले नहीं, मगर पिछले चार दिन से लगातार चल रही अप्रत्याशित बारिश ने मोर, मेंढक और (जाहिर है) मनुष्यों के लिए भी जश्न मनाने का एक बड़ा अवसर सुलभ क
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औडेसिटी से गीत हुआ आपका, हमेशा के लिए.

कई बार किसी वेब साईट पर या किसी ब्लॉग पर आपका कोई पसंदीदा गीत मिल जाता है, या कभी कोई गीत आप सुनते हैं और पसंद आता है। ऐसे में ये अखरता है कि गीत को आप उस वेबपेज या ब्लॉग पर तो सुन पाते हैं पर डाउनलोड लिंक उपलब्ध ना होने से अपने कंप्यूटर पर सेव नहीं
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एक पोस्ट में इतनी गालियाँ देखकर तो भडासी भी शर्मा जायेंगे फिर भी हम लिख रहे हैं तो इसके पीछे आख़िर कौन सी मजबूरी है?

सबसे पहले तो रचना जी का हार्दिक धन्यवाद जिनसे हमें ऐसा लंबा शीर्षक रचने की प्रेरणा मिली. ये भी बस एक प्रयोग भर ही है. परिणाम अगर संतोषजनक रहे तो आगे से कम से कम आधी पोस्ट शीर्षक में ही लिख देने पर भी विचार करेंगे. लोगों को सुविधा हो जायेगी. एग्रीगेटर
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हिन्दी ब्लॉगर से पंगा??? स्पेमर को सिखाया सही सबक.

लंबे समय से स्पेम कमेंट्स ब्लॉगर्स और टिप्पणीकारों को परेशान करते रहे हैं. आपने भी देखे होंगे, "सी हियर ऑर हियर" जैसे कमेंट्स या ५० डॉलर जैसे नाम मात्र के दाम में एक जोडा मोजे खरीदने का एक्सक्लूसिव
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भगवान कभी इनकी भी सुने.........मगर कैसे?

इंटरनेट दुनिया में विचरण करते समय अक्सर एक बात नोट की है। ब्लॉग्स पर, विशेषकर भारतीय ब्लॉग्स पर मेट्रीमोनियल एड प्रचुरता में दिखते हैं। इंश्योरेंस के साथ साथ सबसे ज्यादा दिखने वाले विज्ञापन यही हैं।
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अमिताभ बच्चन की एक कविता

सर्वप्रथम तो आप सभी स्नेहिजनों का हार्दिक धन्यवाद जो इस ब्लॉग को ऐसा स्वागत मिला. लेकिन साथ ही इतने लंबे अंतराल के लिए क्षमा प्रार्थना भी. पिछले तीन दिन से यात्रा में था. अवसर मिला था
May 11 2008 10:04 AM
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घोस्ट बस्टर का ब्लॉग

दो महीने पहले तक जानकारी नहीं थी कि हिन्दी में भी ब्लॉग्स जैसी कोई चीज होती है. दरअसल कंप्यूटर पर हिन्दी के फॉण्ट इंटरनेट एक्सप्लोरर के सिवाय किसी और ब्राउसर में सही से दिखते ही नहीं थे और इंटरनेट