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09 Jun 2010
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काम का भी कोई बहाना बना लो...

एक पुराना सेटायर...आबिदा परवीन की गाई एक गजल का शेर आज याद आ रहा है, 'मिलना चाहा तो किए तुमने बहाने क्या-क्या, अब किसी रोज न मिलने के बहाने आओ..। यकीन मानिए, बहानों का बहुत महत्व है। पीने वाले तो बहाने बनाने में महारत रखते हैं। पहले 'आज गम गलत करना है,
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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छलना...कब तक छलती रहोगी तुम...

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चण्डीदत्त शुक्ल
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`दहशत में दम नहीं, जो ठहरे सरगम के आगे'

सलमान अहमद1990 में सामने आए बैंड जुनून के कुछ साल पहले तक तीन करोड़ रिकॉड्र्स बिक चुके थे, ऎसे में कहना बेमानी होगा कि जुनून और सलमान बेहद मशहूर हैं, हर दिल अजीज हैं। कामयाबी, शोहरत, पैसा...दुनिया की हर खुशी से मालामाल सलमान ने अब दहशतगर्दी के खिलाफ
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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सयंमी होने का एकांतवास

.html-marquee {height:200px;width:400px;background-color:FF9933;font-family:Cursive;font-size:22pt;color:000066;font-weight:bold;border-width:4;border-style:dotted;border-color:3300CC;} क्यों झेल रहे तुमसंयमी होने का एकांतवास...प्रिय,क्या ना जानूं
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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फिर क्या बोलें, क्यों बोलें ये लब

.html-marquee {height:200px;width:400px;background-color:FF9933;font-family:Cursive;font-size:22pt;color:000066;font-weight:bold;border-width:4;border-style:dotted;border-color:3300CC;} बताना ही क्याकिपहली बारिश के बादकिस तरह मन का पोर-पोरसहलाती हैमाटी
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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एक कुटिल प्रेमी की आदर्श-व्याख्या

.html-marquee {height:200px;width:400px;background-color:FF9933;font-family:Cursive;font-size:22pt;color:000066;font-weight:bold;border-width:4;border-style:dotted;border-color:3300CC;} वो तुम्हारी निगाह से उतर गए...माना कि कुछ तो कमज़ोर थे,दृढ़ नहीं रह
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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पनीली आंखों के आगे खुशबूदार शाम

.html-marquee {height:200px;width:400px;background-color:FF9933;font-family:Cursive;font-size:22pt;color:000066;font-weight:bold;border-width:4;border-style:dotted;border-color:3300CC;} तुमने कहा क्या फायदा हुआ-इस साथ से?हम नहीं रह पाए पास...नहीं हो
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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नहीं बनना महान

मुझे नहीं बनना आदर्श पुरुष,या फिर देवता...नहीं चाहिए लेबलमहान होने कामैं बने रहना चाहता हूं...सारी दुर्बलताओं से ग्रस्तएक आम इंसान!जो बिना झिझक केआंख को जो अच्छा लगे,मन को जो शीतल कर दे...प्राणों को जो झंकृत कर दे...उसको बिना हिचक-अपना कह दे!ऐसी दिव्यता
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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क्रूर ये समय

प्रिय,आज हूं मैं  हिंस्रआक्रामक...उत्तेजितकिसी आदमखोर पशु सा उन्मत्त!ढूंढ रहा हूं घड़ी के आविष्कारक को...मिल जाए / तो / तोड़ दूं उसका सर...जब तुम अपने हाथ पर बंधी कलाई घड़ी देखते होमन करता हैजला दूं संसार की सारी घड़ियों कोजिन्होंने बांध रखी है
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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दिल्‍ली हिन्‍दी ब्‍लॉगर ‍ मिलन

इंटरनेशनल दिल्‍ली हिन्‍दी ब्‍लॉगर ‍मिलन, रविवार २३ मई को सांय 3 बजे से 6 तक...इसे व्‍यक्तिगत बुलावे की मान्‍यता प्रदान करें।यह सिर्फ सूचना है। जिसमें ब्‍लॉगर समुदाय के सभी सक्रिय, निष्क्रिय, टंकी धारक, बेटंकी ब्‍लॉगर सभी आमंत्रित हैं। पूर्ण विवरण के लिए
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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आत्मज्ञान तक पहुंच / समझा हूं / कि हूं / कन्फ्यूज़्ड

पिछली पोस्ट में कुछ कविताएं आपके लिए हाज़िर की थीं...वही सिलसिला जारी है...सुंदरता पर / निश्वास / छोड़ता हुआ भी / तन्मय कब तक रहता मैं?आदमखोर चरित्र को दरकिनार कर / सत्यवसन रहता मैं...नहीं झेल सकता मैं अब एक भी मुखौटे वाला चेहराउतार डाले सभी
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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बरसों पहले की कबिताई...

कई दिन हुए, चौराहा पर कविता जैसा कुछ नहीं लिखा...। आज कुछ पुराने काग़ज़ मिले...उनमें कबिताई जैसा कुछ दिखा...सोचा आपके लिए यहां उतार दूं...साल 1996-97 से लेकर 2000-01 के बीच  की ये कविताएं हैं संभवतः....लीजिए, एक के बाद एक...होते हैं कुछ और मायने भी
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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बहुत याद आएंगे सरोद के उस्ताद

अली अकबर खान चाहते  थे—राजस्थानी संगीत को मिले ऊंचाई सरोद आज ख़ामोश है। मन के तार छेड़ने वाले इस साज़ से आवाज़ आए भी तो कैसे...इसके बादशाह उस्ताद अली अकबर खान मौसिक़ी का संसार और ये फ़ानी दुनिया छोड़कर फ़ना हो गए हैं। अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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14 हसीनाएं, एक दीवाना... घुटने टेक रहा टाइगर

* बीवी  ने उतार कर रख दी शादी की अंगूठी* पति को जमकर पीटा, दांत तक तोड़ डाले* कार दुर्घटना को दिया अंजाम, पहुंचे अस्पताल* फिर सास को पड़ा दिल का दौरा...नहीं...ये किसी मध्यवर्गीय भारतीय पुरुष की दुख भरी कहानी नहीं है...। फिर कौन
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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मजदूर और मजबूर....मीडिया

दोस्तों,फोकस टेलिविजन में मेरे वरिष्ठ, हिंदी आउटपुट डेस्क के प्रमुख प्रमोद कुमार प्रवीण ने मज़दूर दिवस पर एक कविता लिखी। अभिव्यक्ति और प्रतीकों के लिहाज से अनूठी ये कविता इस मायने में भी उल्लेखनीय है कि मीडिया के मज़दूरों पर सधी हुई टिप्पणी भी यहां
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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सुकून के सुर...येसुदास

हज़ारों मील लंबे रास्ते, गांव, गलियारे, नुक्कड़, चौराहे, अलग-अलग लहजा, तरह-तरह की ज़ुबान...यही तो है अपना हिंदुस्तान...विविधता से भरपूर देश, यहां के लोग अलग, उनके संस्कार अलहदा, लेकिन कहीं का भी, किसी इलाक़े का बाशिंदा क्यों ना हो...जब वो चैन चाहता है,
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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फिर छिड़े बात किताबों की

(जयपुर के हिंदी अखबार डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हम लोग में प्रकाशित आलेख...चौराहा के पाठकों के लिए)प्रकाशकों और लेखकों के नज़रिए से मुद्रित किताबों का महत्व और डिजिटल पुस्तकों की चुनौतीपिछली सर्दियों की भोर याद आती है...एक सुबह, यही कोई साढ़े सात भर बजे
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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हर दिन होली...

हे ऐ ऐ ऐ ऐ ऐ....सररररारा सररररारा जोगीरा सररररारा सररररारा...खूब मचाओ धमाल...ना अंग की सुध रहे...ना कपड़ों की...चाहे जींस पहन रखी हो...चाहे बुशर्ट...टी-शर्ट हो या बरमूडा ही सही...आज तो बस गा लो जोगीरा...अरे भाई...होली है...होली है....बुरा ना मानो आज होली
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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फिर गूंजे चाहत संगीत

तुम मेरे लिए नहीं थे पड़ाव भरना ही किसी तृष्णा की तुष्टि का साध्यफिर क्योंकुंठाओं की धरती पर बलिदान हुआ हमारा प्रेमपूछता है मेरे प्रेम का ज़िद्दी राग, मुझसे ही जोर-जोर सेहृदय अब भी चाहता है...बना रहे रागपररात भर, मंद-मंद कर रिसता हैकानों मेंकुहुक नहीं,
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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Apr 25 2010 03:15 PM
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सरगम के समंदर में बहती मिठास

सरगम...इन चार अक्षरों में समाया है वैसा ही जादू, जैसा ढाई अक्षर वाले प्यार की नस-नस में बहता है। प्यार करो या संगीत सुनो...एक ही बात है...और संगीत से प्यार हो जाए, तब? फिर तो मज़ा ही कुछ और आता है। साज़ जगे और जाग गई ज़िंदगी...रग-रग में लहू बनकर तैरने
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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मक्खन-सी तुम्हारी याद

नीले-नीले बाल, संतरी रंग का चेहरा, पॉल्का डॉट्स से सजी फ्रॉक...ये लड़की कौन है? कुछ जानी-पहचानी सी है ना! याद आ गया या बता दूं? ये वही तो है—अमूल मक्खन के रैपर पर मुस्कराती, इठलाती किशोरी...जिसकी शक्ल देखते ही दिमाग में कहीं गूंजने लगती है ये
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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कर देना फिर मेरी चादर सिंदूरी

आज फिर खोलीजंग लगे ताले से बंधीपुरानी लोहे वाली संदूकभरभराकर ढहा वर्तमानकिस तरह कस रहा अतीतजैसे, फिर आईं तुम बांह में जकड़ने को भागी-भागी सी...लौटी भीगी-भीगी शामपहली-पहली बारिश की बूंदें लेकरउतराई आंख के सामने हर रात की तस्वीरझिलमिलाती हुई
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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अविनाश वाचस्पति रहे पुकार...कहां हो प्यारे टाटा जी

चौराहा पर पहली बार...किसी और की...(नहीं तो, ये अपने ही हैं...) अविनाश वाचस्पति जी की रचना.... --टाटा मोटर्स की इंडिका धोखे से पुराना मॉडल दे दिया गया : खरीदने से अब
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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काश...हम होते...उंगलियां एक हाथ की!

काश! तुम होतेगर्म चाय से लबालब कपहर लम्हा निकलती तुम्हारे अरमानों की भाप...दिल होता मिठास से भराकाश!मैं होतीतुम्हारी आंख पर चढ़ा चश्मा..सोचो, वो भाप बार-बार धुंधला देती तुम्हारी नज़रकाश! मैं होती रुमाल...और तुम पोंछते उससे आंख...हौले-से ठहर जाती पलक के
 
चण्डीदत्त शुक्ल
Feb 22 2010 06:25 PM
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वेलेंटाइन डे : मंटो के बहाने अनूठी मोहब्‍बत के चंद अफसाने

http://mohallalive.com/2010/02/14/valentine-day-special-writeup-by-chandidutt-shukla/ से साभार...कहते हैं, दिल की लगी क्या जाने ऊंच-नीच, रीत-रिवाज, घर-बिरादरी और लोक-लाज। फिर क्यों भला मोहब्बत के अफसाने सुनते-सुनाते वक्त भी किसी लड़की की निगाह लड़के
 
चण्डीदत्त शुक्ल
Feb 14 2010 09:18 PM
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अपने ही गर्भ में छिपा लो…सिखा दो…अभेद्य मंत्र

अनजाने चेहरों वाली / सीमाओं से पार / भाषाओं से इतर / कई तस्वीरें / देखीं / सुनीं / पहली-पहली बार / तुम्हारे ही संग / उनमें बसा प्रेम / उभरा तब तुम्हारी आंख से / छलका हमारे होंठों तक / आज फिर / गया उसी दौर में / पर अबूझ रह गए / वो चित्र / जड़ हैं नायक /
 
चण्डीदत्त शुक्ल
Feb 11 2010 08:23 PM
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हमारे प्रेम के विरुद्ध…हम…फिर भी ज़िंदा चाहत-संगीत

हर बार उभर आते हैंमेरे चेहरे परतुम्हारे प्रेम के निशानतबजब हम मिलते हैंसूरज मुस्कराता हैऔर, और तेज़ बहने लगती है नदीफर्राटा भर-भर हांफ उठती हैधरतीपर ये उन्माद नहीये सब करते हैंव्यंग्यहम परहम भी लगातार निचोड़ते रहेअपने-अपने हिस्से का
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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सूख गया गुलाब…अब और भी महकता है

तमाम गीत चुनकर मैंने रख लिए हैं/ उस गुलदस्ते में / जिसमें पहली-पहली बार / तुम्हारे जूड़े से निकालकर / लगा लिया था / लाल गुलाब / अब वो सूख गया है / पर महक़ अब तक है / वैसी की वैसी / जैसी थी नए-नकोर फूल में / और देखो / महकता ही जा रहा है / बिना मिलन के
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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पथभ्रष्ट कबूतरों की चोंच में दबे रह गए खत

जीन-बुशर्ट पहने लड़के-लड़कियां / जब-जब खटखटाते की-पैड / स्क्रीन पर उभरते कुछ हर्फ / 160 कैरेक्टर्स से / क्या बुनते थे वो / नहीं समझ पाया / मैं / जब तक नहीं आया था / तुम्हारा / एक औपचारिक लघु-संदेश / सुबह का सलाम पल्लू में बांधकर / अब जानता हूं / तकनीक के
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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ठंडी हथेली में मुस्कान की गुनगुनाहट

कलबहुत अरसे बादजब राह में धुंध गहरी हो रही थीऔर-और ज़्यादातब यकायकगाढ़ी राततब्दील हो गई ताज़ा सुबह में तुम फुसफुसाईंपागल हो?समझते ही नहींमैं तुमसे प्यार करती हूंठहर गई सांसथर्रा गया मैंपूरा का पूराअपने वज़ूद के साथ...तुम्हारी घृणातेज़ाब
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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क्लचर की जगह बांध लो...

पलकें खुलते ही / और सुर्ख हो जाते हैं / आंखों के डोरे / याद आती हैं सुबहें / तुम्हारी चाहतों के लाल रंग में रंगी हुई / पता नहीं, कहां से आती है / तुम्हारे हाथ की पकी रोटियों की सोंधी महक/ हर तरफ गूंजती है तुम्हारी हंसी की खनक / बार-बार / तुमने ही क्यों
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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फिर भी है तलाश

दर्द है / कितना? / कोई ना पूछे/ बयां करना मुश्किल है!पर यक़ीन मानो / हम दोनों मुस्कराएं / यही इतना इसका हल है!!है नफ़रत तुम्हें मेरे वज़ूद से / मैं डरता हूं अपनी खुदगर्जियों के सबूत से /फिर भी मिलते हैं हम / ढूंढते हैं एक-दूसरे को / मान भी लो, यही हमारे
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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तेरे लब कहां हैं, ओढ़ ले मेरी मुस्कान

मैंने दीं अश्कों से नम शामें  / तुमने खिलखिलाहटों से भरी सुबहें / मैं काला हुआ,  चीखता ही रहा  / तुम गुलाबी रहीं, कभी ना मद्धम हुईं / नादां था, हरदम भटकता रहा / अब जो तुम...नासाज़ हो---नाराज़ हो / पछता रहा हूं/ यकीन मानो / छीजता ही जा रहा
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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ब्लॉगिंग पर किताब...ब्योरा चाहिए

नए साल पर नई सूचना... हिंदी ब्लॉगिंग पर एक महत्वपूर्ण किताब का प्रकाशन हो रहा है. मार्च तक किताब प्रकाशित होने की पूरी संभावना है. पुस्तक में शामिल करने के लिए कृपया ये जानकारी मुहैया कराएं. ब्योरा कृपया मेरे ई-मेल chandiduttshukla@gmail.com पर भेजें.
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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देह की आज़ादी नहीं दिलाती हर पीड़ा से मुक्ति---नासिरा शर्मा

अफगानिस्तान की मजलूम औरतों के आंसुओं से लबरेज चेहरों पर उभरी दर्द की लकीरों और उनसे टपकते दुख को जब एक स्त्री ने ही अखबार के पन्नों पर रंगना शुरू किया तो पूरी दुनिया के नारीवादी एकबारगी सिहर उठे, इतना शोषण, ऐसा अत्याचार, अब तक सुना नहीं-देखना तो दूर
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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सेक्स की तलाश में नहीं रहती मेरे उपन्यासों की स्त्री : मैत्रेयी पुष्पा

मैं अपना टेप रिकार्डर खोलती हूं, इसमें उन सच्ची औरतों की आवाजें हैं, जो नि:शंक भाव से मानती हैं कि जरूरी नहीं, पति ही उनके बच्चों का पिता हो॥ ये पंक्तियां हैं मैत्रेयी पुष्पा के एक लेख की। उनके उपन्यासों की स्त्री इतनी बेबाक है कि समाज के ठेकेदारों क
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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बड़े भ्रम में होते हैं विवाद खड़ा करने वाले - प्रयाग शुक्ल

इस साक्षात्कार के साथ प्रकाशित चित्र श्री तनवीर फारूक़ी जी का खींचा हुआ है....इस पर उनका कॉपीराइट है...उनके ब्लॉग से ही ये चित्र साभार लिया गया है...) रोज बदल रही दुनिया में मैं एकांतवासी की भूमिका में हूं.. कहकर सहसा गंभीर हो गए उस शख्स को आप पलायनव
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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इंटरनेट पर सवार भोजपुरी

कुछ दिन पहले तक यह सोचना भी मुश्किल था कि लिट्टी-चोखा का जायका इंटरनेट के जरिए फिजी तक पहुंच सकेगा या फिर मॉरिशस में रहने वाले, 71 वर्षीय सौरव परमानंद वेबसाइट पर भोजपुरी का लेख पढ़ सकेंगे। हालांकि अब माहौल बदल चुका है। गंवई भाषा कही जाने वाली भोजपुरी
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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स्टील को बनाया सोना

विश्व की नंबर दो यूरोपीय इस्पात कंपनी आर्सेलर के रूस की नंबर-एक कंपनी सेवरस्ताल के साथ विलय की घोषणा के बावजूद स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल अपनी परियोजना को ताकतवर बताने में जुटे हैं। नाम और संपदा, दोनों के लिहाज से लक्ष्मी निवास बने मित्तल न केवल
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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योग्यता से पाई ऊंचाई

तेज-तर्रार, लेकिन नम्र हैं। खासे पढ़े-लिखे और नई पीढ़ी को बढ़ावा देने वाले, यानी महिंद्रा एंड महिंद्रा के मैनेजिंग डायरेक्टर आनंद महिंद्रा। हार्वर्ड सरीखे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से उन्होंने बिजनेस मैनेजमेंट और आ‌र्ट्स की डिग्री भी हासिल की है। 1981
 
चण्डीदत्त शुक्ल