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20 May 2010
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मेरा होना या न होना

मैं तभी भली थीजब नहीं था मालूम मुझेकि मेरे होने सेकुछ फर्क पड़ता है दुनिया कोकि मेरा होना, नहीं हैसिर्फ औरों के लिएअपने लिए भी है.मैं जी रही थीअपने कड़वे अतीत,कुछ सुन्दर यादों,कुछ लिजलिजे अनुभवों के साथचल रही थीसदियों से मेरे लिए बनायी गयी राह परबस चल
 
mukti
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सोचकर तो देखें

कभी सोचते हैं हमफाइव-स्टार होटलों मेंछप्पन-भोग खाने से पहलेकि कितने ही लोगएक जून रोटी के बगैरतड़प-तड़प के मरते हैं ।कभी सोचते हैं हमआलीशान मालों मेंकीमती कपड़े खरीदने से पहलेकि कितने बच्चे और बूढेफटे -चीथड़े लपेटेगर्मी में झुलसतेसर्दी में ठिठुरते हैं
 
mukti
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वो नहीं ’गुड़ियाघर’ की नोरा जैसी.

जब उसनेएक-एक करकेझुठला दियेउसके सभी आरोप,काट दिये उसके सारे तर्क,तो झुंझलाकर वह बोला,"औरतें कुतर्की होती हैंअपने ही तर्क गढ़ लेती हैंबुद्धि तो होती नहींकरती हैं अपने मन की"वो सोचने लगी,काश...वो बचपन से होतीऐसी ही कुतर्की...,गढ़ती अपने तर्कबनाती अपनी
 
mukti
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भूख से मरने वालों की खबर (2)

(पता नहीं ये आँकड़े कितने सच्चे हैं ? कितने झूठे ? पर बात इन आँकड़ों की सच्चाई की नहीं, इनसे पड़ने वाले असर की है. पता नहीं ये खबरें लोगों उद्वेलित करती हैं या नहीं, पर मुझे करती हैं.  24th फ़रवरी 2010,के Hindustaan Times के Delhi संस्करण में
 
mukti
Feb 25 2010 03:32 AM
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कौन सी भूख ज़्यादा बड़ी है???

प्रिय तुम्हारी बाहों मेंपाती हूँ मैं असीम सुख,भूल जाना चाहती हूँसारी दुनियावी बातों को,परेशानियों को,फिर क्यों ??याद आती है वो लड़कीचिन्दी-चिन्दी कपड़ों में लिपटीहाथ में अल्यूमिनियम का कटोरा लियेआ खड़ी हुई मेरे सामनेप्लेटफ़ार्म पर,मैंने हाथ में पकड़े
 
mukti
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Feb 21 2010 10:17 AM
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तुम्हारी मर्ज़ी

किसने कहा थाखोल दो खिड़कियाँ?अब बौछारें पड़ेंगीतो उनकी छींटेंभिगो देंगी घर के कोने,हवाएँ आयेंगींऔर फड़फड़ायेंगेडायरी के पन्ने,कुछ तिनके, कुछ धूल,कुछ सूखे पत्ते,डाल से टूटकर आ जायेंगेहवाओं के साथ अनचाहे ही,ताज़ी हवा और रोशनी के लियेये सब तोसहना ही
 
mukti
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Feb 12 2010 12:28 AM
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अनछुई कली

जनवरी में मेरे इस ब्लॉग को एक वर्ष पूरे हो गये हैं. मेरे लिये सबसे अच्छी बात यह रही कि इस बीच बहुत से सुधीजनों से परिचय हुआ, अनेक लोगों से प्यार और स्नेह मिला. मुझे लगा जैसे ब्लॉगजगत मेरा एक परिवार बन गया हो, हालांकि अभी मुझे कम लोग ही जानते हैं, पर फिर
 
mukti
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अम्मा के सपने

मेरी अम्माबुनती थी सपनेकाश और बल्ले से,कुरुई, सिकहुलीऔर पिटारी के रूप में,रंग-बिरंगे सपने...अपनी बेटियों की शादी के,कभी चादरों और मेजपोशों परकाढ़ती थी, गुड़हल के फूल,और क्रोशिया सेबनाती थी झालरेंहमारे दहेज के लिये,खुद काट देती थीलंबी सर्दियाँएक शाल के
 
mukti
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बेटी

उसके होने से हीपावन है घर-आँगन,उसकी चंचल चितवनमोह लेती हम सबका मन,वो रूठतीतो रुक जाते हैंघर के काम सभी,वो हँसतीतो झर उठते हैंहरसिंगार के फूल,महक उठता हैघर का कोना-कोना,जाने कैसे हैं वे लोगजो बेटियों कोजन्मने ही नहीं देतेहम तो सह नहीं सकतेअपनी
 
mukti
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आज़ादी का मतलब

कौन है क़ैद?कौन आज़ाद?कैसे तय करें?कुछ बन्धनजिन्हें हमसमझते हैं क़ैदउनसे आज़ाद होकरपाते हैं खुद कोठगा सा,फिर तड़पते हैंवापसउन्हीं बन्धनों मेंबँधने के लिये,रह जाते हैं हमइस मकड़जाल मेंउलझकर,हमेंआज़ादी का मतलबसमझना ही होगा.
 
mukti
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नमन

जिसने मुझेउँगली पकड़करचलना नहीं सिखायाकहा कि खुद चलोगिरो तो खुद उठो,जिसने राह नहीं दिखाई मुझेकहा कि चलती रहोराह बनती जायेगी,जिसने नहीं डाँटा कभीमेरी ग़लती परलेकिन किया मजबूरसोचने के लियेकि मैंने ग़लत किया,जिसने कभी नहीं फेरामेरे सिर पर हाथदुलार सेपर
 
mukti
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विश्वास

जब-जब तुमने कहा"तुम मेरी हो"मुझे लगामैं चीज़ हूँ कोईजब-जब तुमने कहा"मैं तुम्हारा हूँ"मैंने महसूस कियाएहसान कर रहे हो तुमऔर जब तुमने कहा"हम बने हैं एक-दूजे के लिये"मुझे ये प्यार नहींव्यापार लगाइतने बरस बाद भीमुझे तुम्हारे प्यार परविश्वास क्यों नहीं?
 
mukti
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बचकाना सा एक सपना

मेरा एक सपना हैकि मैं दिल्ली कीरिंग रोड कोदेख सकूँ रात कोकैसी लगती हैंबंद दुकानें और रेस्टोरेंटखाली सड़केंबिना ट्रैफिक की,बैठ जाऊँ मैंसड़क के डिवाइडर परऔर लिखूँएक कविता,मेरा यह सपनाबचकाना लग सकता हैपर इसे पूरा होने मेंलग सकते हैं वर्षोंजब एक अकेली
 
mukti
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पूर्ण समर्पण

प्रिय, तुमने कहा था मुझसेकि तुम मुझकोपाना चाहते होपूरी तरह सेतब मैंतुम्हारे "पूरी तरह से" कामतलब नहीं समझ पायी थीअब जान गयी हूँमैं तैयार हूँकर दूँगी मैंपूर्ण समर्पणदे दूँगी तुमको ये तनइसमें क्या रखा हैकर सकती हूँतुम पर अर्पणसौ-सौ जीवनक्योंकि मैंनेतुमको
 
mukti
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चुप्पी

हम तब भी नहीं बोले थेजब एक टीचर नेबुलाया था उसे स्टाफ़रूम मेंअकेलेऔर कुत्सित मानसिकता सेसहलायी थी उसकी पीठडरी-सहमी वहरोती रहीसिसकती रही...हम तब भी नहीं बोलेजब बीच युनिवर्सिटी मेंखींचा गया थाउसका दुपट्टाऔर वहहाथों से सीने को ढँकेलौटी हॉस्टलफिर वापस
 
mukti
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एक छोटे शहर की लड़की (२)

रिक्शे पर बैठी जो हमेशा सखियों के साथ बस की भीड़ में आज धक्के खाती है, शाम को कमरे पर आकर एक-एक पैसे का हिसाब लगाती है, पढाई भी करती है काम पर भी जाती है, परम्परा और आधुनिकता में मेल बैठाती है महानगर की लड़कियों से अलग नज़र आती है एक छोटे शहर की लड़क
 
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एक छोटा सा घर

चाह है एक छोटे से घर की जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो ताकि हवाएँ बिना रोक-टोक इधर से उधर जा सकें
 
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सृजन के बीज

नये साल की पूर्व संध्या पर वर्ष की अन्तिम पोस्ट ) तुझमें जो आग है उस आग को तू जलने दे अपने सीने में उसे धीरे-धीरे पलने दे... भभक कर जलेगी तो राख बन जायेगी धुयें के साथ यूँ ही आप से सुलगने दे... उस पर आँसू न बहा अश्क के छींटे मत दे न अपने दिल को इस आग
 
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अस्तित्व

मैं सोई थी मीठे सपनों में खोई थी उस गहरी नींद से जगा दिया मैंने अपने अस्तित्व को तुममें मिला दिया था तुमने ठोकर लगाकर मुझे मेरे अस्तित्व का एहसास करा दिया.
 
mukti
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तुम्हारा आना

एक सच्चा प्यार किस तरह से किसी के अन्दर पूरी इन्सानियत के प्रति आस्था पैदा कर देता है...इस बात को व्यक्त करती सात साल पहले लिखी एक कविता...) तुम्हारा आना मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे आने से कुछ बदल गया है बदल गये हैं गीतों के मायने वो मन की गहराइयों तक
 
mukti
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पर... ... माँ

ग़लती करती तो डाँट खाती दीदी से भी और बाबूजी से भी सब सह लेती पर सह न पाती माँ तुम्हारा एक बार गुस्से से आँखें तरेरना .......................... कई तरह की सज़ाएँ पायीं मार भी खायी कई बार पर नहीं भूलती माँ तुम्हारी वो अनोखी सज़ा कुछ भी न कहना सभी काम
 
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सन्नाटा

चारों तरफ़ सन्नाटा है हालाँकि शोरगुल भी है नारे भी हैं चीखती-चिल्लाती आवाज़ें भी हैं फिर भी सन्नाटा है इसलिये कि आवाज़ें नहीं उठतीं सबके लिये उठती हैं सिर्फ़ अपने लिये, इसलिये कि कोई आवाज़ नहीं उठती उनके खिलाफ़ जिन्होंने खरीद लिया है सभी की आवाज़ों क
 
mukti
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एक नारी की कविता

मेरी कविता सायास नहीं बनायी जाती भर जाता है जब मन का प्याला लबालब भावों और विचारों से तो निकल पड़ती है अनायास यूँ ही पानी के कुदरती सोते की तरह और मैं रहने देती हूँ उसे वैसे ही बिना काटे बिना छाँटे मेरी कविता अनगढ़ है गाँव की पगडंडी के किनारे पड़े अन
 
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हीरा

अपने बाबूजी की थी मैं अनगढ़ हीरा सँवारा , तराशा बनाया मुझे , बनाकर मुझको एक अनमोल हीरा अपनी ही चमक से चमकाया मुझे , अपने माँ की थी मैं जिद्दी बिटिया डाँटा-डपटा , समझाया मुझे , दुनियादारी की बातें बताकर रानी बिटिया बनाया मुझे , जब बड़ी हुयी तो बड़े जत
 
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औरत पागल होती है (emotional fool)

तुमने नहीं किया वादा ज़िन्दगी भर साथ निभाने का फिर भी उसने तुम्हारा साथ दिया, प्यार करता हूँ ये भी नहीं कहा तुमने पर उसने शिद्दत से तुम्हें प्यार किया तुमने नहीं कहा लौट के आने के लिये तब भी उसने इन्तज़ार किया मिल गया तुम्हें कोई और साथी पर उसे तुमसे
 
mukti
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मेरी बच्ची

तुझे दूँगी वो सारी खुशियाँ जो मुझे नहीं मिलीं तेरी ज़िन्दगी को ऐसे मैं संवारुँगी तुझे रखूँगी पलकों की छाँव में ग़म की हर धूप से बचा लूँगी कैसे बचाउँगी शैतानों की नज़रों से तुझे अभी से सोचकर डर लगता है कि मेरी ही तरह तुझे भी जाने क्या-क्या सहना होगा प
 
mukti
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एक प्रौढ़ लड़की

रिसता है कुछ दिल से आँखों के रास्ते मन के ज़ख्मों के टाँके टूट गये हैं शायद, बड़ी मुश्किल से सुखाती हूँ इन्हें फिर कोई पूछ ही लेता है घर के बारे में माँ-पिता के बारे में अजूबा सा लगता होगा एक प्रौढ़ लड़की बिना अभिभावक के अकेले कैसे काटती है ज़िंदगी,
 
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अधूरापन

कभी भावनाओं को शब्द नहीं मिलते हैं कभी शब्दों में भाव नहीं आ पाता है, कभी खुशी में दिल उदास होता है कभी-कभी ग़म में भी आराम आ जाता है क्या हुआ? हर बात अधूरी-सी क्यों लगती है ज़िन्दगी इतनी उजड़ी उजड़ी-सी क्यों लगती है?
 
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राहत

जो हुआ अच्छा हुआ कुछ राज़ सामने आ गए अच्छे-भले लोग भी अपना चेहरा दिखा गए भ्रम में जीने से फुर्सत मिली सच जानकर राहत मिली
 
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तेरा प्यार

तेरा प्यार बहुत कुछ थामेरे लियेपर सब कुछ नहीं,और भी बहुत कुछ हैदर्द है, तन्हाई है,सूनापन हैऔर अन्धेरा भी,बेशक चले जाओ तुमपर तुम्हारी याद हैइतना सब कुछ हैदुनिया मेंमेरे लिये
 
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बादल के टुकड़े

मुट्ठी मेंआकाश पकड़ना चाहा थाकुछ बादल के टुकड़ेमेरे हाथ लगेहम अम्बर को देखतरसते रहते हैंये बादल दिन-रातबरसते रहते हैं
 
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टूटे सपने

टूटे सपनों की किरचेंबिखरी हैंमन की फ़र्श परबटोरो तो चुभती हैंहाथों मेंना देखोतो पैरों मेंदेखो तोआँखों मेंइस कश्मकश केपार उतार देकोई मेरे टूटे सपनों कीकिरचें बुहार दे
 
mukti
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Sep 20 2009 10:56 PM
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घर

शाम ढलते हीपंछी लौटते हैं अपने नीड़लोग अपने घरों कोबसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़पर वो क्या करें जिनका घर हर साल ही बसता-उजड़ता हैयमुना की बाढ़ के साथ
 
mukti
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सूखे फूलों को मत फेंको

सूखे फूलों को मत फेंकोहो सकता है इनमें से हीबीज कोई धरती पर गिरकर मिट्टी-पानी से मिलजुलकरकिसलय एक नया बन जायेतरह-तरह के फूल खिलायेसूने उपवन को महकायेखत्म नहीं होती मिटकर भीबीजों की ताकत को देखोसूखे फूलों को मत फेंको
 
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ज़िन्दगी फिर से

चारों ओर फैली है धुँध सी फ़ीका चाँद, चाँदनी धुँधलीज़िन्दगी के रंग धुल गये सारेदुःखों की बदली में छुप गये तारे,टूटे-फूटे अरमानों की राख बटोरकरउम्मीदों की चिंगारी को ढूँढ़करहौसलों की आग जला ली जाये,आओ!ज़िंदगी फिर से जी ली जाये.
 
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feminist poems

अबकी सावन मेंनहीं आयी हथेलियों सेमेहंदी की खुशबूनहीं बरसे बादलझूले नहीं पड़े पेड़ों परअबकी सावन मेंनहीं जा सकी घररोजी-रोटी के चक्कर में
 
mukti
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महानगर

मन घबराता है, समझ में नहीं आता कहाँ जायें ? महानगर के आकाश में चाँद भी साफ नहीं दिखता, जिसे देखकर कोई कविता लिखी जाये.
 
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एक छोटे शहर की लड़की (१)

एक छोटे शहर की लड़की आँखों में हज़ारों सपने लिए आती है महानगर में, अकेली लड़ती है अपने अस्तित्व को मिटने से बचाने के लिए, एक पहचान हो उसकी भी बस इतना चाहती है, और इसके लिए रोज़ एक नया गुर सीखती जाती है।
 
mukti
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एक छोटा सा घर

चाह है एक छोटे से घर की जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो ताकि हवाएँ बिना रोक-टोक इधर से उधर जा सकें
 
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पहचान

इस भीड़ में चेहरे हैं बहुत पर कोई पहचाना चेहरा नहीं मिलता. चेहरों के पीछे चेहरें हैं और उसके भी पीछे चेहरे अपनों के बीच भी कोई अपना नहीं मिलता. क्यूँ अपनी पहचान को छिपाते हैं यहाँ लोग जो जहाँ जैसा है क्यूँ वैसा नहीं मिलता.
 
mukti