"हे प्रभु यह तेरापन्थ"

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23 May 2010
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आचार्य महाश्रमण का पदाभिषेक क़ी गूंज पुरे ब्रह्माण्ड में

सरदारशहर के गांघी विद्या मन्दिर स्थित इंजनियरिंग कोलेज मैदान में आज सुबह ८:३० तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारवे आचार्य के रूप में आचार्य श्री महाश्रमण का विधिवत आचार्यपट पर अभिषेक हुआ!. सम्पूर्ण धर्म संघ कि ओर से मुनि
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आचार्य श्री महाप्रज्ञा क़ी आध्याधिमिक यात्रा

90 वर्षीय महाप्रज्ञ के अंतिम दर्शन करने के लिए देशभर से बड़ी संख्या में उनके अनुयायी सरदार शहर पहुंचे। उनकी अंतिम यात्रा में करीब तीन घंटे का समय लगा। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री डा. सीपी
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आचार्य महाप्रज्ञा जी कि यादे

Acharya Mahapragya's Ahimsa Yatra Delhi entryAcharya Mahapragya morning walk
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एक युग कि समाप्ति : परम श्रेद्धय गुरुदेव आचार्य महाप्रज्ञजी का महाप्रयाण

तेरापंथ जैन घर्म संघ के दशम आचार्य श्री  महाप्रज्ञजी का राजस्थान के एक कस्बे सरदारशहर में  आज दोपहर २ बजकर ५२ मिनट पर महाप्रयाण हो गया .. यह दुखद खबर सुनकर पूरा देश विस्मित है...आचार्य श्री महाप्रग्य के देवलोक होने के समाचार हवा से भी तेज गति
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जैन साहित्य इतिहास -25

अब तक आपने पढ़ा ...... ३-स्थानांग (ठाणांग) -यह श्रुतांग दस अध्ययनों में विभाजित है, और उसमें सूत्रों की संख्या एक हजार से ऊपर है। इसकी रचना पूर्वोक्त दो श्रुतांगों से भिन्न प्रकार की है। यहां प्रत्येक अध्ययन में जैन सिद्धान्तानुसार वस्तु-संख्या गिनाई गई
 
SELECTION & COLLECTION SELECTION & COLLECT
May 06 2010 01:29 AM
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जैन साहित्य:प्राचीन इतिहास-24

गतांक से आगे ......अर्धमागधी जैनागम(श्रुतांग-११)१. आचारांग (आयारंग) - इस ग्रन्थ में अपने नामानुसार मुनि-आचार का वर्णन किया गया है। इसके दो श्रुतस्कंध हैं। प्रत्येक श्रुतस्कंध अध्ययनों में और प्रत्येक अध्ययन उद्देशकों या चूलिकाओं में विभाजित है। इस प्रकार
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मुझे यह गीतिकाए बहुत ही प्रिय लगती है

भक्ति गीतों कों सुनने के लिए हम सभी आतुर रहते है. मुझे यह गीतिकाए बहुत ही प्रिय लगती है. जिसमे जैन तेरापंथ धर्म संघ के आघप्रवतक प्रथम आचार्य भिक्षु स्वामी कों सम्बोधित है. इन्ह गीतों कों भक्ति भावनापूर्ण आवाज एवं संगीत देने वाले मेरे मित्र एवं जाने माने
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जैन चिठाकारो का एग्रीगेटर वास्तव में बहुत ही उपयोगी लग रहा है.

जैन चिठाकारो का एग्रीगेटर वास्तव में बहुत ही उपयोगी लग रहा है. . हम सभी देश विदेश में बसे जैन ब्लॉगरो से एक ही साथ रूबरू हो पाते है उनके लेखन कों पढ़कर  ... शायद इससे आगे भी हमे जैन ब्लोगरो के अंतरराष्ट्र्य बैठको एवं सम्मेलनों कों
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जैन साहित्य:प्राचीन इतिहास-23

अंग-प्रविष्ट व अंग-बाह्य साहित्य -दिग. परम्परानुसार महावीर द्वारा उपदिष्ट साहित्य की ग्रन्थ-रचना उनके शिष्यों द्वारा दो भागों में की गई - एक अंग-प्रविष्ट और दूसरा अंग-बाह्य। अंग-प्रविष्ट के आचारांग आदि ठीक वे ही द्वादश ग्रन्थ थे, जिनका क्रमशः लोप माना
Apr 04 2010 08:18 AM
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जैन साहित्य:प्राचीन इतिहास-22

गातांक से आगे....जैनधर्म मूलतः आध्यात्मिक है, और उसका आदितः सम्बन्ध कोशल, काशी, विदेह आदि पूर्वीय प्रदेशों के क्षत्रियवंशी राजाओं से पाया जाता है। इसी पूर्वी प्रदेश में जैनियों के अधिकांश तीर्थंकरों ने जन्म लिया, तपस्या की, ज्ञान प्राप्त किया और अपने
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क्यों पहले अवतार लिया ?

आचार्य महाप्रज्ञभगवान महावीर की जन्म जयन्ती के अवसर पर मैंने गीत लिखा। उसकी प्रथम पंक्ति है - जिसकी आज जरुरत उसने क्यो पहले अवतार लिया।'' आज युग को महावीर की जरुरत है। कभी व्यक्ति जरुरत पैदा करता है, कभी युग को व्यक्ति की जरुरत होती है। महावीर की आज
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महावीर जयंती विशेष:: भगवान महावीर का सन्देश

विश्व कों अंहिसा का पाठ पढानेवाले भगवान महावीर ने सत्य कि खोज में राजमार्ग कों त्यागकर कांटो भरा पथ  अपनाया. एवं स्वय के द्वारा जिए गे सत्य कों नई परिभाषा दी , जब मानव समाज विषमता और हिंसा के चक्रव्यू में फंसा हुआ था, ऐसे कठिन समय में
टैग: जयंती
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क्या आप जैन ब्लोगर है ? तो साइनअप करे.

आदरणीय जैन ब्लोगर मित्रो !सादर जय जिनेन्द्र !मैंने लेखन का वह दोर भी देखा है तब कलम को स्याही के दवात में डुबोकर लेखक लिखता था, और उस दोर के पाठक  साहित्य को सफ़ेद या मटिया रंग से उस पर कवर चढाकर संजो के रखते थे और पढ़ते  थे. युग
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इंसानियत गढती है स्त्री...किन्तु

हमे महिला और पुरुष में कोई मतभेद नही करना चाहिए, वे सिर्फ शारीरिक रूप  से अलग है. बापूजी कि बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है जितनी पहले थी. आज भी हमारे समाज में महिलाए कई तरह के भेदवाव का शिकार होती है. मै बापू के विचारों कों एवं उनके अर्थो
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क्या आप मेरी होली कि प्यारी सूची में है ? बोलो- ब्लोगर बंघुओ " ओल इज वेल"

कल होलिका दहन था और आज घुलेटी है. रंगो का यह त्यौहार मन कों सुकून प्रदान करने वाले है. लाल, गुलाबी, पिला, नीला इन्द्रधनुषी रंगो में मानो सारा संसार डूब गया है . विभिन्न रंग हमारे जीवन में प्रेम, उमंग , भाईचारे कों बढाते है. आपसी गिला सिकवो कों त्याग कर
Mar 01 2010 04:11 PM
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जैन:प्राचीन इतिहास-21

गातांक से आगे....जैन संघ में उत्तरकालीन पंथभेद -जैन संघ में जो भेदोपभेद, सम्प्रदाय व गण गच्छादि रूप से, समय समय पर उत्पन्न हुए, उनका कुछ वर्णन ऊपर किया जा चुका है। किन्तु उनसे जैन मान्यताओं व मुनि आचार में कोई विशेष परिवर्त्तन हुए हों, ऐसा प्रतीत नहीं
Feb 28 2010 05:17 AM
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जैन-धर्म का सार भी निकले :: सन्त विनोबाजी

"जैन धर्म ग्रन्थ" एक अहम दस्तेवाज के रूप में अकिंत हो चुका है.जैन-धर्म-सार ग्रन्थ के आरम्भ में सन्त विनोबाजी ने अपने निवेदन में कहा है कि सर्व-धर्म-समन्वय और दिलों को जोड़ने की दृष्टि से उन्होंने धम्मपद नवसंहिता तैयार की, ऋग्वेद-सार, मनु-शासनम्,
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तेरस ऱी है रात ऑडियो सी डी

तेरापंथ प्रथम आचार्य भिक्षु स्वामी (सी. टी.यू.प़ी मुंबई के सदस्य भिक्षु समाधि सिरायारी (राजस्थान) दर्शन करते हुए )तेरस ऱी है रात उपरोक्त ऑडियो सी डी हमारी सस्था सी. टी यू प़ी मुंबई ने प्रसारित की है. युवा गीतकार कम्पोजर गायक रवि जैन गोतम जैन कमल छाजेड
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जैन:प्राचीन इतिहास-20

गतांक से आगे.......गुजरात-काटियाबाड़ में जैनधर्म -ई. सन् की प्रथम शताब्दी के लगभग काठियाबाड़ में भी एक जैन केन्द्र सुप्रतिष्ठित हुआ पाया जाता है। षट्खंडागम सूत्रों की रचना का जो इतिहास उसके टीकाकार वीरसेनाचार्य ने दिया है, उसके अनुसार वीर निर्वाण से ६८३
Feb 17 2010 07:56 AM
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जैन:प्राचीन इतिहास-19

गातांक से आगे....चालुक्य और होयसल राजवंश -चालुक्य नरेश पुलकेशी (द्वि.) के समय में जैन कवि रविकीर्ति ने ऐहोल में मेघुति मन्दिर बनवाया और वह शिलालेख लिखा जो अपनी ऐतिहासिकता तथा संस्कृत काव्यकला की दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है। उसमें कहा गया है कि
Feb 16 2010 11:59 AM
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जैन:प्राचीन इतिहास-18

गातांक से आगे....           कदम्ब राजवंश - कदम्बवंशी अविनीत महाराज के दानपत्र में उल्लेख है कि उन्होंने देसीगण, कुन्दकुन्दान्वय के चन्द्रनंदि भट्टारक को जैनमंदिर के लिये एक गांव का दान दिया। यह दानपत्र शक
Feb 15 2010 03:31 PM
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जैन:प्राचीन इतिहास-17

गतांक से आगे ......दक्षिण भारत व लंका में जैन धर्म तथा राजवंशों से संबंध -एक जैन परम्परानुसार मौर्यकाल में जैनमुनि भद्रबाहु ने चन्द्रगुप्त सम्राट् को प्रभावित किया था और वे राज्य त्याग कर, उन मुनिराज के साथ दक्षिण को गए थे। मैसूर प्रान्त के अन्तर्गत
Feb 11 2010 06:44 PM
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जैन:प्राचीन इतिहास-16

गातांक से आगे.... पूर्व व उत्तर भारत में धार्मिक प्रसार का इतिहास -महावीर ने स्वयं विहार करके तो अपना उपदेश विशेष रूप से मगध, विदेह अंग, बंग, आदि पूर्व के देशों, तथा पश्चिम की ओर कोशल व काशी प्रदेश में ही फैलाया था, एवं तत्कालीन मगधराज श्रेणिक बिंबसार व
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जैन:प्राचीन इतिहास-15

गातांक से आगे....दिगम्बर आम्नाय में गणभेद -दिगम्बर मान्यतानुसार महावीर निर्वाण के पश्चात् ६८३ वर्ष की आचार्य परम्परा का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। कहा गया है कि तत्पश्चात् किसी समय अर्हद्बलि आचार्य हुए। उन्होंने पंचवर्षीय युगप्रतिक्रमण के समय एक विशाल
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जैन:प्राचीन इतिहास-14

गातांक से आगे....सात निन्हव व दिगम्बर-श्वेताम्बर सम्प्रदाय -ऊपर जिन गणों कुलों व शाखाओं का उल्लेख हुआ है, उनमें कोई विशेष सिद्धान्त-भेद नहीं पाया जाता। सिद्धान्त-भेद की अपेक्षा से हुए सात निन्हवों का उल्लेख पाया जाता है। पहला निन्हव महावीर के जीवन काल
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जैन:प्राचीन इतिहास-13

गतांक से आगे.....प्राचीन ऐतिहासिक कालगणना -कल्पसूत्र स्थविराबली में उक्त आचार्य परम्परा के संबंध में काल का निर्देश नहीं पाया जाता। किन्तु धर्मघोषसूरि कृत दुषमकाल-श्रमणसंघ-स्तव नामक प्राकृत पट्टावली की अवचूरि में कुछ महत्त्वपूर्ण कालसंबंधी निर्देश पाये
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जैन:प्राचीन इतिहास-12

गतांक आगे ...........श्वेताम्बर सम्प्रदाय के गणभेद -जैन संघ संबंधी श्वेताम्बर परंपरा का प्राचीनतम उल्लेख कल्पसूत्र अन्तर्गत स्थविरावली में पाया जाता है। इसके अनुसार श्रमण भगवान महावीर के ग्यारह गणधर थे।इन्द्रभूति गौतम आदि ग्यारहों गणधरों द्वारा पढ़ाए
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जैन:प्राचीन इतिहास-11

गतांक से आगे....गौतम-केशी-संवाद -महावीर निर्वाण के पश्चात् जैन संघ के नायकत्व का भार क्रमशः उनके तीन शिष्यों-गौतम, सुधर्म और जंबू ने संभाला। इनका काल क्रमशः १२, १२, व ३८ वर्ष = ६२ वर्ष पाया जाता है। यहां तक आचार्य परंपरा में कोई भेद नहीं पाया जाता। इससे
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जैन:प्राचीन इतिहास-10

गतांक से आगे........महावीर की संघ-व्यवस्था और उपदेश -महावीर भगवान् ने अपने अनुयायियों को चार भागों में विभाजित किया-मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका। प्रथम दो वर्ग गृहत्यागी परिव्राजकों के थे और अन्तिम दो गृहस्थों के। यही उनका चतुर्विध-संघ कहलाया।
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जैन:प्राचीन इतिहास-9

गातांक से आगे...तीर्थंकर वर्धमान महावीर -अन्तिम जैन तीर्थंकर भगवान महावीर के माता-पिता तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की सम्प्रदाय के अनुयायी थे-ऐसा जैन आगम (आचारांग ३, भावचूलिका ३, सूत्र ४०१) में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह भी कहा गया है कि उन्होंने
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जैन:प्राचीन इतिहास-8

गातांक से आगे....तीर्थंकर पार्श्वनाथ -तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म बनारस के राजा अश्वसेन और उनकी रानी वर्मला (वामा) देवी से हुआ था। उन्होंने तीस वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर सम्मेदशिखर पर्वत पर तपस्या की। यह पर्वत आजतक भी पारसनाथ पर्वत नाम से
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जैन:प्राचीन इतिहास-7

गातांक से आगे..............तीर्थंकर नेमी नाथ वेदकालीन आदि तीर्थंकर ऋषभनाथ के पश्चात् जैन पुराण परम्परा में जो अन्य तेईस तीर्थंकरों के नाम या जीवन-वृत्त मिलते हैं, उनमें बहुतों के तुलनात्मक अध्ययन के साधनों का अभाव है। तथापि अंतिम चार तीर्थंकरों की
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जैन:प्राचीन इतिहास-6

गतांक से आगे.....वैदिक साहित्य के यति और व्रात्य -ऋग्वेद में मुनियों के अतिरिक्त' यतियों का भी उल्लेख बहुतायत से आया है। ये यति भी ब्राह्मण परम्परा के न होकर श्रमण-परम्परा के ही साधु सिद्ध होते हैं, जिनके लिये यह संज्ञा समस्त जैन साहित्य में उपयुक्त होते
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जैन:प्राचीन इतिहास-5

गातांक से आगे............केशी और ऋषभ के एक ही पुरुषवाची होने के उक्त प्रकार अनुमान करने के पश्चात् हठात् मेरी दृष्टि ऋग्वेद की एक ऐसी ऋचा पर पड़ गई जिसमें वृषभ और केशी का साथ साथ उल्लेख आया है। वह ऋचा इस प्रकार है :-ककर्दवे वृषभो युक्त आसीद्अवावचीत्
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जैन:प्राचीन इतिहास-4

गतांक से आगे........ऋग्वेद की वातरशना मुनियों के संबंध की ऋचाओं में उन मुनियों की साधनायें ध्यान देने योग्य हैं। एक सूक्त की कुछ ऋचायें देखिये-मुनयो वातरशनाः पिशंगा वसते मला।वातस्यानु ध्राजिं यन्ति यद्देवासो अविक्षत ।।उन्मदिता मौनेयेन वाताँ आतस्थिमा
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जैन:प्राचीन इतिहास-3

गातांक से आगे..............भागवतपुराण में कहा गया है कि-"बर्हिषि तस्मिन्नेव विष्णुदत्त भगवान् परमर्षिभिः प्रसादितो नाभेः प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मेरुदेव्यां धर्मान् दर्शयितुकामो बातरशनानां श्रमणानाम् ऋषीणाम् ऊर्ध्वमन्थिनां शुक्लया तन्वावततार।" (भा. पु.
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जैन:प्राचीन इतिहास-2

गतातांक से आगे............चौदह कुलकरों के पश्चात् जिन महापुरुषों ने कर्मभूमि की सम्यता के युग में धर्मोपदेश व अपने चारित्र द्वारा अच्छे बुरे का भेद सिखाया, ऐसे त्रेसठ महापुरुष हुए, जो शलाका पुरुष अर्थात् विशेष गणनीय पुरुष माने गये हैं, और उन्हीं का
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जैन:प्राचीन इतिहास

प्राचीन इतिहास -जैन पुराणों में भारतवर्ष का इतिहास उसके भौगोलिक वर्णन के साथ किया गया पाया जाता है। भारत जम्बूद्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित है। इसके उत्तर में हिमवान् पर्वत है और मध्य में विजयार्द्ध पर्वत। पश्चिम में हिमवान् से निकली हुई सिन्ध नदी बहती
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त्रिवर्ग सिद्धान्त

धर्म, अर्थ (सम्पति), काम (इच्छा) धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थो धर्म एव च। अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थिति॥ परित्यजेदर्थकामो यो स्याता धर्म वर्जितो । कुछ लोगो का कहना है कि कल्याण एव सुख्-सन्तोष की प्राप्ति के लिऍ धर्म और श्रेयस्कर है, अ
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घर्म क्या है ?"

धर्म" सस्कृत भाषा का शब्द है, अर्थ अत्यंत व्यापक है किसी अन्य भाषा में धर्म का समानार्थक  शब्द मुझे देखने को नहीं मिला. जब मुझे किसी ने एक सभा में पूछा कि -"घर्म क्या है ?" मेरा मानना है कि मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में न्यायसंगत आचरण क
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