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14 Jun 2010
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नील लोक

जिस जगह वो रहता था उस जगह के आगे कोई बस्ती नहीं थी. गाँव के छोर से आगे जाने की अघोषित मनाही थी. कई पीढीयों से. उसे पक्का विश्वास था की दुनिया के गोल होने बातें महज बकवास थी.और दुनिया का छोर इसी बस्ती से आगे ही कहीं है जहां धरती एकदम किसी तीक्ष्ण किनारे
 
sanjay vyas
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ट्रिक

जब समंदर कोदेखा भी नहीं थातब अमर चित्र कथा मेंसिंदबाद जहाजी की यात्राएं पढ़करमोहल्ले के खेल जीत लिया करते थेभले ही ये यकीन अदेखे औरअविश्वसनीय भूगोलों से आता थापर शायद जिंदा इंसान का हौसला हीइसे सच की तरह प्रस्तुत करता थाबड़ी ही तरतीब और करीने सेअसंभव
 
sanjay vyas
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रोंडेवू

न पहुंचे हो जहांदुस्साहसी यूरोपीय यात्रियों के कदमया थम गया हो जहांसदैव चलता बौद्ध भिक्षुओं का जीवटघंटों थिर रहने वाला योगियों का प्राण भीजहां काँपता हो जिस जगह अभी अभी उर्वर हुईधरती का हरापन ही साक्षी होमैं वहीं मिलना चाहता हूँइससे पहले किकोई कीट पहुंचे
 
sanjay vyas
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नींद में, उससे बाहर

ढाबे पर बस रूकती है. ये रात की बस है जो एक छोटे शहर से लगभग महानगर को जोडती है. ढाबे की चारपाई पर बैठकर खाई गयी रोटियाँ और तीखी सब्ज़ी बेस्वादी लगती है.शायद असमय या 'कुवेला' इसका कारण हो. बहुत कम लोग उतरे हैं यहाँ. ज़्यादातर बस में और नींद में हैं. जो लोग
 
sanjay vyas
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फेंका हुआ

कोई अपकेंद्री बल उसे तेज़ी से किसी अनजान दुनिया में फेंक रहा था। उसके अपने उससे दूर भागते प्रकाश बिन्दुओं में तब्दील हो गए थे। या वो ही उनसे दूर फेंका जा रहा था।उसकी अपनों से बनी दुनियाँ बहुत छोटी थी। पर उन्हें सहेजने का काम करने वाले स्मृति-कोष पर से
 
sanjay vyas
Feb 27 2010 06:00 PM
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एक करवट और

उसकी बेचैनी औंधे गिरे भृंग की तरह थी जो सिर्फ एक जीवनदायी करवट चाहता था.एक अर्ध-घूर्णन. फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा.या कम से कम ऐसी उम्मीद की जा सकती थी. उल्टा पड़ा कीड़ा जैसे अनंत शून्य में अपनी आठों टांगों की बेहाल हरकतों में कोई खुरदरा आधार ढूंढता है. एक
 
sanjay vyas
Feb 12 2010 07:20 PM
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तुमने मुझे कहा ...

कानों में फुसफुसा कर उसने जो कहा था वो आई डू या कबूल है जैसी अर्थ चेतना वाला नहीं था. सिर्फ प्रेम-प्रस्ताव का प्राप्ति-स्वीकार था. एक सन्देश के सही जगह पहुँचने की सूचना. कोई वादा नहीं कि इस पर आगे विचार होगा या नहीं. पर फिर भी वो इतने में ही खुश था.बेहद
 
sanjay vyas
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बस की लय को पकड़ते हुए

ये बस दो रेगिस्तानी जिला मुख्यालयों को जोडती है जो दिन में शहर और रात में गाँव हो जाते है.सुबह ये शहर का सपना लिए जगते हैं और रात को सन्नाटा लिए सो जातें हैं.इनके बीच सदियों का मौन हैं, सिर्फ कहीं कहीं जीवन तो कहीं इतिहास मुखर हैं. बस की खिड़की से शहर
 
sanjay vyas
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नाच

उसका नाच कितना अलग था!एक बिंदु में जैसे उसकी कमर समाप्त हो जाती थी और फिर देह उसी बिंदु के गुरुत्व केंद्र पर दो हिस्सों में बंटकर घूर्णन करती थी। तेज़ और तेज़ फिर तेज़!कटि के नीचे का भाग अलग घूमता लगता और उसके ऊपर का भाग भिन्न वर्तुल में घूमता था। ये
 
sanjay vyas
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किस्सालोक में कहीं खो गई है वो

कहानी सुनाओ ! उसकी नन्ही सी बेटी रात को सोने से पहले ये आदेश सुनाती। वो याद करने की कोशिश करता। उसे याद आता , ' प्यासा कौवा ', 'लालची बन्दर' ,' रंगा सियार ' या ऐसा ही कुछ। और ये सब वो उसे कई बार सुना चुका था। उसे कई बार कुछ भी सुनाने लायक याद नही आता
 
sanjay vyas
Dec 29 2009 11:52 AM
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प्रेमी वैम्पायर के बहाने प्रेम पर कुछ बिखरा सा

इन दिनों दो फ़िल्में देखी। सीक्वल।पहली थी ट्वाईलाईट जिसकी डीवीडी मुझे एक सहकर्मी मित्र ने दी जिनका बेटा हाल ही में विदेश से लौटा था। और दूसरी थी न्यू मून जिसे मैंने शहर के सिनेमा हॉल में देखी। मैं बहुत ज़्यादा फ़िल्में नहीं देखता और हौलीवुड की तो और भी
 
sanjay vyas
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कुछ भी शाश्वत नही

शहर के बाहरी छोर पर बने कैफेटेरिया से , अपने दोस्त के साथ एक बेहद आत्मीय सम्बन्ध का औपचारिक समापन कर वो वापस लौट रहा था . दोनों ने वहीं मिलना तय किया था . एक एक कॉफ़ी और समापन की औपचारिक घोषणा . बड़ी विचित्र बात थी कि हाथ मिलाने की औपचारिकताओं से शुरू
 
sanjay vyas
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दुनिया या प्रेम में खुलती खिड़की

डाकिया आज भी उसे कायदे से नहीं जान पाया था भले ही इस महल्ले में वो पिछले कई सालों से रह रहा था । ये बात अलग थी कि आज डाकिया ख़ुद अपनी पहचान के संकट से गुज़र रहा था । अपने घर में भी । दोस्त लोग उसके इतने कम थे कि ख़ुद को दिलासा देने के लिए वो दुआ सलाम
 
sanjay vyas
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कोरस में असंगत

दुःस्वप्न उसकी उम्मीद से ज्यादा वास्तविक थे वे तमाम हॉलीवुड मूवी चैनलों और हॉरर धारावाहिकों की तरह रोज़ दीखते और कुछ फीट के फासले पर घटित होते थे जिन्हें देखने के लिए रात और नींद का इंतज़ार नहीं करना पड़ता था पर हाँ रात और नींद में कुछ अधिक तीव्रता से
 
sanjay vyas
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फ्रेम

एक भरी पूरी उम्र लेकर दुनिया से विदा हुई दादी के बारे में सोचता है उसका पोता बड़े से फ्रेम में उसके चित्र को देखता। विस्तार में फ्रेम को घेरे उसका चेहरा बेशुमार झुर्रियां लिए जिनमे तह करके रखा है उसने अपना समय। समय जो साक्षी रहा है कई चीज़ों के अन्तिम
 
sanjay vyas
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वे दिन और पहली बार प्रेम जैसा कुछ

वे बेकार पड़े टायरों में उकडू फंस कर लुढ़कने और दुनिया को तेज़ गोल घूमते देखने के दिन थे. किसी दोस्त की एक सक्षम लात से चोट खाकर लुढ़कता था किसी ट्रक का बेकार टायर अपने में कैद एक लड़के को हर एंगल से दुनिया दिखाता. और यूँ तय होता था टीले की ऊंचाई से सम
 
sanjay vyas
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योद्धा (कविता)

वो एक शानदार योद्धा था। मिटटी के अखाडे में उसका दर्प कभी खंडित नहीं हुआ था। पहलवानों की गुरु शिष्य परम्परा में अपनी तरह का अकेला ही आया था वो। चौंधियाते क्रिकेट मैदानों से बहुत दूर अखाडे के धूसर कोनों का लड़ाका अपनी सत्ता के महज कुछ क़दमों से नापे जा
 
sanjay vyas
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ग्राम देवी (कविता)

गाँव की छोटी सी पहाडी कीतीन सौ निन्यानवे सीढियां चढ़करदेवी के उस अत्यन्त विनम्र मन्दिर मेंपहुँचते हैं श्रद्धालु।नवरात्रि में 'देवी' का किंचित औपचारिक संबोधनआम दिनों में हवा की तरह हल्का होकर'माइ' या 'माता' रह जाता है।ये ग्राम देवी है जो गाँव में सबसे
 
sanjay vyas
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एक तनाव भरे रोमांच की तलाश में

ठीक वो क्षण, जब बिच्छू अपना डंक शिकार में घोंपने ही वाला हो, या कोई बेस जम्पर किसी ऊंची इमारत से कूदने के लिए अंतिम रूप से तैयार हो, जब प्राचीन यूनान में हजारों की भीड़ के मध्य एक ग्लेडिएटर बस अपना निर्णायक वार करने ही वाला हो, या फिर घात लगाए बैठा
 
sanjay vyas
Sep 17 2009 09:04 PM
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घर गृहस्थी में धंसता एक पुराना प्रेम पत्र

" श्री गोपीवल्लभ विजयते" बम्बोई (तिथि अस्पष्ट) प्यारी सुगना,मधुर याद.श्री कृष्ण कृपा से मैं यहाँ ठीक हूँ और तुम भी घर पर प्रभु कृपा से सानंद होंगी.मेरा मन तो बहुत कर रहा है कि पत्र के स्थान पर स्वयं उपस्थित हो जाऊं पर एक सेठ का मुनीम होना कितना
 
sanjay vyas
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पार्क

पार्क जितना हरा हो सकता था, था। जितना सुंदर हो सकता था, था। एक रंगीन फव्वारा बिल्कुल बीचोबीच। तरह तरह के फूल, मुस्कुराते।झूले,स्लाइड्स,बेंचें, बच्चे,बूढे,युवा,और माली।सब कुछ भरा भरा सा। पार्क शहर की गहमा गहमी के केन्द्र में टापू की तरह था।बाहर निकलते ही
 
sanjay vyas
Aug 10 2009 02:01 PM
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सुबह शाम की किताब

एकआबादी यहाँ कई सालों से थी। पीछे की पहाडियां ही इससे ज्यादा पुरानी थी बाकी कुँआ, पेड़, मन्दिर सब धीरे धीरे बनते रहे। आदमी के पैर यहाँ सबसे पहले पड़े फ़िर कुआँ खुदा,घर बने पेड़ उगे और मन्दिर बना। भगवान् तो हमेशा उनके बीच रहा होगा पर उसकी ज़रूरत सबसे बाद में
 
sanjay vyas
Jul 26 2009 03:45 PM
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एक छलाँग भर दूर है ये फासला

मेरा इनसे रिश्ता तेरह साल पहले कहीं जाकर जुड़ता था। उसके बाद के इन सालों में इस रिश्ते को कई मुलाकातों से होकर और बड़ा होना था ख़ास कर तब जबकि पिछले आठ सालों से मैं इन्हीं के शहर में था। पता नहीं ऐसा क्या था कि आज से पहले मेरा इनसे सिर्फ़ एक ही बार मिल
 
sanjay vyas
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क़स्बे में प्रेम- कुछ चित्र

एक जटा शंकर जी का घर क़स्बे के इस पुराने मोहल्ले में सबसे ग़लत जगह पर था। एक अत्यन्त जटिल ज्यामितीय संरचना में बसे पुराने घरों की जमावट असंख्य वीथीयों की दुरूह प्रणाली का निर्माण करती थी। कोई गली खूब अन्दर तक जाकर किसी घर में गुम हो जाती तो कोई किसी
 
sanjay vyas
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कायांतरण

क़स्बे के व्यक्तित्व में तेज़ी से परिवर्तन हो रहा था। रात में मुस्कुराते तारे निर्जीव होकर टंगे लगते थे। सबने जैसे सामूहिक रूप से फांसी खा ली थी। आसमान की प्रांजलता समाप्त हो गई थी। एक पीपल का पेड़ जो क़स्बे में सबसे बूढा था अब सूखने लग गया था। ये उस
 
sanjay vyas
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दुनिया के तापमान से एक डिग्री ज़्यादा में जीते हुए

हर रोज़ बिना पढ़े वो उस लड़की के मेसेजेज़ 'इन बॉक्स' से डिलीट कर देता था जिनमे ज़िन्दगी के गूढ़ भावों को सरलीकृत अंदाज़ में लिखा होता था। जिनमे प्यार को किसी बेरोजगार कवि या शायर की चार पंक्तियों में परिभाषित किया होता था। संदेश जो सरल हास्य से लेकर भी
 
sanjay vyas
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लॉन्ग शॉट में एक आदमी को देखते हुए

डिस्क्लेमर - मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इस आदमी को नज़दीक से मैं नहीं जानता । हाय - हेलो के अलावा शायद ही कभी मैंने उससे बातचीत की है और मुझसे उम्र में बड़ा होने के कारण मैंने अपनी समझ आने पर उसे हमेशा बड़ा ही देखा है । फ़िर भी , कई सालों से उसे अलग अलग
 
sanjay vyas
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अभिशप्त क़स्बे से आरम्भ

क़स्बे की जन्मपत्री में कोई भयानक गड़बडी थी। आजकल इसकी पुष्टि कम्प्यूटरीकृत कुंडली से सूक्ष्म विवेचन करने वाले प्रख्यात ज्योतिषी भी कर रहे थे। इन दिनों ख्याति अर्जित कर रहे क़स्बे के ही एक वास्तु शास्त्री के अनुसार क़स्बे की बसावट में ही बहुत भारी त्
 
sanjay vyas
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अपनों को खोने पर

इन दिनों के आसपास ही शायद उसने अपने भीतर प्रेम की पहली कौंध महसूस की होगी यही दिन रहे होंगे जब उसने सोचा होगा कि इंतज़ार हमेशा उबाऊ नहीं होता और नोट बुक में गणित के सूत्रों के अलावा भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है मसलन कविता या पत्र। इन्हीं दिनों मां की ड
 
sanjay vyas
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छुटकी का गुल्लक

मेरे मन में पता नहीं क्यों बड़ी उत्सुकता है। तीन सिक्के है जिनमे एक बड़ी बिटिया के गुल्लक को मिलेगा एक मुझे यानी छुटकी के गुल्लक को मिलेगा और एक किसको मिलेगा इसका फ़ैसला टॉस से होगा। यानी मामला सस्पेंस का है। और लो, तीन में से एक तो मुझे मिल गया और एक
 
sanjay vyas
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वो जादू करने वाली

गाँव के लोग उस वृद्धा को भय मिश्रित जिज्ञासा से देखते थे। सन इकहत्तर में वो सिंध से इस तरफ़ आयी थी। अकेली थी। गाँव में भी अकेली रहती थी। मुख्य बस्ती से दूर झौंपे में उसका बाकी जीवन कट रहा था। उसके परिवार के बारे में किसी को ज्यादा जानकारी नहीं थी, बस
 
sanjay vyas
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एक बस के इंतज़ार में

नए घर की देहरी पर कदम रखते ही मीता के मन में स्मृतियों की कौंध चमक उठी . पिता का घर अब उसका पीहर था . अब तक पिता हर मौसम में उसके पीछे छाता लेकर खड़े रहते थे । भाई का मज़बूत कन्धा आश्वस्त करता था । माँ का दुलार घर और दुनिया के बीच उसकी बेरोकटोक आवाजाह
 
sanjay vyas
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प्यास सिर्फ़ पानी से नहीं बुझती

इस जगह बस्ती होने का कोई तुक नही था। यहाँ दुनिया से कोई सड़क नहीं आती थी , और यहाँ मौजूद लोगों ने बाहर जाने के जो भी मार्ग खोजे वो अंततः आपस में ही मिल गए। सूरज यहाँ से हमेशा सर पर ही सवार दिखाई देता था। चमकता , आग फेंकता। पर कहतें हैं न जीवन कहीं भी
 
sanjay vyas
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आँख के जल में याद

एक सुंदर सी लगने वाली छतरी के पास खडा टूरिस्ट उसे मुग्ध भाव से देखता है।पत्थरों पर नक्काशी करते वक्त कारीगर के मन में ज़रूर कोई कोमल भाव उपजा होगा।पत्नी का स्पर्श शायद उसने फ़िर से महसूस किया होगा जो सृष्टि के एक और मामूली दिन को उसके लिए विशिष्ट बना
 
sanjay vyas
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समय जहाँ उल्टा लटका है

इस जगह के भीतर घुसते ही लगा जैसे निपट अनजान जगह आ गया हूँ। विश्व की सीमाओं से परे। क्या हुआ होगा?अघोरी या सिद्ध की तीव्र और आक्रामक भक्ति से ईश्वर की आत्मा में भारी कम्पन हुआ होगा और ये जगह देश और काल की तमाम सीमाओं को भेद कर एक नए ही आयाम में विन्यस
 
sanjay vyas
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स्याही से बाहर छिटकते अर्थ

एक वाग्दत्ता अपने होने वाले पति को विवाह से पहले की अन्तिम चिट्ठी लिखती है । चिट्ठी में वो लग्न की तय हुई तिथि की जानकारी देती है । कई बार कच्चे ड्राफ्ट को फाड़ने के बाद वो आश्वस्त होकर एक साफ़ सुथरे पन्ने पर अपना पत्र पूरा करती है । अंत में ' केवल तु
 
sanjay vyas
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माया लोक और यथार्थ के बीच किसी भूगोल पर

सालों बाद इस जगह को छोड़ कर मैं फ़िर यहीं था। ये शहर आज भले ही इक्कीसवीं सदी में था पर ये बार बार अपनी प्राचीन स्मृतियों में लौटता था। लगता था जैसे ये काल के विशाल समुद्र में डूबता उतराता रहता था। जैसे प्राचीन और अर्वाचीन इसके लिए घर से बाहर निकलने के
 
sanjay vyas
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चाँद नही तो मूंग फली सही

ये दिन छुट्टी का था, शाम को सपरिवार प्रोग्राम बना कि आज अचलनाथ चला जाय। ये जोधपुर का मशहूर और अपेक्षाकृत प्राचीन शिव मन्दिर है। यहाँ सावन के महीने में और शिवरात्रि पर खूब भीड़ रहती है। ये दिन भी शायद सावन के महीने का ही था। शहर के परकोटे के अन्दर आए
 
sanjay vyas
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देसी टमाटरों के लदते दिन यानि दुनिया का इकहरा होते जाना

कुछ दिन पहले अपने मित्र रवींद्र के साथ फार्म पर जाने का प्रोग्राम बना। जोधपुर से फासला कोई १३५किलो मीटर का था। गाड़ी में यहाँ से निकलते ही नज़र एक ढाबे के नाम पट्ट पर अटक गयी लिखा था 'शेरे पंजाब वैष्णव भोजनालय '। एक मुस्कराहट के साथ मन तुंरत राज़ी था,
 
sanjay vyas
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जोधपुर में शीत

कम ही रहता है प्रवास जोधपुर में जाड़े का, ठिठक कर आता है वो यहाँ, अक्सर तो दबे पाँव आकर भाग जाता है, उसकी उपस्थिति मिठाई की दुकानों के बाहर कड़ाह में खौलते दूध या रेवडी गजक के ठेलों पर दर्ज होती है , जब भी शीत का डेरा होता है जोधपुर में संक्षिप्त मगर म
 
sanjay vyas