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12 Jun 2010
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बलुआ धरती पानी सी लगती

मृग तृष्णा में  बलुआ धरती  पानी सी लगती छलना अक्सर सच की एक कहानी सी लगती कोख किराये पर मिलती है अब बाजारों मेंमूल्यों की हर बात यहाँ बेमानी सी लगती एक छलाँग
 
chandrabhan bhardwaj
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हो नहीं सकता

बराबर उसके कद के यों मेरा कद हो नहीं सकता वो तुलसी हो नहीं सकता मैं बरगद हो नहीं सकता मिटा दे लाँघ जाए या कि उसका अतिक्रमण कर ले मैं ऐसी कोई भी कमजोर सरहद हो नहीं सकता जमा कर
 
chandrabhan bhardwaj
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उनके माथे पर अक्सर पत्थर के दाग रहे

उनके माथे पर अक्सर पत्थर के दाग रहे जो  इमली  अमरूदों   आमों   वाले बाग़ रहे उन कदमों को पर्वत या सागर क्या रोकेंगे जिनकी आँखों में पानी सीने में आग रहे अँधियारे आँगन में रहतीं सपनों की किरणें जैसे  
 
chandrabhan bhardwaj
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हमें ऐ ज़िन्दगी तुझ से शिकायत भी नहीं कोई

वसीयत भी नहीं कोई   विरासत भी  नहीं कोई हमें ऐ  ज़िन्दगी तुझ से शिकायत भी नहीं कोई रहा खुद पर भरोसा या रहा है सिर्फ ईश्वर पर सिवा इसके हमारे पास ताकत भी नहीं कोई मिले बस चैन दिन का और गहरी नीद रातों की हमें अतिरिक्त इसके और चाहत भी
 
chandrabhan bhardwaj
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उनकी नज़र में खास बन जाते

तमन्ना थी कि हम उनकी नज़र में खास बन जाते कभी   उनके   लिए   धरती   कभी आकाश बन जाते अगर वे  प्यास  होते तो ह्रदय  की तृप्ति  बनते हम अगर वे
 
chandrabhan bhardwaj
Apr 07 2010 12:40 PM
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वो गुजरता है पागल हवा की तरह

राह में जिसकी जलते शमा की तरह  वो गुजरता है पागल हवा की तरह छलछलाते  हैं  आँसू  अगर   आँख मेंपीते  रहते  हैं  कड़वी  दवा  की 
 
chandrabhan bhardwaj
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आह भी भरने नहीं देता

कसकते हैं मगर इक आह भी भरने नहीं देता ज़माना घाव को भी घाव अब कहने नहीं देता महत्वाकांक्षाएं  तो   खड़ी   हैं   पंख    फैलाए  बिछाकर जाल बैठा जग
 
chandrabhan bhardwaj
Mar 21 2010 11:50 AM
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घर को घर क्या कहें

ईंट पत्थर का है घर को घर क्या कहें इक अकेले   सफ़र को सफ़र   क्या कहें कोई   आहट   नहीं   कोई   थपकी   नहीं बिन प्रतीक्षा रहे दर को दर क्या कहें जो   तरसता रहा  
 
chandrabhan bhardwaj
Mar 15 2010 12:26 PM
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है बहुत मुश्किल

उजड़ती बस्तियों को फिर बसाना है बहुत मुश्किलबिलखती आँख  में सपने   सजाना  है बहुत मुश्किल   बहुत  आसान   आलीशान   भवनों  का   बना  लेनाकिसी दिल में
 
chandrabhan bhardwaj
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फूस पर चिनगारियों का नाम हो जैसे

फूस पर चिनगारियों का नाम हो जैसे ज़िन्दगी दुश्वारियों का नाम हो जैसे पेड़ अब होने लगा है छाँह के काबिल पर तने पर आरियों का नाम हो जैसे  आह आँसू करवटें तड़पन
 
chandrabhan bhardwaj
Mar 02 2010 10:38 AM
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ज़िन्दगी फुलवारियों का नाम हो जैसे

होंठ पर किलकारियों का नाम हो जैसे ज़िन्दगी फुलवारियों का नाम हो जैसे मन भिगोया तन भिगोया आत्मा भीगी प्यार ही पिचकारियों का नाम हो जैसे आस के  अंकुर उगे कुछ कोपलें फूटीं स्वप्न कोई क्यारियों का नाम हो जैसे बाँटती फिरती हँसी को और
 
chandrabhan bhardwaj
Feb 26 2010 10:23 AM
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हवा आवाज़ देती है

यह ग़ज़ल हिंदी की प्रष्ठभूमि पर हिंदी के संस्कार हिंदी के विन्यास हिंदी का भाषा सौष्ठव हिंदी का शब्द संसार हिंदी के  तेवर और हिंदी की मानसिकता के साथ लिखी है लेकिन अरूज़ का
 
chandrabhan bhardwaj
Feb 25 2010 06:32 PM
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किसी के नाम से यदि ज़िन्दगी जुड़ी होती

 बुझे  दियों  में  भी  इक  बार  रोशनी  होती  किसी के नाम से यदि ज़िन्दगी जुड़ी होतीजहाँ पे धूप ही  हरदम  तपी रही  सर परवहाँ  भी पाँव के नीचे  तो  चाँदनी  
 
chandrabhan bhardwaj
Feb 15 2010 02:29 PM
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नया अंदाज़ रखना

नए तेवर नया अंदाज़ रखना; कहन सच्ची मधुर आवाज़ रखना. भले ही पंख हों छोटे तुम्हारे, सदा ऊँची मगर परवाज़ रखना. कभी भूखा कभी प्यासा रखेगी, मगर
 
chandrabhan bhardwaj
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बैठा हुआ हूँ

नदी को पार कर बैठा हुआ हूँ; सभी कुछ हार कर बैठा हुआ हूँ. मिले बिन मान के ऐश्वर्य सारे,  उन्हें इनकार कर बैठा हुआ
 
chandrabhan bhardwaj
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कभी लगती हकीक़त सी

कभी तो ख्वाब सा लगता कभी लगती हकीक़त सी; मिली है ज़िन्दगी इक क़र्ज़ में डूबी वसीयत सी. उसूलों के लिए जो जान देते थे कभी अपनी, वे खुद करने लगे हैं अब उसूलों की तिजारत सी. कभी जिसके इशारों पर हवा का रुख बदलता था ,हवा करने लगी है अब स्वयं उनसे बगावत सी. रखा
 
chandrabhan bhardwaj
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क्या पता वह प्यार था

ज़िन्दगी मचली उमंगों का उठा इक ज्वार था; क्या पता वह वासना थी क्या पता वह प्यार था। याद बस दिन का निकलना और ढलना रात का, कल्पनाओं के महल थे स्वप्न का संसार था। होंठ पर मुस्कान सी थी आँख में पिघली नमी, प्यार की प्रस्तावना थी या कि उपसंहार था। स्वप्न म
 
chandrabhan bhardwaj
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मेरा अनुवाद तुम

मूल कविता हूँ मैं मेरा अनुवाद तुम; मेरे लेखन की हो एक बुनियाद तुम। मैं अमर शब्द हूँ तुम अमर काव्य हो, हूँ परम ब्रह्म मैं हो अमर नाद तुम। तुम हो काशी मेरी तुम हो काबा मेरा, मन के मन्दिर में मस्जिद में आबाद तुम। जिसमें आठों पहर ज्योति जलती सदा, सिद्ध व
 
chandrabhan bhardwaj
Dec 29 2009 11:46 AM
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हंस सब उड़ गए

सूखती झील में काइयाँ रह गईं; हंस सब उड़ गए मछलियाँ रह गईं। रेत सी उम्र कण कण बिखरती रही, हाथ खाली बँधी मुट्ठियाँ रह गईं। सत्य को बिन सुने ही अदालत उठी, आँसुओं से लिखी अर्जियाँ रह गईं। अब खरीदे हुए मंच के सामने, बस ख़रीदी हुई तालियाँ रह गईं। यह सियासत
 
chandrabhan bhardwaj
Dec 29 2009 11:46 AM
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ख़ुद को भला तो बना

चार तिनके जुटा घोंसला तो बना; ज़िन्दगी का कहीं सिलसिला तो बना। इक पहल एक रिश्ता बने ना बने, जान पहचान का मामला तो बना। कुछ कदम तुम बढ़े कुछ कदम हम बढ़े, , कर गुजरने का कुछ हौसला तो बना। ज़िन्दगी एक ठहरी हुई झील है, कर तरंगित कहीं बुलबुला तो बना। सन्न स
 
chandrabhan bhardwaj
Dec 29 2009 11:46 AM
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सुंदर दिखाई दे

हों बंद पलकें रोशनी भीतर दिखाई दे; तो ज़िन्दगी कुछ और भी सुंदर दिखाई दे। जब आदमी की आस्था विश्वास तक पहुंचे, तो राह का कंकर दया शंकर दिखाई दे। अनमोल होगा जौहरी की आँख में हीरा, फक्कड़ फकीरी आँख को पत्थर दिखाई दे। जब पोंछते हैं धूल मन के बंद दर्पण की,
 
chandrabhan bhardwaj
Dec 29 2009 11:46 AM
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खुद भ्रम में है आईना यहाँ

है ज़हर पर मानकर अमृत उसे पीना यहाँ; ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की ही तरह जीना यहाँ। उन हवाओं को वसीयत सौंप दी है वक्त ने, जिनने खुलकर साँस लेने का भी हक छीना यहाँ। आँख में रखना नमी कुछ और होठों पर हँसी, क्या पता पत्थर बने कब फूल सा सीना यहाँ। हो गया बेहद
 
chandrabhan bhardwaj
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कोई सपना पलक पर बसा ही नहीं

जाने क्या हो गया है पता ही नहीं; कोई सपना पलक पर बसा ही नहीं। नापते हैं वो रिश्तों की गहराइयाँ, जिनकी आंखों में पानी बचा ही नहीं। उनको मालूम क्या दर्द क्या चीज है, जिनके पाँवों में काँटा गड़ा ही नहीं। टूट जाने का अहसास होता कहाँ, प्यार की डोर में जब
 
chandrabhan bhardwaj
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नया कुछ नहीं

प्यार से और बढ़कर नशा कुछ नहीं; रोग ऐसा कि जिसकी दवा कुछ नहीं। जिस दिये को जलाकर रखा प्यार ने, उसको तूफान आँधी हवा कुछ नहीं। जान तक अपनी देता खुशी से सदा, प्यार बदले में खुद माँगता कुछ नहीं। जिसने तन मन समर्पण किया प्यार को उसको दुनिया से है वास्ता क
 
chandrabhan bhardwaj
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उजाले और धुँधलाए

किसी वीरान में भटका हुआ राही किधर जाए; न कोई रास्ता सूझे न मंज़िल ही नज़र आए। बदन की चोट तो इंसान सह लेता सहजता से, लगे मन पर तो शीशे सा चटक कर वह बिखर जाए। घुमड़ते ही रहे दिल में किसी की याद के बादल, उसाँसॉं से न उड़ पाए न आँसू बन बरस पाए। अगर रेखागणि
 
chandrabhan bhardwaj
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ऊँगली उठाता है

बता कर कुछ न कुछ कमियाँ निगाहों से गिराता है; ज़माना नेक नीयत पर भी अब ऊँगली उठाता है। समझता ख़ुद के काले कारनामों को बहुत उजला, हमारे साफ दामन को मगर दागी बताता है । किसी को पक्ष रखने का कोई मौका नहीं देता, सबूतों के बिना हर फैसला अपना सुनाता हैं। रह
 
chandrabhan bhardwaj
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अपनापन नहीं मिलता

न जिसके बीच हो दीवार वह आँगन नहीं मिलता; कहीं अब ज़िन्दगी नज़रों में अपनापन नहीं मिलता। जिसे हम ओढ़ कर कुछ देर अपने दुःख भुला देते, बुना हो प्यार के धागों से वह दामन नहीं मिलता। जहाँ जज्बात की इक आग हरदम जलती रहती थी, दिलों में अब वो जज्बा वह दिवानाप
 
chandrabhan bhardwaj
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प्रणय - शतक (प्रेमानुभूति का काव्य) - चंद्रभान भारद्वाज

१) मेरे दिल को धडकना सिखाया तूने, मेरे सपनों को उड़ना सिखाया तूने; मैं तो अनजान था प्यार के नाम से, प्यार का पाठ पढ़ना सिखाया तूने। (२) आज तू मेरे मन का विषय बन गई, मेरे चिंतन मनन का विषय बन गई; प्यार की एक पुस्तक जो मन में लिखी, तू गहन अध्ययन का विष
 
chandrabhan bhardwaj
Oct 14 2009 07:44 PM
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प्रणय-शतक (प्रेमानुभूति का काव्य)-चंद्रभान भारद्वाज

१) मेरे दिल को धडकना सिखाया तूने, मेरे सपनों को उड़ना सिखाया तूने; मैं तो अनजान था प्यार के नाम से, प्यार का पाठ पढ़ना सिखाया तूने। (२) आज तू मेरे मन का विषय बन गई, मेरे चिंतन मनन का विषय बन गई; प्यार की एक पुस्तक जो मन में लिखी, तू गहन अध्ययन का विष
 
chandrabhan bhardwaj
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टूटी आस्थाएं

ढह गए विश्वास टूटी आस्थाएं; दर्द बन कर रह गईं हैं प्रार्थनाएं। प्रश्नचिन्हों से घिरे हैं न्यायमंदिर, हाथ में कुरआन गीता हम उठाएं। दीप की जलती हुई लौ तो बुझातीं, आग को पर और दहकातीं हवाएं। कौन के आगे करें शिकवा शिकायत, जब बिना अपराध ही मिलतीं सजाएं। थ
 
chandrabhan bhardwaj
Oct 14 2009 07:44 PM
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नदी प्यार की

तन के आँगन में वर्षा हुई प्यार की;मन में बहने लगी इक नदी प्यार की।चार पल ही बिताये कभी साथ में,लगता जी ली हो पूरी सदी प्यार की।स्वाद अब और कोई सुहाता नहीं,जब से प्राणों ने बूटी चखी प्यार की। घुल गई है हवाओं में चारों तरफ़,ऐसी साँसों में खुशबू भरी प्यार
 
chandrabhan bhardwaj
Sep 15 2009 03:42 PM
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साधनाओं में तुम

हो हवाओं में तुम सब दिशाओं में तुम;रम रहीं मेरे मन की गुफाओं में तुम। झांकता हूँ शरद रात्रि में जब गगन,दीखतीं चंद्रमा की कलाओं में तुम।हो गया है निगाहों में कैसा असर,मुझको लगती हो जलती शमाओं में तुम। मैंने लिखने को जब भी उठाई कलम,गीत ग़ज़लों में प्रहसन
 
chandrabhan bhardwaj
Sep 09 2009 11:56 AM
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सपने दिखा प्यार के

चल दिया कोई सपने दिखा प्यार के;सूझता है न अब कुछ सिवा प्यार के। आह आंसू तड़प हिचकियाँ सिसकियाँ, दर्द बदले में केवल मिला प्यार के। क्यों न जाने ज़माने की बदली नज़र, जबसे खुद को हवाले किया प्यार के। मोतियों की लड़ॊं से सजी हो भले, अर्थ क्या ज़िन्दगी का बिना
 
chandrabhan bhardwaj
Sep 02 2009 02:59 PM
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देखा नहीं

प्यार ने आग पानी को देखा नहीं;होम होती जवानी को देखा नहीं।ताज ठुकरा दिया बोझ सिर का समझ,प्यार ने हुक्मरानी को देखा नहीं। प्यार की राह में मोड़ ही मोड़ हैं, मोड़ लेती कहानी को देखा नहीं। गिर गई गांठ से कब कहाँ क्या पता, प्यार की उस निशानी को देखा नही।
 
chandrabhan bhardwaj
Aug 17 2009 11:55 AM
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करवटों में कटी

प्यार की इक उमर करवटों में कटी;चाहतों में कटी आहटों में कटी।हो प्रतीक्षा की या हो विरह की घड़ी,खिड़कियों में कटी चौखटों में कटी। जिनके प्रियतम बसे दूर परदेश में, उनकी विरहन उमर घूंघटों में कटी। प्यार के तेल बिन जो जले ही नहीं,उन दियों की उमर दीवटों में
 
chandrabhan bhardwaj
Aug 03 2009 05:12 PM
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chandrabhan bhardwaj
May 08 2009 10:21 AM
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एक सपना पलक पर सजा तो सही

ज़िन्दगी को कभी आजमा तो सही; एक सपना पलक पर सजा तो सही। पाँव ऊँचाइयों के शिखर छू सकें, सोच को पंख अपने लगा तो सही। बाजुओं में सिमट आएगा यह गगन, कोई कोना पकड़ कर झुका तो सही। मोम पत्थर गला कर बनाती है वो, आग सीने में थोडी जला तो सही। कर न परवाह ऊँची लह
 
chandrabhan bhardwaj
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न मौसम का भारोसा है

हवाओं का भरोसा है न मौसम का भरोसा है; चमन को अब बहारों का न शबनम का भरोसा है। विषैली बेल शंका की उगी विश्वास की जड़ में, न फूलों का न खुशबू का न आलम का भरोसा है। जड़ों में नाग लिपटे हैं जमे हैं गिद्ध डालों पर, कहाँ बैठें न बरगद का न शीशम का भरोसा है।
 
chandrabhan bhardwaj
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ज्योति कैसे जलेगी जलाए बिना

दीप को वर्तिका से मिलाए बिना; ज्योति कैसे जलेगी जलाए बिना। स्वप्न आकार लेगें भला किस तरह, हौसलों को अगन में गलाए बिना। ज़िन्दगी में चटक रंग कब भर सके, सोये अरमान के कुलबुलाए बिना। एक तारा कभी टूटता ही नहीं, दूर आकाश में खिलखिलाए बिना। प्यार का अर्थ आ
 
chandrabhan bhardwaj
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ज़िन्दगी का प्यार मानना

कठिनाइयों को ज़िन्दगी का प्यार मानना; ठोकर लगे तो जीत का इक द्वार मानना। रखना निगाहों में सदा तारे बिछे हुए, कांटा चुभे तो फूल की बौछार मानना। सुलगा हुआ रखना यहाँ चूल्हा इक आस का, सब रोटियों पर भूख का अधिकार मानना। आने लगेंगीं ख़ुद उधर की आहटें इधर,
 
chandrabhan bhardwaj