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मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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14 Jun 2010
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बहन की शादी !

एक लम्बे अर्से के बाद अपने डैशबोर्ड पर आया हूँ और ब्लॉग खोलकर कुछ लिखा रहा हूँ । बीते हुए दिन काफी व्यस्त रहे । 6 जून की बहन की शादी थी और उसी सिलसिले में मुझे शादी से पहले और शादी के बाद तक व्यस्त रहना पड़ा । एक पूर्ण सफल शादी कराना और सभी जिम्मेदारियां
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चिट्ठेरिया !

उधर गली के आखिरी मोड़ पर नयन सुख चचा की दुकान पर सब लोग नयनों का सुख लेने की खातिर जमघट लगाए रहे । बस कोनों सुख हुआं से गुजरा नहीं कि लगे टकटकी बाँध के घूरने । जैसे कि घर तक पनार कर ही दम लेंगे । उधर नयन सुख चचा पान का पत्ता काटते हुए बोले "अरे ई ससुर
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मेरा होना और ना होना !

ऐसे समय में जबकिसत्ता के गलियारों में दबा दी जाती हैहर वो आवाज़जो सत्ता के विरुद्ध होमैं दूर तक फैली हुई खामोशी को देखता हूँ ।जबकि रोज़ हीमरते हैं या मार दिये जाते हैंनंगे, भूखे और बदरंग जानवर से आदमी मैं विकास की ओर अग्रसर भारत को देखता हूँ ।उन दिनों से
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आम आदमी !

आम आदमी हुक्का गुड़गुड़ाता है, चिलम पीता है और वो ना मिले तो बीड़ी सुलगाता है । हुक्का बचे ही कितने हैं और ना अब वो शौक रहा हुक्का-पानी बंद करने वाला । इसी लिये हुक्के का क्रेज़ ख़त्म हो गया । वैसे अच्छी चीज़ थी हुक्का, बस गुड़गुड़ाते रहो और खाँसते रहो । जब
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दद्दा हमार शादी अब कैसन हुई ?

उधर हमार दद्दा कहत रहे कि "पढ़ लै ससुर, ब्याह-व्याह तब भी हो जाएगा ।" हम खूब मन लगाय के पढ़त रहे । इतना पढ़े कि .... कितना पढ़े ? पूरे 25 बरस तक पढ़त रहे ....ऊ कैसे ?अरे शुरू मा हमार कच्छा बदलने के दिन रहे और पाँच बरस यूँ ही गुजर गये...ऊ का बाद नर्सरी फिर
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उन बीते हुए दिनों में

- तुम मुझे बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते ।-बिल्कुल भी नहीं ?-ह्म्म्मम्म .....बिल्कुल भी नहीं ।-इत्ता सा भी नहीं ?-अरे कहा ना बिल्कुल भी नहीं फिर इत्ता सा कैसे कर सकती हूँ ।-"मैं सोच रहा था कि इत्ता सा तो करती होगी ।" कहते हुए मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।वो उठकर
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बलदेव की प्रेम समस्या

बलदेव का नाम ना जाने किन विकट परिस्थितियों में बलदेव रखा था । ये तो उसकी दादी ही जानती थी । बलदेव डेढ़ पसली का 20-21 बरस का पतला सूखा सा दिखने वाला लड़का । शर्ट को भी शर्म आती होगी कि मुझे किस कम्बखत ने पहन लिया । एक बार बलदेव के बाप ने बलदेव को एक लड़की
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जो मर गये या मार दिये गये

जो मर गये या मार दिये गयेवे तराजू के पलड़ों की तरह हैंजिन्हें तौला जाता रहा हैबारी-बारीकम और ज्यादा की तरह ।फर्क सिर्फ इतना है किकुछ भुला दिये गये थे मरने से पहलेऔर कुछ भुला दिये जायेंगे मरने के बादहमेशा के लिये ।रहेगी तो बस गिनतीउन सभी जमा सरकारी कागजों
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मुझे तुम्हारी चाहना है !

उन खर्च होते हुए चन्द जमा दिनों में से, उस एक शाम को जब सूरज सुस्ताने लगा और पंक्षी वापस अपने घरों को लौट चले थे । मैंने कुछ कदम चल लेने के बाद उसकी हथेलियों को अपनी अँगुलियों से छूते हुए अपने होने का आभास कराया था । मेरे होने का, नहीं शायद उस एहसास को
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कलकत्ता...OOPS !...कोलकाता

इन पिछले बीते हुए दिनों में 1 दिन के लिये कलकत्ता ...oops!....कोलकाता जाना हुआ । उस एक दिन के लिये 4 दिन लगे । कह सकते हैं कि 23 मार्च से 27 मार्च तक ट्रेन, बस, ऑटो और कोलकाता में रहा । हावड़ा रेलवे स्टेशन से निकलते ही सड़कों, बसों, टैक्सी, ऑटो और सड़कों
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Image Label के द्वारा आप अपने ब्लॉग पर विजिटर्स की संख्या में वृद्धि कर सकते हैं । आइए देखें कैसे ?

चित्र को लेबल दें(Label Your Image) :शायद आप इसके बारे में अधिक ना सोचते हों किन्तु यह सत्य है कि जो फोटो आप अपनी ब्लॉग की पोस्ट में लगाते हैं उसके माध्यम से भी गूगल सर्च के द्वारा पढने वाले आपके ब्लॉग तक पहुँच सकते हैं । जब भी आप अपने ब्लॉग पर कोई फोटो
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Firefox धन कैसे कमाता है ?(Earning secrets of Firefox)

फायरफ़ॉक्स (Firefox) एक मुफ्त में उपयोग किया जाने वाले ओपन सोर्स वेब ब्राउसर (Open Source Web Browser) है । "Firefox is One of the highly used freeware software in computer history". तो क्या आपने कभी सोचा है कि यह धन कैसे कमाता है ? शायद कुछ ने ही सोचा
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क्या इसी दुनिया का था वो ?

वो हम-सब से बहुत अलग था । बहुत अलग । शायद यह अलग होना ही उसे विशेष बनाता था । बचपन में जब सब गुड्डे-गुड़ियों के साथ खेला करते या उसके बाद क्रिकेट, गुल्ली-डंडा या खो-खों में रमे रहते तब वह एकांत में चुप सा बैठा रहता, ख़ामोशी का लबादा ओढ़े । उसकी जिंदगी में
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बहुत समय पहले की बात थी

नानी माँ की गोद में लेटा हुआ मैं नाना जी के ये कहने पर कि "बहुत समय पहले की बात थी " सोच में पड़ जाता हूँ । बहुत समय पहले की बात इन्हें कैसे याद रह जाती होगी । फिर मैं नाना जी से पूँछता हूँ कि "कितने समय पहले की नाना जी ?" । नाना जी प्यार(मक्का की फसल
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Mar 05 2010 06:39 PM
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अर्थ को खोजते हुए शब्द !

उसने मुझे हमेशा के लिये छोड़कर जाते हुए कहा "अपना ख़याल रखना !" वो चली गयी । फिर ना कभी आने के लिये । ये उसके कहे हुए अंतिम शब्द थे । तब लगा कि वह कुछ शब्द दे गयी है जो मुझे अपने पास रखने हैं और उनकी हिफाज़त करनी है । उन शब्दों के गूढ़ रहस्यों को जानने के
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Feb 25 2010 11:24 AM
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उस रात फिर एक ख्वाब थपकियाँ देकर सुला दिया गया !

वो बैठी थी चुप, ख़ामोशी में खोयी सी । कमरे की खिड़की पर लगा अख़बार बार-बार हवा के तेज़ झोंके से फडफडाता और शांत हो जाता । बाहर चाँदनी मद्धम-मद्धम झर रही थी । खिड़की की दरारों से शीत लहर अन्दर प्रवेश कर जाती थी । तब ख़ामोशी को तोड़ते हुए मेज पर पढ़ा हुआ
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अनुगमन !

यह महज इत्तेफाक नहींकिहम शोषित और अव्यवस्थित है ।व्यवस्थित सोच से उत्पन्न समाज मेंश्रंखलित व्यवस्था के पायदान पर खड़े होशोर भर मचानाहमारी फितरत है, बसऔर कुछ नही ।हम सोचते हैं किकोई आये, औरहम बन जायें अनुयायी ।कि शायदजो दिला सके हमेंपुनः आजादी ।मगर कौन ?उन
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Feb 19 2010 03:59 PM
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फिर मिलेंगे !

लगता नही था ये क्रिसमस ईव से पहले का दिन है । ठीक उसका दिसम्बर न लगने जैसा । जब तक कोई खुद से न कहे कि यह दिसम्बर है । सड़क का एक छोर आते-आते पुल पर ख़त्म होता था । सड़क कहाँ ? शायद पगडण्डी कहना ठीक हो । जो वह पहले कही जाती रही थी । पुल के नीचे नदी सुस्त
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Feb 11 2010 05:03 PM
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उन क़दमों के निशाँ !

वो ठीक पहाड़ की चोटी पर था । जहाँ से वो उस दिशा में जाना चाहता था, जहाँ पहुँचने पर उसे मंजिल मिल जाने का एहसास हो । नही यह ठीक नहीं । उसे सम्पूर्णता का एहसास हो । जिन क़दमों के साथ वह इस चोटी पर पहुँचा था । उन पीछे रह गये क़दमों के निशाँ तो मिट गये होंगे
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लव स्टोरी !

वक़्त ने दस्तक दी । उसकी उंगली पकड़ उसे ले चल दिया और ले जाकर खड़ा कर दिया एक नदी के एक ओर । इससे पहले कि वो कुछ पूंछता उसने अपने ओठों पर उंगली रखी और उसे खामोश रहने के लिये इशारा किया । उसने इशारों ही इशारों में उसे अपनी पलकें मूँद लेने के लिये कहा ।
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ई छोकरा-छुकरिया कैसे नैन मटक्का करत रहत

स्वागत है आप सब लोगन का प्रेम नगर मां । अब ई का नाम प्रेम नगर काहे है ? बड़ा जाना पहचाना सा सवाल और हम कहत हैं कि ई सवाल का जवाब दे दे थक गये हैं कि भैया ऊ का कहत हैं कि हियाँ प्रेम बहुत होत है । जब देखो तब हियाँ के लड़के लडकियाँ नैन मटक्का करत रहत । अब ऊ
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दुनियाँ का आधा सच !

यह बात उसे बचपन में ही पता चल गयी थी कि अगर इस दुनियाँ में सबसे ज्यादा कुछ कडवा होता है तो वह है "सच" । हाँ सच सबसे ज्यादा कडवा होता है । उसके साथ हमेशा ऐसा होता था कि सच उसे टुकड़ों में पता चलता था ।उसके यहाँ काम करने वाली के मुँह से आधा सच उसे दोपहर को
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अंत का प्रारंभ !

दिन बड़े मासूमियत से गुजरा करते थे । अपने होने का भरपूर एहसास कराकर ही शाम को ढलते थे और फिर चाँद को सौंप कर चल देते थे । दिल और दबी जुबाँ जिस बात को दिन में खुद से न कह पाते वो बड़ी फुर्सत से चाँद से कहा करते ।उन कस्बाई दिलों की मोहब्बत किताबें बदलते
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तपती दोपहर का बूढा नीम

जून की एक दोपहर थी या दोपहर भरी एक जून .....नहीं शायद गर्मी की एक दोपहर । निमोरियों से नीम भरा हुआ उस तपती दोपहर को खड़ा खड़ा देख रहा था । पकी-अधपकी निमोरियाँ, कुछ जमीन पर और कुछ नीम पर झूल रही थीं ।इस सुस्त छुट्टी भरी दोपहर को काटना उतना मुस्किल न था
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मुक़र्रर समाज

सूरज धीमे धीमे बुझता सा लगने लगा । शायद हौले हौले पीला पड़ने लगा था, ठीक किसी गरीब के चेहरे की तरह । विद्यालय की घंटी, नहीं शायद घंटा, हर रोज़ की तरह जाकर महँगू ने बजा दिया था । महँगू जो पाँचवी कक्षा में पढता था, उसे यह कार्यभार मास्टर जी ने शुरू से सौंप
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उस जानिब रूहानी तक़द्दुस चेहरे

उन नीम के झरते हुए पीले पत्तों और उतरकर गाढे होते हुए अँधेरे के बीच चलती हुई बातें बहुत दूर तक चली गयी थीं । हम अपने अपने क़दमों की आहटों से अन्जान बहुत दूर निकल गये थे । तब उसने यूँ ही एकपल ठहरते हुए कहा था ....-यह नीम की पत्तियाँ झड रही हैं न...-हाँ,
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उसकी मुक़द्दस मोहब्बत !

दूर तक उड़ते हुए गर्म हवा के बवंडर हुआ करते और धूप वहाँ अपनी रूमानियत नहीं फैलाती थी। याद थी जो हर वक़्त उसके अक्स से लिपटी रहती । उन यादों को साथ ले अपनी चौखट पर खड़ी हो वो दूर तक तलाशती उस चेरे को । उन सभी पलों में इंतज़ार की लम्बी घड़ियाँ हुआ करती,
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ज़िक्र (एक प्रेम कहानी)-अंतिम भाग

कहते हैं कि ख्वाहिशों का कोई छोर नहीं होता । कहाँ शुरू होती हैं और कहाँ ख़त्म ये पता ही नहीं चलता । कुछ ख्वाहिशें तो ऐसी होती हैं कि खुद ख्वाहिशों को ख्वाहिश करने वाले से प्यार हो जाता होगा । सोचती होंगी कि कितना नेक बंद है जो दिल से इतनी मासूम सी ख्
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ज़िक्र (एक प्रेम कहानी) - भाग 2

सर्दियों की गुनगुनी धूप थी, आसमान पंक्षियों के होने से और भी ज्यादा खूबसूरत लग रहा था । पेड़ों ने अपना पुराना लिबास उतारकर नया धारण कर लिया था और उसमें वो कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रहे थे । कहीं दूर से भीगी हुई धरती की भीनी-भीनी महक आ रही थी जैसे हवाओं
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ज़िक्र (एक प्रेम कहानी)

कुछ रातें ऐसी होती हैं जो जिंदगी में अपना असर छोड़ जाती हैं । वो रात भले ही बीत जाए लेकिन उसके बाद उम्र भर कुछ अनकहे धुंधले-से अक्स स्मृतियों में उलझे रह जाते हैं । जो पानी के दाग की तरह वजूद के लिबास पर हमेशा के लिए नक्श हो जाते हैं । ऐसी ही उस रात ज
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ख़्वाहिशों की शाम ढलती है !!

अजीब दिन थे । बाहों में बाहें डाले चहलकदमी करते रहने के दिन । उतरते हुए सूरज और ढलती हुई शामों के दिन । दूजे के हाथों प्रेम संदेशा पहुँचाने के दिन । गली के नुक्कड़ पर उसका इतंजार करते रहने के दिन । किताबों के आखिरी सफहों पर मन में पिघल रहे कुछ शब्दों
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झूठा सच बनाम समाजशास्त्र

मास्टर जी कक्षा में ब्लैक बोर्ड के सामने हाथ में डंडा पकड़े हुए किसी चुनाव में दिए जाने वाले भाषण के समय मंत्री की तरह दहाड़ रहे हैं और ख़ुद को शेर से कम नहीं समझते हुए पूँछ रहे है कि बताओ "कि सतहत्तर, अठहत्तर और उनहत्तर में से कौन सी संख्या बड़ी है ।"
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नंदनी महाजन जी का हिन्दी ब्लॉग जगत को अलविदा कहना हिन्दी ब्लॉग जगत के हित में नहीं

मैं यह पोस्ट ना ही तो ज्यादा ट्रैफिक पाने के लिए लिख रहा हूँ और ना ही ज्यादा टिप्पणियों की खातिर। आज जब मैंने नंदनी महाजन जी का ब्लॉग जख्म परेशां है चुप्पी से... देखा तो मुझे बहुत दुःख हुआ यह जानकर कि नंदनी महाजन जी ने हिन्दी ब्लॉग जगत को अलविदा कहते
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आत्मा की डायरी से (जिसे जुबां ना कह सकी)

कभी कभी मन करता है कि कई दिनों तक और कई रातों तक सोता रहूँ । इतना कि इस सोते रहने की सोच से निजात मिले । हर गम और हर परेशानी उस सोते हुए दिन रात में घुल जाए, चाहे कितने भी बुरे से बुरे स्वप्न आयें और मैं उन्हें देखूं, ख़ुद को मरते हुए, जीते हुए, तडपत
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ख़ामोश सा अफ़साना !!

कभी कभी लगता है कि दूर तलक चली जाती खामोश सड़क पर मैं तुम्हारे हाथों में हाथ डाल कर यूँ ही खामोश चलता चलूँ-चलता चलूँ । कभी कभी खामोश रहना भी कितना सुकून देता है, है न । तुम्हें पता है कि जब ख़ामोशी जुबां अख्तियार कर लेती है तो बहुत सी बातें ऐसी होती है
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ब्लॉगिंग से संबंधित कुछ ग़लतफ़हमियाँ

हमारे एक मित्र थे बिल्कुल लखनऊ की नज़ाकत और नफ़ासत लिए हुए. वो अक्सर एक ज़ुमला इस्तेमाल किया करते थे " ये शरीफ़ हैं, इनकी शराफ़त की तो..." अब डैश-डैश पर मत जाइए. उसमें बहुत कुछ छिपा है, अजी मानिए कि बहुत कुछ छुपा रहता है इस डैश-डैश में. मसलन... अजी ग
Dec 04 2009 04:10 PM
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आपके ब्लॉग के दिन खराब होने के 10 लक्षण

यह टिप्पणी प्राप्त होना कि "बहुत खूबसूरत रचना/ भावपूर्ण रचना/ Nice Post" जब आपको इस तरह की टिप्पणी प्राप्त हो तो इसका तात्पर्य यह है कि पढ़ने वाले के पास आपकी पोस्ट के बारे में कहने को कु्छ नही है या बहुत से ब्लॉंगर सिर्फ़ बिना पढ़े अपनी अधिक से अधिक
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लेखक की मृत्यु

लेखक मुझे लिखना चाहता था या यूँ कहूँ कि मेरे बारे में लिखना चाहता था. उसने एक कहानी बुनी थी और वो चाहता था कि मैं उसकी कहानी का हिस्सा बनूँ. एक ऐसा हिस्सा जिससे कहानी का नज़रिया बदल जाए. वो चाहता था कि मैं उसका नायक बनूँ, एक ऐसी कहानी का नायक जो न तो
Dec 01 2009 06:56 PM
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अज़ीज़-अज़-जान लड़की

पेड़, पौधे, पत्तियाँ, फूल, खुले लम्बे दूर तक फैले खेत कहीं बहुत पीछे छूटते जा रहे हैं. खुले मैदानों में खेलते बच्चे, पल्लू को मुंह में दबाएँ मुस्कुराती वे स्त्रियाँ, बैलगाड़ी, खिली धूप ये सब एक एक करके पीछे छूट गए हैं. मैं तुमसे आखिरी विदा लेने के बा
Nov 25 2009 10:25 PM
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वक़्त की हथेली पर फैलीं

वक़्त की हथेली पर फैलीं तेरी मेरी खामोशियाँ साँसों में घुलती सी जातीं तेरी मेरी नजदीकियाँ चुपके से दबे पाँव आकर बाहों में लेती ये तन्हाइयां बंद पलकों में समेटती ख्वाबों में तेरी परछाइयां सोचता हूँ कहीं ये वही प्यारा सा इश्क तो नहीं
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Nov 25 2009 11:07 AM