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चंद मुट्ठी अशआर

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01 Feb 2010
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घिर आये..

घिर आये स्याह बादल सरे शामऔर उदास ये जेहन क्यूँ हुआपोशीदाँ अहसास क्यूँ उभर आयेये दिल तनहा दफ्फअतन क्यूँ हुआयूँ तो अब तक चेहरे की ख़ुशी छुपाते थे ग़म छुपाने का ये जतन क्यूँ हुआ कोई चोट तो गहरी लगी होगी ये संगतराश यूँ बुतशिकन क्यूँ हुआ दुष्यंत......
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चहुँ ओर यही हवा..युवा,युवा,युवा (१२ जनवरी 'युवा दिवस' पर विशेष0

बीते कुछ सालों के राष्ट्रीय परिदृश्य पर नज़र डालें तो आसानी से यह बात समझ आ जाती है की भारतीय युवा शक्ति सार्थकता के पथ पर अग्रसर है की नहीं। चाहे ओलम्पिक में स्वर्ण जीतने की 'अभिनव' शुरुआत हो या शह और मात से मिला विश्वविजय का 'आनंद'। चाहे मुष्टि प्र
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किसी और के पास कहाँ ....

तुम्हारी जो ख़बर हमें है वो किसी और के पास कहाँ देख लेता हूँ कहकहों में भी आंसू के कतरे ऐसी नजर किसी और के पास कहाँ ज़माने ने ठोकरें दी पत्थर समझकर तुने मुझे सहेज लिया मूरत समझकर होगी अब हमारी गुजर किसी और के पास कहाँ उम्र भर देख लिया बियाबान में भटक
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इसी जद्दोजहद में .........

इसी जद्दोज़हद में ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं हर्फ़ हर्फ़ जोड़ कर ज्यों सफे भर रहे हैं अधूरी है रदीफ़ काफिया नहीं है पूरा तुकबंदी मिलाने की बस जुगत कर रहे हैं ज़िन्दगी गो कि इक ग़ज़ल है रूठा हुआ हमसे अभी ये शगल है अशआरों की तरह उमड़ते हैं चेहरे कई लेकिन 'म
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सावन के आने पर ......

मेघों का अम्बर में लगा अम्बार थकते नहीं नैना दृश्य निहार हर मन कहे ये बारम्बार आहा! सावन..कोटि कोटि आभार धरा ने ओढी हरित चादर निराली लहलहाए खेत बरसी खुशहाली तन मन भिगोये रिमझिम फुहार आहा! सावन.. कोटि कोटि आभार भीगे गाँव ओ' नगर सारे थिरकीं नदियाँ छोड़
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यूँ ही .....

यूँ ही चुप रहोगे न हाल-ऐ-दिल कहोगे तो इस बाज़ार में तुम्हे कौन चुनेगा ये आवाजों की नुमाइश है जान लो ज़रा खामोशियों की सदायें यहाँ कौन सुनेगा दुष्यंत..........
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चंद मुट्ठी अशआर

जब जब दिल में टीस उठी औ' मन हुआ बीमार मैंने ख़ुद पर वार लिए चंद मुट्ठी अशआर दुष्यंत.....
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संसद भवन में.......

स्वांग धरे तरै तरै कुरता और टोपी धरे देखो कैसे कैसे आए संसद भवन में बातें करे बड़ी बड़ी जनता की है किसे पड़ी वही तो नेता कहाए संसद भवन में राज राज करे बस नीति सारी भूल जाएँ हैं सारे छंटे-छंटाये संसद भवन में भूख से हैं मरते जहाँ हजारों औ लाखों लोग ये बिन
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मुझे रात में ख़ुद से ..........

मुझे रात में ख़ुद से बेख़याली दे दे जिससे खूबसूरत मेरी सहर बन जाए या तो पलकों से बहता दरिया सूख जाए या अब बहे तो ज़हर बन जाए सोचता हूँ कहीं से खरीद लूँ वो चीज़ें जिनसे ये दीवारें घर बन जाए नए पौदे दिल की क्यारियों में रोप दो यारों ज़रा और हसीं ये शहर
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मन से नमन आज तेरा है माँ.......

माँ तेरे नेह से, दुलार से, ममता की फुहार से भीगता रहे ये जीवन, आज पुलकित है मन तेरी महानता के आगे, आज छोटा पड़ गया आसमां मन से नमन आज तेरा है माँ तेरी गोद का बिछौना, तेरा आँचल मेरा खिलौना तेरी प्यार भरी थपकी, वो सुकून भरी झपकी तेरी प्यार भरी झिड़की, त
Dec 29 2009 11:51 AM
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बादलों का .........

बादलों का काफिला आता हुआ देख कर अच्छा लगता है प्यासी धरती को सावन का मंज़र अच्छा लगता है इस भरी महफिल-ऐ-दुनिया मे उसका चंद लम्हों के लिए मुझसे बात करना, मिलना और देखना अच्छा लगता है जिन का सच होना किसी सूरत मे भी मुमकिन नहीं ऐसी ऐसी बातें अक्सर सोचकर
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अपने होठों पर ....

अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ थक गया मैं करते-करते याद तुझको अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा रोशनी हो घर जलाना चाहता हूँ आखिरी हिचक
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मैंने इस दिल पर.....

मैंने इस दिल पर बाँध सा बना दिया है मुहब्बत का दरिया अब इसके पार होता नहीं जाने क्यों अब जब भी लिखने बैठता हूँ मेरी ग़ज़ल मे इश्क का अशआर होता नहीं तुझसे नजदीकियां खो न दूँ इसलिए फासला रखा है मैंने खुशनसीब हूँ की तू इस पर बेजार होता नहीं आजकल नई हवा बह
Dec 29 2009 11:51 AM
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चंद मुट्ठी अशआर

अगर तलाश करो तो कोई मिल ही जाएगा मगर हमारी तरह कौन तुझे चाहेगा तुझे जरुर कोई चाहतों से देखेगा मगर वो ऑंखें हमारी कहाँ से लाएगा न जाने कब तेरे दिल पर नई दस्तक हो मकान खाली हुआ है कोई तो आएगा मैं अपनी राह में दीवार बन कर बैठा हूँ अगर वो आया तो किस रस्त
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नवसंवत्सर मंगलमय हो .......

नव्दिवस, नव्मास नववर्ष और नव उल्लास लिए फागुन गया चैत्र आया संग खुशियों का आभास लिए शुभ हर घड़ी है आज संग शगुनो का वास लिए करे नवारम्भ इस वर्ष का मन में विपुल विश्वास लिए सुखी रहें निरोगी रहें किसी विपदा से न सामना हो गुडी पड़वा तथा नवसंवत्सर पर 'दुष
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एक वाकया चंद पंक्तियाँ ........

भोपाल से रतलाम के सफर मे एक जोडा सामने की सीट पर ट्रेन मे बैठा था। मोह्तार्रम मुसलसल मोहतरमा पर बरस रहे थे और इल्जाम था कि वे इतनी ज्यादा पार्टियों मे क्यों शामिल होती हैं। लगातार नए पुराने वाकयों का हवाला देकर यह दर्शाने कि कोशिश की जा रही थी कि उनक
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पगली सी इक लड़की ........

मैं जब चाँदनी के साथ छत पर टहलता हूँ चाँद हाथों से छुपाती है वो पगली सी लड़की उसकी इस चुहल पर जब खीज उठता हूँ मैं तो खिलखिलाती मुस्कुराती है वो पगली सी लड़की मैं जब कागज़ पर स्याही से ग़ज़ल लिखता ह तो संग संग गुनगुनाती है वो पगली सी लड़की कभी जिदें बच्
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सृष्टि की अनमोल कृति ........

सृष्टि की अनमोल कृति कभी दुलारती मां बन जाती कभी बहन बन स्नेह जताती बेटी बन जब पिया घर जाती आँसू की धारा बह जाती कभी पत्नी बन प्यार लुटाती बहु बन घर को स्वर्ग बनाती नारी तेरे बहुविध रूपों से यह संसार चमन है नारी दिवस पर हर नारी को बारम्बार नमन है ...
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आओ हम तुम मिलकर ........

आओ हम तुम मिलकर इस जहाँ में सच्चा प्यार ढूँढें कुछ तुम्हारी रूबाइयों को देखें कुछ मेरी ग़ज़ल के अशआर ढूँढें मुहब्बत का दरिया भी रीत गया ठूंठ इश्क के बाग़ हुए इस चमन मे अब खिजां की बस्ती है आओ हम इसके लिए बहार ढूँढें कभी यहाँ शायर मुहब्बत की ग़ज़ल कहत
Dec 29 2009 11:51 AM
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आज तिमिर का नाश हुआ.....

आज तिमिर का नाश हुआ दीपों की लगी कतार कार्तिक अमावस्या लेकर आई यह आलोकित उपहार द्वार द्वार पर दीप जलें घर घर हुआ श्रृंगार हर देहरी प्रदीप्त हुई बिखरा हर्ष अपार झाड़ बुहार आँगन को लक्ष्मी को दें आमंत्रण करबद्ध हो सब करें मन से रमा का वंदन सभी को शुभ द
Oct 14 2009 07:48 PM
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दियार-ऐ-इश्क से गुजर जाने से पहले........

दियार-ऐ-इश्क़* से गुजर जाने से पहले, थे होशमंद, न थे दीवाने से पहले *इश्क का शहर सब्ज़ बाग़, सुर्ख गुल हम देख ही न पाये, खिजां आ गई बहार आने से पहले बज़्म* में उनकी मुहब्बत एक तमाशा है, मालूम न था हमें, वहां जाने से पहले *बज़्म- महफिल मेरा नाखुदा* तो न
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इस पिघलती शाम.....

इस पिघलती शाम को अपना बनाया जाएउसका ज़िक्र छेड़ो, कुछ सुना-सुनाया जाएआंखों में खलल देती है शमअ बेवफाबुझा दो इसे, वफ़ा का सबक सिखाया जाएअक्सर ख़याल-ऐ-यार ही देता है खुमारीज़रा जाम भी भरो यारों, इसे और बढाया जाएगहराया है नशा, ज़रा तेज़ रक्स होगहरा गई है रात,
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मैं चला था जहाँ से ......

मैं चला था जहाँ से , वहां अब भी घना कुहरा खड़ा है मेरे चलने से हुई है रोशनी , या वो ख़ुद ही पीछे मुडा है वो कहते थे हमसे कि यूँ न बदलेगा नसीब होने तो दो मुकाबला , देख लेंगे कौन बड़ा है खैर सूरत पे ज़ोर जो चलता नहीं लो कि आइना ही अब सोने में जड़ा है मु