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संजीव सलिल की रचनाएँ

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17 Jun 2010
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गीत: तो चलूँ …… संजीव 'सलिल'

गीत:तो चलूँ ……संजीव 'सलिल'*जिसकी यादों में 'सलिल', खोया सुबहो-शाम.कण-कण में वह दीखता, मुझको आठों याम..दूरियाँ उससे जो मेरी हैं, मिटा लूँ तो चलूँउसमें बस जाऊँ उसे खुद में बसा लूँ तो चलूँ ……मैं तो साया हूँ, मेरा ज़िक्र भी कोई क्यों करे. जब भी ले नाम मेरा,
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Jun 17 2010 10:25 AM
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कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल'

कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल' कथा-गीत:मैं बूढा बरगद हूँ यारों...संजीव 'सलिल' **मैं बूढा बरगद हूँ यारों...है याद कभी मैं अंकुर था. दो पल्लव लिए लजाता था. ऊँचे वृक्षों को देख-देख-मैं खुद पर ही शर्माता था. धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ.शाखें
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Jun 16 2010 09:08 PM
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गीत : भाग्य निज पल-पल सराहूँ..... ---संजीव 'सलिल'

        गीत :        भाग्य निज पल-पल सराहूँ.....        संजीव 'सलिल'       
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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मुक्तिका: मन का इकतारा.... --संजीव 'सलिल'

 : मुक्तिका :मन का इकतारासंजीव 'सलिल' **मन का इकतारा तुम ही तुम कहता है. जैसे नेह नर्मदा में जल बहता है.. *सब में रब या रब में सब को जब देखा. देश धर्म भाषा का अंतर ढहता है.. *जिसको कोई गैर न कोई अपना है.हँस सबको वह, उसको सब जग सहता है..*मेरा बैरी
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीत: ताल देते भँवर रे....... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

गीत:संजीव 'सलिल'geetsalila.blogspot.कॉमसाजों की कश्ती सेसुर का संगीत बहालहर-लहर चप्पू लेताल देते भँवर रे....थापों की मछलियाँ,नर्तित हो झूमतींनादों-आलापों कोसुन मचलतीं-लूमतीं.दादुर टरटरा रहेकच्छप की रास देख-चक्रवाक चहक रहेस्तुति सुन सिहर रे....टन-टन-टन
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीत: मिला न उनको पानी.... --संजीव 'सलिल'

गीत:मिला न उनको पानी....संजीव 'सलिल'**छलनेवाले, छले गए कह-सुन नित नयी कहानी.आग लगाते रहे, जले जब- मिला न उनको पानी....*नफरत के खत लिखे अनगिनत प्रेम संदेश न भेजा. कली-कुसुम को कुचला लेकिन काँटा-शूल सहेजा. याद दिलाई औरों को, अब याद आ रही नानी....*हरियाली
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीत: काला कूट धुआँ....... --संजीव 'सलिल'

गीत: संजीव 'सलिल'**तन-मन, जग-जीवन झुलसाता काला कूट धुआँ.सच का शंकर हँस पी जाता, सारा झूट धुआँ....आशा तरसी, आँखें बरसीं,श्वासा करती जंग.गायन कर गीतों का, पातीहर पल नवल उमंग.रागी अंतस ओढ़े चोला भगवा-जूट धुआँ.....पंडित हुए प्रवीण, ढाईआखर से
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
May 24 2010 07:57 PM
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नवगीत: मुँह में नहीं जुबान...... --संजीव 'सलिल'

नव गीत:संजीव वर्मा 'सलिल'  मौन देखकरयह मत समझोमुँह में नहीं जुबान...*शांति-शिष्टता,धैर्य-भद्रता,जीवट की पहचान.शांत सतह के नीचे हलचल,मचल रहे अरमान.श्वेत-शयन लख यह मत समझो रंगों से अनजान. मौन देखकर यह मत समझोमुँह में नहीं जुबान...*ऊपर-नीचे सब जानें पर
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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तितलियाँ : कुछ अश'आर संजीव 'सलिल'

 तितलियाँ : कुछ अश'आर संजीव 'सलिल'तितलियाँ जां निसार कर देंगीं.हम चराग-ए-रौशनी तो बन जाएँ..*तितलियों की चाह में दौड़ो न तुम.फूल बन महको तो खुद आयेंगी ये..*तितलियों को देख भँवरे ने कहा. भटकतीं दर-दर न क्यों एक घर किया?कहा तितली ने मिले सब दिल
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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अंतिम गीत: लिए हाथ में हाथ चलेंगे.... ---संजीव 'सलिल'

 . अंतिम गीतसंजीव 'सलिल' *ओ मेरी सर्वान्गिनी! मुझको याद वचन वह 'साथ रहेंगे'तुम जातीं क्यों आज अकेली?, लिए हाथ में हाथ चलेंगे....*दो अपूर्ण मिल पूर्ण हुए हम सुमन-सुरभि, दीपक-बाती बन. अपने अंतर्मन को खोकर क्यों रह जाऊँ मैं केवल तन? शिवा रहित शिव, शव
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
May 14 2010 10:26 AM
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मातृ दिवस पर स्मृति गीत: माँ की सुधियाँ पुरवाई सी.... संजीव 'सलिल'

माँ की सुधियाँ  पुरवाई सी....संजीव 'सलिल'*तन पुलकित मन प्रमुदित करतीं माँ की सुधियाँ  पुरवाई सीतुमको खोकर खुद को खोया, संभव कभी न भरपाई सी ...  *दूर रहा जो उसे खलिश है तुमको देख नहीं वह पाया.निकट रहा मैं लेकिन बेबस रस्ता छेक नहीं
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीत : जब - तब --संजीव 'सलिल'

गीत : जब - तब संजीव 'सलिल' अभिषेक किया जब अक्षर का, तब कविता का दीदार मिला.शब्दों की आराधना करी-तब भावों का स्वीकार मिला.जब छंद बसाया निज उर में तब कविता के दर्शन पाये.पर पीड़ा जब अपनी समझीतब जीवन के स्वर मुस्काये.जब वहम अहम् का दूर हुआतब अनुरागी मन
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
May 06 2010 10:15 AM
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रासलीला : संजीव 'सलिल'

रासलीला :संजीव 'सलिल' *आँख में सपने सुनहरे झूलते हैं. रूप लख भँवरे स्वयं को भूलते हैं.झूमती लट नर्तकी सी डोलती है.फिजा में रस फागुनी चुप घोलती है.कपोलों की लालिमा प्राची हुई है.कुन्तलों की कालिमा नागिन मुई है.अधर शतदल पाँखुरी से रसभरे हैं.नासिका
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: मत हो राम अधीर...... --संजीव 'सलिल'

*जीवन के सुख-दुःख हँस झेलो ,मत हो राम अधीर.....*भाव, आभाव, प्रभाव ज़िन्दगी.मिल्न, विरह, अलगाव जिंदगी.अनिल अनल परस नभ पानी-पा, खो, बिसर स्वभाव ज़िन्दगी.अवध रहोया तजो, तुम्हें तो सहनी होगी पीर.....*मत वामन हो, तुम विराट हो.ढाबे सम्मुख बिछी खाट हो.संग कबीरा
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नव गीत: झुलस रहा गाँव..... --संजीव 'सलिल'

*झुलस रहा गाँवघाम में झुलस रहा...*राजनीति बैर की उगा रही फसल.मेहनती युवाओं की खो गयी नसल..माटी मोल बिक रहा बजार में असल.शान से सजा माल में नक़ल..गाँव शहर से कहो कहाँ अलग रहा?झुलस रहा गाँवघाम में झुलस रहा...*एक दूसरे की लगे जेब काटने.रेवड़ियाँ चीन्ह-चीन्ह
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: करो बुवाई... --संजीव 'सलिल'

नवगीत:करो बुवाई...खेत गोड़कर करो बुवाई...*ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.मँहगाई जी-जाल बड़ी है. सच मुश्किल की आई घड़ी है.नहीं पीर की कोई जडी है.अब कोशिश कीहो पहुनाई.खेत गोड़कर करो बुवाई...*उगा खरपतवार कंटीला. महका महुआ मदिर नशीला.हुआ भोथरा कोशिश-कीला.श्रम से कर
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नव गीत: मीत तुम्हारी राह हेरता... --संजीव 'सलिल'

गीतमीत तुम्हारी राह हेरता...संजीव 'सलिल'*मीत तुम्हारी राह हेरता...*सुधियों के उपवन में तुमनेवासंती शत सुमन खिलाये.विकल अकेले प्राण देखकर-भ्रमर बने तुम, गीत सुनाये.चाह जगा कर आह हुए गुममूँदे नयन दरश करते हम-आँख खुली तो तुम्हें न पाकरमन बौराये, तन
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीतिका: बिना नाव पतवार हुए हैं... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

गीतसंजीव 'सलिल'*वक़्त ने दिल को दिए हैंघाव कितने?...*हम समझ ही नहीं पाएकौन क्या है?और तुमने यह न समझा मौन क्या है?साथ रहकर भी रहे क्योंदूर हरदम?कौन जाने हैं अजानेभाव कितने?वक़्त ने दिल को दिए हैंघाव कितने?...*चाहकर भी तुम न हमकोचाह पाए.दाहकर भी हम न
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: बजा बाँसुरी ---संजीव 'सलिल'

*बजा बाँसुरीझूम-झूम मन...*जंगल-जंगलगमक रहा है.महुआ फूलामहक रहा है.बौराया हैआम दशहरी-पिक कूकी, चितचहक रहा है.डगर-डगर परछाया फागुन...*पियराई सरसोंजवान है.मनसिज तानेशर-कमान है.दिनकर छेड़ेउषा लजाई-प्रेम-साक्षीचुप मचान है.बैरन पायलकरती गायन...*रतिपति बिन
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: ऊषा को लिए बाँह में ---संजीव 'सलिल'

नव गीत:ऊषा को लिए बाँह मेंसंजीव 'सलिल'*ऊषा को लिए बाँह में,संध्या को चाह में.सूरज सुलग रहा है-रजनी के दाह में...*पानी के बुलबुलों सीआशाएँ पल रहीं.इच्छाएँ हौसलों कोदिन-रात छल रहीं.पग थक रहे, मंजिलकहीं पाई न राह में.सूरज सुलग रहा है-रजनी के दाह
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत : चूहा झाँक रहा हंडी में... --संजीव 'सलिल'

नवगीत :चूहा झाँक रहा हंडी में...संजीव 'सलिल'*चूहा झाँक रहा हंडी में,लेकिन पाई सिर्फ हताशा...*मेहनतकश के हाथ हमेशारहते हैं क्यों खाली-खाली?मोती तोंदों के महलों में-क्यों बसंत लाता खुशहाली?ऊँची कुर्सीवाले पातेअपने मुँह में सदा बताशा.चूहा झाँक रहा हंडी
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Mar 07 2010 08:43 AM
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गीत : किस तरह आये बसंत?... --संजीव 'सलिल'

गीत :किस तरह आये बसंत?...मानव लूट रहा प्रकृति कोकिस तरह आये बसंत?...*होरी कैसे छाये टपरिया?,धनिया कैसे भरे गगरिया?गाँव लीलकर हँसे नगरिया.राजमार्ग बन गयी डगरिया.राधा को छल रहा सँवरिया.अंतर्मन रो रहा निरंतरकिस तरह गाये बसंत?...*बैला-बछिया कहाँ चरायें?सूखी
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Mar 06 2010 08:01 PM
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नवगीत: आँखें रहते सूर हो गए --संजीव 'सलिल'

नवगीत;संजीव 'सलिल'*आँखें रहते सूर हो गए,जब हम खुद से दूर हो गए.खुद से खुद की भेंट हुई तो-जग-जीवन के नूर हो गए...*सबलों के आगे झुकते सब.रब के आगे झुकता है नब.वहम अहम् का मिटा सकें तो-मोह न पाते दुनिया के ढब.जब यह सत्य समझ में आया-भ्रम-मरीचिका दूर हो
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Mar 05 2010 09:17 AM
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नवगीत: रंगों का नव पर्व बसंती ---संजीव सलिल

रंगों का नव पर्व बसंतीरंगों का नव पर्व बसंतीसतरंगा आयासद्भावों के जंगल गायबपर्वत पछतायाआशा पंछी को खोजे सेठौर नहीं मिलती.महानगर में शिव-पूजन कोबौर नहीं मिलती.चकित अपर्णा देख, अपर्णाहै भू की काया.सद्भावों के जंगल गायबपर्वत पछतायाकागा-कोयल का अंतर अबजाने
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Feb 24 2010 10:43 PM
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गीत : सबको हक है जीने का --संजीव 'सलिल'

गीत : संजीव 'सलिल' सबको हक है जीने का,चुल्लू-चुल्लू पीने का.....*जिसने पाई श्वास यहाँ,उसने पाई प्यास यहाँ. चाह रचा ले रास यहाँ.हर दिन हो मधुमास यहाँ. आह न हो, हो हास यहाँ.आम नहीं हो खास यहाँ. जो चाहा वह पा जानाहै सौभाग्य नगीने का.....*कोई अधूरी आस न
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Feb 23 2010 04:50 PM
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आदि शक्ति वंदना: संजीव वर्मा 'सलिल'

आदि शक्ति वंदना: संजीव वर्मा 'सलिल'*आदि शक्ति जगदम्बिके, विनत नवाऊँ शीश.रमा-शारदा हों सदय, करें कृपा जगदीश....*पराप्रकृति जगदम्बे मैया, विनय करो स्वीकार.चरण-शरण हैं, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....*अनुपम-अद्भुत रूप, दिव्य छवि, दर्शन कर जग धन्य.कंकर से
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
टैग: kaxmi
Feb 20 2010 06:17 PM
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नवगीत: फगुनौटी त्यौहार. --संजीव 'सलिल'

नवगीत:संजीव 'सलिल' फागुन फगुनाई फगुनाहटफगुनौटी त्यौहार.रश्मिरथी हो विनत कर रहा वसुधा की मनुहार.....*किरण-करों से कर आलिंगित पोर-पोर ले चूम. बौर खिलें तब आम्र-कुञ्ज में विहँसे भू मासूम.चंचल बरसाती सलिला भी हुई सलज्जा नार.कुलाचार तट-बंधन में बंधचली पिया के
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Feb 14 2010 10:22 AM
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दोहा गीत: धरती ने हरियाली ओढी --संजीव 'सलिल'

धरती ने हरियाली ओढी,मनहर किया सिंगार.,दिल पर लोटा सांपहो गया सूरज तप्त अंगार...*नेह नर्मदा तीर हुलसकरबतला रहा पलाश.आया है ऋतुराज काटनेशीत काल के पाश.गौरा बौराकर बौरा कीकरती है मनुहार.धरती ने हरियाली ओढी,मनहर किया सिंगार.*निज स्वार्थों के वशीभूत हो छले न
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Feb 13 2010 11:41 PM
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सामयिक कविता: संजीव 'सलिल'

सामयिक कविता:संजीव 'सलिल'*हर चेहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.अलग तरीका, अलग सलीका, अलग ढंग है...*भगवा कमल चढ़ा सत्ता पर जिसको लेकरगया पाक बस में, आया हो बेबस होकर.भाषण लच्छेदार सुनाये, सबको भये.धोती कुरता गमछा धारे सबको भाये.बरस-बरस उसकी छवि हमने विहँस
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: चले श्वास-चौसर पर... ---संजीव 'सलिल'

*चले श्वास-चौसर पर...आसों का शकुनी नित दाँव.मौन रो रही कोयल,कागा हँसकर बोले काँव...*संबंधों को अनुबंधों नेबना दिया बाज़ार.प्रतिबंधों के धंधों के आगे दुनिया लाचार.कामनाओं ने भावनाओं को करा दिया नीलम.बद को अच्छा माने दुनिया कहे बुरा बदनाम.ठंडक देती धूपतप
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीत: निर्झर सम / निर्बंध बहो संजीव 'सलिल'

गीत संजीव 'सलिल' निर्झर सम निर्बंध बहो,सत नारायण कथा कहो...जब से उजडे हैं पनघट.तब से गाँव हुए मरघट.चौपालों में हँसो-अहो...पायल-चूड़ी बजने दो.नाथ-बिंदी भी सजने दो. पीर छिपा-सुख बाँट गहो...अमराई सुनसान न हो.कुँए-खेतवीरान न हो.धूप-छाँव मिल 'सलिल'
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत / भजन: भोर हो गयी... --संजीव 'सलिल'

नवगीत / भजन:संजीव 'सलिल' जाग जुलाहे!भोर हो गयी...***आशा-पंछी चहक रहा है.सुमन सुरभि ले महक रहा है..समय बीतते समय न लगता.कदम रोक, क्यों बहक रहा है?संयम पहरेदार सो रहा-सुविधा चतुरा चोर हो गयी.जाग जुलाहे!भोर हो गयी...***साँसों का चरखा तक-धिन-धिन.आसों का धागा
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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संजीव सलिल की रचनाएँ

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: सारा का सारा हिंदी हैआचार्य संजीव 'सलिल'* जो कुछ भी इस देश में है, सारा का सारा हिंदी है. हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है.... मणिपुरी, कथकली, भरतनाट्यम, कुचपुडी, गरबा अपना है. लेजिम, भंगड़ा, राई, डांडिया हर नूपुर का
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: चले श्वास-चौसर पर -संजीव 'सलिल'

नवगीतसंजीव 'सलिल'चले श्वास-चौसर परआसों का शकुनी नित दाँव.मौन रो रही कोयल कागा हँसकर बोले काँव...*सम्बंधों को अनुबंधों ने बना दिया बाज़ार. प्रतिबंधों के धंधों के आगे दुनिया लाचार.कामनाओं ने भावनाओं को करा दिया नीलाम.बाद को अच्छा माने दुनिया,कहे बुरा
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत:: हर चहरे पर/नकली चहरा... --संजीव 'सलिल'

नवगीत:संजीव 'सलिल' *हर चहरे परनकली चहरा...*आँखें रहते सूर हो गए.क्यों हम खुद से दूर हो गए?हटा दिए जब सभी आवरण तब धरती के नूर हो गए. रोक न पाया कोई पहरा.हर चहरे परनकली चहरा...*भूत-अभूतपूर्व की वर्चा.भूल करें हमअब की अर्चा.चर्चा रोकें निराधार सब. हो न
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: गीत का बनकर / विषय जाड़ा --संजीव 'सलिल'

नवगीत:संजीव 'सलिल' गीत का बनकर विषय जाड़ानियति पर अभिमान करता है...कोहरे से गले मिलते भाव.निर्मला हैं बिम्ब के नव ताव..शिल्प पर शैदा हुई रजनी-रवि विमल सम्मान करता है...गीत का बनकर विषय जाड़ानियति पर अभिमान करता है...फूल-पत्तों पर जमी है ओस.घास पाले को
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: हवा में ठंडक संजीव 'सलिल'

नवगीत: हवा में ठंडक संजीव 'सलिल'हवा में ठंडक बहुत हैकाँपता है गात साराठिठुरता सूरज बिचाराओस-पालानाचते हैं-हौसलों को आँकते हैंयुवा में खुंदक बहुत हैगर्मजोशी चुक न पाए,पग उठा जो रुक न पाएशेष चिंगारीअभी भी-ज्वलित अग्यारी अभी भीदुआ दुःख-भंजक बहुत हैहवा
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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कुण्डलिनी: --आचार्य संजीव 'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदा

कुण्डलिनीआचार्य संजीव 'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदाकरुणा संवेदन बिना, नहीं काव्य में तंत..करुणा रस जिस ह्रदय में वह हो जाता संत.वह हो जाता संत, न कोई पीर परायी.आँसू सबके पोंछ, लगे सार्थकता पाई.कंकर में शंकर दिखते, होता मन-मंथन. 'सलिल' व्यर्थ है गीत, बिना
 
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सरस्वती वंदना : २ -संजीव 'सलिल'

सरस्वती वंदना : २ संजीव 'सलिल'*हे हंसवाहिनी!, ज्ञानदायिनी!!अम्ब विमल मति दे...*जग सिरमौर बने माँ भारत.सुख-सौभाग्य करे नित स्वागत.नव बल-विक्रम दे...*साहस-शील ह्रदय में भर दे.जीवन त्याग-तपोमय कर दे.स्वाभिमान भर दे...*लव-कुश, ध्रुव-प्रह्लाद हम बनें.मानवता
 
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गीतिका: तितलियाँ --संजीव 'सलिल'

गीतिका तितलियाँ संजीव 'सलिल' *यादों की बारात तितलियाँ.कुदरत की सौगात तितलियाँ..बिरले जिनके कद्रदान हैं.दर्द भरे नग्मात तितलियाँ..नाच रहीं हैं ये बिटियों सीशोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ..बद से बदतर होते जाते.जो, हैं वे हालात तितलियाँ..कली-कली का रस लेती
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
टैग: muktika