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सागरनामा

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08 Mar 2010
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" फिर दिखा वो आइना ...."

चंद कतरे ज़िंदगी की ओस के, होंठों पे रखमैं खुश हुआ था,फिर किसी उम्मीद के अहसास ने आकर के यूँमुझको छुआ था !एक पल में उड़ चले थे , सोच के पर जाने कहाँ,सच मेरी लाचार हालत का भी मुझको झूठ सालगने लगा था ! .......कि अचानक दिख गयी तस्वीर वो जो थी हकीकत, फिर दिखा
 
सागर
Feb 14 2010 03:21 PM
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मैं मगर हारा नहीं हूँ

थक गया हूँ मैं भले हीमैं मगर हारा नहीं हूँ...वक़्त हो कितना भी कातिलवक़्त का मारा नहीं हूँ !!दीप मेरा आँधियों में लड़खड़ाता ही सहीपर जल रहा है....हौसला बोझिल हुआ सा डगमगाता ही सहीपर चल रहा है !रौशनी की लकीरें कुछ दिखें या न सही ,घबरा के दम को घोंट लूं ,
 
सागर
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आंसू -१

निशान बाकी रहें इसीलिए गीलापन ज़रूरी है बहुत सूखी रेत पर क्या रहेंगे अभी हैं अभी हवा का स्पर्श पाते ही चुक जायेंगे निशान बाकी रहें इसीलिए तो.....!! यूँ ही नहीं बिछाता आया हूँ मैं आँसू तुम्हारी राह में !!
 
सागर
Dec 29 2009 11:57 AM
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....प्रतिक्रया !

बोल हल्ला " ब्लॉग पर ' कैसे मिलेगा न्याय जयश्री को ' पोस्ट पड़ने के बाद की प्रतिक्रया" कभी घर के अंदर कोई आरुशी तो कभी बाहर कोई जयश्री किसी मिटटी के लौंदे की तरह मसल दी जाती है मिटा दी जाती है ; ब्लैक बोर्ड पर लिखी किसी इबारत की तरह ! हम सिर्फ़ तमाशबी
 
सागर
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...अपने करीब !

आ स्था और फिर अनास्था और दोनों के बीच कहीं छुटता हुआ एक सूत्र फैलता हुआ तागा जब जब मेरी हथेलियों के बीच उग आई भाग्य रेखा को छूता है... तब तब कहीं अन्यायास ही मैं अपने करीब , बहुत करीब पहुँचने लगता हूँ !!
 
सागर
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"नववर्ष की शुभ कामनाएं "

समक्रमिकता से समस्वरता ... होती विस्तृत चेतनता ; पुष्पित कुसुमित होता अवचेतन धूम्राच्छादित परिवेश से परे अलमस्त कुछ सागर की तरह ; स्तनित नर्तन , अतिवर्तन औ' जीवंतता , स्वर नियंता का चरैवेति ....चरैवेति ! है लक्ष्य से भी महत्वपूर्ण गंतव्य - यात्रा की
 
सागर
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आज खबर है - कल दीवाली थी....

कुछ फुसफुसाहटें सी सुनाई तो दी थी यहाँ ! कुछ रौशनी सी भी हुई थी इस खामोश कोने में आज खबर है - कल दीवाली थी , गुज़र गयी !!
 
सागर
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** शुभकामनायें **

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें
 
सागर
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दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें
 
सागर
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तेरह अक्टूबर ....किशोर की याद में... .....!!

एक कुर्सी खींच कर उल्टी बैठा था कुछ ही देर पहले वो एक कबूतर टूटी प्याली में चोंच मारता पलकें झपकाता गाता मुस्कुराता नाचता नचाता .... हवाओं में रंग से भरता हुआ उड़ गया अचानक जाने कहाँ ...! अब सिर्फ पंख हैं .... कुछ प्याली में कुछ कुर्सी पर और कुछ इधर उ
 
सागर
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मैं का टूटना... हम हो जाना..... दर्द है !!

मैं का टूटना हम हो जाना दर्द है तपती सांकल की तरह ना छुअन की संभावना ना ही खुल जाने की आस बंद होती हथेली पर पूर्ण और अपूर्ण के दरम्यान भीड़ सा हो जाने का अहसास सर उठाता है .. चुभता रहता है तीखी किरचों की तरह एकाकीपन आँख बंद करता है ( अंधों से परिचय भ
 
सागर
Oct 14 2009 07:57 PM
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"...वक्त्त"

मिल ही जाता है वक्त्त मुझे देर सवेर ,लाख उससे मैं दामन बचाता रहूं !घोँप कर घड़ी के काँटे मेरी हथेली पर ;चाहता है कमबखत मुस्कुराता रहूं !!
 
सागर
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"....ये मेरा खुदा "

....और फिर अपनी ही उनींदी परछाईं में मैंने उसे देखा इक ख्वाब के अहसास साकुंवारी बर्फ सी सफेदी लिए हवाओं में खुशबू कि तरह सब तरफ बिखरता हुआ सा और फिर महसूसा ...रूह की गहराई में दूsssर तक उतरतेएक चुप्प सी खामोशी बनकर ....हौले हौले !!ये मेरा खुदा तुम्हारे
 
सागर
Sep 12 2009 06:18 AM
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कहाँ थे तुम ?

कहाँ थे तुम जब पुकारा था तुम्हें मेरे दर्द ने ? कहाँ थे तुम जब दिन भर ये नम आँखे हर किसी सूरजमुखी कि पंखुडी टटोल रही थी , हर गली -हर मकान के मुंडेरों पर घुटनों के बल चल चल मेरी हर सांस तुम्हारी ही किसी छूट गयी परछाईं कि टोह में इधर उधर डोल रही थी...
 
सागर
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"...पराजय के बाद "

कल तक जो धूप थी आँगन में पसरी पसरी ; एक खामोश सी उदासी हो गयी है , गमलों में लगे डेलिया , अपने तमाम रंगों के बावजूद अब कुछ गुनगुनाते नहीं ..... पडौसी की दीवार पर बैठी गौरय्या जो कल तक खूब बतियाती फिरती थी आज वहीं दूर बैठी टिकटिकी लगाये बस ...... देखत
 
सागर
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सागरनामा

विश्वास एक ज़मीं का एहसास इक ज़मीं का संत्रास इक ज़मी का ; ........................... तोड़ने लगता है शिराएँ अंतर्मन की रोकने लगता है धाराएं मन - प्रवाह की ; दो गुनी ताक़त से सर उठाती है अस्मिता हौसले और सर चढ़ जाते हैं जिजविषा पीठ छूकर अस्तित्व निखारत
 
सागर
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किस्सा

खिड़की के पल्ले में सिमटा छोटा सा आकाश आस पास की बिखरी भीड़ का दस्तावेज़ बन चला है क्यूंकि मैं जानता हूँ ................. इन आँखों के फ्रेम में दिखने वाली साली भीड़ नहीं है फकत भीड़ का इक छोटा सा हिस्सा है ! अपनी अभिव्यक्ति के बहाने जिसे संवेदनाओं क
 
सागर
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जीवन रीत गया...!

अतीत से कटा नहीं वर्तमान के गुंथे आते में अटा जीवन रीत गया !! कितने टुकड़े जिया पल पल , क्षण क्षण याद नहीं - - गिनती आती नहीं - या की जाती नहीं । किससे कितना जुड़ा कितना कटा जीवन रीत गया !! कितने पैर होंगे सोच के कबूतर के कितने संभाल कर रखे हैं ख़ुद ही
 
सागर
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आंसू-२

उसने जब जब छुआ है चेहरा ख़ुद का कांपती हथेलियों ने पूछा है ॥ तुम सागर तो नहीं हो फिर यह चेहरे पर तुम्हारे रेत सा गीलापन क्यों है ? अब कौन इन सूखी सी अपनी ही लकीरों से उलझती, मात खाती हथेलियों को समझाए "आंसुओं के लिए भी कभी कोई शर्त होती है ???"
 
सागर