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बस, सिर्फ़ दो मिनट ...

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03 Jun 2010
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Commented on “मानसिक हलचल “

At disqus too, you needed to grab the priviledge of disapproval, Hunh ? बादशाह सलामत मॉडरेशन अटारी बैठ मुर्गे और तीतर लड़ा रहे हैं ? Originally posted as a comment by amarindia1 on मानसिक हलचल using DISQUS.
 
डा० अमर कुमार
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अनिर्वचनीय सुख

सुख की परिभाषा व सीमा मैं निर्धारित नहीं कर पाता । फिर भी कुछ ऎसे क्षण अनायास टकराते हैं कि मन एक अनाम आह्लाद से भर जाता है । हमारे हृदय को क्या पुलक से भर देता है, क्या नहीं ? इसको आप क्या शब्दों की सीमा में बाँध सकते हैं ?  जैसे कि पोपले [...]
 
डा० अमर कुमार
Dec 29 2009 11:57 AM
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कंट्रोल अल्टर डिलीट के मायने

आपमें से लगभग हर कोई कम्प्यूटर का इतना जानकार है कि मायने आईने की तरह साफ़ है, कंट्रोल अल्टर डिलीट यानि सिस्टम रिस्टार्ट ! फिर यह संबोधन शीर्षक चिकित्सीय संदर्भ में कहाँ घुसपैठ लगा रहा है ? मैंने ही अपनी अवधारणाओं के चलते इस पन्ने का यह नामकरण किया है
 
डा० अमर कुमार
Dec 29 2009 11:57 AM
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कुछ ख़ास नहीं

वर्ड्प्रेस पर मेरे ब्लाग चल नहीं पाते, पता नहीं क्यों ? शायद मेरा अनाड़ीपन ही हो । मनुष्य की नाड़ी पर पकड़ बना लेने से ही कोई सर्वज्ञ तो नहीं हो जाता । चलो एक शुरुआत फ़िर सही, प्रतिष्ठित भले हो किंतु वर्डप्रेस सुगम्य नहीं लगता, जाने क्यों ? आज बच्चों का
 
डा० अमर कुमार
Dec 29 2009 11:57 AM
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साक्ष्य एक अनर्गल प्रलाप का

दोस्त हिन्दी ब्लोग की गरिमा को बनाये रखिए । विवाद मे कुछ नही मिलेगा । किसी के भी पास समय नही है इन बातों कि तह मे जाने का । हो सके तो आप विवाद का अंत करे अपनी तरफ से बढ़ावा ना दे । बिना वजह आपकी सकारात्मक ऊर्जा बर्बाद हो रही है । Originally [...]
 
डा० अमर कुमार
Dec 29 2009 11:57 AM
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साक्ष्य एक अनर्गल प्रलाप का

डा0 अमर कुमार के शब्द हैं: ”यह ठीक है, कि आप बाहर आज़ाद घूम रहे हैं, लेकिन मियाँ जी जूती भी पहना करते हैं । जब तक आप अपने बीमार मन का इलाज़ नहीं करवा लेते, यह जूती यदा कदा प्रयोग कर सकते हैं ! सिर की अदला बदली होती रहेगी, पर उसकी नौबत न [...]
 
डा० अमर कुमार
Dec 29 2009 11:57 AM
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अभूतपूर्व का तो पता नहीं जी..पर यह है…

अविस्मरणीय, कम से कम मेरे लिये तो है ही ! दूसरे भभकी देते हों..शेख़ी बघारते हों या कि कुछ और..लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि मैंने दुनिया देखी है, क्यॊकि मेरे लिये अब तक दुनिया के रंग गिन पाना ही कठिन है…सो ?  आज इस दुनिया का एक और रंग देखने को मिल
 
डा० अमर कुमार
Dec 29 2009 11:57 AM
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हाय मुफ़्त होते बदनाम…, काहे को हाय ?

एक अधीर फुसफुसाहट.., “ कौन है, अंदर ? “ फ़ौरन ही जवाब मिलता है, एक खीझभरी जम्हुँआई के साथ.., “ अरे यार कोनो बैग-वाला घुसा बैठा है, तब से ! “ घड़ी पर एक उचटती निग़ाह डालते हुये अपना ग़ुबार निकालता है, “ झोला भर के दवाई ले गवा है..डाक्टरवा के फुसलावत होई,
 
डा० अमर कुमार
Dec 29 2009 11:57 AM
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हम …आपको समझना चाहते हैं !

हम अपने गिरेबाँ में झाँक चुके, अब आपकी बारी है ! बहुधा एक अल्प पढ़ालिखा आदमी बल्कि कभी कभी अनपढ़ भी, किसी डाक्टर को यह कह कर ख़ारिज़ कर देते हैं कि ‘  डाक्टर समझ में नहीं आये । ‘ मेरे कानों तक भी बात आती है तो मन में यही एक प्रश्न उठता ह
 
डा० अमर कुमार
Dec 29 2009 11:57 AM
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सुन मेरे बंधु रे….ऽऽ , सुन मेरे साथी

प्रिय मित्रों                 सर्वप्रथम यह संबोधन अपने व्यवसायिक मित्रों  के लिये ही है । इससे पहले कि, उनमें कहीं से असंतोष या विरोध के स्वर उठें, मैं यह स्पष्ट कर दूँ क
 
डा० अमर कुमार
Dec 29 2009 11:57 AM
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साक्ष्य एक अनर्गल प्रलाप का

दोस्त हिन्दी ब्लोग की गरिमा को बनाये रखिए । विवाद मे कुछ नही मिलेगा । किसी के भी पास समय नही है इन बातों कि तह मे जाने का । हो सके तो आप विवाद का अंत करे अपनी तरफ से बढ़ावा ना दे । बिना वजह आपकी सकारात्मक ऊर्जा बर्बाद हो रही है । Originally [...]
 
डा० अमर कुमार
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अनिर्वचनीय सुख

सुख की परिभाषा व सीमा मैं निर्धारित नहीं कर पाता । फिर भी कुछ ऎसे क्षण अनायास टकराते हैं कि मन एक अनाम आह्लाद से भर जाता है । हमारे हृदय को क्या पुलक से भर देता है, क्या नहीं ? इसको आप क्या शब्दों की सीमा में बाँध सकते हैं
 
डा० अमर कुमार