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काकोरी के शहीद

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08 Mar 2010
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श्री अशफाक उल्ला खां – मैं मुसलमान तुम काफिर ?

इस तरह की अपनी कुर्बानियों से  वतन  की  मिट्टी – पानी  का  कर्ज़  अदा  करने  वाले  सिरफिरे  मतवालों में श्री बिस्मिल के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का ही नाम आता है । प्रस्तुत आत्मकथ्य में विशेष परिचय के
 
डा. अमर कुमार
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मालिक तेरी रजा रहे, बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे

जहाँ  तक  मैं  समझता  हूँ  कि  पिछली सँदर्भित  कड़ी  सहित  परिचय श्रृँखला  की  यह  कड़ियाँ  सँभवतः  श्री भगवतीचरण वर्मा के कनिष्ठ भ्राता और बिस्मिल जी के अभिन्न मित्र श्री शिव वर्मा ने
 
डा. अमर कुमार
Feb 23 2010 10:50 PM
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पुनःआरँभ बिस्मिल आत्मकथ्य- और इसके पहले

इससे पहले कि मैं आत्मकथा की कड़ियों का पुनःप्रकाशन आरँभ करूँ, मैं  देश  के  गौरव  अमर  हुतात्मा के सम्मुख क्षमादान माँगते हुये नतमस्तक हूँ । उस  समय  जबकि  इस  आत्मकथा का  प्रवाह अपने  अँतिम 
 
डा. अमर कुमार
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मैजिक लालटेन द्वारा तस्वीरें दिखाकर या…

अब तक आपने पढ़ा… “ इसी कारण महामना देशबन्धु चितरंजन दास ने अन्तिम समय ग्राम संगठन ही अपने जीवन का ध्येय बनाया था । मेरे विचार से ग्राम संगठन का सब से सुगम रीति यही हो सकती है कि युवकों में शहरी जीवन छोड़ कर ग्रामीण जीवन से प्रीति उत्पन्न हो । जो युवक म
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:44 AM
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यह कैसा भारतवर्ष है

अब तक आपने पढ़ा … “ मैं इस समय इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि यदि हम लोगों ने प्राणपण से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो  हमारा  उद्योग  क्रान्तिकारी  आन्दोलन  से  कहीं  अधिक  लाभदायक होता, जिस
 
डा. अमर कुमार
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अन्तिम समय की बातें

आज 17 दिसम्बर 1927 ई0 को निम्नलिखित पक्तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जब कि 19 दिसम्बर 1927  ई0 सोमवार पौष कृष्ण 11 सम्वत् 1984 को 6 बजे प्रातःकाल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है । अतएव नियत समय पर यह लीला संवरण करनी होगी ह
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:44 AM
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श्री रामप्रसाद बिस्मिल

अमर शहीद की अँतिम नोट से इस आत्मकथ्य का पटाक्षेप नहीं होता । इसके उपराँत एक लघुखण्ड ’ विशेष परिचय’ का है । इसमें काकोरी काँड के लगभग सभी पात्रों का परिचयात्मक वर्णन है । यह तो स्पष्ट है कि, श्री बिस्मिल जी ने इसे स्वयँ न लिखा होगा । मेरा अनुमान है कि
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:44 AM
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वो कवितायें, जो मुझे प्रिय रही हैं !

अब तक आपने पढ़ा.. “ वायसराय ने जब हम काकारी के मृत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अग्रिम कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनाना चाहि
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:44 AM
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कालकोठरी के गीत और अँतिम नोट

अपनी प्रिय कविताओं के उल्लेख के बाद शहीद बिस्मिल ने अपनी कालकोठरी में गाये जाने वाले गीतों का उल्लेख करते हुये एक अँतिम नोट राष्ट्रवासियों के नाम दिया है, जो कि स्वगत कथन जैसा ही है । – प्रस्तुतकर्ता : डा० अमर कुमार की टिप्पणी अलीपुर बम्ब केस के
 
डा. अमर कुमार
Aug 15 2009 02:15 AM
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गये थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई ।

अब तक आपने पढ़ा.. “ यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ? इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं, मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के सम
 
डा. अमर कुमार
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राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।

अब तक आपने पढ़ा…  उनको  उचित  है कि अधिक से अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जें तक की योग्यता  प्राप्त करके किसी कला-कौ्शल के सीखने का प्रयत्न करें और  उस कला-कौशल द्वारा ही वह अपना जीवन व्यतीत करें ।  इसके आगे स्व० बिस्मिल लिख
 
डा. अमर कुमार
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यह कैसा भारतवर्ष है

अब तक आपने पढ़ा … “ मैं इस समय इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि यदि हम लोगों ने प्राणपण से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो  हमारा  उद्योग  क्रान्तिकारी  आन्दोलन  से  कहीं  अधिक  लाभदायक होता, जिस
 
डा. अमर कुमार
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उन्हीं के साथ विश्वासघात कर के निकल भागूँ ?

पिछली कड़ी में..निश्चित किया कि अब भाग चलूं । पाखाने के बहाने से बाहर निकाला गया । एक सिपाली कोतवाली से बाहर दूसरे स्थान में शौच के निमित्त लिवा गया । दूसरे सिपाहियों ने उससे बहुत कुछ कहा कि रस्सी डाल लो । उस ने कहा मुझे विश्वास है यह भागेंगे नहीं । अ
 
डा. अमर कुमार
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अच्छा हुआ जो मैं गिरफतार हो गया और भागा नही

अब विचारने की बात यह कि भारतवर्षमें क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थक कौन से साधन मौजूद है ?  गत पृष्ठों में मैंने अपने अनुभवों का उल्लेख करके दिखला दिया है कि समिति के सदस्यों को उदर-पूर्ति तक के लिये कितना कष्ट उठाना पड़ा । प्राण-पण से चेष्टा करने
 
डा. अमर कुमार
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इतिहास को हमारे प्रयत्नों का उल्लेख करना ही पड़ेगा

ऐतिहासिक दृष्टि से हम लोगों के कार्य का बहुत बड़ा मूल्य है । जिस प्रकार भी हो, यह तो मानना ही पड़ेगा  कि इस  गिरी  हुई  अवस्था  में  भी, अधिकाँश भारतवासी युवकों के हृदय में स्वाधीन होने के भाव विराजमान हैं । वे यथा शक्ति स
 
डा. अमर कुमार
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फांसी की कोठरी है या, साधना की गुफा

फांसी की कोठरी अन्तिम समय निकट है । दो फांसी की सजायें सिर पर झूल रहा है । पुलिस को साधारण जीवन में और समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में खूब जी भर के कोसा है । खुली  अदालत  में  जज  साहब, खुफिया पुलिस  के  अफसर, मजिस्टेट,
 
डा. अमर कुमार
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अशफ़ाकउल्ला ख़ाँ वारसी : अन्तिम समय में दो शब्द

नमस्कार ! एक  अँतराल  के  पश्चात  यह  कड़ियाँ  प्रारँभ  करने  का  मन बनाया है । किसी हुतात्मा की अवमानना सहन न कर पाना,एक प्रमुख कारण रहा था । न जाने कब, हम इन सिरफिरों को गँभीरता से ले पायेंगे ?यदि इनके स्
 
डा. अमर कुमार
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अन्तिम समय की बातें

मैं भी तो अल्पज्ञ जीव मात्र ही हूं  :  श्री बिस्मिल की इस स्वीकारोक्ति में मेरी असहमति का कोई स्थान नहीं है । कदाचित मुझे लगने लगा था, कि हम अपने देश के शहीदों के प्रति उदासीन हैं.. निश्चित ही यह हतोत्साहित करने का कारक हो सकता था.. पर ऎसा
 
डा. अमर कुमार
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माशूक के थोड़े से भी एहसान बहुत है

तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये । बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये ।। अब आगे पृष्ठ 131 से जारी है…. समिति के सदस्यों ने इस प्रकार का व्यवहार किया । बाहर जो साधारण जीवन [...]
 
डा. अमर कुमार
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तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये

उसने अपना बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह बना लिया गया । यह कुछ अधिक जानता था । उसके बयान से क्रान्तिकारी पत्र के पार्सलों का पता चला । बनारस के डाकखाने से जिन-जिन के पास पार्सल भेजे गये थे उन को पुलिस ने गिरफतार किया । कानपुर में गोपीनाथ ने जिस के पा
 
डा. अमर कुमार
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अभियोग वा सन्देह

मैंने नमस्ते कर उत्तर दिया कि आप के चरणों की कृपा है । क्योंकि इस मुकद्में के पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के वकीलों की जिरह को सुन कर मैंने भी साहस किया था ।  अब आगे.. इस के बाद सब से पहले मुख्य नेता महाशय के
 
डा. अमर कुमार
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मैं मन ही मन घुटा करता

एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया, जिसमें तीन डाक्टर थे । उन बुद्धू की जब कुछ समझ में न आया, तो यह कह दिया गया कि सेठ जी को कोई भी बीमारी ही नहीं है । अब आगे.. जब से काकोरी षड़्यन्त्र के अभियुक्त जेल में एक साथ रहने लगे, तभी से उनमें एक अद्भुत परिवर्तन का [..
 
डा. अमर कुमार
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प्रलोभन, शिनाख़्त तथा बनवारीलाल

बनारसीलाल के सम्बन्ध में सब मित्रों ने कहा था कि इस से अवश्य धोखा होगा, पर मेरी बुद्धि में कुछ न समाया था । प्रत्येक जानकार ने बनारसीलाल के सम्बन्ध में यही भविष्यवाणी की थी कि वह आपत्ति पड़ने पर अटल न रह सकेगा । इस कारण सब ने उसे किसी प्रकार के गुप्त
 
डा. अमर कुमार
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जेल और भेद जानने का प्रयत्न

मैं गिरफ़्तार हो गया । मैं केवल एक अंगोछा पहने हुये था । पुलिस वालों को अधिक भय न था । पूछा यदि घर में कोई अस्त्र हो,  तो दे दीजिये मैने कहा कोई आपत्तिजनक वस्तु घर में नहीं है । उन्होंने बड़ी सज्जनता की । मेरे हथकड़ी इत्यादि कुछ न डाली । मकान की [.
 
डा. अमर कुमार
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मैं गिरफ़्तार हो गया

नवयुवकों का भी उत्साह बढ़ गया । जितना कर्जा था निपटा दिया । अस्त्रों की खरीद के लिये लगभग एक हजार रूपये भेज दिये । प्रत्येक केन्द्र के कार्यकर्ता को यथा स्थान भेज कर दूसरे प्रान्तों में भी कार्य विस्तार करने का निर्णय कर के कुछ प्रबन्ध किया । एक युवक
 
डा. अमर कुमार
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रेलवे डकैती

इन कठिनाइयों के बाद भी…. इस दल ने विदेश से अस्त्र प्राप्त करने का बड़ा उत्तम सूत्र प्राप्त किया था, जिससे यथा रूचि पर्याप्त अस्त्र मिल सकते थे, उन अस्त्रों के दाम भी अधिक न थे । अस्त्र भी पर्याप्त संख्या में बिल्कुल नये मिलते थे । यहां तक प्रबन्
 
डा. अमर कुमार
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कार्यकर्ताओं की दुर्दशा, अशान्ति युवक दल

इस वृहत संगठन में भी …  इस समय समिति के सदस्यों की बड़ी दुर्दशा थी । चने मिलना भी कठिन था । सब पर कुछ न कुछ कर्ज हो गया था । किसी पास साबित कपड़े तक न थें कुछ विद्यार्थी बन कर धर्मक्षेत्रों ( लंगर ) तक में भोजन कर आते थे । चार [...]
 
डा. अमर कुमार
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कार्यकर्ताओं की दुर्दशा, अशान्ति युवक दल

इस वृहत संगठन में भी …  इस समय समिति के सदस्यों की बड़ी दुर्दशा थी । चने मिलना भी कठिन था । सब पर कुछ न कुछ कर्ज हो गया था । किसी पास साबित कपड़े तक न थें कुछ विद्यार्थी बन कर धर्मक्षेत्रों ( लंगर ) तक में भोजन कर आते थे । चार [...]
 
डा. अमर कुमार
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नौकरी, व्यवसाय तथा वृहत् संगठन

इन चालबाजारियों के चलते….  अब सब ओर से चित्त को हटा कर बड़े मनोयोग से नौकरी में समय व्यतीत करने लगा । कुछ रूपया इकट्ठा करने के विचार से, कुछ कमीशन इत्यादि का प्रबन्ध कर लेता था । इस प्रकार थोड़ा सा पिताजी का भार घटाया । सब से छोटी बहिन का वि
 
डा. अमर कुमार
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चालबाजार

नोट बनाने के प्रयोगों के बाद… कई महानुभावों ने गुप्त समिति के नियमादि बना कर मुझे दिखायें । उन में एक नियम यह भी था कि जो व्यक्ति समिति का कार्य करें, उन्हें समिति की ओर से कुछ मासिक दिया जावे । मैंने इस नियम को अनिवार्य रूप में मानना अस्वीकार
 
डा. अमर कुमार
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नोट बनाने के प्रयोग

पुनर्गठन के बाद…. इसी बीच मेरे एक मित्र की एक नोट बनाने वाले महाशय से भेंट हुई । उन्होंने बड़ी-बड़ी आशायें बांधी । बड़ी लम्बी लम्बी स्कीम बांधने के पश्चात मुझसे कहा कि एक नोट बनाने वाले से भेंट हुई है । बड़ा दक्ष पुरू्ष है । मुझे भी बना हुआ नोट देख
 
डा. अमर कुमार
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पुर्नसंगठन

पिछली बार.. अनुभवहीनता से इस प्रकार ठोकरें खानी पड़ी । कोई पथ प्रदर्शक तथा सहायक नहीं, जिस से परामर्श करता । व्यर्थ के उद्योग धन्धों तथा स्वतन्त्र कार्यों में शक्ति का व्यय करता रहा । अब आगे.. पुर्नसंगठन जिन महानुभावों को मैं पूजनीय दृष्टि से देखता था
 
डा. अमर कुमार
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संसार अन्धकारमय दिखाई देता था

राजकीय घोषणा के पश्चात जब मैं शाहजहाँपुर आया तो शहर की अदभुत दशा देखी । कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था । जिसके पास मैं जाकर खड़ा हो जाता था, वह नमस्ते कर चल देता था । पुलिस वालों का बड़ा प्रकोप था । प्रत्येक समय छाया की भांति पीछे-पीछे [...]
 
डा. अमर कुमार
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संसार अन्धकारमय दिखाई देता था

राजकीय घोषणा के पश्चात जब मैं शाहजहाँपुर आया तो शहर की अदभुत दशा देखी । कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था । जिसके पास मैं जाकर खड़ा हो जाता था, वह नमस्ते कर चल देता था । पुलिस वालों का बड़ा प्रकोप था । प्रत्येक समय छाया की भांति पीछे-पीछे [...]
 
डा. अमर कुमार
Feb 01 2009 02:13 AM
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पग पग विश्वासघात

प्रतिज्ञा, पलायनावस्था व शाहजहांपुर में आप पढ़ चुके हैं…   जब राजकीय घोषणा हुई और राजनैतिक कैदी छोड़े गये, तब शाहजहांपुर आ कर कोई व्यवसाय करने का विचार हुआ, ताकि माता पिता की कुछ सेवा हो सके । विचार किया करता था कि इस जीवन में अब फिर कभी आजाद
 
डा. अमर कुमार
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प्रतिज्ञा, पलायनावस्था व शाहजहांपुर

अब हमलोग पिछली कड़ी  से आगे  बढ़ते हैं.. इन्हीं विचारों में निमग्न यमुना तट पर बड़ी देर तक घूमता रहा। ध्यान आया कि धर्मशाला चल कर ताला तोड़ सामान निकालूं । फिर विचारा धर्मशाला जाने से गोली चलेगी, व्यर्थ में खून होगा । अभी ठीक नहीं । अकेले बदला
 
डा. अमर कुमार
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मैनपुरी षड़यन्त्र और विश्वासघात

हथियारों की खरीद के आगे पढ़ें… इधर तो हम लोग अपने कार्य में व्यस्त थे, उधर मैनपुरी के एक सदस्य पर लीडरी का भूत सवार हुआ । उन्होंने अपना पृथक संगठन किया । कुछ अस्त्र-षस्त्र भी एकत्रित किये । धन की कमी पूर्ति के लिए एक सदस्य से कहा कि तुम अपने किसी कुटु
 
डा. अमर कुमार
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हथियारों की खरीद

अबतक आपने पढ़ा… उसी समय देशवासियों के नाम संदेश नामक एक पर्चा छपवाया गया । जिसका कारण था कि पंडित गेंदालाल जी ब्रम्हचारी जी दल सहित ग्वालियर में गिरफतार हो गये थे ।
 
डा. अमर कुमार
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स्वदेशप्रेम और क्रांतिकारी आन्दोलन

पूज्यपाद श्री स्वामी सोमदेव का देहान्त हो जाने के पश्चात जब से अंगे्रजी के नवे दर्जे में आया कुछ स्वदेश सम्बन्धी पुस्तकों का अवलोकन आरम्भ हुआ । शाहजहांपुर में सेवा समिति की नींव पं0 श्रीराम बाजपेयी जी ने डाली, उस में भी बड़े उत्साह से कार्य किया । दूस
 
डा. अमर कुमार
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स्वदेशप्रेम और क्रांतिकारी आन्दोलन

पूज्यपाद श्री स्वामी सोमदेव का देहान्त हो जाने के पश्चात जब से अंगे्रजी के नवे दर्जे में आया कुछ स्वदेश सम्बन्धी पुस्तकों का अवलोकन आरम्भ हुआ । शाहजहांपुर में सेवा समिति की नींव पं0 श्रीराम बाजपेयी जी ने डाली, उस में भी बड़े उत्साह से कार्य किया । दूस
 
डा. अमर कुमार