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मीमांसिकी

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22 Apr 2010
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‘मै और मेरा समय’

कवितामैमेरा घरकिताबे मेरीमेरे विचारमैं जो सोचता हूंमेरा समयसमय में मैंसमय के बारे मेंमैनें यह लिखा ऐसा लिखा वैसा लिखाउनके बारे में, खिलाफ उनकेलिखा मैंनेस्वार्थ, लोभ, लालच, बाजार,वैश्वीकरण, गरीबी दरिद्रतासबसे पहले मैने ही किये विचारउच्चारे तमाम तमाम
 
कपिलदेव
टैग: kavita
Apr 22 2010 10:18 PM
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इस तरह जो बचा रहेगा वह

यहीं से शुरू होगा इतिहास पिछला बाकी सारा पीछे छूट जाएगापलट दिया जाएगा पन्नासरकारें बदल दी जाएंगी स्मृतियां रहेंगी - मगर रोती हुई - किसी कोने या कूडेदान मेंजो बचा रहेगा वह इतिहास नहीं इतिहास के बचे होने का शोक होगाबस, शोक ही बचा रहेगाशोक का इतिहास नहीं
 
कपिलदेव
टैग: kavita
Feb 25 2010 05:16 PM
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‘प्रेम का जंगल’

वियतनामी कहानी ‘प्रेम का जंगल’ लेखक: ट्रंग ट्रंग डिन्ह वियतनाम के एक विद्यालय में अंग्रेजी की शिक्षिका ‘वूआन ली ’ नंे यह कहानी मूल वियतनामी से अंग्रेजी में अनूदित करके, भेजा है,। उनके ही आग्रह पर मैनें इसका अ्रग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया है। हिन्दी
 
कपिलदेव
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गोरख को याद करते हुए

गोरख पाण्डेय की मृत्यु के ठीक बीस वर्ष वाद, उनके परिजनों ने उनके पैतृक गांव पंडित का मुडेरा, जिला कुशीनगर में अपने ही घर प्रांगण में उन्हें समारोह पूर्वक याद किया। यह स्मृति समारोह, गोरख के नाम पर स्थापित गोरख पाण्डेय स्मृति न्यास देवरिया के सहयोग से
 
कपिलदेव
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यानी मैं

सिंदबाद के समुद्री डाकुओं और मुनाफाखोर मनुष्यताओं के रक्तपाती इतिहास के सदियों पुराने जर्जर पृष्ठों से छिटक कर इक्कीसवीं सदी की बिलासी वैचारिकता में नख-दंत की तरह धंसा हुआ मैं एक अनवरत इनकार हूं- सृष्टि का आदि अव्यय जिसे नष्ट करने के अभियानों का इतिह
 
कपिलदेव
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यानी मैं

सिंदबाद के समुद्री डाकुओं की गिरफ्त और मुनाफाखोर मनुष्यताओं के रक्तपाती इतिहास के सदियों पुराने किसी जर्जर पृष्ठ से छिटक कर इक्कीसवीं सदी की गोद में गिरा हुआ मैं एक अनवरत इनकार हूं- सृष्टि का आदि अव्यय जिसको नष्ट करने के अभियानों का इतिहास ही हमारी स
 
कपिलदेव
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मैं एक अनवरत गुस्सा हूं

मैं एक अनवरत गुस्सा हूं अपने समय की कविता के खिलाफ उबलता हुआ एक औजार जो समझौता परस्त चालाक और दुनियादार हाथों का रूमाल बनने से इनकार कर देता है। मैं अपने समय की सुचिक्कणता में अंटने से इनकार करता हूं अपने प्यारे प्यारे चूजों के चोंच में दाना डालते हु
 
कपिलदेव
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कस्बाई स्त्री-विमर्श का आर्य-आवर्त

तहलका डाटकाम’ पर एक कस्बाई शिक्षिका का व्याकुल विचार पढ़ कर ) माना कि अम्मा की दी हुई ‘स्त्री-सुबोधिनी’ की जिल्द उखड़ गई है बिखर गए हैं पन्ने पृष्ठों के क्रम उलट पुलट गए हैं मगर मत भूलो अनुजा रस्तोगी कि अम्मा की नसीहतें जिन्दा हैं तुम्हारी स्त्रियों के
 
कपिलदेव
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एक कर्मचारी का विदाई समारोह

चमक रहा है उसकी आंखों का खालीपन सेवाकाल के अंत पर आयोजित उत्सव में बुलाया गया है संगमरमरी सीढ़ियों कालीनों बिछे गलियारों से लकदक सुसज्जित सभ्य-सभागार में लाया गया है चकित चैधियायी आंखों से अपनी ही देख रहा है वह बधस्थल पर लाए गए बकरे-सा होता हुआ अपना ह
 
कपिलदेव
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समय जो सबका पिता है

कपिलदेव यह समझाने का समय नहीं है समझने का भी नहीं यह समझने और समझाने से बाहर निकल जाने का समय है समय से बाहर निकल जाने का समय सूरज नें अपने घोड़ों को कार्यमुक्त कर दिया है सुबह और शाम की दूरियां पूरी करता है अब स्वचालित यान से टापों का शोर अब नहीं सुन
 
कपिलदेव
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समय जो सबका पिता है

यह समझाने का समय नहीं है समझने का भी नहीं यह समझने और समझाने से बाहर निकल जाने का समय है समय से बाहर निकल जाने का समय सोचा जो, वह कहा नहीं कहा वह नहीं, जो सोचा कहने और सोचने के बीच फंसा है यह समय। जिद ने तर्क को पीछे ठेल दिया है वत्सलता को काठ मार गय
 
कपिलदेव
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कविता की किताब

कल की सुबह के बारे में कल वाले कल के पहले वाले कल ही सोच लिया जाय यह सोचते हुए, कल सोचा कि कल सुबह कविता वाली वह किताब पढूंगा दफतर जाने के पहले के वक्त में दूबे जी से मिलना क्या आज ही जरूरी है कल न भी मिले तो क्या इसतरह तो कविता वाली वह किताब कब पढ़ी
 
कपिलदेव
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मीमांसिकी

कपिलदेव गजल की किताब जो किताब के बाहर हेै इक चैकन्ना बडबोलापन तो है ही इन गजलो मे दम साधी आवाजें भी हैं,चुभ जाने वाला स्वर भी ‘‘किताब से बाहर‘‘ देवेन्द्र आर्यं का पहला गजल संग्रह है। हिन्दी में गजल का इतिहास बहुत पुराना नही है। शमशेर और मुक्तिवोध की
 
कपिलदेव
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मौन की साजिश के विरूद्ध

कपिलदेव मौन की साजिश के विरूद्ध ( कविता संग्रह - ‘असुन्दर सुन्दर’ रू जितेन्द्र श्रीवास्तव) ‘भारत भूषण अग्रवाल’ सहित कई पुरस्कारों से चर्चा में आ चुके युवा कवि जितेन्द्र नें अपने पहले संग्रह ‘अनभै कथा’ में विशेष रूप से लक्ष्य की गयी ‘वय’ की सहज आकांक्
 
कपिलदेव
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मीमांसिकी

समय से संवाद की जिज्ञासा ः शब्दों में समय एक युवा कवि के रूप में पहचान बना चुके जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कविता के साथ साथ आलोचना के क्षेत्र में भी अपनी लगातार उपस्थिति दर्ज कराई है। उनकी दो आलोचना पुस्तकों - भारतीय समाज की समस्याएं और प्रेमचंद तथा भार
 
कपिलदेव
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अष्टभुजा की कविता ताम की या झाम की

जिससे नही पसीना निकला जिसमें मिट्टी नहीं लगी चलते चलते थक जाने की जिसमें इच्छा नहीं जगी वह इच्छा किस काम की इच्छा केवल नाम की जिस छाया में सिहरन लागे जिस छाया में दाम लगे उस छाया में रहना वर्जित उस छाया में आग लगे छाया किसी गोदाम की चंचल पूंजी घाम की
 
कपिलदेव
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अटभुजा शुक्ल ‘ताम की या झाम की’

जिससे नहीं पसीना निकला जिसमें मिट्टी नहीं लगी चलते चलते थक जाने की जिसमें इच्छा नहीं जगी वह इच्छा किस काम की इच्छा केवल नाम की जिस छाया में सिहरन लागे जिस छाया में दाम लगे उस छाया में रहना वर्जित उस छाया में आग लगे छाया किसी गोदाम की चंचल पूंजी घाम क
 
कपिलदेव
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मंगलेश को महान कवि

मंगलेश को महान कवि और दैवीय गुणों से सम्पन्न सावित करने के उद्देश्य से लिखा गया पंकज का यह आलेख बहुतों को अच्छा लगा होगा। लेकिन अगर वे सचमुच ही इतने बड़े कवि और इतने महान इंसान हैं , तो ऐसा शिखर निर्मित करने की जरूरत क्या थी , ? क्या इतने के बाद भी मं
 
कपिलदेव
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कवि प्रमोद कुमार की चिकित्सा सहायता के लिए अपील

जनवादी लेखक संघ की गोरखपुर की इकाई के सचिव,समर्थ कवि व जुझारू मजदूर नेता प्रमोद कुमार को कैंसर हो गया है। एस.जी.पी.जी.आई के डाक्टरों नें तत्काल आपरेशन कराने की सलाह दी है। फर्टीलाइजर कारखाना गोरखपुर में कर्मचारी रह चुके प्रमोद कुमार, कारखाना बंद हो ज
 
कपिलदेव
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कवि प्रमोद कुमार की चिकित्सा सहायता के लिए अपील

जनवादी लेखक संघ की गोरखपुर इकाई के जिला सचिव, मजदूर नेता व संवेदनसील कवि प्रमोद कुमार को कैंसर हो गया है। एस.जी.पी.जी.आई के डाक्टरों नें तत्काल आपरेसन कराने की सलाह दी है। फर्टीलाइजर कारखाना गोरखपुर में कर्मी रह चुके प्रमोद कुमार, कारखाना बंद हो जाने
 
कपिलदेव
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सुंदर असुंदर

सुंदर असुंदर युवा कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव का यह दूसरा संग्रह, उनके पिछले संग्रह--अनभै कथा की संवेदना को आमूल विस्तार देता हुआ एक सर्वथा नया संग्रह है । इस संग्रह में कवि का कला-वोध और काव्य-विवेक अधिक गझिन और परि;;कृत हुआ है। यह उस युवा कवि का संग्र
 
कपिलदेव