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विचार करने के लिए कुछ विचार

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23 Jan 2010
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रातोरात हो सकता है चमत्कार

चमत्कार का नाम तो आपने सुना होगा, चमत्कार को कई बार नमस्कार भी किया होगा। क्या आप नहीं चाहते कि आपके जीवन में कुछ चमत्कार हो? कोई कहे कि आपके जीवन में भी चमत्कार हो सकता है और बड़ी आसानी से हो सकता है, ठीक ऐसे जैसे आप पान की दुकान पर गए और दो-चार रुपये
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काउंटडाउन का मतलब टार्गेट पर नजर

बड़ा दिलचस्प शब्द है काउंटडाउन। इसके कुछ और चमत्कार देखिए। एक लड़का किसी नई कक्षा में नामांकन कराता है। अब फायनल एक्जाम के लिए उसके पास बारह महीने हैं। वह सोचता है, अरे बारह महीने हैं, बारह महीने। एक महीना बीता। वह सोचता है, अभी तो एक ही महीना गुजरा है,
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शुरू कीजिए काउंटडाउन

नया साल शुरू हो चुका है। इसके पांच दिन गुजर चुके। कल छठा दिन होगा, परसों सातवां, तरसों आठवां, फिर नौवां, दसवां और एक दिन निश्चित ही कोई दिन ऐसा भी होगा, जो इस साल का अंतिम दिन होगा। फिर शुरू होगा एक और नया साल। साल की शुरुआत से ही शुरू हो जाएगा उसके
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मुबारक हो नया साल

बहुत गुल खिला गुजरे सालमुबारक हो नया साल।
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जलियांवाला बाग के शहीदों के बहाने

जलियांवाला बाग के शहीदों की याद में, उन्हें और उनके परिजनों को सम्मान दिलाने की खातिर मेरे मित्रों सतीश चंद्र श्रीवास्तव ने, फिर एम. अखलाक ने, फिर रविकांत ने जो कुछ लिखा, कहा और जितना आक्रोश व्यक्त किया, वह सिर्फ उस मानवीय संवेदना को ही उभारते हैं, ज
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इन्हें लाश की राजनीति में भी शर्म नहीं आती!

किसी अपराधी की लाश और देश को बचाने के लिए मौत को गले लगा लेने वाले शहीदों की लाश में कोई फर्क नहीं??? रविकांत प्रसाद प्रसंग-एक : निठारी कांड का एक पात्र सुरेन्द्र कोली, जो छोटे-छोटे बच्चों को टुकड़ों में काटकर उसका गोश्त खाता था। फिलहाल जेल में हैं।
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काश, ठहरे पानी में हलचल हो

मेरे देश की संसद मौन है एम. अखलाक एक आदमी रोटी बेलता है, दूसरा सेंकता है, तीसरा न बेलता है न सेंकता है, सिर्फ खाता है। मैं पूछता हूं- तीसरा कौन है? मेरे देश की संसद मौन है। मैं इन चर्चित पंक्तियों से अपनी बात शुरू करता हूं। संभव है सतीश चंद्र श्रीवास
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शहीदों के खानदान ही खत्म!

ढूंढे़ नहीं मिल रहे जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों के परिजन। शर्म! शर्म!! शर्म!!! सतीश चंद्र श्रीवास्तव देश को आजादी की प्रेरणा देने वाले जलियांवाला बाग के शहीदों के खानदान ही खत्म हो गए हैं। आजादी के 62 साल बाद इस दुर्गति पर न तो संसद में एक बार भ
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मेरी बीवी, मेरे बच्चे

एक जहीन सा वाक्य - मेरी बीवी, मेरे बच्चे। उनके इर्द-गिर्द ही तो मानव का जीवन संसार रचा-बसा होता है। मानव उनके कितना करीब होता है, हो सकता है या होना चाहिए, इस पर विचार व्यक्तित्व विकास और भविष्य की संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, ऐसा मुझे लगत
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ढलता सूरज धीरे-धीरे उगता है, उग आएगा

जी हां, भविष्य की संभावनाएं तलाश रहे हैं तो इस बात पर भी भरोसा करना सीखना होगा। जिस तरह से यह सत्य है कि ढलता सूरज धीरे-धीरे ढलता है, ढल जाएगा, ठीक उसी तरह यह भी सत्य है कि ढलता सूरज धीरे-धीरे उगता है, उग आएगा। यह जीवन का यथार्थ है। जो ढलता है, वह उग
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ढलता सूरज, धीरे-धीरे ढलता है, ढल जाएगा

जहां जड़ों में सबही नचावत राम गोसाई मजबूती से स्थापित हो और जन्म-जन्मांतर के रिश्ते-नाते का हर दिमाग कायल हो, वहां भविष्य को संवारने के लिए संभावनाओं की तलाश कर उस पर अमल करना थोड़ा दुश्वारी भरा तो हो सकता है, पर है जरूरी। जरूरी इसलिए कि जन्म-जन्मांत
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Some valuable values

To realize the value of a sister : Ask someone who doesn't have one. To realize the value of ten years : Ask a newly divorced couple. To realize the value of four years : Ask a graduate. To realize the value of one year : Ask a student who has failed a
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बतोलेबाजी नहीं, नुकसान हो जाएगा

एक सीन की कल्पना कीजिए, हो सकता है यह सीन आपको किसी हकीकत में डूबा डाले। पड़ोस का कोई दबंग है या किसी आफिस का कोई बास है। अब किसी सामान्य व्यक्ति या आफिस के किसी सामान्य कर्मचारी का मिजाज देखिए। दबंग व्यक्ति या बास से दूर , जब वह अपने कुनबे में अंटाग
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सब जज्बे की बात

व्यक्तित्व विकास पर चल रही सीरीज का यह पचासवां आलेख है। मेरे लिए तो यह बस एक आश्चर्य की ही बात है कि मैंने एक ख्याल पर्सनालिटी डेवलपमेंट पर उनचास लेख लिख दिए और पचासवां लिखने जा रहा हूं! क्या लिखूं यह सवाल नहीं है, न ही यह सवाल है कि कैसे लिखूं? सवाल
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सालम आदमी को बेच देता है वह आदमी

नजीर के कलाम 'यां आदमी पे जान को वारे है आदमी और आदमी पे तेग को मारे है आदमी...’ की तरह ही तो दिखता है वह। आता है, चाय-नाश्ता-भोजन करता है, इंसानियत के रिश्ते गांठता है, चकाचौंध व ग्लैमर भरी जिंदगी के सपने दिखाता है और आखिर में सालम आदमी को बेच देता
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लत, संगत, पंगत

चाहने वालों का आग्रह था, थोड़ा जल्दी-जल्दी लिखूं, कम समय अंतराल पर लिखूं। पर, देख लीजिए, इच्छा के बाद भी विलंब हुआ। क्यों हुआ, इस पर विचार करने बैठा तो जो तीन चीजें बातें छनकर आईं, उससे भविष्य को संवारने का ही सूत्र मिलता है। ये तीन चीजें हैं लत, संग
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फैलता-सिकुड़ता भविष्य

वक्त के दायरे में चाहे भविष्य ही क्यों न हो, जब फंसता है तो फैलता भी है और सिकुड़ता भी है। कैसे? दिल्ली जाने के लिए किसी ने बस पकड़ी, किसी ने ट्रेन तो कोई हवाई जहाज पर ही उड़ चला। तीन व्यक्ति का एक भविष्य दिल्ली पहुंचना वक्त के दायरे में कैसे फैला और
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आप सभी को दशहरे की बधाई

यह भी याद करें, यह भी फरियाद करें। कि मिलता रहे हमें, हम सबको,सदा, सदा और हमेशा।मां का प्यार... ,बहन का प्यार... ,कभी-कभी दुल्हन का भी प्यार... ।
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फेट, ट्रस्ट, होप

मुझे याद आता है दुष्यंत की रचना का एक टुकड़ा। मैं बेपनाह अंधेरे को सुबह कैसे कहूं, मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं .....। कविता किसी दूसरे अर्थ में लिखी गयी है, पर मुझे इसका जो मतलब समझ में आता है, उसका नजारा कराना चाहूंगा। नजारों की नजर यह है कि जो
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मैं तूफान में भी चैन से सोता हूं....

आप कुछ कर रहे हैं औऱ आपका कलेजा कांप रहा है। क्या है इसका मतलब? मतलब साफ है कि कुछ न कुछ गलत है, कहीं न कहीं कमजोरी है। आप बोल रहे हैं और आपकी जुबां लड़खड़ा रही है। मतलब, या तो बोलना नहीं आता या जो बोल रहे हैं उसकी आपने तैयारी नहीं की है। जिंदगी के मुकाम
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फलक को जिद है जहां बिजलियां गिराने की....

संदर्भ भविष्य को संवारने का है, शुरुआत करता हूं एक शेर से। मुलाहिजा फरमाइए। शेर है - फलक को जिद है जहां बिजलियां गिराने की, हमें भी जिद है वहीं आशियां बनाने की। जब तक आप इस शेर की मस्ती को जज्ब करें, तब तक इसी के जेरेसाया मैं अपनी दो बात आपसे कह लूं। आप
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बाप की लाश और बेटी की परीक्षा

भविष्य की चिंताएं कैसे-कैसे फैसले कराती है, इसे मैंने देखा है और देखकर हैरान भी हुआ हूं। कुछ दृश्यों से आपको भी दो-चार कराना चाहूंगा। हो सकता है इन उदाहरणों से भविष्य और उसके मैकेनिज्म को समझने में आसानी हो और यह अनुभव किसी काम आ जाए।पहला उदाहरण - एक
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कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

भविष्य सुधारने के लिए आप क्या करते हैं? सपने देखते हैं और उसे साकार करने की कोशिशें करते हैं। सपने साकार हुए तो अच्छा और टूट गये तो .....? डर यहीं होता है, घबराहट यहीं होती है। इलाहाबाद से मेरे एक मित्र श्री सतीश श्रीवास्तव ने सुझाया है कि भविष्य संवारने
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अमर उजाला को धन्यवाद

अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल के गांव जलालपुर चलने का आह्वान करती 'विचार' की पिछली पोस्ट को 'अमर उजाला' ने अपने छह अगस्त के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर 'ब्लाग कोना' में जगह दी है। इसके लिए अखबार की पूरी टीम को मेरी ओर से धन्यवाद। इससे मेरा उत्साहबर्द्धन हुआ।
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चलिए शहीद बैकुंठ शुक्ल के गांव जलालपुर

सरकारी गवाह बन गये गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष की दिनदहाड़े हत्या कर अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव की मौत का बदला लेने वाले बैकुंठ शुक्ल व हजारीबाग जेल से अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के हीरो जयप्रकाश नारायण को कंधे पर चढ़ा फरार करा देने वाले योगेन्द्र
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भविष्य को रिस्क चाहिए

जी हां, चिंता करने की नहीं, भविष्य बनाने की चीज है। आप चाहें तो आपका भविष्य बन सकता है, चाहें तो बिगड़ सकता है। भविष्य रिस्क है। जिसने रिस्क लिया, उसका भविष्य हमेशा उज्ज्वल रहा। जिसने रिस्क नहीं लिया. वह पड़ा रहा, सड़ता रहा। जिस भविष्य की चिंता में ह
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कुछ ऐसा भी है भविष्य का मैकेनिज्म

आदमी अनाम और शिशु के स्वरूप में जन्म लेता है। शिशु का भविष्य क्या है? उसका नामकरण, उसका लालन-पालन। फिर भविषय क्या है? उसका सही तरीके से पठन-पाठन। फिर क्या है? उसका रोजी-रोजगार। फिर क्या? शादी विवाह। फिर? बाल-बच्चे। इसके बाद ? अपने बच्चों का पालन-पोषण
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... फिर भी बचा रहता है भविष्य

आदमी डरता है, घबराता है, भाग-दौड़ करता है, हड़बड़ी-जल्दबाजी मचाता है, नैतिक-अनैतिक सबकुछ करता है, करने को तैयार रहता है, काहे के लिए? भविष्य के लिए ही न? कुछ अपने भविष्य के लिए तो कुछ बच्चों के भविष्य के लिए ही न? सोचों की थोड़ी ऊंची उड़ान ली जाय तो
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हीन भावना से ऐसे उबरें - एक और सुझाव

हीन भावना से ऐसे उबरें पर इलाहाबाद में रहने वाले मेरे एक पत्रकार मित्र के मित्र श्री कुलदीप ने सुझाव दिया है कि हीन भावना से उबरना हो तो जमकर गालियां दो, सभी समस्याएं दूर हो जायेंगी। किसी की बातों को खींचना निश्चित रूप से आदर्श शिष्टाचार की बात नहीं
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हीन भावना से ऐसे उबरें (अंतिम)

हीन भावना से उबरने की चर्चा में एक अहमतरीन बात जो कहना चाहूंगा, वह यह कि वह भी क्या आदमी है जो आदमी को देखकर हीन भावना से ग्रसित हो जाये। सोचिए, कितनी बेवकूफी की बात है कि कोई कार में बैठकर सर्र से बगल से निकल गया और कोई हीन भावना से ग्रसित हो गया। क
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हीन भावना से ऐसे उबरें (3)

हीन भावना का मतलब ही है कमजोरी, लाचारी, बेबसी। आप हीन भावना से तब तक नहीं उबर सकते, जब तक आप खुद को कमजोर, लाचार और बेबस बनाये रखते हैं। हीन भावना से उबरने का एकमात्र जो तरीका है, वह यह है कि आप जिस फील्ड में हैं, जहां भी हैं, वहां खुद को मजबूत, सक्ष
Jun 16 2009 09:16 PM
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हीन भावना से ऐसे उबरें (2)

अभी कुछ दिनों पहले मेरे मोबाइल पर एक जोकवाला एसएमएस आया। एक बच्चे से कोई पूछ रहा था- जिस व्यक्ति में कमी ना हो, उसे क्या कहते हैं? बच्चे का जवाब था - कमीना (कमी ना)। हंसने की बात थी, एसएमएस पढ़कर हंसा, पर बात थी मार्के की। सोचा, ऐसा कौन सा व्यक्ति है
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उत्तर बिहार में आर्सेनिक का बढ़ता दायरा

गंगा किनारे बसे राज्य के बारह जिलों भागलपुर, कटिहार, खगडिय़ा, मुंगेर, लखीसराय, बेगूसराय, समस्तीपुर, पटना, भोजपुर, बक्सर, वैशाली और सारण के लगभग 80 प्रखंडों में आर्सेनिक का खतरा मंडरा रहा है। हालांकि, वैज्ञानिक अभी यह बता पाने में अक्षम हैं कि जल में ज
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इतिहास में दर्ज है जल प्रबंधन के विफलतम प्रयास की कहानी

जल प्रबंधन को लेकर किये गये विफलतम प्रयासों की यह वह कहानी है, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी है। 19वीं सदी के उतरार्द्ध में बाढ़ नियंत्रण की समस्या पर गंभीर चर्चा शुरू हुई। 1893 में बंगाल के तत्कालीन चीफ इंजीनियर डब्लू इंगलिश ने भारत और नेपाल
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इन नदियों को बचाना होगा

पतित पावनी गंगा हो या वरदायिनी बूढ़ी गंडक, मैया कमला हो या माता सीता की नगरी होकर बहने वाली बागमती-लखनदेई, किसी का पानी पीने लायक नहीं रहा। पहाड़ों के सिल्ट से भरी उत्तर बिहार की ये नदियां कचरा निष्पादन का आसान माध्यम बनी हुई हैं। प्रदूषण से इनकी कलक
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सबसे बड़ा सवाल - शुद्ध पानी

सबसे बड़ा सवाल - शुद्ध पानी जी हां, उत्तर बिहार में लोगों को शुद्ध पानी कैसे मिले, यह बड़ा सवाल बन गया है। सम विकास योजना की मद से सरकारी चापाकलों के गाड़े जाने की बात हो या जलापूर्ति योजनाओं के माध्यम से शुद्ध पेयजल मुहैया कराने की, कहीं भी ये कल्या
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पानी का तिलस्म और उत्तर बिहार

सिर्फ जानें ही नहीं लेता, उत्तर बिहार में बहुत कुछ करता है पानी। यह गांवों को घेर लेता है और वहां पहुंचना और वहां से निकलना रोक देता है। सड़क-रेलमार्गों से उर्र-फुर्र करने वाले आदमी को पैदल और नाव की सवारी कराने लगता है। जमींदार को पानीदार बना देता ह
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बैकुंठ शुक्ल की फांसी का वह दिन

सरकारी गवाह बन गये गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष की बेतिया के मीना बाजार में हत्या कर भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु की मौत का बदला लेने वाले बैकुंठ शुक्ल को फांसी देने के वक्त गया जेल का सरकारी जल्लाद भी मानो थमक गया था। जेल के सुपरिंटेंडेंट मिस्टर परेरा रुमा
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द ट्रायल आफ बैकुंठ शुक्ल

फणीन्द्र नाथ घोष की हत्या के आरोप में फांसी पर झूल जाने वाले शहीद बैकुंठ शुक्ल के केस का पूरा दृष्टांत आजादी की पचासवीं वर्षगांठ पर प्रकाशित पुस्तक 'द ट्रायल आफ बैकुंठ शुक्ल : ए रिवोल्यूशनरी पैट्रियट’ में विस्तार से मिलता है। इसके संपादक नंद किशोर शु
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हीन भावना से ऐसे उबरें (1)

सच पूछिए, यदि किसी को यह पता चल गया कि वह हीन भावना से ग्रसित हो चुका है या हो रहा है तो उसकी बीमारी का समझिए आधा इलाज हो गया। जिस दुश्मन को आप ठीक से समझ गये, समझिए उसकी आधी ताकत आपके पास आ गयी। जब तक दुश्मन के पैंतरों से आप अनजान रहते हैं, तभी तक व