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हिन्दी निकष

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31 Dec 2009
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हिन्दी निकष

इन दिनों थोड़ी फुर्सत है तो कुछ पुराने कागजात खंगाल रहा हूँ। पुरानी ग़ज़लें और गीत और ......... बहुत कुछ अपनी स्मृतियों के साथ फिर से निकल-निकल कर आ रहे हैं। ........ (चंद तस्वीरे-बुतां, चंद हसीनों के खुतूत, बाद मरने के मिरे घर से ये सामां निकला।) एक
 
आनंदकृष्ण
Dec 29 2009 11:50 AM
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एक ग़ज़ल : "गीत गाते रहे.........."

आज कुछ पुराने कागजात खंगालते वक्त एक पुरानी रचना मिली जिस पर तारीख पड़ी थी- १५ जनवरी १९९२। इसे पढ़ते हुए कुछ पुरानी स्मृतियाँ भी उछल-कूद कर गईं। इसे केवल मेरी प्रारम्भिक रचनाओं के रूप में देखें. गीत गाते रहे गुनगुनाते रहे। रात भर महफिलों को सजाते रहे।
 
आनंदकृष्ण
Dec 29 2009 11:50 AM
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ग्रीष्म सप्तक

भीषण गर्मी पड़ रही है ......... इस मौके पर सात दोहे प्रस्तुत हैं। ये सभी दोहे अपने आप में स्वतंत्र हैं किन्तु समेकित रूप में ये ग्रीष्म ऋतु के एक पूरे दिन का चित्रण करने का प्रयास हैं...... प्रयास की सफलता का मूल्यांकन आप करेंगे ना-?????? दोहे निकल प
 
आनंदकृष्ण
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चार मिसरे

चार मिसरे समाद फरमाएं- हमने जो ख्वाब थे सजा डाले- देख लो-वक़्त ने मिटा डाले। आरजू अब सुपुर्दे-खाक करो- मैंने सारे वो ख़त जला डाले.
 
आनंदकृष्ण
Dec 29 2009 11:50 AM
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हिन्दी निकष

साहित्य "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात" का अनुगामी बने : ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद जी महाराज। भारतीय मनीषा में भगवान् आदि-शंकराचार्य का अवतरण एक अलौकिक व विलक्षण घटना है। उन्होंने तत्कालीन समाज में फ़ैली कुरीतियों रूढियों और कुं
 
आनंदकृष्ण
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हिन्दी निकष

लघुकथा : नींद उनके घर पुत्री जन्म का समाचार सुन कर मैं उन्हें बधाई देने जा पहुंचा- ................ मैंने देखा- नवजात कन्या चैन से सो रही है और उसके माता-पिता की आंखों से नींद उड़ने लगी है.......... (रचना- ०३-०५-१९९५)
 
आनंदकृष्ण
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गीत : तुम मुझसे

तुम मुझसे बस शब्द और सुर ले पाये- पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरे गीत-? मुझको तो बस गीत सुनाना आता है, होंठो पर संगीत सजाना आता है गहरा रिश्ता है मेरा पीड़ाओं से- फिर भी मुझको हास लुटाना आता है तुम मुझको बस आह-कराहें दे पाये- पर बोलो ! कैसे छीनोगे मु
 
आनंदकृष्ण
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वे आँखें

एक बहुत पुराना गीत गीत की पृष्ठभूमि ये थी कि मेरी सुगम संगीत परीक्षा का फाइनल वाइवा हो रहा था। मैं लेट हो गया था इसलिए भागा-भागा हांफता हुआ कॉलेज पहुंचा। वहाँ पहुँच कर कुछ प्रकृतिस्थ होने के बाद जब मैंने इधर-उधर देखना शुरू किया तो मुझे इस गीत की प्रे
 
आनंदकृष्ण
Dec 29 2009 11:50 AM
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हिन्दी निकष

सफेद पर्दे पर : एक अभिजात्य शून्यता (डॉ. रमेश चन्द्र शाह के उपन्यास पर केन्द्रित) ''मैंने एक कमरे के घर में चार सदस्यों के परिवार को पाला पोसा, बच्चों को लिखाया पढाया और आज इसी शहर में मेरे बेटे के चार मकान है जिनमें उसके बूढे बाप के लिए एक कोना भी न
 
आनंदकृष्ण
Dec 29 2009 11:50 AM
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एक ग़ज़ल : गर ज़मीं ........ गर ज़मीं आशियाँ बनाने को- तो फलक बिजलियाँ गिराने को। किस तरह से कहें फ़साने को, हर तरह उज्र है ज़माने को। हमने चाहा है अश्क मिल जाए- दर्द अपना कहीं छुपाने को। उन गुलों को मसल दिया उसने- जो मिले थे शहर सजाने को। एक इंसान की
 
आनंदकृष्ण
Dec 29 2009 11:50 AM
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एक हिंदी ग़ज़ल : चांदनी (शरद पूर्णिमा पर विशेष) क्या शरारत वहां कर रही चांदनी-? रात भर खिडकियों पर रही चांदनी। मैं तुम्हारे लिये गीत गाने लगा- इसलिये आजकल डर रही चांदनी। सब तुझे खोजते ही रहे उम्र भर- तू छुपी सबके भीतर रही चांदनी। फूल से सीख ली हैं सभी
 
आनंदकृष्ण
Dec 29 2009 11:50 AM
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हिन्दी निकष

प्रतीक्षा मेरी आंखों में सपनों का उजास है जिसे तुम सह नहीं पाते । मेरी थरथराती अंगुलियां कुछ रचनेके लिए बेताब हैं- यह जानना तुम्हारे लिए एक चेतावनी का सायरन बन गया । मेरे मुंह से फूटते शब्द एक नदी बन जाएंगे- यह आशंका ही तो बांध का पहला नींव का पत्थर
 
आनंदकृष्ण
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ये मौली है............. मेरी बेटी.... उम्र है चार साल और के.जी. में पढ़ती है । इसे रेडियो सुनना और वहाँ भी पुराने गाने सुनना बहुत अच्छा लगता है। रफी बाबा की बड़ी प्रशंसक है ......... वो कहती है कि बड़ी हो कर वो गाना गायेगी जैसे रेडियो में अंकल-आंटी ग
 
आनंदकृष्ण
Dec 29 2009 11:50 AM
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एक गीत ;"वे संबोधन----" वे संबोधन याद करो । अपने विगत क्षणों से प्रियतम- थोडा तो संवाद करो । अधरों ने विस्मृत करने का बहुत अधिक आयास किया है । किंतु तुम्हारी सुधियों के संग प्राणों ने वनवास किया है । स्वर्णपुरी से अब तो अपने स्वप्नों को आज़ाद करो । वे
 
आनंदकृष्ण
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एक गीतः सोच लेंगे ----

एक गीतः सोच लेंगे ---- सोच लेंगे कोई उलझन आ गई है बिन बुलाए- हम पहुंच जायेंगे तुम तक, क्या हुआ जो तुम ना आए । तुम तनिक सी बात पर जब रूठते, मुंह फेर लेते, कांपते अधरों से अस्फुट स्वरों में कुछ बोल देते तब तुम्हारे गाल पर बिखरी हुई उस लालिमा में- हृदय
 
आनंदकृष्ण
Dec 29 2009 11:50 AM
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हिन्दी निकष

पुराने कागजात खंगालने में मिला एक बहुत पुराना गीत भेज रहा हूँ जिस पर तारीख पडी है- १७-११-१९९१ स्थान- भोपाल रेलवे स्टेशन (कोई इंटरव्यू वगैरह देने गया होऊंगा) फिर उसे घर आ कर एडिट किया होगा. इस पर मेरे पूरे हस्ताक्षर हैं जो मैं बहुत कम करता हूँ. ये गीत
 
आनंदकृष्ण
Jul 25 2009 07:55 PM
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हिन्दी निकष

गीत: चाहे ना हो ........चाहे ना हो साथ तुम्हारा,या हाथों में हाथ तुम्हारा ।मेरी सांसें तुमको प्रतिक्षण साथ रखेंगी याद बना कर ।। बचपन की मधुरिम किलकारी,निश्छल, अर्थहीन सी गारी ।पल में हास, अश्रु पल भर मेंरोना, रूठ मनौवल प्यारी । चढ़ना लपक-लपक पेड़ों पर, और
 
आनंदकृष्ण
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Jul 23 2009 07:48 PM
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हिन्दी निकष

समलैंगिकता और समाज समलैंगिकता को कानूनी जामा मिलने के बाद हर आम आदमी के मन में उठने वाले सवालों के उत्तरों में आज के उत्तर -आधुनिक हो रहे समाज की कड़वी सच्चाई और घिनौना चेहरा छुपा है. हमारी प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में कभी कभी बहुत विद्रूपित और
 
आनंदकृष्ण
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"मंच" पर वज्रपात का दिन

आज का दिन "मंच" पर वज्रपात का दिन है। आज की सुबह ह्रदय द्रावक समाचार लाई है. एक सड़क दुर्घटना में मंच के लोकप्रिय कवि ओम प्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड सिंह गुज्जर का निधन हो गया और ओम व्यास तथा ज्ञानी बैरागी गंभीर रूप से घायल हुए हैं. एक शोक सूचना औ
 
आनंदकृष्ण
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एक छोटी सी ग़ज़ल

एक छोटी सी ग़ज़ल गर ज़मीं आशियाँ बनाने को- तो फलक बिजलियाँ गिराने को। किस तरह से कहें फ़साने को, हर तरह उज्र है ज़माने को। हमने चाहा है अश्क मिल जाए- दर्द ये अपना कहीं छुपाने को। उन गुलों को मसल दिया उसने- जो मिले थे शहर सजाने को। एक इंसान की ज़रूरत है-
 
आनंदकृष्ण
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चार मिसरे-

चार मिसरे- मैं तुम्हारे ख़्वाबों का इक जहां बनाऊंगा। प्यार के मुरीदों का कारवां बनाऊंगा। मुझको तेरी साँसों की फूल सी छुवन की कसम- लौट के अगर आया- आसमां बनाऊंगा.
 
आनंदकृष्ण
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हिन्दी निकष

स्वर्गीय राजीव सारस्वत को श्रद्धांजलि ताज होटल मुंबई में हुए आतंकी हमले में हिन्दुस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड में राजभाषा प्रबंधक के पद पर कार्यरत श्री राजीव सारस्वत की मृत्यु हो गई। वे वहाँ संसदीय राजभाषा समिति के निरीक्षण दौरे के सम्बन्ध में बनाए गए न
 
आनंदकृष्ण
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हिन्दी निकष

मेरी पिछली ग़ज़ल में रदीफ़ "दो" था और इस ग़ज़ल में भी यही रदीफ़ है. दोनों "दो" के अर्थ अलग अलग हैं. बताइयेगा की इस तज़रबे में मैं कितना कामयाब रहा- पेशे-नज़र है ये ग़ज़ल- ग़ज़ल : कोई हमदम या............... कोई हमदम या कोई कातिल दो। मेरी कश्ती को एक साहिल दो.
 
आनंदकृष्ण
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एक ग़ज़ल : "रोक पाएंगीं क्या ........." रोक पाएंगीं क्या सलाखें दो-? जब तलक हैं य' मेरी पांखें दो । जिसने सबको दवा-ए-दर्द दिया- आज वो माँगता है- साँसें दो । चाह कर भी निकल नहीं सकता- मुझको घेरे हुए हैं बाँहें दो । वो इबादत हो या की पूजा हो- एक मंजिल है
 
आनंदकृष्ण
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एक ग़ज़ल:इक मुसाफिर ने.....

एक ग़ज़ल प्रस्तुत है- इक मुसाफिर ने कारवां पाया। कातिलों को भी मेहरबां पाया. मेरे किरदार की शाफाक़त ने- हर कदम एक इम्तिहाँ पाया। जुस्तजू में मिरी वो ताक़त है- तुझको चाहा जहाँ-वहाँ पाया। वो जो कहते हैं-मिरे साथ चलो उनके क़दमों को बेनिशां पाया। इक सितारा
 
आनंदकृष्ण
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एक ग़ज़ल

सूखते होंठों पे हमको तिश्नगी अच्छी लगी। जिंदगी जीने की ऐसी बेबसी अच्छी लगी। इस नुमाइश ने दिखाए हैं सभी रंजो-अलम- इस नुमाइश की हमें ये तीरगी अच्छी लगी हैं वसीले और भी, फितरत-बयानी के, लिए पर हमें नज्मो-ग़ज़ल, ये शाइरी अच्छी लगी। आलिमों ने इल्म की बाते
 
आनंदकृष्ण