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अस्तित्व

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13 Jun 2010
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...मुझे ऐ जिंदगी दीवाना कर दे

उस दिन इयरफोन लगे हुए थे। 14 मिनट 21 सेकंड लंबी इस कव्वाली के आखिरी सिरे पर थी--कई-कई वार चढ़ी कोठे ते नी मैं उतरी कई-कई वारी..... न दिल चैन न सबर यकीं नू.... न भूलदी सूरत प्यारी.... आ जा सजणा.... ना जा सजणा ......तू जितीया ते मैं हारी... छेती आजा
 
डॉ. अमिता नीरव
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इश्क़-ए-हक़ीक़ी में अन्नपूर्णा देवी

4 जून के स्क्रीन में अन्नपूर्णा देवी पर एक खुबसूरत आर्टिकल पढ़ा...... खुबसूरत से अच्छा और कोई शब्द फिलहाल मिल नहीं रहा है...... क्योंकि उस अनुभूति को जिसे मैंने पढ़ने के दौरान और आज तक जी रही हूँ, शब्द नहीं दे पा रही हूँ, इसलिए फिलहाल सिर्फ खुबसूरत शब्द
 
डॉ. अमिता नीरव
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इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं

ऐसा शायद होता ही होगा.... तभी तो उत्सव से जुड़ता है अवसाद। क्या होता होगा इसका मनोविज्ञान.....? क्यों होता है, ऐसा कि जमकर उत्सव मनाने के बाद समापन के साथ ही गाढ़ी-सी उदासी........ न जाने कहाँ से चुपके से आ जाती है.... करने लगती है चीरफाड़, उस सबकी, जिसे
 
डॉ. अमिता नीरव
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लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस

शुक्रवार की शाम थी.... इंतजार के पहले दिन के मुहाने पर बैठे थे, अभी एक दिन और बाकी था। अपने एक जैसे रूटिन में सन्डे का इंतजार करते रहने के दौरान यूँ ही एक तुकबंदी रच डाली थीसोम, मंगल खुमारबुध, गुरु उतार शुक्र, शनि इंतजारतब कहीं आता है रविवार....हाँ तो
 
डॉ. अमिता नीरव
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होने-गवाँने का हिसाब

मानसून के आमद की खबरों के बीच पश्चिम में गर्मी अपने पूरे शबाब पर है..... दाना चुगने के लिए चोंच खोले चिड़िया के बच्चे की तरह धरती का मुँह जगह-जगह से खुलने लगा है..... मौसम की कुछ ज्यादा ही मेहरबानी रहती है हम पर जरा बदला नहीं.... मन भी बदलने लगता
 
डॉ. अमिता नीरव
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दर्द के लिए दवा के तौर पर दर्द की तलाश

बेचैन दिन और तपती-सी रातें हैं.... उद्वेलन, उलझन और विषाद की पर्तें चढ़ने लगी है। होने पर सवाल और मुट्ठी में बँधी रेत-सी फिसलती....साँसों का अहसास.... हो पाने का अहसास और होने को बहा दिए जाने की तीखी ख्वाहिश..... ऐसे ही तपते, उलझे और मुश्किल दिनों में
 
डॉ. अमिता नीरव
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माँ एक रसायन है

माँ से हमारा रिश्ता सबसे पुराना होता है, खून का....इसलिए उसे तो हमें प्यार करना हुआ ही..... कुछ ऐसे रिश्ते भी होते हैं, जो माँ की तरह खून से तो नहीं बँधे होते हैं, लेकिन उनके होना, हमारे जीवन की नींव में होता है, और वो इतना पुख्ता होता है, कि उसका अहसास
 
डॉ. अमिता नीरव
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जीने का शऊर आ रहा है....?

झिलमिलाते तारों और खिलखिलाती हवा के साथ रात की जुगलबंदी के माहौल में अपनी साधना के पन्नों को पलटते हुए बहुत सारी शहद की बूँदे जहन में उतरी थी.... सोचा था, सुबह बहुत मीठी होगी...। जागने से पहले और नींद के लंबे दौर के बाद जब आँखें खुली तो पता नहीं क्यों
 
डॉ. अमिता नीरव
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भूख जगाता बाजार

गर्मियों के सुलगते दिन और बुझती रातों को जीना एक अहसास है... ठंडी सफेद चादरों पर जागे देर तक, तारों को देखते रहे छत पर पड़े हुए... की तरह का....तो देर तक जागती रातों वाली ऐसी ही राख हुई छुट्टी की सुबह थी। नींद गाढ़ी थी और उसका खुमार और भी गाढ़ा.... बाहर
 
डॉ. अमिता नीरव
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डुबोया मुझको होने ने....

हम हर वक्त होना चाहते हैं, बल्कि होने के अलावा हम और कुछ चाह भी नहीं सकते हैं, एक साथ पैसा, शोहरत, इज्जत, नाम, खुबसूरती, तंदुरूस्ती और पता नहीं क्या-क्या.... चाहते हैं.... होना और होना.... होने की दौड़ में हैं हम सब... पूरी जिंदगी इस होने के नाम कुर्बान
 
डॉ. अमिता नीरव
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मैं ही कश्ती हूँ, मुझीं में है समंदर मेरा

निदा फ़ाज़ली का शेर हैहर घड़ी खुद से उलझना है मुकद्दर मेरामैं ही कश्ती हूँ, मुझीं में है समंदर मेराबस कुछ ऐसे ही हाल है, इन दिनों.... ऊब के साथ अरूचि का संयोग है, न सूफी पसंद आ रहा है, न गज़लें, न शास्त्रीय.... न फिक्शन भा रहा है, न फैक्चुअल... न फिलॉसफी
 
डॉ. अमिता नीरव
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ट्रेडमिल पर सभ्यता...

सप्ताह की शुरुआत में ज्यादातर काम रविवार को आए अखबारों और पत्रिकाओं को देखने का ही होता है... इस तरह से अपने दिमाग में कुछ और कूड़ा जमा हो जाता है..., लेकिन ये बेवजह नहीं होता है, क्योंकि इन सूचनाओं से ही किसी विचार तक पहुँचा जाता है। तो एक तरह से यह एक
 
डॉ. अमिता नीरव
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बुरे से अच्छा हो तो भी मुश्किल..... बदलाव

जीवन में बहु प्रतिक्षित बदलाव आया , लेकिन फिर भी पसरी हुई है गहरी उदासीनता... विचार नहीं, विचारहीनता भी नहीं...मगर कुछ तो है जिसे नहीं होना चाहिए ...। दौड़ थमी, रफ्तार पर ब्रेक लगा, चुनौती मद्धम हो गई...। चाहा हुआ पाया....संतोष होना था, नहीं हुआ...सतह पर
 
डॉ. अमिता नीरव
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सृष्टि के गर्भाधान का उत्सव गुड़ी पड़वा

फागुन के गुजरते-गुजरते आसमान साफ हो जाता है, दिन का आँचल सुनहरा, शाम लंबी, सुरमई और रात जब बहुत उदार और उदात्त होकर उतरती है तो सिर पर तारों का थाल झिलमिलाने लगता है। होली आ धमकती है, चाहे इसे आप धर्म से जोड़े या अर्थ से... सारा मामला आखिरकार मौसम और मन
 
डॉ. अमिता नीरव
Mar 16 2010 10:58 AM
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अबला और दुर्गा के बीच

महिला दिवस पर सप्लीमेंट निकालने की तैयारी से पहले विभागीय मिटिंग चल रही थी...क्या दिया जा सकता है महिला दिवस पर... सब अपने-अपने विचार रख रहे थे, लेकिन एक बात पर सारे सहमत थे कि सप्लीमेंट में न तो महिला की बुरी स्थिति को लेकर ‘स्यापा’ किया जाएगा और न ही
 
डॉ. अमिता नीरव
Mar 08 2010 08:21 AM
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ये वक्त गुज़र जाएगा

जब सब कुछ सामान्य और अपनी गति से चलते हुए एकरस हो रहा हो... तब एकाएक कुछ ऐसा हो, जिसकी प्रत्याशा न हो और अनचाहे मेहमान की तरह आ टपके अकेलापन.... तब...? कल शाम से ऐसे ही अकेलेपन से जूझ रहे हैं। रात को सोने तक का सारा वक्त गर्क़ किया टीवी और कम्प्यूटर
 
डॉ. अमिता नीरव
Feb 23 2010 08:41 AM
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अंधा कर देने वाली चकाचौंध

अमेरिका से आर्किटेक्चर का कोर्स कर भारत आया लड़का शादी कर रहा था और दुर्भाग्य से हम साग्रह आमंत्रित थे... छुट्टी की शाम को शहर से 20 किमी दूर शादी का वैन्यू था और जाना जरूरी... मन-बेमन था लेकिन पहुँचे। आधा किमी दूर गाड़ी पार्क कर पैदल ही विवाह-स्थल पर
 
डॉ. अमिता नीरव
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प्रतीकों के बीच गुमा प्रेम

फागुन की गुलाबी-सुनहरी सी सुबह...और रविवार का दिन...हफ्ते भर से प्रेम को लेकर की गई माथापच्ची के बाद आई छुट्टी....। प्रेम को विषय बनाकर उसकी बाल की खाल निकाली.... एंगल ढूँढें ( गोया प्रेम नहीं कोई खबर हो, फिर पत्रकार सिवा एंगेल ढूँढने के और कुछ जानता भी
 
डॉ. अमिता नीरव
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Feb 14 2010 04:58 PM
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क्या है हम ....?

रविवार की छुट्टी....हाथ पसारे खड़ा खुला-खुला सा दिन... लिहाफ का भला लगने वाला गुनगुनापन...मीठी सरसराती वासंती बयार...खिड़की से उड़कर अंदर आते धूप के कतरे....मखमली-सा अहसास...उन्माद के तूफान के गुज़र जाने के बाद की शांति...पार्श्व में गुलाम अली का
 
डॉ. अमिता नीरव
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काश...काश....काश

कई दिनों से लगातार यह महसूस हो रहा था कि आसपास अस्त-व्यस्तता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। टेबल पर पड़ी हुई कुछ पढ़ी, बे-पढ़ी, अधपढ़ी पत्रिकाएँ, अखबार के कुछ पन्ने, लिखे, अधलिखे कुछ कागज़...अलमारी के हैंडल, कुर्सी की पुश्त और दरवाजे के पीछे लगी खूँटी पर टँगे
 
डॉ. अमिता नीरव
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हवाओं में महका बसंत

इस बार न तो कोयल कूकी, न बयार बही, न आम बौराया और न ही पलाश दहका....बहुत दबे पाँव बसंत आया...दिन-रात की तीखी खुनक के बीच दोपहर थोड़ी बहुत मुलायम हो रही है। आहट सुनाई पड़ रही है...वह अभी आया तो नहीं ही है, बस कहीं किसी पलाश पर बसंत की छाया दिखती है, बाकी
 
डॉ. अमिता नीरव
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मकर संक्रांति की शुभकामना

माघ का मध्य है...पारंपरिक रूप से सर्दी की विदाई का समय आ पहुँचा है। अब यदि क्लाइमेट चेंज का असर हो तो हो सकता है लगातार सींक होता जा रहा सर्दी का मौसम थोड़ा-सा फैल जाए और होली तक अपने पंडाल को खींच ले जाए.....लेकिन....हमेशा ऐसा नहीं होता है। फिर यदि ऐसा
 
डॉ. अमिता नीरव
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रेट्रोस्पेक्शन

गुजरते साल का आखिरी रविवार....ठिठके, उदास और पीले-से शिशिर की एकाकी और बेचैन-सी दोपहर...सुबह-शाम मौसम में थोड़ी तीखी-सी खुनक...दिसंबर गुजरने को है, लेकिन मौसम वैसा ही मुलायम बना हुआ है, जैसा बसंत से थोडा़ पहले हुआ करता है। कभी-कभी उत्तर से आती हवाएँ
 
डॉ. अमिता नीरव
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असंतुष्ट सुकरात की तलाश में....

फिर से एक मुश्किल दौर....सब कुछ सामान्य है शायद इसलिए.....ऐसे ही समय में अक्सर जेएस मिल याद आ जाते हैं.....जिनका लिखा हुआ हम अपने यूनिवर्सिटी के दिनों में दोस्तों के बीच दोहराया करते थे। बेंथम के सिद्धांत के विरूद्ध उन्होंने अपने विचार देते हुए कहा थ
 
डॉ. अमिता नीरव
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तस्वीर-सा सुंदर गोवा....

गतांक से आगे जब हम हुए समंदर के पड़ौसी इस बार सोच ही लिया था कि कुछ भी हो जाए समंदर को रखेंगे आँखों के सामने....खुशकिस्मती कि जगह मिल भी गई ऐसी...बीच पर ही मिली एक कॉटेज....यहाँ दिन के किसी भी पल में समंदर अपने होने को भूलने नहीं देता है। जैसे-जैसे र
 
डॉ. अमिता नीरव
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तस्वीर सा सुंदर गोवा...

समंदर के साथ ही दिन-रात, सुबह-शाम हर एक पल बिताने की योजना बनाकर हम गोवा घूमने निकले थे, लेकिन दो दिन हमने मडगाँव (जहाँ हमने ट्रेन छोड़ी) में ही बिता दिए। मडगाँव गोवा का दूसरा सबसे बड़ा शहर....लेकिन ये क्या.....मडगाँव तो देश के किसी भी शहर-सा एक आम-स
 
डॉ. अमिता नीरव
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१० दिन के लिए अर्धविराम....!

मावठा रूका तो....धूप का हाथ पकड़कर गहरी खुनक साथ चली आई...तब से धूप और खुनक दिन भर आँख मिचौली खेलती रहती हैं और शाम होते-होते धूप तो थक कर घर चली जाती है, लेकिन खुनक रात होते ही जवान हो जाती है....। मन रूखा-रूखा बना हुआ है, कितनी ही कोशिश की उसे मनान
 
डॉ. अमिता नीरव
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कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता

नवंबर में अगस्त सी बारिश हो रही है। पिछले पाँच छः दिनों से लगातार यूँ लग रहा है जैसे बारिश का ही मौसम हो.....। अमूमन इस महीने दीपावली होती है, लेकिन इस बार दीपावली-दशहरे से फारिग हो चुके लोगों को नवंबर ने सावन जैसी सौगात दी। गीला-गीले से दिन पर रूमान
 
डॉ. अमिता नीरव
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...कि मैं जमीन के रिश्तों से कट गया यारों...

एक बड़े शहर में रहने के अपने सुख और अपने दुख हैं....कह सकते हैं कि कोई भी सुख निरपेक्ष नहीं होता है या फिर बहुत आशावादी हैं तो यूँ भी कह सकते हैं कि दुख अपने साथ कोई-न- कोई उपहार लेकर आता है...कोई फर्क नहीं अलबत्ता....। हाँ तो एक साफ सफेद छुट्टी पर स
 
डॉ. अमिता नीरव
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मैं....

जिम्मेदारी....शौक और जरूरत को अपनी पूरी ऊर्जा और पूरी क्षमता से सजाने की ज़िद्द.....दिन की चेतना के हर एक मिनट का अर्थ तलाशते...हर एक क्षण को अर्थवान बनाने का जुनून....आसमान पर हीरे से लिखी इस इबारत के बाद भी कि जीवन की कोई अर्थवत्ता नहीं है...जन्मे
 
डॉ. अमिता नीरव
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.....अवसाद के बीच

दीपावली गुजर गई...रात भर पटाखों के शोर के बीच दिनभर की थकान ने आँखों में नींद भर दी...और सुबह उठे तो उत्सव गुजर चुका था और गुजर चुका था उसका उत्साह.... अब थी छुट्टी....खाली बर्तन-सी बजती हुई....कोई योजना नहीं और कोई तैयारी नहीं....फूटे हुए पटाखों के
 
डॉ. अमिता नीरव
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गुम हो चुकी लड़की.....अंतिम कड़ी

गतांक से आगे शाम पाँच बजे ही रिज़वान ने मुझे उसके अपार्टमेंट के नीचे छोड़ा... जब निकलना हो तो मुझे फोन कर लेना... और नहीं तो....---कहकर बात अधूरी छोड़ कर आँख मारी। मुझे अच्छा नहीं लगा।---मैंने रूखाई से कहा, मैं पहुँच जाऊँगा, यू डोंट वरी। नीली कैप्री
 
डॉ. अमिता नीरव
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गुम हो चुकी लड़की....छठी कड़ी

गतांक से आगे.... प्लेन से उतर कर एयरपोर्ट पर आते ही रिज़वान दिखाई दे गया जोर-जोर से तख़्ती हिलाता हुआ। मैं तेजी से उसकी तरफ पहुँचा तो वह तपाक से गले लग गया। मैंने हँसते हुए कहा-- वहाँ जर्मनी में भी तुम ऐसे ही मिले थे मुझे तख़्ती हिलाते हुए, तब मैं तु
 
डॉ. अमिता नीरव
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गुम हो चुकी लड़की....पाँचवी कड़ी

गतांक से आगे.. दीपावली मना चुकने के बाद परीक्षा की तैयारी का दौर शुरू हो चुका था....। शामें हल्की-हल्की ठंडक लेकर आने लगी थी। दोस्त के यहाँ सुबह से शाम तक पढ़ने के बाद देर शाम घर लौट रहा था कि गली के मुहाने पर मैंने उसे बदहवास हाल में पाया। दुपट्टा औ
 
डॉ. अमिता नीरव
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गुम हो चुकी लड़की

गतांक से आगे.... उस दिन जोर-जोर से आँधी चलने लगी और बादल घुमड़ आए.... मैं दरवाजे-खिड़कियों को बंद करन के लिए बाहर आया तो वह सामने थी.....चलो थोड़ा घूमकर आते हैं....उसने प्रस्ताव दिया। पागल हो क्या....? मौसम खराब हो रहा है...। --मैंने कहा। तभी पानी बर
 
डॉ. अमिता नीरव
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गुम हो चुकी लड़की

गतांक से आगे.... देर शाम जब मैं गर्मी से घबरा कर छत पर आया तो उसे देखकर याद आया कि मैं उसे बहुत दिनों बाद देख रहा हूँ। सफेद कुर्ते पर हल्के गुलाबी रंग का दुपट्टा पड़ा हुआ था। अपने बालों को उसने बड़ी बेतरतीबी से उपर बाँध लिया था। उसकी छत की मुँडेर पर
 
डॉ. अमिता नीरव
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गुम हो चुकी लड़की

दिसंबर जा रहा था..... वो गुजरते साल का एक और छोटा-सा दिन था...... गुलमोहर के पेड़ के नीचे धूप और छाह से बुने कालीन पर वो मेरे सामने बैठी थी। उसके सिर और कंधों पर धूप के चकते उभर आए थे..... मोरपंखी कुर्ते पर हरा दुपट्टा पड़ा था......कालीन की बुनावट को
 
डॉ. अमिता नीरव
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गुम हो चुकी लड़की.... पाँचवी कड़ी

गतांक से आगे.. दीपावली मना चुकने के बाद परीक्षा की तैयारी का दौर शुरू हो चुका था....। शामें हल्की-हल्की ठंडक लेकर आने लगी थी। दोस्त के यहाँ सुबह से शाम तक पढ़ने के बाद देर शाम घर लौट रहा था कि गली के मुहाने पर मैंने उसे बदहवास हाल में पाया। दुपट्टा औ
 
डॉ. अमिता नीरव
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गुम हो चुकी लड़की....चौथी कड़ी

गतांक से आगे दो दिन से लगातार बारिश हो रही है..... घर से बाहर निकलने की भी मोहलत नहीं मिली। इन दिनों में सर्फिंग-चेटिंग...... मेलिंग-कालिंग.....टीवी और मूवीज सब कुछ हो चुका और अब बुरी तरह से ऊब गया हूँ....। अपने कमरे की खिड़की से बाहर की ओर देख रहा थ
 
डॉ. अमिता नीरव
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ब्रूस अल्माइटी और गॉड

तुम्हारे लिए ईश्वर क्या है?कॉफी के कोको पावडर वाले झाग को चम्मच से सिप करती लड़की से विश्वविद्यालय के कैंटीन में बैठे लड़के ने पूछा।इस एकाएक पूछ गए प्रश्न ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया। थोड़ी देर सोचने के बाद लड़की ने कहा। --ही इज लाइक पेरेंट टू
 
डॉ. अमिता नीरव
Sep 24 2009 10:13 AM