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13 Jun 2010
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वक़्त से हाथ मिला लिया

हिन्दयुग्म से बैरंग लौटी मेरी रचना ,... जीने की आरजू ने हर गम भुला दियारोये बहुत थे हम मगर , चाहत को सुला दिया भारी पड़ता है इश्क तो गमे-रोज़गार परन हवा निवाला बनती , क्या पी के जी रहतेउतरे जो हम जमीं पर , टुकड़ों ने सिला दियाजीने की आरजू ने हर गम भुला
 
शारदा अरोरा
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' गर , लेकिन ' ( if n buts )

खुरदरे सफ़र ने मिटा दिए ' गर , लेकिन 'चिकनी सतह पर नहीं टिकता कुछ भी ज़िन्दगी तेज चली खुशनुमा सफ़र में तोभारी वक़्त जैसे रेंग कर रुक गया हो अभीसारी साजिशें हैं मिट्टी में मिला देने कीकुछ बच रहूँ तो निशाँ बोलें कभीफ़ना होता है जब भी कोईजादुई से टुकड़े बोल
 
शारदा अरोरा
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आदमी की अना

न चाहते हुए भी वो सब दिख जाता है , फिर लफ्जों में उतरना लाजिमी है ... क़द से ऊँची है आदमी की अनाऊँचाई पर भी बौना ही हुआनजर-अन्दाज़ करके करते हैं फनाअन्दाज़ कितना शातिराना हुआउसके मन की उपज , उसका समाँअपना मौसम है जुदा , मेल ही न हुआकिस से पूछे सवाल अपनी
 
शारदा अरोरा
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रँग सारे भरती

इतना चुभते से क्यों हैं रेशमी धागेअपनी चलती नहीं है कुछ भी उसके आगेमेरे काढ़े कसीदे नहीं कढ़तेमेरे यत्नो से फूल नहीं खिलतेहाथ लगते ही तेरा ये क्या होताअरमानों के दीप सारे जलतेडोरी रेशमी है क्यों चुभतीतिल्लेदार है आँखों में रमतीजरीदार , चटख ,
 
शारदा अरोरा
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मन के अँगना में फलक तन्हा है

जिन्दगी तुझको जब भी देखा मैंनेइक मुखौटे को तेरे हाथ से छीना मैंने मन के अँगना में फलक तन्हा हैचाँद सूरज की तरह उनको उतारा मैंने मुड़ के देखा नहीं कभी पीछेजिन्दगी तुझसे बहुत प्यार किया है मैंने साथ देती नहीं परछाई भीफिर भी हर लम्हा ऐतबार किया है मैंनेहर
 
शारदा अरोरा
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आँखों से ओझल नहीं होता

वो कौन सी महफ़िल है जिसमें दिलबर नहीं होताहो सामने या छिपा दिल में , वो रहबर नहीं होतातन्हाई भी करती है शिकायतकि इक पल भी वो आँखों से ओझल नहीं होताखबर तो उसको भी है इतना भी वो बेखबर नहीं होतावो कौन सी महफ़िल है जिसमें दिलबर नहीं होतादिन हो के रात हो
 
शारदा अरोरा
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के है कोई सबेरा

है कोई तो पहलू अँधेराके जिसकी तह में है कोई तो चेहराचलना है आँख मूँद करवरना क्या वक़्त है कभी ठहरासाये सा उभरता है वोतन्हाँ देखते ही लगता है पहराजुबाँ उसकी ही तो बोलते हैंजड़ों में बस गया है जो गहरारौशनी करते हैं सायों पे बार बारउघाड़ते हैं दिन-रात , के है
 
शारदा अरोरा
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टहलाते-टहलाते

गम टहल गया मुझको टहलाते-टहलातेआजिज आ गया था मेरे समझौते से , राह भूल गयाबाद मुद्दत के हुई उनसे मुलाक़ात जोईद का चाँद उतरा है फलक से , राह भूल गयाआज फिर है इश्क की बाजीगुरूर से कह दो पहरेदार ,राह भूल गयाये कौन सा मुकाम हैनिशान बोलते खड़े राहगीर ,राह भूल
 
शारदा अरोरा
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थपक कौन सी

चुनरी सितारों से जड़ा रक्खी हैबिरहन ने कोई अलख जगा रक्खी हैरात कटती नहीं सब्र भी टूटा नहींदिल के साज पे बाशिन्दों कोथपक कौन सी सुना रक्खी हैबिरहन ने कोई अलख जगा रक्खी हैहर लम्हा है रात का आख़िरी लम्हारात के कानों में यही कह करआहट सुबह की सजा रक्खी हैबिरहन
 
शारदा अरोरा
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बहुत दिन हुए जिन्दगी से मिले

एक ही तर्ज़ पर दो गीत १. बहुत दिन हुए जिन्दगी से मिलेअरमाँ मचल कर पहलू में हिलेबदला है मौसम , दिल भी है सहमाले चल किसी अमराई तलेपत्ता न हिलता , गुम है हवा भीतपती जमीं पर भी पुरवाई चलेझपकता है आँखें , कुम्हलाया शज़र भीयादों के जब जब लग आता गले2.बहुत दिन हुए
 
शारदा अरोरा
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समझो के शब हुई

आये हैं बीमार बीमार का हाल पूछनेकोई और भी है मेरे जैसा , तसल्ली हुईआहट हुई राह में देख कर गुलाब कोसेहरे में गुंथता ये , ख़्वाबों से बात हुईकोई गुजरा था कह देते हैं निशाँ सब कुछछेड़े जो तराने तो या खुदा दर्द हुआ या ग़ज़ल हुईजितना है तेरा मन उदास , दर्द भी
 
शारदा अरोरा
Mar 06 2010 03:18 PM
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रँग आ गया फागुन की बयारों का

रँग आ गया फागुन की बयारों कामस्ती के ढोल नगाड़ों काहोली का , तन-मन रँग के गीत गाने का रँग होली का है अबीर-गुलालरँग जीवन का है यही , हँसी-खेल-खुशीबहाना है चलने का , दम भरने कारँग आ गया फागुन की बयारों का थिरकन भी है धड़कन का जवाबथाप ढोलक की नहीं , कदम
 
शारदा अरोरा
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लफ्ज़ सीते हैं

न गम किया , न गुमान कियायही तरीका है जीने का , जिसने आराम दियाचाहा कि गम से दूरी बरकरार रहेये वो शय है हर कदम , जिसका दीदार कियाहम खलिश को भी रखते हैं अपनी निगरानी मेंसुनते हैं कई बार वजूद इसने भी तार-तार कियासहलाता है कभी वक़्त भी थपकियाँ दे दे करघूँट
 
शारदा अरोरा
Feb 20 2010 11:07 AM
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धुआँ धुआँ हो करके उठा

दिल तपता है , किसने देखा अँगारों कोवो जो धुआँ धुआँ हो करके उठा , उसे उम्र लगी परवानों की ढलती है शमा , पिघली जो है ये अश्कों मेंछा जाती है अफसानों सी , इसे उम्र लगी बलिदानों कीरँग कोई हुआ , गुलाल हुआ या मलाल हुआमिल जाता है इन्सां के खूँ में , इसे उम्र
 
शारदा अरोरा
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कहने को हम हैं अपनी मर्ज़ी के मालिक

अपनी दुनिया भी कहाँ अपनी हैकहने को हम हैं अपनी मर्ज़ी के मालिकचप्पे चप्पे पे राज़ किसका हैअपनी धड़कन भी कहाँ अपनी हैअपनी चाबी तो खुद हमनेअपनी दुनिया के हाथों में थमाई हैकब ज़माने के हिलाये से हिले हमदिल के साज़ पे सुर-तालअपनी दुनिया की ही तो कारस्तानी
 
शारदा अरोरा
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रन्ज न रखना तुम दिल में

दुनिया को इधर उधर तुम कर लेनापर रन्ज न रखना तुम दिल में , मेरे लिएकह पाते नहीं जब ज़ज्बात दिल केतुम नज़रों की भाषा पढ़ लेनातोहफों की कीमत आँकों मतजो खो जाएँ तो फिर न मिलेंकुछ ऐसे तोहफे बाँटो नरन्ज न रखना तुम दिल में , मेरे लिएमत आना किसी की बातों मेंअपने
 
शारदा अरोरा
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कोई कुण्डी-ताला खोल गया

क्या जाने क्या बोल गयालो ये भी पिछला साल गयामत रह जाना बातों -बातों मेंउड़ते हैं परिंदे वे ही तोगढ़ते हैं कसीदे नभ की शान में जोकोई कुण्डी-ताला खोल गयाक्या जाने क्या बोल गयाकुछ गुपचुप बातें हैं करतेपिछले सालों के पन्ने भीचमकते हैं सुनहरी अक्षर ही तो
 
शारदा अरोरा
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सूरज को अभी देर है

हवा का इक झोँका था , मैनें द्वार तक सजा लिया सूरज को अभी देर है , तेरे घर तक आने में इक सपना दिखाने को आँख लगी हो जैसे ठगे से देखते हैं गुलशन की नाउम्मीदी को तूने अपनी ही कोई बात कही हो जैसे रूठा है मेरा अपना ही , मुझसे मेरा सँसार कहीं तेरी हर पीड़ प
 
शारदा अरोरा
Dec 29 2009 11:48 AM
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मिट्टी में मिल जाने के बाद

रँग लाती है हिना , पत्थर पे पिस जाने के बाद खुशबू आती है यहाँ , वजूद मिट जाने के बाद फूलों से पूछो सोये कितना काँटों पर , डाल पर आने के बाद भूल जायेगी चुभन भी , समय बदल जाने के बाद ऐ मेरे दिल क्या पायेगा तन्हाई में , अपनों से बिछड़ जाने के बाद फिर से
 
शारदा अरोरा
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मैं वो बात नहीं छेड़ूँगी

मैं वो बात नहीं छेड़ूँगी , वो तेरा दिल दुखायेगी मेरा क्या है , वो तेरे जख्मों को छेड़ जायेगी बाद मुद्दत के सही , पुरवाई तो चली थाम लम्हों को , किस्मत तो सँवर जायेगी मोड़ तो आते हैं , सफर में भी कई रुक गए तो , तन्हाई भी ठहर जायेगी भूलता कोई नहीं , रहे अ
 
शारदा अरोरा
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कुछ भी नहीं पूछा है उसने

परछाइयों से लड़ बैठी हूँ अब कोई मुझे बुलाये न कुछ भी नहीं पूछा है तुमने ये कोई मुझे बताये न दरिया तो पार किया मैंने अब साहिल पे अटकाये न पतवारें तो होती बहाना हैं दम अपना कोई भुलाये न नहीं पछाड़ा मुझको दरिया ने किनारे से कोई लडाये न हाय कोई ढाल बनी ह
 
शारदा अरोरा
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हर हिस्से की धूप तय है

मौसम भी क्या शय है हर हिस्से की धूप तय है करता है गुलशन जो बेमानी पकड़ी जाती है नादानी जीवन की ये कैसी लय है छाया की प्यासी मय है अजीब हादसा है बेनामी मुँह छिपाए है गुमनामी सरक जाने का भय है धूप-छाया की कच्ची वय है
 
शारदा अरोरा
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पीड़ा कब पढ़ आई हिज्जे

अपनी पीड़ा को बाँधोगे ,सँगीत ,बहर और काफिये में सैलाब कहाँ बहता है , किनारे समेट के सिम्तों में बाँधो बाँधो टुकडों में , हवा और आँधियों को कर लो तुम क़ैद गुबार, धुँए और लपटों को सरहद बाँधे इन्सानों को , मजहब बाँधे भगवानों को इश्क की कोई जात नहीं होती
 
शारदा अरोरा
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जो लम्हात हमसे लिखवाते हैं

जज्बात हमसे लिखवाते हैं है कोई न कोई तो बात जो लम्हात हमसे लिखवाते हैं अपने हाथों में जिन्दगी जितनी बच जाये फिसले जाते हैं दिन रात जो लम्हात हमसे लिखवाते हैं अपना चेहरा ही नहीं जाता है पहचाना हुई ख़ुद से यूँ मुलाकात जो लम्हात हमसे लिखवाते हैं रोये गा
 
शारदा अरोरा
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तिनका है बना पतवार कहीं

ले चल मुझको तू पार जरा तिनका है बना पतवार कहीं चलना है धारा के सँग-सँग हूँ बीच नहीं मझधार कहीं डगमगाया है तूफाँ ने जितना उतना ही तू दमदार कहीं चाहत ले आती है रँग इतने इस रौनक का तू हक़दार कहीं चिड़ियाँ चहचहाती हैं तो जरुर सुबह किनारे की है तरफदार कहीं
 
शारदा अरोरा
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दिन है बड़ा मटमैला सा

अब न शाम-सहर दिन है बड़ा मटमैला सा उड़ गया चैन मेरे हाथों से नीँद की ही तरह अब न शाम- सहर रातें जो न हों तारों भरी हम जुगनू लेकर चल लेते छल करता है सूरज जब-जब छाया का टुकड़ा दे दे कर दिन का है कहो , ये कौन पहर अब न शाम- सहर दिन कब होते सब एक से हैं छाय
 
शारदा अरोरा
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सुरुरों ने आ लिखा है

मैंने लिखा नहीं हैसुरुरों ने आ लिखा हैये बात कह रही हैबरसों से दुनिया सारीजुनूनों ने आ लिखा हैधड़कन ये कह रही हैउसकी जुबाँ नहीं हैबेजुबानों ने आ लिखा हैजन्मों से चल रहा हैजिसे देख के हैं चलतेउन्हीं रँगों ने आ लिखा हैअपनी खता नहीं हैतुम्हें पा के हम जो
 
शारदा अरोरा
Aug 31 2009 11:14 AM
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ठण्डी हवा के झोंके

ठण्डी हवा के झोंके , छूकर हैं जब गुजरतेछूकर हैं उनको आये , वादों से जो मुकरतेखुशियों के ये इरादे , कैसे सनम पकड़तेबहती हवा के मानिंद , दामन में न ठहरतेसिर चढ़ के जो बोले , देखो सुरूर चढ़तेमीठी सी नीँद बन कर , दिल में हैं यूँ उतरतेठहरा है काफिला भी , देखो
 
शारदा अरोरा
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जिसकी जितनी झोली

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता और धज्जी-धज्जी रात मिलीजिसकी जितनी झोली थी उतनी ही सौगात मिलीलाख लगे हों दिल पर पहरे , अपनी ही औकात मिलीभर तो लेते दामन अपना , बात नहीं बेबात मिलीचाँद भी उतरा तारे भी उतरे , फ़िर भी न उजली रात मिलीजहन सजाये बैठे हैं हम , यादों की
 
शारदा अरोरा
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रँगीन रेशमी राखी

यूँ तो डोर है रेशम सीकच्ची नहीं , बन्धन सीमजबूती इतनी है दुलार कीभाई बहन के प्यार कीकुदरत का नूर बरसातीइस रास्ते भी , भाई का प्यार सीएक आँगन में पलेजोड़ती अनूठे सँसार सीरँगीन रेशमी डोरीदुआओं का बोलता भण्डार सीऔर कलाई पर सजीरक्षा का वचन उपहार सी
 
शारदा अरोरा
Aug 05 2009 09:09 PM
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हथेलियों की हिना में मेरा नाम

झाँक आती है लेखनीउसके दिल मेंजो मेरा लगता नहीं कुछफ़िर भी बड़ा करीब हैपढ़ आती है उसका दिलये उसी राह का मुसाफिरलगता रकीब हैतेरी हथेलियों की हिना में मेरा नाम है कि नहींतेरी सोचों में मेरी जगह है कि नहींहर दिन के साथ मद्धिम होता है रँगे-हिनामगर वो रूहे-हिना
 
शारदा अरोरा
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होता है आदमी भी खुदा

होता है आदमी भी खुदा कभी-कभी जब वो इंसाँ होता औरों के जख्म-छालों पर जब वो मरहम रखता होता दिखता नहीं है कभी खुदा बेशक उसका ही नजारा होता नजर नजर का फेर है जर्रे-जर्रे उसका ही पसारा होता बहुत दूर नहीं वो हमसे फैसले की घड़ी में इधर या उधर होता होता है आद
 
शारदा अरोरा
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तू वफ़ा कर ना कर

तू वफ़ा कर ना कर , मुझको तो वफ़ा की आदत है ये और बात है कि जफा , रास आती कब है कैसे चुन लूँ मैं काँटें, चमन की झोली से गुलाब रह-रह के जब लुभाते हैं घर से चलते हैं , साबुत आने की दुआ करते हैं कैसे न माँगें खैर उनकी , जो दुआओं से हमें मिलते हैं बिखरे -बि
 
शारदा अरोरा
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जो जी चाहे

जो जी चाहे वो घड़ियाँ याद कर लेना जो साथ गुजरीं थीं वो कड़ियाँ आबाद कर लेना १ नहीं मालूम हमको है , कहाँ जाती हैं ये राहें हमें मालूम इतना है , बड़ी प्यासी हैं ये रूहें बड़ी प्यासी हैं ये रूहें २ कहाँ मिट्टी के माधो तुम , कहाँ हूँ मैं भी ठहरी सी टकरा के
 
शारदा अरोरा
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दुनिया के मेले यूँ गए

दुनिया के मेले यूँ गए हमको तन्हाँ छोड़ कर भीड़ के इस रेले में , जैसे कोई अपना न था तन्हाई ले है आई ये हमें किस मोड़ पर खुली आँखों की इस नीँद में , अब कोई सपना न था चाँद माथे रख के टिकुली आ गया दहलीज पर उसके सिवा अब रात का , अपना कोई खुदा न था या खुदा
 
शारदा अरोरा
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निशानी तेरी मेरे पास

चेहरा चमकता है सिन्दूरी आभा से ये ही बेहतर निशानी तेरी मेरे पास दिलों के मिलने के सबब होते हैं थोड़े लम्बे रास्तों में जगमगाते हैं साथ-साथ दूरियाँ कितनी भी हों चाहे भले फासले दिलों के हों तो कर जाते हैं उदास जगते मद्धिम दीये हों जैसे तेरे ख्याल की रो
 
शारदा अरोरा
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इश्क वफ़ा की सीढियाँ चढ़ कर

इश्क वफ़ा की सीढियाँ चढ़ कर चुन लाये कुछ उजली किरणें हुस्न के माथे ताज सजे फ़िर जन्मों का सारा दुःख भूले रात की चाँदनी वफ़ा के दम पर दिन का सेहरा इश्क के सर पर इश्क जो चढ़ता सूरज सा ही कैसे अपने आप को भूले वफ़ा की चाहत है सबको ही चाहत है पर वफ़ा नहीं है स
 
शारदा अरोरा
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उम्र के हाथों छला गया है

आज का दिन भी नया नहीं है बचपन याद से गया नहीं है अल्हड़ है ये अब भी बेशक उम्र के हाथों छला गया है मैंने चाहा गीत मैं गा लूँ सूरज से इक किरण चुरा लूँ माथे में इक सोच बसा लूँ अंगने में सूरज जो खड़ा है प्यार का उबटन , वफ़ा की खुशबू क्यों न मैं मल-मल के न
 
शारदा अरोरा
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भरम न हो तो

वो साथ नहीं आयेगा , साथ चलने का भरम होता है भरम न हो तो ये दिल तन्हाँ होता है दिल टूटे या सलामत रहे , भरम को साबुत रख कर चलने की वजह बनता है चारों ओर जो ही तू है , मेरी हस्ती क्या है और बता कैसे गुमाँ बनता है सुबहों को शामों में ढलते देख रही हूँ , दि
 
शारदा अरोरा
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क़दमों में ख़म माँगा

तकता था , सिसकता था दुनिया ने कहाँ बाँधा ? जुबाँ को शब्द नहीं थे शब्दों ने है कुछ बाँचा अरमानों और हकीकत को कहाँ कहाँ जाँचा तेरी उँगली पकड़ने को तेरा ही साथ माँगा सर रख के जो ये रोता कब मिला कोई काँधा ऊँची- नीची डगर पर माली ने है कुछ राँधा सपनों में
 
शारदा अरोरा