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17 Jun 2010
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"मरा हुआ आदमी"

आदमी ;                  मरने के बाद ,कुछ नहीं सोचता |आदमी ;मरने के बाद ,कुछ नहीं बोलता |कुछ नहीं सोचनेऔर कुछ नहीं बोलने पर ;आदमीमर जाता है। उदय प्रकाश की लिखींये
 
शंकर फुलारा
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"क्योंकि मैं भारत हूँ"

मैं भारत हूँ,वर्तमान में बहुत शर्मिंदा हूँ । अपराध,भ्रष्टाचार,अनैतिकता से त्रस्त,अपने भ्रष्ट नेताओं के कारण । फिर भी ….“मैं” जिन्दा हूँ ,"क्योंकि; मैं भारत हूँ",      गिरता हूँ फिर उठता हूँ,हर बार संभालता हूँ,हर बार जलता हूँअपनों
 
शंकर फुलारा
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"छिनाल औरत"(आदमी भी)

ये पोस्ट चिपलूनकर जी को समर्पित है ।एक बहुत चालाक औरत थी। चरित्रहीन मां-बाप की संतान। इसलिए पैतृक गुण बचपन से ही उसमें विद्यमान थे । वह भी अपने मां-बाप से ज्यादा दुश्चरित्र हो गयी। साथ ही चालाक इतनी, कि; 'उसकी चरित्रहीनता को समझने - जानने के बाद भी उसके
 
शंकर फुलारा
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ये हमारे ही कर्म हैं, किस मामले में सजा समय पर, और पूरी मिल रही है ?

आज किसलिए रो रहे हैं हम ? "जब बोया पेड़ बबूल का हो आम कहाँ से होय"।ये न्याय व्यवस्था का वृक्ष तो अंग्रेजों ने अपने को छाया देने के लिए लगाया था। जब हम आजाद हुए थे तब ये वृक्ष हमारे नेताओं ने उखाड़ कर एक नया वृक्ष लगाना चाहिए था। जिसके नजदीक जाने पर
 
शंकर फुलारा
Jun 08 2010 06:12 PM
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गरीब का इंटरव्यू,भारत की सत्ता दाउद को सौंप दो, "नया मन्त्र",डाकू से वाल्मीकि

आज तक कई साक्षात्कार पढ़-देख चुका। बड़े से बड़े पत्रकार द्वारा; छोटे से छोटे पत्रकार द्वारा लिए गए। बड़े से बड़े व्यक्तित्व का इंटरव्यू। पर एक आदमी का इंटरव्यू मैंने आज तक नहीं देखा। और वो है “गरीब आदमी”। इसका कारण ? ‘हो सकता है “ये” (इंटरव्यू लेने वाले)
 
शंकर फुलारा
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अब आगे क्या होगा पता नहीं ?

एक बार मुझे अपने घर के रास्ते में एक कांटा चुभा । जूता छेद कर अन्दर तक चला गया । बहुत दर्द हुआ; बड़ा, लम्बा-मोटा था । मैंने निकाला और किनारे फैंक दिया फिर भूल गया । एक दो दिन तक हलकी पीड़ा रही; उसके बाद तो बिलकुल भी याद न रहा । कुछ दिन बाद मेरे बेटे ने
 
शंकर फुलारा
टैग: कांटे
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मैं और वो

सदियों से सोया ; “मैं” अन्धकार में। कोई आयेगा;मुझे जगायेगा,जैसे ;इसी इंतजार में। “वो” ,आया ;एक बार नहीं , बार-बार आया ;मुझे जगाया,झिंझोड़ा;और, "दिया",जलाया । पर, हाय रे ; “मेरा” "आलस्य","अवचेतना", और;उससे भी बढ़कर,"अहंकार" । “मैं”,“उसे”, नहीं जान पाया ।
 
शंकर फुलारा
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मेरे हाथों एक कबूतर कि जान बची , और "कविता सी" बन गयी

(खैर…! मैंने, कबूतर को उठाया; तो वह "थोड़ा फड़फड़ाया", उसके फड़फड़ाने से, “ये बच जायेगा” ; मैंने, "कुछ अंदाज" लगाया )। वैसे तो बचपन से घायल पक्षियों को बचाने के बहुत से अवसर मिले एक दो बार तो दिल्ली में लालकिले के सामनेजैनमंदिर (पक्षियों का अस्पताल) भी उन्हें
 
शंकर फुलारा
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नक्सल समस्या का समाधान

“नक्सल समस्या का समाधान” इस तरह नहीं होगा जैसे हमारे नेता या सरकार चाह रही हैहै है लिए हमारे राजनैतिक और सामाजिक नेताओं को आगे आना होगा। आगे आने का मतलब ! ‘ऐसे नहीं जैसे अभी तक आते रहे हैं’। ‘ टी.वी.स्टूडियो में बैठ कर, उनके समर्थक बनकर, या
 
शंकर फुलारा
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आखिर देशभक्त ब्लोगर इतने बड़े राष्ट्रीय स्वाभिमान के आन्दोलन को अनदेखा क्यों कर रहे हैं ?

मैं बहुत से ब्लॉग देखता हूँ जो देशभक्ति से परिपूर्ण होते हैं | और न केवल देश-समाज-संस्कृति-संस्कारों के उत्थान में लगे हुए हैं; अपितु सभी से इसमें सहयोग क़ी अपेक्षा करते हैं और आह्वान भी करते हैं | इन सबके लिए मैं एक बात कहना चाहूँगा कि; जिस कार्य को आप
 
शंकर फुलारा
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आखिर झगड़ा क्या है

मैं जब भूखा होता हूँ तो, खाना खा लेता हूँ । यह नहीं सोचता, कि उसे पैदा किया किसने ॥ मैं जब प्यासा होता हूँ तो, पेय पी लेता हूँ । यह नहीं सोचता, कि उसे पीने लायक बनाया किसने॥ मुझे जब नींद आती है तो, मैं सो जाता हूँ । रजाई-गद्दे में लिपट कर ,बिना जाने
 
शंकर फुलारा
टैग: झगडा
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शर्म

(तभी वह चाहता है कि सभी बेशर्म हो जाएँ तो उसे शर्म करने की आवश्यकता न हो । और यह खेल अनवरत रूप से चल रहा है । चाहे आज किसी भी क्षेत्र में देख लें )। भारतीय संस्कृति-सभ्यता-समाज और व्यक्तिगत आचरण में शर्म का बहुत ही महत्त्व है। अब तो यह कहना चाहिए कि ;
 
शंकर फुलारा
टैग: शर्म
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मेरा ब्लॉग बीमार था

मेरा ब्लॉग बीमार था , एक क्लिनिक का पता मुझे था पर कभी मौका नहीं लगा था या मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था क्या करूँ आज जब बहुत परेशान हो गया तो डॉक्टर साहब को नब्ज देखने को कह ही दिया | ऐसा विश्वास नहीं था कि इतने जल्दी मेरे ब्लॉग का बुखार उतर जायेगा
 
शंकर फुलारा
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एक सुचना

मेरा ब्लॉग ओपन होने में बहुत ज्यादा समय ले रहा है लगभग पांच से दस मिनट इस कारण से मैंने सोचा कि कहीं अत्यधिक विजेटों के कारण तो ऐसा नहीं हो रहा। और मैंने बहुत से विजेट कम कर दिए हैं कृपया इसे गलत न समझें । इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ ।और एक सुझाव भी अपनी
 
शंकर फुलारा
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मनुष्य एक ही बच्चे को जन्म क्यों देता है ?

मनुष्य एक ही बच्चे को जन्म क्यों देता है ? किसी अपवाद को छोड़ कर। श्रष्टि द्वारा निर्धारित है या कहना चाहिए, 'प्राक्रतिक तौर पर' कि मनुष्य एक ही बच्चे को जन्म देता है । और बहुत से प्राणी ऐसे हैं; जो दो-चार- दस से लेकर सौ या उससे भी ज्यादा बच्चों को जन्म
 
शंकर फुलारा
May 23 2010 09:59 AM
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जाति बदलने का सुनहरा अवसर

जिन लोगों को अपनी जाति से संतुष्टि नहीं है, 'क्योंकि जिन्हें छोटी जाति कहा जाता है वह बड़ी जाति में आना चाहते हैं; और जो बड़ी जाति के कहे जाते हैं वह आरक्षण के लाभ के लिए छोटी जाति की आकांक्षा रखते हैं' । तो ; ऐसे लोगों के लिए यह सुनहरा अवसर है। वह अपनी
 
शंकर फुलारा
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"विवाह से पूर्व प्रेम, केवल वासनात्मक ही होता है”

आज वैज्ञानिक जो भी शोध कर रहे हैं और उसके निष्कर्षों पर पहुँच रहे हैं, ‘वह सब हमारे पौराणिक शास्त्रों में पहले से ही वर्णित है’। पर;'क्योंकि आज आसुरी प्रव्रत्ति की प्रबलता के वशिभूत हुए'; ‘हम; या हमारे निति-नियंता और तथाकथित बुद्धिजीवी’, “उन विचारों को”,
 
शंकर फुलारा
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कहीं कुत्ते आन्दोलन न कर दें

अरे दुनिया वालो जरा धीरे बोलो ,अभी कुत्ते सोये हैं ,उनकी नींद न खोलो । क्योंकि;भारतीय नेताओं से अपनी तुलना का जब उन्हें पता लगेगा,यकीन मानो, बड़ा गरम खून है; खौलने लगेगा । आदमी तो केवल पुतले जलाएगा तोड़-फोड़ करेगा,पर ये न समझो कुत्ता केवल भौंकेगा या
 
शंकर फुलारा
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“एक विचारधारा” ‘जो देश और समाज के लिए खतरनाक है’

विश्व के कुछ स्थानों पर एक विचारधारा “कम्युनिज्म” देश काल परिस्थिति अनुसार मानी जाती है। जिसका जन्म नास्तिकवाद से हुआ है। जिन देशों का थोडा बहुत भी आध्यात्मिक इतिहास और परम्पराएँ हैं यह उन देशों में सफल नहीं हुआ और कहीं थोड़ा-बहुत सफल हुआ भी तो समय आने पर
 
शंकर फुलारा
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कसाब को फांसी पर, "इस तरह की ख़ुशी" क्यों ? जैसे .....

कसाब को फांसी पर इतनी ख़ुशी दिखाई जा रही है जैसे यह कोई अनहोनी हो रही हो; या जैसे देश को उसके द्वारा किये अपराध की सजा पर संदेह हो कि फांसी नहीं भी हो सकती, इसका (इस तरह की ख़ुशी का) क्या अर्थ है ?उसने जो किया उसकी सजा तो यही है, इस पर इतनी ख़ुशी और
 
शंकर फुलारा
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ब्लोगिंग करना कितना कठिन है ! ‘कोई हमसे पूछे’

ब्लॉग पोस्ट करने के लिए एक लेख की आवश्यकता होती है; और लेख के लिए मस्तिष्क में एक रूप रेखा बनती है, तब कहीं एक अच्छा लेख बन पाता है; जो विचारणीय हो । एक अच्छा लेख लिखने के लिए कोई एक विचार या “मुद्दा” होना जरुरी है, और कठिनाई यहीं से आरम्भ होती है। आज के
 
शंकर फुलारा
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और भी भूलें हैं, जिनको मान कर सुधारना चाहिए

“विदेशों में भारतीय करेंसी नोट छपवाना सरकार की भूल”ये एक समाचार पढ़ा और देखा। अपनी भूल मानना एक सकारात्मक पहल है। ये भूल तो ऐसी है जिसको दोबारा न करने पर उसके द्वारा होने वाली हानि से बचा जा सकता है । बहुत सी भूलें “जो सरकार द्वारा आज भी निरंतर की जा रही
 
शंकर फुलारा
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लालू बोले वेतन बढाओ (सांसदों का)

एक खबर पढ़ी, ‘सांसदों का वेतन अस्सी हजार व पेंशन एक लाख हो । ये मांग करने वाले सांसद हैं; अपने मसखरेपन के लिए पहचाने जाने वाले “लालू प्रसाद यादव”। वास्तव में इनका खर्चा पूरा नहीं पड़ता होगा; क्योंकि एक क्रिकेट टीम तो इनकी अपने बच्चों की है। और आज के ज़माने
 
शंकर फुलारा
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नेताओं की तरह ही कुछ ब्लौगर भी हो गये हैं

जैसे राजनीतिक नेता अपने प्रति लोगों को आकर्षित करने के लिए कोई विवादित और संवेदनशील विषय को बिना गंभीरता के; केवल वोट लेने के लिए अपना मुद्दा बनाते हैं और अपने समर्थक और अपनी सभाओं में भीड़ जुटाते हैं, वैसे ही ये सब हथकंडे हिंदी के ब्लौगर भी अपनाते हैं।
 
शंकर फुलारा
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"सरकारी गोला बारूद-सरकारी सीनों पर"

वाह रे ! हमारे सुरक्षा बलों के देशभक्त जवानो; देश को और तुम्हारे बच्चों को तुम पर कैसे गर्व होगा ? क्या कह कर वो परिचय देंगे कि हमारा सिपाही/ बाप वो गद्दार है जिसने अपने ही भाईयों का खून बहाने के लिए,अपने ही देश के दुश्मन; नक्सलवादियों को सरकारी गोला
 
शंकर फुलारा
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एक बच्चे के मासूम सवाल

“ये रिशवत खाने वाले”क्या रोटी नहीं खाते ? (क्योंकि वह रिशवत समेत सभी आर्थिक भ्रष्टाचार को पेट भरने की चीज समझता है) । अगला सवाल.........? जब इन्हें पता है कि रिशवत खाकर जेल होनी है; तो इन्हें डर क्यों नहीं लगता ?(वह समझता है कि पकड़े तो सभी ने जाना हैं,
 
शंकर फुलारा
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एक बच्चे के मासूम सवाल

“ये रिशवत खाने वाले”क्या रोटी नहीं खाते ? (क्योंकि वह रिशवत समेत सभी आर्थिक भ्रष्टाचार को पेट भरने की चीज समझता है) । अगला सवाल.........? जब इन्हें पता है कि रिशवत खाकर जेल होनी है; तो इन्हें डर क्यों नहीं लगता ?(वह समझता है कि पकड़े तो सभी ने जाना हैं,
 
शंकर फुलारा
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“जुआ” किसी का नहीं हुआ

(अगर हमारे क्रिकेट खिलाडियों में वास्तव में नैतिकता है और उन्हें देश-धर्म-समाज से कुछ भी सहानुभूति है तो उन्हें इन लोगों के आपसी दांव-पेचों में "मोहरा" नहीं बनना चाहिए)। वैसे तो सभी खेलों में प्रतिस्पर्धात्मक भाव व हार जीत का निर्णय होता है। एक दूसरे को
 
शंकर फुलारा
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क्या होगा भारत का अगर ये नियम बन जाएँ ?

कि ; पति-पत्नी में से एक ही व्यक्ति को नौकरी का अधिकार दिया जाये । कि ; पति-पत्नी या मां-बेटे में से केवल एक को ही नेतागिरी मिलेगी । कि ; सरकारी कर्मचारियों से नियुक्ति के समय ही एक करार पर सहमती लेकर ;कि हड़ताल नहीं करेंगे नौकरी दी जाये। कि ; देश में
 
शंकर फुलारा
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बेचारा थरूर ! कांग्रेस का असली चेहरा छुपा नहीं पाया ; या....

एक बार फिर कांग्रेस अपना वास्तविक चेहरा दिखने से नहीं रोक पाई । ऐसा सैकड़ों बार हो चुका है; पर क्योंकि वह (कु)संस्कार बन चुका है और देश की अधिकतर आबादी इस “कांग्रेस-कल्चर” में ढल चुकी है इसलिए किसी को भी सही-गलत का भान नहीं होता । वरना ; कांग्रेस तो अपने
 
शंकर फुलारा
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सबसे बड़ा धोखा

संसार का सबसे बड़ा धोखा… ! एक ऐसा धोखा जिसने तब के लगभग पचास करोड़ लोगों की आँखों में धूल झोंक दी…..!, एक ऐसा “फ्रौड”जिसमें हमारे देश के महान नेताओं की मिलीभगत रही…..! , और आज तक आप इससे अनजान रहे….!, लेकिन अब आप अनजान नहीं रहेंगे….., अब हम आपको बताएँगे
 
शंकर फुलारा
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ये मैच फिक्स है, खुदा को मंजूर है

थरूर ( जो अपनी शादियों से प्रभावित कर सकें) व अन्य वर्तमान नेताओं जैसे , विचारधारा हो कांग्रेस और वामपंथियों जैसी, चाल-चलन हो माया,मुलायम और लालू जैसा, और इन सबकी गलत नीतियों से “केवल राजनितिक लाभ” लेने की ललक या प्रवृति हो भाजपा जैसी; “तो हमारा देश भारत
 
शंकर फुलारा
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उत्तराखंड में मेले की फोटो

आज हमारे यहाँ उत्तराखंड में जगह-जगह मेले होते हैं जो बैसाखी से पहले शुरू होकर एक दो दिन बाद तक चलते हैं, ऐसा ही एक मेला "द्वाराहाट" (जिला अल्मोड़ा) में होता है जो कुछेक सदी से है; पारंपरिक है, और जैसा कि होता है किसी राजा ने अपने दुश्मन राजा को हराया तो
 
शंकर फुलारा
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"मिया-बीबी राजी , तो ! "

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शंकर फुलारा
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अब समय आ गया, कि एक सूचि बनाई जाये ...या ब्लॉग बनाया जाये नाम रखा जाये "भारत के कलंक" ताकि सनद रहे | ब्लोगर के लिए विचारणीय

कई दिन से मेरे मन में ये बात चल रही थी हमारे बहुत से ब्लोगर मित्र बहुत प्रवीण हैं कंप्यूटर विज्ञान में और ब्लोगिंग में, जैसे- अपने सुरेश चिपलूनकर जी हैं, विकास मेहता जी हैं, फिरदौस जी हैं ,एम वर्मा जी हैं, अलबेला जी हैं, महेंद्र मिश्र जी हैं, पी.
 
शंकर फुलारा
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हाय रे उत्तराखंड

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शंकर फुलारा
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हमारे आदर्श (आईकोन)कितने "आदर्श" हैं

‘हमारे भारत के कुछ “अति साधारण बुद्धि” लोगों के “आदर्श” (आईकोन) कुछ कलाकार (फ़िल्मी अभिनेता), कुछ खिलाड़ी और अन्य क्षेत्रों के व्यक्तित्व होते हैं । जो अपनी विशिष्ट प्रतिभा के कारण प्रसिद्धि पाते हैं और अपने प्रशंसकों (फैन्स) की संख्या बढ़ाते हैं और
 
शंकर फुलारा
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"लिंक"

मेरी पिछली पोस्ट के लिए लिंक की सुविधा मांगी है; जो इस प्रकार है ; भारत स्वाभिमान ट्रस्ट. ओर्ग  यहाँ पर स्वामी जी का मेरा आज का विचार (ब्लॉग) देखें |
 
शंकर फुलारा
Apr 06 2010 05:50 PM
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इतनी टिप्पणियां ! सोच भी नहीं सकते

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शंकर फुलारा
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एक कविता "मेरी पहचान"

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शंकर फुलारा