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चीरफाड़

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16 Jun 2010
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गोरी चमड़ी के समक्ष घुटने टेकते नेता!

पत्रकार, लेखक, चिंतक डॉ. वेदप्रकाश वैदिक देश की वर्तमान दुरावस्था पर दुखी हैं। उनका हृदय रो रहा है। मेरे मित्र हैं, दुखी मैं भी हूं। वे जानना चाहते हैं कि हर मौके पर, चाहे अवसर यूनियन कार्बाइड द्वारा दी गई त्रासदी का हो, डाऊ केमिकल्स का हो या परमाणु
 
एस.एन. विनोद !
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'पेड न्यूज' से आगे 'सोल्ड वोट'!

वाकया दिलचस्प भी है और पीड़ादायक भी। लोकतंत्र के लिए शर्मनाक और निर्वाचित लोकप्रतिनिधियों को बाजारू-बिकाऊ निरूपित करनेवाला तो है ही। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विधायकों ने विधानपरिषद चुनाव में कांग्रेस-राकांपा उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान
 
एस.एन. विनोद !
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सत्ता की साजिश है अर्जुन का बचाव!

मजबूर हूं इस टिप्पणी के लिए कि हमारे देश के वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी या तो स्वयं मूर्ख हैं या इतने शातिर कि उन्होंने पूरे देश को मूर्ख समझ रखा है। यूनियन कार्बाइड के भगौड़े चेअरमैन वारेन एंडरसन की 1984 में अमेरिका रवानगी पर प्रणब की सफाई को देश स्वीकार
 
एस.एन. विनोद !
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अति आत्मविश्वास, अति महत्वाकांक्षा, अति अहंकार!

कुछ मामलों में अति आत्मविश्वास को भी स्वीकार किया जा सकता है। सहन किया जा सकता है। किन्तु अति महत्वाकांक्षा की उपज अति अहंकार को कदापि नहीं। महाज्ञानी, महाशक्तिशाली, अति संपन्न रावण के अंत का कारण यही अति अहंकार बना था। उनके सोने की लंका ध्वस्त हो गई थी
 
एस.एन. विनोद !
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राजीव का 'मेरा भारत महान'!

राजीव गांधी प्रतिपादित 'मेरा भारत महान' की आज बरबस याद आ रही है। सचमुच महान ही तो है यह लोकतांत्रिक भारत देश जहां का कानून मंत्री घोषणा करता है कि हजारों लोगों की मौत और लाखों लोगों के विकलांग हो जाने की त्रासदी के मामले को भारत की सर्वोच्च अदालत 'ट्रक
 
एस.एन. विनोद !
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... तो जनता सिखा देगी सबक!

चाटुकार नेता अब और 'कोरस' न गाएं। दिग्विजय सिंह, वसंत साठे के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के विशेष सचिव रह चुके पी.सी. अलेक्जांडर ने, संकेत में ही सही, यह स्पष्ट कर दिया कि राजीव गांधी के कहने पर ही मध्यप्रदेश के तब के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह
 
एस.एन. विनोद !
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अब फैसला जनता करे!

क्या अब भी यह बताने की जरूरत है कि भोपाल के भक्षक के रक्षक कौन बने थे? दीवारों पर साफ-साफ लिख दिया गया है। पढ़ लें। सब कुछ आईने की तरह साफ है। हजारों निर्दोषों को मौत की नींद सुला देने वाले यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वारेन एंडरसन को केंद्र व मध्यप्रदेश
 
एस.एन. विनोद !
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अब फैसला जनता करे!

क्या अब भी यह बताने की जरूरत है कि भोपाल के भक्षक के रक्षक कौन बने थे? दीवारों पर साफ-साफ लिख दिया गया है। पढ़ लें। सब कुछ आईने की तरह साफ है। हजारों निर्दोषों को मौत की नींद सुला देने वाले यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वारेन एंडरसन को केंद्र व मध्यप्रदेश
 
एस.एन. विनोद !
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देशद्रोही हैं एंडरसन को बचाने वाले!

एक सीधा सवाल सरकार से और आम जनता से भी। 15 हजार से अधिक लोगों को मच्छरों की तरह मार डालने के अपराधी को बचाने वाले को सत्ता में बने रहने का अधिकार है? सत्ता पक्ष के ऐसे आपराधिक कृत्य पर क्या देश तटस्थ बना रहेगा? भोपाल गैस त्रासदी पर आए फैसले के बाद
 
एस.एन. विनोद !
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अब एक त्रासदी न्याय व्यवस्था की!

15,274 लोगों की मौत के जिम्मेदारों को 2 साल की कैद! वह भी लगभग 25 साल के बाद! भोपाल गैस कांड को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में से एक बताया गया है। अब अदालत के इस फैसले को एक त्रासदी निरूपित करने को हम मजबूर हैं। सचमुच यह न्याय का एक मजाक है।
 
एस.एन. विनोद !
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एक कुंठा है मोदी का बाल दिवस विरोध!

नहीं, मोदी की यह कोई जिज्ञासा नहीं, राजनीतिक या फिर व्यक्तिगत कुंठा है। विरोध के लिए विरोध है।गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी में तेज है, जुझारुपन है, सुशासन के पक्ष में समर्पण है, और है संघर्ष का माद्दा। किन्तु जब शब्द व्यक्तिगत कुंठा या सिर्फ
 
एस.एन. विनोद !
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...फिर भी लोकतंत्र जीवित रहेगा!

चाहें तो आप इनकार कर दें, विरोध दर्ज कर दें! देश की वर्तमान राजनीति को बहुत नजदीक से नंगा देखने के बाद मैं मजबूर हूं इस टिप्पणी के लिए कि भारत का लोकतंत्र आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। मैं चर्चा उस लोकतंत्र की कर रहा हूं जिसकी कल्पना देश के
 
एस.एन. विनोद !
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झूठ बोला था, झूठ बोल रहे हैं

आईपीएल नीलामी और शरद पवार से जुड़े सनसनीखेज नए खुलासे के बाद भी पवार का अपने पुराने कथन पर अडिग रहना चोरी और सीनाजोरी का शर्मनाक मंचन ही तो है! वैसे अब कोई किसी राजनीतिक (पालिटिशियन) से सचाई, ईमानदारी, नैतिकता की अपेक्षा भी नहीं करता। लेकिन जब देश के
 
एस.एन. विनोद !
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धनबल-बाहुबल के मुकाबले जनबल!

स्वस्थ लोकतंत्र के एक अत्यंत ही सुखद घटनाक्रम पर ध्यान दिया आपने? जी हाँ, मैं चर्चा कर रहा हूं पश्चिम बंगाल के स्थानीय निकाय के चुनाव परिणाम की। वहां सिर्फ चुनाव में हार-जीत की स्थापित परंपरा आगे नहीं बढ़ी है। लोकतंत्र का एक मजबूत पक्ष उभरकर सामने आया
 
एस.एन. विनोद !
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'राजनीति' के लिए निर्दोषों की बलि!

अगर ममता बनर्जी के आरोप में दम है तब राजनीति के इस घिनौने पक्ष को तत्काल मौत दे दी जाए। विलंब की स्थिति में निर्दोष और आम लोगों के खून से हमारी धरती लाल होती रहेगी, इतिहास बदरंग हो जाएगा। सत्ता की राजनीति करने वाले छल-कपट, जातीयता, साम्प्रदायिकता,
 
एस.एन. विनोद !
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नीतीश और बिहार पर सार्थक बहस

'नीतीश का बिहार , नीतीश के पत्रकार' में बिहार की वर्तमान पत्रकारिता पर की गई मेरी टिप्पणी पर अनेक प्रतिक्रियाएं मिली हैं। विभिन्न ब्लॉग्स पर भी टिप्पणियां की जा रहीं हैं। कुछ सहमत हैं, कुछ असहमत हैं। एक स्वस्थ- जागरूक समाज में ऐसी बहस सुखद है। लेकिन मेरी
 
एस.एन. विनोद !
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भाजपा नेताओं का यह कैसा दीवानापन!

''तेरे दीवानों का कम होगाअब ना दीवानापनऐ वतन, मेरे वतन,अच्छे वतन, प्यारे वतन।''कभी एजाज सिद्दीकी के इन शब्दों को अपने होंठों पर निरंतर सम्मान देने वाले भाजपा के कतिपय नेताओं को अब हो क्या गया है?अनुशासन के नाम पर या फिर तथाकथित छवि के नाम पर स्वनामधन्य
 
एस.एन. विनोद !
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क्या कांग्रेस मृत हो चुकी है!

सवाल और जवाब दोनों लोकतंत्र की मूल भावना को चुनौती दे रहे हैं। इनमें राजतंत्रीय प्रणाली की बू मौजूद है। अनायास एक सवाल भी उत्पन्न हो गया कि क्या कांग्रेस पार्टी मृत हो चुकी है?कुछ मित्र कभी-कभी मुझ पर आरोप लगा देते हैं कि मैं कांग्रेस और गांधी-नेहरू
 
एस.एन. विनोद !
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कुलदीप नैयर से इस्तीफा लिया था गोयनका ने!

क्या जेपी की संपूर्ण क्रांति बेमानी थी! - 3 (अंतिम)हां ! जेपी ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। अपनों द्वारा किए गए विश्वासघात को वे झेल नहीं पाए। गांधी और जेपी की मौत में सिर्फ एक फर्क था। गांधी के सीने मेें गोली मारी गई जबकि जेपी के सीने के अंदर दिल ने
 
एस.एन. विनोद !
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क्या जेपी की संपूर्ण क्रांति बेमानी थी? - 2

संपूर्ण क्रांति तो समाज में आमूलचूल परिवर्तन का एक सर्वमान्य आंदोलन था। जी हां, सर्वमान्य। अंग्रेजी साप्ताहिक 'ब्लिट्जÓ के संपादक आर.के. करंजिया हमेशा से जयप्रकाश और उनके दर्शन के आलोचक रहे थे। लेकिन जब जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा बुलंद किया तब अपनी
 
एस.एन. विनोद !
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क्या जेपी की संपूर्ण क्रांति बेमानी थी?

आज राजीव गांधी की याद आ रही है। उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम व विज्ञापन उनका स्मरण दिला रहे हैं। स्वाभाविक रूप से उनकी याद आई तब इंदिरा गांधी की भी याद आई। और तब याद आए जयप्रकाश नारायण और याद आया आपातकाल अर्थात्ï इमरजन्सी। इन यादों के बीच मुखर हुई
 
एस.एन. विनोद !
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नीतीश का बिहार, नीतीश के पत्रकार!

अब इस विडंबना पर हंसूं या रोऊं? एक समय था जब पत्रकार राजनेताओं अर्थात्ï पॉलिटिशियन्स को भ्रष्ट, चोर, दलाल निरूपित किया करते थे। वैसे करते तो आज भी हैं, किंतु अब राजनेता पत्रकारों को भ्रष्ट, चोर, दलाल, निरूपित करने लगे हैं। क्यों और कैसे पैदा हुई ऐसी
 
एस.एन. विनोद !
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बिकाऊ पत्र, बिकाऊ पत्रकार, बिकाऊ पत्रकारिता!!!

एक बड़े समाचारपत्र समूह के संपादक पिछले दिनों दिल्ली में युवा पत्रकारों से मुखातिब थे। बड़ा समूह... बड़ा संपादक! उत्साहित युवा पत्रकारों की अपेक्षाएं हिलोरें मार रही थीं, पत्रकारिता में कुछ अनुकरणीय ग्रहण करने की लालसा और पत्रकारीय मूल्यों के विस्तार के
 
एस.एन. विनोद !
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झारखंड पर कोई दया करेगा?

क्या अब भी झारखंड पर कोई दया करेगा? झारखंड, राजनीतिक-रोगग्रस्त है। पीडि़त है। कठोर शब्द और आशंका के लिए मैं मजबूर हंू। झारखंड प्रदेश गठन के पूर्व पृथक झारखंड आंदोलन के दौरान अन्य लोगों के साथ-साथ मैं भी पृथक राज्य के पक्ष में तर्क दिया करता था कि अलग
 
एस.एन. विनोद !
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ बलात्कार!

जवाब चाहिए इन सवालों के। क्या धनबल और बाहुबल सच को कैद कर सकता है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ बलात्कार कर सकता है? बौद्धिक आजादी के आंदोलन को कुचल सकता है?पिछले दिनों इस स्तंभ की अनुपस्थिति के दौरान कुछ नकली गांधीवादियों और नकली कांग्रेसियों ने इस
 
एस.एन. विनोद !
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अपना 'मुहावरा' भूल गए लालू!

अगर यह विडंबना है तो इसे संपूर्णता में स्वीकार करें। संशय तब पैदा होता है जब भावना और नीयत को समझने में भूल हो जाए। तब विस्फोट होता है। पिछले दिनों राजनीति और मीडिया में कुछ ऐसा ही हुआ। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी अपने कुछ शब्दों
 
एस.एन. विनोद !
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गडकरी के लिए निर्णय की घड़ी

क्या सचमुच नैतिकता, ईमानदारी, मूल्य, सरोकार, रिश्ते, धर्म, सचाई, संवेदना, विश्वास, समर्पण, प्रतिबद्धता, त्याग, मित्रता, सौहाद्र्र जैसे शब्द और इनके निहितार्थ बेमानी हो गए हैं? पूरे समाज-देश पर इनके विपरीतार्थ शब्दों के कब्जे को देखते हुए मस्तिष्क में यह
 
एस.एन. विनोद !
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लोकतंत्र के दुश्मन, विश्वासघाती ये जनप्रतिनिधि!

'चोर-चोर मौसेरे भाई' की कहावत को सार्थक करते हुए हमारे कथित निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने एक बार फिर 'नापाक राजनीतिक सौदेबाजी' का घृणित, बेशर्म मंचन किया है। कठोर शब्दों के इस्तेमाल के लिए क्षमा करेंगे। मैं मजबूर हंू अपने राष्ट्रीय दायित्व को लेकर,
 
एस.एन. विनोद !
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एक अकेले ललित मोदी 'विलेन' कैसे

बीसीसीआई अध्यक्ष शशांक मनोहर एक भले मानुस हैं। नामी वकील हैं। परिवार का सांस्कृतिक पाश्र्व सुखद एवं अनुकरणीय है। स्वभाव से शांत, शालीन और सभी के लिए स्वीकार्य हैं। सार-संक्षेप यह कि शशांक मनोहर किसी को नुकसान नहीं पहुंचाने वाले एक सज्जन व्यक्ति हैं। यही
 
एस.एन. विनोद !
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अवसरवाद, समझौता, समर्पण के ये 'पापी'!

क्या सत्ता में बने रहने का एकमात्र मार्ग अवसरवादी अनैतिक समझौता है? यह सवाल आज हृदय को वेध रहा है। देश के एक सामान्य नागरिक के रूप में मेरे सरीखे अनेक लोग इस सवाल का ईमानदार जवाब चाहेंगे। हां, ईमानदार जवाब चाहिए। क्या कोई जवाब के लिए आगे आएगा? 'हमाम में
 
एस.एन. विनोद !
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संस्कृति के साथ ये कैसा बलात्कार!

माफी चाहता हूं। आईपीएल के गंदले पानी को आज फिर खंगालना पड़ रहा है। यह जरूरी है। इसलिए कि हम जिस महान संस्कृति की धरोहर की गाथा गाकर विश्व समुदाय में भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं उस संस्कृति की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यह भारत की प्राचीन महान सभ्यता
 
एस.एन. विनोद !
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क्रिकेट हमाम के ये नंगे!

क्रिकेट की इस कालिमा ने सच पूछिए तो पूरी की पूरी केंद्र्र सरकार को नंगा कर डाला है । अब इसे कोई कथित गठबंधन युग का दुष्परिणाम कह ले या वर्तमान राजनीति में प्रविष्ट भ्रष्टाचार की अति। यह सच चिन्हित हुआ कि चरित्र, नैतिकता, मूल्य, सिद्धान्त, आदर्श, ईमानदारी
 
एस.एन. विनोद !
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बड़ी मछलियों को बचाने छोटी मछलियों की बलि

जी हां, क्रिकेट की आड़ में ग्लैमर और काले धन की चाशनी का स्वाद लेने वाली बड़ी मछलियों को बेनकाब होने से बचाने का खेल शुरू हो गया है। छोटी मछलियां जिबह होने के लिये तैयार रहें। उनकी बलि निश्चित है। तुलसीदास यूं ही नहीं कह गये थे कि, ''समरथ को दोष नहीं
 
एस.एन. विनोद !
Apr 22 2010 01:07 AM
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गैरखिलाडिय़ों से मुक्त हो क्रिकेट!

यह भी खूब रही! केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला की दार्शनिक सोच को समझें। आईपीएल विवाद पर केंद्रीय मंत्रिपरिषद के अपने सहयोगी शशि थरूर का उन्होंने विरोध किया था, उनसे इस्तीफा मांगा था। आलोचना और दबाव के बीच प्रधानमंत्री ने थरूर से इस्तीफा ले लिया। अब डॉ.
 
एस.एन. विनोद !
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'धंधा' बन गया 'जेंटलमेन्स गेम' क्रिकेट !

अगर यही 'जेन्टलमेन्स गेम' अर्थात्ï भद्र लोगों का खेल है, तब शब्दकोश में मौजूद 'जेन्टलमैन' के अर्थ बदल दिए जाएं। या फिर क्रिकेट खेल के साथ जुड़े इस विशेषण को रद्द कर दिया जाए। चाहे कोई कितना भी बचाव कर ले, सफाई दे दे, यह प्रमाणित हो चुका है कि क्रिकेट अब
 
एस.एन. विनोद !
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शीतयुद्ध के साये में कांग्रेस

कहीं कोई बड़ी गड़बड़ी है अवश्य! पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, अतुल्य घोष और एस. के. पाटिल के कुख्यात 'सिंडीकेट' के बाद यह पहला अवसर है जब कांग्रेस संस्कृति के प्रतिकूल पार्टी के कुछ नेता सत्ता और संगठन को कटघरे में
 
एस.एन. विनोद !
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गडकरी की हैसियत को टुटपूंजिया चुनौती!

क्षमा करेंगे, भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के समक्ष कांग्रेस ने स्वयं को हल्का साबित कर लिया, बौना साबित कर लिया। गडकरी को उनकी हैसियत बताने की कोशिश करने वाले कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का यह कथन कि गडकरी का राजनीतिक वजन अभी इतना नहीं हुआ है कि कांग्रेस
 
एस.एन. विनोद !
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सदैव आरक्षित कांग्रेस अध्यक्ष पद!

यह फर्क तो है! गली-कूचों की दीवारों पर पोस्टर चिपकाने वाला कांग्रेस पार्टी में कभी राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बन सकता। कांग्रेस में यह पद आरक्षित है। आरक्षित है गांधी-नेहरू परिवार के लिए। सुविधानुसार, बल्कि मजबूरी है। यदा-कदा किसी 'यस मैन' को इस कुर्सी पर
 
एस.एन. विनोद !
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76 जवान की जगह, 76 राजनेता होते तो.......?

एक असहज, ह्रदय को वेध देने वाला सवाल। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवान की जगह अगर देश के 76 राजनेताओं को नक्सली मौत की घाट उतार देते, तब क्या होता? जाहिर है तब पूरे देश में राष्ट्र ध्वज झुका दिए जाते, राष्ट्रीय शोक घोषित कर दिया जाता और
 
एस.एन. विनोद !
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शर्मसार वर्धा, अपमानित वर्धावासी

कलम और वाणी की आजादी के सबसे बड़े पैरोकार महात्मा गांधी की कर्मभूमि वर्धा में गुरुओं के गुरु ने यह क्या कह डाला! 'वर्धा के स्थानीय लोग चोर हैं!' '..... पत्रकार चोर हैं!' सत्य अहिंसा और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में एकल विश्व स्वीकृति प्राप्त करने वाले
 
एस.एन. विनोद !