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मैनें आहुति बनकर देखा..

http://kartikeya-mishra.blogspot.com/
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08 Jun 2010
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नींद क्यों रात भर नहीं आती... कैम्पस में आखिरी रात, आखिरी पोस्ट

रात बीत रही है। ज़िन्दगी में पहली बार ऐसा हो रहा है कि बीतती हुई रात अच्छी नहीं लग रही। रात के ढाई बजे बालकनी में खड़े हुए जी में बस ये आ रहा है कि सॉफ्टपीडिया सर्च करूँ, शायद कोई ऐसा सॉफ्टवेयर मिल जाये जो इस बेरहम रात को बीतने से रोक ले, या कम से कम धीमा
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
टैग: बी.टेक.
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संस्कार, सभ्यता, बाजारीकरण, नैतिकता की ठेकेदारी, और वैलेंटाइन डे के बहाने एक सच

अपने गिरिजेश जी तो फगुनाहट में सराबोर हैं, उन्हें बखूबी साथ मिल रहा है अमरेन्द्र भाई का, तथा हिमांशु भाई का। कौन आचारज है, कौन चेला, कुछ भी क्लियराय नहीं रहा। जो भी हो, यह मंडली लगभग हर दूसरे ब्लॉग पर जोगीरा सरररर करते दिख जा रही है। ब्लॉग जगत का आपसी
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Feb 14 2010 09:15 PM
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चेतावनी- यह पोस्ट पढ़कर वक्त बर्बाद न करें..!

हुर्रे……….याहू…. ढेन….टे….नान…हुर्र…ल्क..ल्क..ल्क..किड़्बिक..किड़्बिक…..किड़्बिक……हुर्रे……….याहू…. ढेन….टे….नान…हुर्र…ल्क..ल्क..ल्क..किड़्बिक..किड़्बिक…..किड़्बिक……हुर्रे……….याहू….
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Feb 14 2010 01:27 AM
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सिद्धार्थ का दूसरा महाभिनिष्क्रमण..

गत 20 जनवरी को मेरे बड़े भाई डॉ० सिद्धार्थ Ischemic Heart and Brain Disorders पर शोध करने के लिये 3 साल के लिये दक्षिण कोरिया के लिये रवाना हुए.. परिवार में किसी की पहली विदेश यात्रा है यह.. सबका विचलित होना स्वाभाविक है.. मेरे विचलन का परिणाम है ये कुछ
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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ऐवेटॉर(अवतार)...भव्य तकनीक के नीचे सांस लेता हुआ सा कुछ बचा रह गया है..

कुछ दिन पहले एक फिल्म देखी.. ऐवेटॉर/या अवतार कह लीजिए शुद्ध हिंदी में। आज मन में आया तो कुछ ठेले देते हैं इसी फिल्म पर। फिल्म समीक्षा मेरे प्याले की चाय नहीं(Not My Cup Of Tea), न ही मेरा ऐसा कोई उद्देश्य है। लेकिन उस फिल्म के भव्य एनिमेशन और भारी-भरकम
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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अब बुझा दो ये सिसकती हुई यादों के चिराग, इनसे कब हिज्र की रातों में उजाला होगा??

भारतीय लोकतंत्र का एक पर्व और बीत गया। अब तो रोजमर्रा की बात हो गई है। बल्कि अब अगर सुबह का अखबार खून के छींटों से तर न आए, तो लगता है अभी रात ही चल रही है, अभी ख्वाब टूटा नही है, अभी सुबह ठीक से हुई नही है। सही ही है। आम आदमी की जेब में पैसे न हों त
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Dec 29 2009 11:53 AM
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क्रोध भारतीय जनमानस का स्थाई भाव है, नपुंसकता राजनेताओं का

वक्त रहते शोक जता लिया जाय तो अच्छा है। क्या पता नई घटना कब हो जाए! मैं इसे एडिट कर क्रोध करना चाहता था, लेकिन सोचा कि फायदा कुछ नहीं। क्रोध जनता की मानसिकता का स्थाई भाव हो चुका है, और नपुंसकता राजनेताओं का। मुझे याद है, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला ह
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Dec 29 2009 11:53 AM
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बी.टेकीय दुरवस्था

सबसे पहले आप सबसे क्षमा चाहूँगा अपनी अनियमितता के लिए। वस्तुतः जब ब्लोगिंग शुरू की थी तो पता नहीं था की यह शगल इतना समय लेने वाला हो सकता है। मैं अन्य वरिष्ठ विचारकों की पोस्ट पढने में इतना मशगूल हो जाया करता हूँ, कि अपनी किताबें भी गालियाँ देती होंग
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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तनहाई के राजदार...3

मैं आज एक मुक्त - कविता सूत्र प्रारम्भ कर रहा हूँ । यह सात - आठ बेतरतीब अ तुकबंदियों - गद्य काव्यों की एक श्रृंखला है ... जिसकी एक - एक लड़ी मैं वक़्त - बेवक्त पोस्ट करता रहूँगा । और हाँ जाहिर है , ये भी मेरी डायरी के पन्ने हुआ करते थे । इसलिए इसे डायर
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Dec 29 2009 11:53 AM
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अरे बाप रे बाप एतना मनई

अरे बाप रे बाप एतना मन ई .... देहात में कभी 'नाच' ( रामसंवारे की नौटंकी, रामगोपाल वर्मा की नहीं ) शुरू होता है, तो भांड ( जोकर ) का मंच पर आने के बाद पहला डायलाग यही होता है..... अरे बाप रे बाप एतना मनई.... वैसी ही कुछ मनःस्थिति मेरी भी हो रही है। इक
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Dec 29 2009 11:53 AM
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फिर वही कुंज-ओ-कफस,फिर वही सय्याद का घर !

तन्हाई के राजदार... 2 8 दिन , गाँव का पुरसुकून माहौल , माँ - बाप - भाई - बहन सहित संयुक्त परिवार के रिश्तों की गर्माहट और ... फिर वही कुंज - ओ - कफस , फिर वही सय्याद का घर ! दीपावली का उल्लास छू हो चुका है। घर से लौटने के बाद हॉस्टल के कमरे का ताला ख
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Dec 29 2009 11:53 AM
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तन्हाई के राजदार.....1

मैनें एक साल लखनऊ में गुजारा है। ये नही कहूँगा कि आईआईटी की तैयारी की है , अन्यथा कई लोगों की ओर से कई सवाल उठ खड़े होंगे। उसी एक साल में मुझे एक बड़ी बुरी लत लगी - डायरी लिखने की। आदत लखनऊ छोड़ने के साथ ही छूट गई थी। लेकिन बीते दिनों वह डायरी हाथ लगी
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Dec 29 2009 11:53 AM
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छपते छपते.......

बहुतों से सुन चुके होंगे, लीजिये हम भी कहे देते हैं...... शुभ दीपावली असल में कल इस नामुराद कॉलेज की कैद से कुछ दिनों के लिए मुक्ति मिल जायेगी, अतः सम्भावना कम ही है कि कल चलते-चलते कोई पोस्ट कर पाऊँ। और अगर कर भी पाया तो क्या पता कब तक छपे. खैर मेरी
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Dec 29 2009 11:53 AM
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जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है......

प्रिय मित्रों , आज अपनी एक ऐसी कृति पोस्ट कर रहा हूँ , जो मेरे दिल के बेहद करीब है । बचपन गाँव में गुजारने के बाद मैं शहर में रहा तो ज़रूर , लेकिन दिल से गाँव की कसक आज भी नहीं छूट पाई है । कभी दुनिया भर के स्वार्थ और दोस्ती के लिबास में छुपी मक्कारी
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Dec 29 2009 11:53 AM
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मैनें आहुति बनकर देखा..

सबसे पहले अमृता तुम .... " जब तक आंखों में कोई हसीं तसव्वुर कायम रहता है, और उस तसव्वुर की राह में जो कुछ भी ग़लत है उसके लिए रोष कायम रहता है, तब तक इंसान का सोलहवां साल भी कायम रहता है। हसीं तसव्वुर चाहे महबूब के मुंह का हो चाहे धरती के मुंह का, इस
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Dec 29 2009 11:53 AM
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रैगिंग, फ़िरदौस, अलीगंज वाले बड़े हनुमान का शाप और सिनेमाहॉल में एक प्रेम उड़ान की क्रैश लैंडिंग…

साढ़े तीन साल होने को आये मुझे बरेली में। एक ऐतिहासिक महत्व का शहर और कमिश्नरी होने के बावजूद इस शहर में एक बहुत बड़ी कमी है- सिनेमाहालों की। कुल जमा आठ-दस में से आधा दर्जन हॉल में या तो ‘जीने नहीं दूँगा’ और ‘चांडाल’ टाइप फिल्में लगी रहती हैं, या तो
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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तनहाई के राज़दार..4

पहली ख़ता- स्वप्न (..आगे) सुगंध याद है मुझे अब भी-वो रुत, वो फिज़ा, जब हम पहली बार मिले थे; नरम जाड़ों के दिन थे वे, और अचानक चलने लगी वो पुरवाई समेट लाती थी अपने आँचल में तरह तरह की खुश-बूएं याद है मुझे अब भी- जब पहली बार मेरे कानों में गूँजी थी तुम
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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सच्चा इस्लाम बनाम झूठा इस्लाम

हमारी गँधाती राजनीति में मुल्ला मुलायम सिंह यादव जैसों के पास पूरी जौहर युनिवर्सिटी खड़े करने के पैसे हैं। लेकिन चालीस हजार संस्कृत पाठशालाओं के शिक्षकों को वेतन के नाम पर देने के लिये एक धेला नहीं है; अलबत्ता मदरसों की सालाना ग्रांट में एक से दो दिन
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Nov 28 2009 04:40 AM
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रोटी-पानी-बिजली-सड़क चाहिये, या पेशाब के बाद सुखाने के लिये ढेलों पर सब्सिडी ? (वहाबी आंदोलन के बहाने)

कल के ‘द हिन्दू’ में एक लेख पढ़ा। प्रसिद्ध विधिवेत्ता राम जेठमलानी ने नई दिल्ली में आतंकवाद पर हुए कानूनवेत्ताओं के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में ‘वहाबी आन्दोलन’ और उग्रवाद में तार जोड़ने की कोशिश क्या की, सउदी राजदूत फैसल-अल-तराद ऐंठकर वॉकआउट कर गये
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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हजार रुपये का चालान, 45 रुपये की ब्रांडी और बर्फ़ का नामोनिशान नहीं…. लब्बोलुआब- मनाली मत जइयो गोरी राजा के राज में।

बहुत देर से सोच रहा था कि क्या शीर्षक रखूँ। फाइनली ये ग़दर शीर्षक दिमाग में भक्क से चमक उठा और हमने उसे यहाँ ला धरा। सबको दुआ-सलाम। इतने दिन से गायब रहने के कारण दो थे- एक गोबरपट्टी में बसे अपने गाँव की यात्रा, दूसरी लौटते ही बर्फ़पट्टी© में बसे मनाल
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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राष्ट्रीय पर्व से ड्राई-डे का सफ़र…(भाग-२)

गाँधीजी का मक़सद स्पष्ट था- ब्रिटिश सत्ता से सबसे निचले स्तर पर संघर्ष करना। और गाँधी की सबसे बड़ी असफलता भी यहीं रही। सत्य तो यह था कि कुटिल ब्रिटिश शासन ने भारतीय जनता का शोषण सीधे नहीं किया, बल्कि सामंतों-जमींदारों जैसे बिचौलियों के माध्यम से। फिर
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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राष्ट्रीय पर्व से ड्राई-डे का सफ़र..(भाग-१)

आज उस शख्स पर कुछ लिखने का मन कर रहा है, जो व्यक्तित्व की सीमाओं से परे उठकर एक विचारधारा, एक ‘वाद’ बन चुका है। जिसे दो महाद्वीपों की जनता ने एक काल में पूजा, दो देशों की संसदों ने जिसे धर्म प्रचारकों ईसा, हजरत, बुद्ध के बाद गुजरी सहस्राब्दि तक का सब
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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7 महीने 16 दिन बाद…

27 जनवरी-12 सितम्बर.. 7 महीने से उपर हो चुके कुछ लिखे; और आज न लिखने का व्रत तोड़ बैठा। ऐसा नहीं है कि कुल जमा 17 पोस्टों में अपनी समस्त सोच उड़ेलकर खाली हो गया था इसलिये किनारा कर लिया। ऐसा भी नहीं है कि आज्ञाकारी बालक की तरह ‘काकचेष्टा बकोध्यानम’ में
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
Sep 12 2009 06:52 PM
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ना त्वम शोचितुमर्हसि

पिछ्ले तीन दिन बहुत गहमा - गहमी में बीते हैं , और इतना कुछ देख लिया है कि जीवन के सारे समीकरण बदले - बदले से नज़र आने लगे हैं। दृश्य - १ सोमवार ( यहाँ साप्ताहिक अवकाश इसी दिन होता है ) की शाम कैंटीन से लौटते वक़्त विपिन दिखाई देता है। चेहरे पर चिंता
 
कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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किस जन-गण-मन अधिनायक की स्तुति करें..? किस भाग्यविधाता के आगे झंडी लहरायें..?

एक और छ्ब्बीस जनवरी बीत गई। सेना के तीनों अंगों के जवान एक बार और कदमताल मिलाकर चल लिये, उँची इमारतों पर तिरंगा एक बार और फहर गया, मिठाइयां फिर बँट गईं, जन-गण-मन अधिनायक की स्तुति एक बार और हो गई, एक और छब्बीस जनवरी बीत गई। लेकिन यह गणतंत्र है किसका.
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हम आज तक अपने आप को माफ़ नहीं कर पाये कि भिंडरावाले हमारी क़ौम में पैदा हुआ, वे कैसे दुनिया से नजर मिलायेंगे जिनके घर-घर में अफ़जल गुरु हैं..........

मैनें खिड़की से बाहर देखा तो रामपुर स्टेशन बीत रहा था। चलो गनीमत है अभी तक तो सही-सलामत चल रही है, अब समय से दिल्ली पहुँचा दे तो सही है। 25 दिसम्बर की सुबह मैं बरेली से दिल्ली कुछ कार्यवश जा रहा था, रात 12 बजे की श्रमजीवी एक्सप्रेस 9 घंटे के विलम्ब के
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दयालु सुकुल चाचा, दसविदानिया, 8086 की मैक्सिमम मोड में 8251 से इंटरफ़ेसिंग और बुश को जूते। याने हम हैं ज़िन्दा ये बताने का वक्त आया है..

नमस्कार, सत श्री अकाल, आदाब अर्ज और अंगरेजी वाला हैलो। यह पोस्ट बस ये बताने के वास्ते है कि बंदा अभी ज़िन्दा है और ’वेल इन शेप’ है। असल में हुआ ये कि कल कई मन्वन्तरोपरांत जब बालक ने अपनी ऑरकुट प्रोफ़ाइल खोली और एक मित्र को कबाड़(Scrap) भेजा
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नये ईसवी वर्ष की मंगलकामनायें

सभी से क्षमाप्रार्थना.... अपरिहार्य कारणों से न तो कुछ नया लिख पा रहा हूँ और न ही आप सबकी पोस्टें पढ़ पा रहा हूँ। जिन्हें पढ़ पा रहा हूँ उनपर टिप्पणी नहीं कर पा रहा। एक साथ कई असमर्थताओं से जूझना पड़ रहा है। परीक्षाओं, वाइवा के साथ-साथ लैपटाप की खराबी