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01 Feb 2010
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मुंबई की आड में महंगाई पर समर्पण, राष्ट्र से ऊपर महाराष्ट्र

पहली फरवरी 2010 यानी सोमवार बयानों के नाम रहा। अगर गौर से देखा जाए और एक साथ आए बयानों को साथ रख कर देखें तो साफ हो जाएगा कि राजनीति की नूरा कुश्ती में कैसे आम आदमी के हितों से खिलवाड़ किया जा सकता है। महंगाई बनाम मुंबई में कुछ यूं बयान आए कि महंगाई गौण
 
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बिन भाषा काहे का गणतंत्र और काहे का राष्ट्र...

गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर गुजरात हाईकोर्ट का राष्ट्रभाषा के संदर्भ में एक जनहित याचिका पर जो फैसला आया, उसमें नियमों और कानूनों से बंधी कोर्ट की बेबसी तड़पा देने वाली है। डिब्बाबंद सामग्री पर हिंदी में निर्देश न छपवा पाने के फैसले का आधार बना हिंदी
 
Devesh
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जाति और शिक्षा की जंग में हैं जीत के बीज

माफ करना मेरी यह पोस्ट राहुल गांधी के सिलसिले में जारी चर्चा के बीच सुरेश चिपलूनकर के पुराने ब्लाग का जवाब बन कर भी नजर आएगी और कई तथ्य वहां आप को जस ते तस भी मिल सकते हैं दरअसल अनुपयोगी जनसंख्या के सिलसिले में आम विचारों को खोजता हुआ मैं वहां पहुंच गया
 
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राहुल रंग भरो कैनवास तुम्हारे सामने है

राहुल गांधी को परिस्थितियों, तकदीर और उनकी मेहनत ने ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है कि वे और उनकी ब्रिगेड देश को नई दिशा की ओर ले जा सकती है और अगर सत्ता सुंदरी ने मोह लिया तो फिर वही होगा जो पिछले कई सालों से सियासत में जारी है.... पिछली पोस्ट में मैने
 
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राहुल रोशनी न बुझे, अगर जलाएं हैं चराग उम्मीदों के...

राहुल गांधी मध्यप्रदेश आए, छात्रों से मिले, राजनीति में आने का न्योता दिया, साफगोई से कड़वे आरोपों को स्वीकार किया... बहुत बरसों बाद राजनीति की गहरी गंदली काई छंटती सी महसूस हुई। लेकिन बधाई पाने के लिए अभी इंतजार करें। बहुत सवाल बाकी हैं नियती, नीति और
 
Devesh
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बिल्कुल ठीक बोला, कुत्तों बाहर निकलो...

ये नेता न शहीद के घर जाने के काबिल हो न सदन बैठने के... मुंबई में आतंकी हमले को अपने सीने पर झेल कर देश की आर्थिक राजधानी को चैन बख्शने वाले शहीदों की चिता की राख भी ठंडी नहीं पडी है और कि नेताओं के गंदे दिमाग में इस आग में अपनी रोटिंयां सेंकने के बे
 
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साध्वी के हौसले को सलाम... कहां मर गए मानवाधिकार वाले?

साध्वी के सम्मान के मदॆन की खबरें लगातार आ रही थीं, लेकिन सिवाए मौकापरस्त नेताओं के किसी की चूं तक सुनाई नहीं दे रही थी। कुछ एक ब्लागरों ने फ्रंट संभाला तो कुछ संत-संन्यासियों ने भी साहस का परिचय देने की कोशिश की, लेकिन चार राज्यों के चुनाव और राजनीत
 
Devesh
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काले प्रेसिडेंट के ताज में मुशिकलों के मोती

ओबामा ने जीत दजॆ की। अच्छा लगा। अमेरिका में पहले अश्वेत प्रेसिडेंट होने के गौरव ने नस्लभेदी अमेरिका में जीतते नजर आते लोकराज में बेशक एक नई हवा को बहने का रास्ता दिया हो, लेकिन असली इम्तहान बाकी है। पिछले एक दशक से कई समस्याओं से जूझते अमेरिका में खो
 
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पूंजीवाद अंत की ओर गरीबों को पैसा दो तो बचेगी जान

ग्लोबलाइजेशन में जो कुछ हुआ,वह न तो अप्रत्यािशत है और न ही अचानक। वल्डर् इकोनामी को कागज से डालरों से कंटर्ोल करने वाले सोच रहे थे पूंजीवाद को ग्लोबलाइजेशन का चोला पहना कर दुिनया को लूटते रहेंगे और िजस देश या आदमी में ये ताकत आ जाएगी िक वह मुकाबला कर
 
Devesh
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गुनाहगार हैं रहने दो मुंह िछपाए हुए

कहने की बात है,िसतारों से हम िमले... हर बार जो देखा कोई चील आसमांं पर िदन का तारा बनी नजर आई। सूरज बादलों की ओट में एेसे िछपा थे जैसे झगड़े के बाद बीच वाले बीवी के पहलू और दरवाजे की ओट में रहते हैं। िदल्ली में संतोष के बाद तािहर ने भी दम तोड़ िदया ।
 
Devesh
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सरमद याद आया

अमेरिका के लास एंजिलस में गो टापलेस आंदोलन के चलते जब महिलाएं अनावृत स्तनों के साथ सड़कों पर आई एक बार फिर ये सवाल दुनियाभर में पहुंच गया है कि जब पुरुष टापलेस हो सकते हैं तो महिलाएं क्यों नहीं। आखिर प्रकृति से एकाकार होने का हक उन्हे क्यों न मिले...
 
Devesh
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पब, पिंक चड्ढी और इतनी हाट ऐश- हर हाथ में दुखती रग

श्रीराम सेना ने पब में लडकियों को पीटा (आदमियों को क्यों छोड दिया?), निशा सूसन एंड पार्टी ने पिंक चड्ढी की धूम मचाई, शायद इसके अलावा विरोध का कोई जरिया नजर ही नहीं आया होगा, आखिर प्रगतिशीलता भी तो कोई चीज है। इस क्रम की बचीखुची कसर ऐन वैलेंटाइन डे पर
 
Devesh