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असुविधा

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11 Jun 2010
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कथा मोर,मणि और वनदेवी की

अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार(एक)इस जंगल में एक मोर थाआसमान से बादलों का संदेशा भी आ जातातो ऐसे झूम के नाचताकि धरती के पेट में बल पड़ जातेअंखुआने लगते खेतपेड़ों की कोख से फूटने लगते बौरऔर नदियों के सीने में ऐसे उठती हिलोरकि दूसरे घाट पर जानवरों को
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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अधूरी प्रेमकथायें

 (पिछली कविता पर जो प्रतिक्रियायें आईं उनमें एक 'शाक' का तत्व था…एक नियमित पाठिका ने मेल किया…'अशोक जी, इतना सच नहीं कहते भाई…कमेन्ट नहीं दे पाऊंगी'…ख़ैर मुझे लिखते समय भी शाक लगा ही थी तो यह अनपेक्षित नहीं था। इसी बीच भोपाल के भाई रितेश से बात के
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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वे इसे सुख कहते हैं

पवित्र परिवार!साथ साथ रहते हैं दोनोएक ही घर मेंजैसे यूंही रहते आये होंपवित्र  उद्यान से निष्काषन के बाद से हीअंतरंग इतने कि अक्सरयूं ही निकल आती है सद्यस्नात स्त्रीजैसे कमरे में पुरूष नहीं निर्वात हो अशरीरीचौदह वर्षों से रह रहे हैंएक ही छत के
 
अशोक कुमार पाण्डेय
May 24 2010 11:59 AM
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हम नालायक बेटे

कोई नहीं आया दरवाज़े परपिता की प्रतिष्ठा बढ़ानेसारे विवाह गीत मां के होठों में दबे रह गयेनहीं मिला बुआ को जड़ाऊ हारदोस्तों की सारी रात नाचते रहने की तमन्ना अधूरी रह गयीभाई तरसता रहा सहबाला बनने कोगहनों की आकांक्षा तो शायद उसको भी थीजिसके दरवाज़े पर नहीं
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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सपने में मौत!

असीम( असीम मेरा पुराना दोस्त है। बचपन का… बारहवीं तक देवरिया के सरकारी इंटरकालेज में साथ ही पढ़े। वह कुछ उन दोस्तों में से था जिनसे दोस्ती का मतलब सिर्फ़ मौजमस्ती नहीं रही। हम कविता, देश-दुनिया और न जाने क्या-क्या बतियाया करते थे। अपना कवि जाग चुका था तो
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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गले मिलें तो साथ धड़कने भी मिलें

(आमतौर पर मान लिया जाता है कि मुक्त छंद लिखने वाले छंद से दूर ही रहते हैं। मेरा मानना है कि हम सबने किशोरावस्था और तरुणाई के पहले सालों में गीत, नज़्म,ग़ज़ल, दोहे लिखे होते हैं…बस एक समय के बाद वह फ़ार्म अपर्याप्त लगने लगता है। आज पढ़िये उसी दौर की एक
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश

तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निशगुज़र जाना चाहता हूंसारे  देश- देशान्तरों सेपार कर लेना चाहता हूंनदियां, पहाड़ और महासागर सभीजान लेना चाहता हूंशब्दों के सारे आयामध्वनियों की सारी आवृतियांदृश्य के सारे चमत्कारअदृश्य के सारे रहस्य.तुम्हे प्रेम करते हुए
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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हत्यारे

(एक)हत्याराअब नहीं रहारात के अंधेरों का मुहताजमुक्त अर्थव्यवस्था केपंचसितारा सैलून मेंसजसंवर करनिःसंकोच घूमता हैन्याय की दुकानो सेसत्ता के गलियारों तकनये चलन के बरअक्सपहन लिए हैंत्रिषूल के लाॅकेटऔरअपने हर शिकार को कहता हैआतंकवादी!(दो)टूटते परिवारों केइस
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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ख़त्म नही होती बात...

(हालिया प्रकाशित कुछ महत्वपूर्ण कविता संकलनों से असुविधा पर आपको रु ब रु कराने के वायदे के तहत हम इस बार प्रस्तुत कर रहे हैं ख्यात युवा कवि बोधिसत्व का ताज़ा संकलन 'ख़त्म नहीं होती बात'। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस संकलन का मूल्य है २०० रु। १९९१ में
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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पता नहीं कितनी बची हो तुम मेरे भीतर!

तुम्हारी तरह होना चाहता हूं मैं तुम्हारी भाषा में तुमसे बात करना चाहता हूं तुम्हारी तरह स्पर्श करना चाहता हूं तुम्हें तुम होकर पढ़ना चाहता हूं सारी किताबें तुम्हें महसूसना चाहता हूं तुम्हारी तरह वर्षों पहले पढ़ा था कभी मुझमें भी हो तुम ज़रा सा उस ज़रा सा
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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Mar 06 2010 10:11 PM
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गुस्से में लिखी एक कविता

इन दिनों बेहद मुश्किल में है मेरा देशदरवाज़े की कोई भी खटखट हो सकती है उनकी ज़रूरी नही कि रात के अंधेरों ही में हो उनकी आमदकिसी भी वक़्त हमारी ज़िंदगी मेंउथल-पुथल मचा सकती है उन बूटों की आवाज़इन दिनों संविधान की तमाम धारायें संवेदनशील हैंकविताओं के बाहर
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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उम्र से अधिक दिखना औक़ात से अधिक दिखना होता है क्या?

(गीत चतुर्वेदी अपनी पीढ़ी (पता नहीं उसमें मैं शुमार हूं भी कि नहीं) के मेरे सबसे प्रिय कवियों में है। उसकी कवितायें बोलती हैं और वह अक्सर चुप रहता है। खोजने वाले उस पर तमाम लोगों का असर खोज सकते हैं पर मुझे उसमें एक ऐसी विशिष्ट मौलिकता दिखती है जिसके
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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मुहब्बत, रतजगे , आवारागर्दी

(मदन मोहन दानिश इस दौर के बेहद ज़रूरी शायर हैं। उनसे और अतुल अजनबी से हम शहर वालों को ढेरों उम्मीदे हैं और दोनों ही अब तक इस पर खरे उतारे हैं। पिछली बार कुमार विनोद साहब की गज़लें पेश करने के बाद तय किया की इनका भी आपसे परिचय कराया जाय...हालांकि ये परिचय
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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किस्सा उस कम्बख्त औरत का

सिलसिला शुरू तो खैर दया से ही हुआ थाउस उदास सी सुबह जब पहली बार झिझकते कदमो से आयी वह नम आंखे गड़ाये जमीन पर और सूनी उंगलियों में फंसी दुख सी नीली कलम खोलते-खोलते फूट ही पडी आखिरकार तो जैसे उसका दुख कोलतार सा पसर गया सबके भीतर कुछ पल के लिए ढीले हो गये
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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जिनके बदले लिखा जा सकता है सिर्फ़ एक शब्द – समझौता

परिचययहां दर्ज़ करना है अपना नामवे डिग्रियां जिन्हें पलट कर भी नहीं देखा वर्षों सेविस्तार से देनी है जानकारी उस दफ़्तर कीजिसमें प्रवेश करते ही लगता हैथोड़ी और बौनी हो गयी आत्मापता लिखना है उस घर काजिसके लिये गिरवी पड़े हैंमेरी ज़िन्दगी के बीस सालयहां दर्ज़
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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देखूंगा एक पूरा स्वप्न

अरसा पहले लिखी यह कविता आज नये साल की शुभकामनाओं के साथ) नये साल में नये साल में लिखूंगा एक पूरी कविता. गाऊंगा पूरे स्वर में कोई मुक्तिगान। ढ़ूढ़ूंगा कुछ पूरे दोस्त। भले नया न हो पर देखूंगा एक पूरा स्वप्न। जीना चाहूंगा एक पूरी ज़िदगी। भटकूंगा पूरेपन की
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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वैसे तो कुछ भी ख़ास नहीं है तेईस दिसंबर को

वैसे तो कुछ भी ख़ास नहीं है तेईस दिसंबर को…बस दो साल पहले इस दिन गुजरात में था…मोदी की दुबारा जीत हुई थी और उस दिन के अनुभव के आधार तीन कवितायें लिखी थीं जो आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं) गुजरात 2007 (एक) वे अब नहीं बोलते ऊंची आवाज़ में सिर झुकाये
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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कीर्ति चाहिए तो कुकूर बनिए

सन्दर्भ बताना ज़रूरी तो नहीं पर प्रबुद्ध पाठक समझ ही जायेंगे... इस बार पढ़िए बोधिसत्व की कविता ) मधुरी बानी बोल देस समूचा आज सेठों के हाथ में है... जो बचा है वो जेब में है काँख में है संस्कृति संगठन पर शोहदों का जाल है वे कुछ करते नहीं...देश का यही हाल
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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मै कलमा पढ़कर सुरैया नही बनाना चाहती

यह कविता गुजराती की मशहूर कवियत्री और सामाजिक कार्यकर्ता सरूप बेन की है। इसे गुजराती से हिन्दी में अनुदित मैंने किया है...बाकी तो बात ही बोले तो बेहतर ) क्या है वज़ह मेरे जीने की नहीं मै क़लमा पढकर सुरैया नहीं बनना चाहती क्योंकि इस देश की तमाम सुरैया,
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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चाय, अब्दुल और मोबाइल

कोई तीन साल पहले यह कविता कथन में छपी थी। आज इसे संकलन तैयार करते हुए दुबारा पढा तो लगा आप सब से शेयर करना चाहिए) रोज़ की तरह था वह दिन और दफ़्तर भी चेहरों के अलावा कुछ नहीं बदला था जहां वर्षों से थके हुये पंखे बिखेर रहे थे ऊब और उदासी फाईलें काई की बद
 
अशोक कुमार पाण्डेय
Nov 14 2009 06:19 PM
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वे

दोस्तों ने कहानी का एहतराम तो किया पर साथ ही इसरार भी कि इस ब्लाग को कविता के लिये ही आरक्षित रखा जाय…तो अब कवितायें ही रहेंगी यहां…लीजिये प्रस्तुत है कोई दस साल पहले लिखी यह कविता जो बाद में साखी मे छपी) वे सबसे ऊंची आवाज़ में नारे लगाकर भर देते हैं
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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ब्लैक फ्रिंज

अब असुविधा पर अपनी कविताओं के साथ-साथ हिन्दी के महत्वपूर्ण रचनाकारों की रचनायें पढवाने का भी विचार है। इस क्रम में आज कवि कथाकार विजय गौड़ की कहानी । हिन्दी की कहानियों में विविधता के अभाव को देखते हुए विज्ञान केंद्रित यह कहानी ख़ास लगती है ) लड़कों क
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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असुविधा

विरूद्ध पता नहीं किस-किस के विरूद्ध कौन सी रणभूमि में निरन्तर कटते-कटाते संघर्ष रत रोज लौट आते अपने शिविर में श्रांत-क्लांत रक्त स्वेद मिट्टी में सने घाव के अनगिन निशान लिये न जीत के उल्लास में मदमस्त न हार के नैराष्य से संत्रस्त। कोई आकस्मिक घटना नह
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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मेज़र गौतम राजरिशी के लिए

मेजर गौतम राजरिशि बीमार हैं, यह सूचना आज ही मुझे मिली। वह मेरे उन मित्रों में शामिल हैं जिनसे ब्लाग पर ही मुलाकात हुई। असुविधा के नियमित पाठक गौतम के भीतर एक संवेदनशील और निच्छल मन है जिसकी बानगी उनकी कविताओं और टिप्पणियों में मिलती है। असुविधा पर कव
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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उधार माँगने वाले लोग

छोटी हो चादरतो पांव न होना ही बेहतरझुका ही रहता है हमेशामांगने वाले का सररहिमन वे नर मर चुके …सब याद थाउन पसरी हुई हथेलियों कोसुन रखे थे उन्होंने भीअपमान और बरबादियों के तमाम किस्सेसंतोष एक पवित्र शब्द था उनके भी शब्दकोष कालालच से नफ़रत करना ही सीखा
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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तैयारी एक लम्बी यात्रा की !

हर यात्रा में शामिल है लौटना अपने-अपने तरीके से लौटता है कोई रोज़ द़फ़्तर से पीठ पर लादे अपमानो की गठरी और पोस्टडेटेड चेक़ों में क़तरा-क़तरा बिकी सुरक्षा ओढ़कर सो जाता हैं स्वप्नहीन नींद में । कोई लौटता है प्यार की भरपूर तलाश के बाद गले में बांधे शर्तों का
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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मै अर्जुन नही हूँ

अर्जुन नहीं हूं मैंभेद ही नहीं सका कभीचिडिया की दाहिनी आंखकारणों की मत पूछियेअव्वल तो यहकि जान गया था पहले हीमिट्टी की चिडिया चाहे जितनी भेद लूंघूमती मछ्ली पर उठे धनुष सेछीन लिया जायेगा तूणीरफिर यह कि रुचा ही नहींचिडिया जैसी निरीह का शिकारभले मिट्टी का
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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वे चुप हैं

हत्यारे की शाल कीगुनगुनी ग़र्मी के भीतरवे चुप हैंवे चुप हैंगिनते हुए पुरस्कारों के मनकेकभी-कभी आदतन बुदबुदाते हैंएक शहीद कवि की पंक्तियाँउस कविता से सोखते हुए आग वे चुप हैंवे चुप हैंमन ही मन लगाते आवाज़ की कीमतसंस्थाओं की गुदगुदी गद्दियों में करते केलिसारी
 
अशोक कुमार पाण्डेय
Aug 20 2009 09:37 AM
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एक सैनिक की मौत

(The Spanish struggle is the fight of reaction against the people, against freedom. My whole life as an artist has been nothing more than a continuous struggle against reaction and the death of art. How could anybody think for a moment that I could be in
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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अंतिम इच्छा

शब्दों के इस सबसे विरोधाभासी युग्म के बारे में सोचते हुए अक्सर याद आते हैं गा़लिब वैसे सोचने वाली बात यह है कि अंतिम सांसो के ठीक पहले जब पूछा जाता होगा यह अजीब सा सवाल तो क्या सोचते होंगे वे लोग कालकोठरी के भयावह एकांत में जिनके गले पर कई बार कसी जा
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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हमारे समय में

(यह कविता कोई सात साल पहले लिखी गयी थी और उस समय अक्षर पर्व में प्रकाशित भी हुई थी। पता नहीं क्यूआज इसे पोस्ट करने का जी हुआ)हमारे समय मेंशेरखतरनाक से दयनीय में तब्दील हो चुका हैऔर मनुष्यों की सारी चिंताजानवरों के इर्द गिर्द सिमट गयी है। हमारे समय में
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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साहित्यिक महामानव मुर्दाबाद

इस बार बडे व्यथित मन से गोरख पान्डे की एक ग़ज़ल लगा रहा हूं। पता नहीं कि वजन वगैरह बराबर है या नहीं। आप इसे ग़ज़ल ना मानना चाहें तो न माने…महत्वपूर्ण इसकी अर्थवत्ता है) रफ़्ता-रफ़्ता नज़रबंदी का ज़ादू घटता जाए है रुख से उनके रफ़्ता-रफ़्ता परदा उतरता जाए है ऊंच
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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चूल्हा

हिन्दी में पीढा, चौकी, कुदाल जैसी अतीत हो चुकी चीजों पर लिखी अतीतग्रस्त कविताओं की लम्बी शृंखला है। चूल्हा भी ऐसा ही पवित्र प्रतीक है ... पर मै जब इसे देखता हूँ तो यह अलग ही दीखता है) चूल्हे की याद करता हूँ तो याद आती है ताखे पर टिमटिमाती ढिबरी जलते
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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तुम्हारी दुनिया में इस तरह

सिंदूर बनकर तुम्हारे सिर पर सवार नहीं होना चाहता हूं न बिछुआ बन कर डस लेना चाहता हूं तुम्हारे कदमों की उड़ान को चूड़ियों की जंजीर में नहीं जकड़ना चाहता तुम्हारी कलाईयों की लय न मंगलसूत्र बन झुका देना चाहता हूं तुम्हारी उन्नत ग्रीवा जिसका एक सिरा बंधा ही
 
अशोक कुमार पाण्डेय
Jun 24 2009 08:14 PM
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अच्छे आदमी

अच्छे आदमी अंधेरा होते ही बंद कर लेते हैं दरवाज़ा अच्छे आदमी करते हैं अच्छी-अच्छी बातें नाप जोख कर लिखते हैं कवितायें सोच समझ कर करते हैं हर काम यहां तक की प्यार भी। अच्छे आदमी के कपड़ों पर नहीं होता कोई दाग़ घर होता है सुन्दर सा पत्नी सुशील-बेटा मेधावी
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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सोती हुई बिटिया को देखकर

अभी-अभी हुलसकर सोई हैं इन साँसों में स्वरलहरियां अभी-अभी इन होठों में खिली है एक ताज़ा कविता अभी-अभी उगा है इन आंखों में नीला चाँद अभी-अभी मिला है मेरी उम्मीदों को एक मज़बूत दरख़्त
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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तुम्हे कैसे याद करुँ भगत सिंह

यह कविता काफी पहले ब्लॉग पर लगायी थी ... पर तब ब्लॉग पर इतनी आवाजाही नही थी।) जिन खेतों में तुमने बोई थी बंदूकें उनमे उगी हैं नीली पड़ चुकी लाशें जिन कारखानों में उगता था तुम्हारी उम्मीद का लाल सूरज वहां दिन को रोशनी रात के अंधेरों से मिलती है ज़िन्दग
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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मौन

यह कविता कथाक्रम के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुई है। लखनऊ से निकलने वाली इस पत्रिका में कविता का कालम वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना जी देखते हैं।) हडप्पा की लिपि की तरह अब तक नहीं पढी जा सकी मौन की भाषा… पानी सा रंगहीन नहीं होता मौन आवाज़ की तरह इसके भी होते ह
 
अशोक कुमार पाण्डेय
May 18 2009 09:52 PM
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आजकल

आजकल कहाँ कर पाता हूँ कुछ भी ठीक से जुलूस में होता हूँ तो किसी पुराने दोस्त सी पीठ पर धौल जमा निकल जाती है कविता कविता लिखते समय किसी झगडालू पडोसी सी चीखती हैं अख़बार की कतरने डूबता हूँ अख़बार में तो किसी मुंहलगी बहन सी छेडने लगती है कहानी कहानियों के
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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कहां होंगी जगन की अम्मा ?

सतरंगे प्लास्टिक में सिमटे सौ ग्राम अंकल चिप्स के लिये ठुनकती बिटिया के सामने थोड़ा शर्मिन्दा सा जेबें टटोलते अचानक पहुंच जाता हूं बचपन के उस छोटे से कस्बे में जहां भूजे की सोंधी सी महक से बैचैन हो ठुनकता था मैं और मां बांस की रंगीन सी डलिया में दो मु
 
अशोक कुमार पाण्डेय