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जीवन सन्दर्भ

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28 Apr 2010
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गीत

अभी नहीं रुका हूं मैं ,अभी नहीं झुका हूं मैं ,अभी तो चल रहा हूं मैं ,दिए सा जल रहा हूं मैं //चला बहुत पर अभी ,जरा नहीं चुका हूं मैं //............उजास को पुकारता ,बचा जरा उदारता ,अभी तो शेष रण बहुत स्वयं किये हैं प्रण बहुत ,अभी हजार मील हैं ,पर नहीं
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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गीत

मन दुखी है तन सुखी है ,कैसा है यह खेल ?यह जीवन है या फिर सारे जीवन की है जेल. रटते रट ते ,बारह खाड़ियाँ ,भूल गए सारी बातें ,भूल गए सब चंदा तारे ,भूल गए गहरी  रातें ,अब तो बस मुर्दा चामों की ढोल बजाना बचा रहा कब तक जागे चाँद पे
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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गीत

महसूस होती है  किसी की कमी धीरे धीरे /उतरती है आँखों में नमी धीरे धीरे /कोई यादों की गहराई में ग़ुम है /आई है याद जो थी थमी धीरे धीरे /तनावों का अजीब नश्तर है /कट रही बर्फ इक जमी धीरे धीरे /मेरी आँखों में देखी क्या कहानी ?उदासी से भरी इक ग़मी धीरे
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Apr 23 2010 10:32 PM
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तुम्हारा दर्द

मैं तुम्हारे दर्द मे शामिल हुआ हूं /सच कहूं तो आज कुछ काबिल हुआ हूं //तमाशे इस कदर देखें हैं अपनी जिंदगी में /कि अब जाकर कहीं ग़म के मुकाबिल हुआ हूं //कभी जो फूल खुशियों के खिलें हैं /कभी मैं दर्द की नदिया का इक साहिल हुआ हूं //हमेशा सपन बुनता ही रहा हूं
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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ग़ज़ल

हसरत ए नाकाम को क्या क्या कहिये /दर्द की  चोट है ये ,इस चोट को कैसे सहिये?//सारे चेहरों पे पुता है ये उदासी का ज़हर /उनके चेहरों पे नकाबें  हैं ये किस से कहिये ?//घर में बैठें हैं उजाले भी लूट के डर से /इतनी दहशत है तो इस मुल्क  मे
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Apr 22 2010 12:05 PM
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तुक्तक

भटक,मटक,चटक,पटक ,मित्र गया राह भटक   ,दौड़ता रहा सदा पर ,द्वार पर गया अटक  //देखता रहा धरा ,गगन को गया गटक ,टाल ठोंकता रहा ,पर गया सदा पटक //तौलता है तालियाँ ,बात पर गयी खटक ,बना  रहा स्वयं ध्वजा ,अंत मे बना लटक//
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Apr 12 2010 07:46 PM
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गीत

मुश्किलों में हों जो अगर ,गीत गाइए/हार भी रहें हों तो फिर जीत जाइये   //रूठिए तो मौसम की तरह ,हंसिये तो ख़ुशी सा ,मुहब्बत भरे पलों सा यहाँ बीत जाइये //यूं ही चलन रहा है प्यार का यहाँ .दुनिया में खुद को बाँट कर के रीत जाइये //होतें हैं क्यों
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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गीत

देखो चन्दन वन बहक  गया ,जाने कितना कुछ महक गया ,अंगड़ाई ली अभिसारों ने ,मादक परिणय व्यापारों ने ,फुनगी पर चढ़ा पलाश यहाँ ,पिघले लोहे सा दहक गया //देखो ......छूटी पीछे बीती पीड़ा ,श्वांसों ने छेड़ी है वीणा ,जागे जीवन मे राग नए ,भोला मन फिर से
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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लड़की

लड़की जैसे नई सुबह की  मीठी लाली ,लड़की जैसे मीरा के भजनों की ताली,लड़की जैसे खुद में तन्मयता की मूरत ,लड़की जैसे प्रभु के  चरणोदक की प्याली ,लड़की मानो उल्लासों की जीवन गाथा ,लड़की जैसे आम्र  वनों की कोयल काली,लड़की कल के इतिहासों
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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तेरा नाम

कि तेरा नाम मेरे नाम से जुड़ने लगा है /जैसे पृष्ठ एक  इतिहास का मुड़ने लगा है //सुबह के स्वप्न सा , तम जरा धुधला पड़ा है /युवा पक्षी समय का, क्षितिज तक उड़ने लगा है //अभी आशा तुम्हारी प्रीत के अनुबंध सी है /कोई क्यों नियम के अधिकार सा कुढने लगा
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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ग़ज़ल

सभी अलग-अलग उदास हैं /यहाँ कौन ग़म शनाश हैं ?//जहाँ बेहयाई की शर्त हो /वहां शर्म ही बेलिबास है //कोई चोट बीती है टीसती /अब प्यार भी इक प्यास है //जब शाम उतरी धुआं धुआं /वहां पीली-पीली उजास है //क्यों मै ज़िन्दगी की दुआ करूं ?/जो गिनी -गिनी सी ये साँस है
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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होली पर

होली आगई ,जाने की तयारी सी करती हुई /कोई जोश नहीं कोई उल्लास नहीं ,सभी कुछ केवल एक रूटीन सा लगता है बेमन से मनाई जा रही हो /इस बार घर भी नहीं जा पाया बच्चों के इम्तेहान ,आपनी ड्यूटी और स्वस्थ्य के चलते /पूरे सेवाकाल मे पहला मौका है जब ऐसा हो पाया /बाबा
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Mar 01 2010 01:15 PM
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देखना एक इतिहास को बनते हुए

कविता के एक ब्लॉग पर इतिहास उतरते हुए देख कर अचम्भा मत कीजिये /आज ऐसा ही हुआ जब ग्वालियर के रूपसिंह stadium पर सचिन तेंदुलकर का बल्ला अपनी ऊंचाइयों के सारे मानदंड ध्वस्त कर नई मंजिलों को छूता  नजर आया .हजारों हजार रन और सैकड़ों शतकों के बाद भी सचिन
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Feb 24 2010 10:43 PM
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जीवन सन्दर्भ

चाहे घर जाओ या वन जाओ ,तुम झुको कि या फिर तन जाओ ,चाहे छाया बन कर फिरो कहीं ,या मन का दर्पण बन जाओ ,आंसू बन आँखों की देहरी ,अगवानी हो इन सांसों की,झंझावातों में जीवन के ,क्या रिक्ति शेष परिहासों की ?उजला उजला सब दीख रहा पर ,पर बहुत शेष है कालापन ,चेहरे
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Feb 17 2010 10:28 PM
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जीवन सन्दर्भ

ग़ज़ल दर्द उतरा है सरेशाम मेरी बस्ती में ,अपने ही कर रहे हैं छेद अपनी कश्ती में ,उम्र पर पाबंदियां ढीली हुई हैं आज तो ,वक़्त की रंगीनियों मे लोग सारे मस्ती में ,जल रहा है देश तो क्या अपना घर महफूज है ,जोश है पर होश का क्या ,बचा कुछ क्या हस्ती में
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Feb 12 2010 08:03 PM
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जीवन सन्दर्भ

राम ललानेह भरी अँखियाँ जिनकी ,अधरों पै मंद सुहास पला ,चित चोर गई बांकी चितवन ,जिनमे बसती चितचोर कला ,गति मति की थाम लई जिन ने ,जिनकी गति मे चमकै चपला ,राम को नाम सदा कहिये ,पुनि पुनि कहिये श्री राम लला ,// प्रन की प्रतिभा जग जीत गयी ,जगती जीती अति
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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जीवन सन्दर्भ

बिना बातआपके साथ कैसी है पहेली बार बार सोचता हूँ कि जिंदगी ऐसी उलझनों , भरी,मुश्किलों भरी क्यों है ?आख़िर क्यों जी जाए ऐसी जिंदगी जहाँ आदमी आदमी को खाने पर तुला है ,कोई जी भी नही पारहा पर जीने भी नही दे रहा. स्नेह नही ,विश्वास नही ,अपनेपन की डोर डोर
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Dec 29 2009 11:45 AM
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गीत

प्यास हूँ मै जिंदगी की प्यास हूँ , धूप का जलता हुआ अहसास हूँ , चाहता था मै गगन चूमूं कभी , पुष्प की इक पांख सा झूमूं अभी , पर चुभन से गीत मेरे रह गए , कूल सा ठहरा रहा मै ,धार से तुम बह गए , जान कर सबकुछ बुरा लगता नहीं , कोई सपना प्यार का जगता नहीं ,
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Dec 29 2009 11:45 AM
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जीवन सन्दर्भ

गीत कुछ कहो कि तुमने मन जीता , कुछ सुनो कि सब रीता रीता , इतने बादल , इतनी वर्षा फिर पानी को क्यों मन तरसा ? क्यों मैं हारा क्यों जग जीता ? / / कुछ कहो . . . . . ऊँची यह अन गढ़ दीवारें , पीठों में चुभती तलवारें , जो भी बीता कैसे बीता ? / / कुछ कहो .
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Dec 29 2009 11:45 AM
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जीवन सन्दर्भ

नज़्म मेरी किसी ज़मीन पर तेरे सूरज की रोशनी , अब कभी नही आती , मेरे प्यार के बगीचे मे तेरी मुहब्बत की बुलबुल कभी नही गाती, क्या करूँ आजकलखुद से पशेमान बहुत हूँ दुनियावी रंग देख के हैरान बहुत हूँ, चाहता हूँ कोई ताबीर नई रच पाऊँ खुद ही खुद की नज़र में
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Dec 29 2009 11:45 AM
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गीत

एक सागर की कथा  है , जिंदगी मुझमे व्यथा है // बह रहा हूँ धार सा मै  , जूझता मंझधार सा मै , घूमता फिरता रहा हूँ , हवा में तिरता रहा हूँ , मन की पाती पर लिखा  जाने कहाँ ,किसका पता हूँ ? ऊबता दिनरात हूँ मै , थकित झंझा वात हूँ मै , समर में
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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जीवन सन्दर्भ

गीत छोटी सी इक किरण से आकाश ने कहा, तुम खिल कर बिखरती हो पर मै थमा रहा , ओंठो पर मुस्कुराहटें कितनी ही आ गयीं , पहले किरण हंसी फिर थोडा लजा गयी , आपमे विस्तार है ,गहरे है ,धमक  है , पर क्या प्यार से जुडने की आँखों मे चमक है ? युग युग से  तो
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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जीवन सन्दर्भ

राम लला नेह भरी अँखियाँ जिनकी ,अधरों पै मंद सुहास पला , चित चोर गई बांकी चितवन ,जिनमे बसती चितचोर कला , गति मति की थाम लई जिन ने ,जिनकी गति मे चमकै चपला , राम को नाम सदा कहिये ,पुनि पुनि कहिये श्री राम लला ,//  प्रन की प्रतिभा जग जीत गयी ,जगती ज
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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तुम

तुम रहे हो जिंदगी में एक आदत की तरह / हम जिए तुमको इबादत की तरह          // तुम हमें मुस्कान से छल ने  लगे          / आजकल की इस सियासत की तरह     // आँधियों के ढेर पर बैठे हुए   &
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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गीत

छोटी सी इक किरण से आकाश ने कहा, तुम खिल कर बिखरती हो पर मै थमा रहा , ओंठो पर मुस्कुराहटें कितनी ही आ गयीं , पहले किरण हंसी फिर थोडा लजा गयी , आपमे विस्तार है ,गहरे है ,धमक  है , पर क्या प्यार से जुडने की आँखों मे चमक है ? युग युग से  तो&nbs
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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राम लला

नेह भरी अँखियाँ जिनकी ,अधरों पै मंद सुहास पला , चित चोर गई बांकी चितवन ,जिनमे बसती चितचोर कला , गति मति की थाम लई जिन ने ,जिनकी गति मे चमकै चपला , राम को नाम सदा कहिये ,पुनि पुनि कहिये श्री राम लला ,//  प्रन की प्रतिभा जग जीत गयी ,जगती जीती अति
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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ग़ज़ल

जिन्दगी  आसपास  है / जाने क्यों फिर उदास है ?// टूटता है मन यहाँ बहुत / हर कोई किसी का खास है // भटक रही है रौशनी यहाँ / आज तम मे ही उजास है // गीत गा रही है गन्दगी / इत्र मे बसी उबास है  // मीत मेरे कुछ करो जरा / मुझ मे अब भी शेष प्या
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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pyar

प्यार किसने देखा है ? वह वृत्त है या रेखा है ? सरल है या गोला है ? ठोस है या पोला है ? कठिन है या भोला है ? लेकिन दोस्त ये पैमाने तो प्यार के नहीं , इन पर भावना को तोलना सही तो नहीं , प्यार तो एक मखमली छुवन है ,अहसास है , जो मेरे ,तुम्हारे ,सभी के अं
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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तुम्हारे हाथों पर ........

तुम्हारे हाथों पर मेहंदी सरीखा  रच गया मै , सच कहूं कल के लिए फिर बच गया मै , खोजता था रौशनी जो मिल न पाई, छू सके जो मन ,कली वो खिल न पाई , किसके लिए खोजूं सितारों का गगन ? आदमी जब है दीयों में ही मगन , तुम नहीं सुनते कहूं क्या ,क्यों कहूं?
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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खो गया ख्यालों मे

खो गया ख्यालों मे रेशमी रुमालों मे , रूप के झरोखों मे , यादों के उजालों मे // आंसुओं की घाटी मे , प्यासे दिए की बाती मे , जिस्म की हरारत मे , दर्द के सवालों मे  // चांदनी की बाँहों मे , दोस्ती की राहों मे , आपकी शिकायत मे , अपने कुछ बवालों मे //
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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गीत

हमने अब तक सब कुछ पाया है मन के अनुरूप , फिरभी हम को कम लगती अपने हिस्से की धूप , चन्दन के वन खोजे तो सापों के दंश मिले           , मर्यादा चाही   फिर भी     &n
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Oct 14 2009 07:44 PM
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जिंदगी

रुक रही है ,थम रही है , रही है पर कम रही है , रही रेगिस्तान सी है , बूँद जैसी नम रही है , ज़िन्दगी ऐसी रही वैसी रही है // रौशनी है पर जरा कम , जोश है पर नहीं है दम , कौन जूझे इस अनय से , कौन ठोके रोज ही ख़म ? जिंदगी जैसी मिली वैसी रही है // टूट कर जु
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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मेरी बच्ची

नन्ही मुन्नी प्यारी बच्ची , सीधी सादी,सुंदर सच्ची , बातें करती बड़ी बड़ी , शैतानी करती कड़ी कड़ी  ,बचपन के सपनों में खोई , जैसे सुबह दूध की धोई , बातें हैं दादी जैसी , सबकी ऐसी या तैसी , रोने पर जब आ जाती , सबके ऊपर छा जाती , करती जब शैतानी वो ,
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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जीवन सन्दर्भ

शहनाई के सुर............शहनाई के मीठे सुर से कुछ पल को यूं बात हुई ,जैसे तेरा दामन पकड़ा ,तुम से इक मुलाकात हुई,खोया खोया चाँद किसी की यादों मे यूं डूबा है ,होश नही है कब दिन डूबा और कब फिर से रात हुई ,तेरी मेरी हस्ती मिल कर जब से एक हुई जानब,हर मौसम
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Sep 05 2009 12:01 AM
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जीवन सन्दर्भ

गीतअर्चना के पुष्प का यह थाल,ज्यों दीप्त दीपित ,श्रेष्ठ ,उन्नत भाल ,हर सुबह के साथ नया प्रकाश ,नावों ने फहरा दिए फ़िर पाल,//अर्चना ............समय का संकल्प ले आगे बढो ,लक्ष्य के दुर्गम शिखर पर जा चढो ,जीत लो बढ़ कर उदासी के किले ,दीप्त हो जिससे विजय का
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Jul 29 2009 02:16 PM
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ग़ज़ल

ग़ज़लदर्द के ,प्यास के पर क़तर जायेंगे ,मुद्दतों बाद हम अपने घर जायेंगे ,रौशनी बंद गलियों में फिरती रही ,यह अंधेरे दियों को निगल जायेंगे ,किसने किसको छला कौन कह पायेगा ,जब हमी में विभीषण निकल आएंगे ,इस जगह की प्रदूषित है आबोहवा ,मन की वैतरणी कैसे उतर
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
Jul 29 2009 02:09 PM
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गीत

दिन बहुत बीते, नहीं अब याद मुझ को गीत पहला // रागिनी सी उम्र थी और प्यार था संतूर सा , अश्रु कण भी नहीं थे और दर्द भी था दूर सा,जी रहा था पुष्प सा , मधुगंध सी थीं तुम प्रिये ,रूप की इस धूप में हर हर शक्श था मजबूर सा ,आज भी है याद मुझको बात पहली ,प्या
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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गीत

कोई सपना है जिसे आंखों ने फ़िर पाया है , एक आइना है जिसमे तू नज़र आया है , रंग है रूप है ,कुछ धूप है जवानी की , याद है ,दर्द है ,कुछ प्यास हैंकहानी की , कितनी सांसों के उजाले में तुझे देखा है , मेरी तन्हाई में तू रौशनी की रेखा है , कितना सुख खोया है त
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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नदी

तेजी से आती है ,जाती है नदी , मौसम के गीतों को गाती है नदी , पथरीले पाटों पर ,उमग रहे घाटों पर , प्रथम प्यार की जैसे ,पाती है नदी , मटमैले पानी की ,चूनर यह धानी सी , तेवर तूफानी ,दिखलाती है नदी , गाँव घर बहा लगाई मगर , खेतों को जीवन दे जाती है नदी ,
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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geet

गीत ज़िंदगी का राग हो , वक़्त का वह शोर हो तुम , जो बुन न पाया गीत कोई , यूँ बहुत मुँह ज़ोर हो तुम / / तुम न जाने क्या रहे हो , आज तक अग्यात है यह , पर अलग ही हो शु भे तुम , राज की ही बात है यह / / गीत की अंतिम कड़ी हो , ज़िंदगी से भी बड़ी हो , आज भी
 
डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह