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मौत भी शायराना चाहता हूँ..!

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02 Feb 2010
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मुझको पहचान लो... तो बताऊँ..!

आप सभी इन महोदय से भली भांति वाकिफ़ हैं... ज़रुरत है तो सिर्फ दिमाग पर ज़ोर डालने की... ये महोदय बहुत जाने माने वैज्ञानिक थे... इन्होंने विज्ञान के लिए काफी कुरबानिया दीं थीं... फिलहाल आप सोचिए और बताइए... ज़रुरत पड़ी तो मैं आपको "क्लू" दे दूंगा... वैसे
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आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार...

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार आँखों भर आकाश है बाहों भर संसारलेके तन के नाप को घूमे बस्ती गाँव हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव सबकी पूजा एक सी अलग-अलग हर रीत मस्जिद जाये
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मिल गया बाबा का आशीर्वाद...

महाराज श्री श्री १००८ बाबा समीरानन्द जी ने मुझे अपना कृपा पात्र बना लिया है... बाबा श्री ने मुझे अपना आशीष प्रदान किया और अपने आश्रम प्रबंधन का प्रबंधक-आश्रम व्यवस्था और कमरा आरक्षण का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा (स्वामी रामकृष्णानन्द महाराज जी आश्रम के
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अज़नबी शहर के अज़नबी रास्ते...

अज़नबी शहर के अज़नबी रास्ते मेरी तनहाई पर मुस्कुराते रहेमैं बहुत दूर तक बस यूं ही चलता रहातुम बहुत दूर तक याद आते रहेज़हर मिलता रहा और जाम हम पीते रहे रोज़ ही मरते रहे और रोज़ ही जीते रहेज़िन्दगी भी हमें आजमाती रहीएक दिन ऐसा हुआ कि मैं ज़रा सा थक गयाथक के सोचा
टैग: मनकही
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परदा और हम...

परदा... एक ऐसा सच हैजिसमें हम वही देखते हैं जो हम देखना चाहते हैंहम देखना चाहते हैं ग्लैमरऔर चाहते हैं सस्पेंसउस परदे पर हमें वही मिलता हैबिल्कुल वहीहम जब परदे के सामने होते हैंहम भूल जाते हैं किहम परदे के सामने बैठे हैंहम सोचते हैं किहम भी वहीं हैं
टैग: परदा
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सूरज हुआ मद्धम, चाँद...

सहस्राब्दी का सबसे लंबा कंगन सूर्यग्रहण शुक्रवार १५ जनवरी २०१० को देखा गया। हालाँकि इस दुर्लभ नजारे को भारतीय उपमहाद्वीप के केवल कुछ ही हिस्सों में ही देखा जा सका। सूर्यग्रहण को देखने के लिए जगह-जगह लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। ऐसा अगला सूर्यग्रहण 1033 साल
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मौत आई ज़रा-ज़रा करके...

घर से निकले थे हौसला करके!लौट आए ख़ुदा-ख़ुदा करके!!दर्द-ऐ-दिल पाओगे वफ़ा करके! हमने देखा है तज़ुरबा करके!!लोग सुनते रहे दिमाग़ की बात!हम चले दिल को रहनुमा करके!!जिंदगी तो कभी नहीं आई! मौत आई ज़रा-ज़रा करके!! किसने पाया सुकून दुनिया में! जिंदगानी का सामना
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एक पाती बाबा के नाम...

मैं आज महाराज श्री श्री १००८ बाबा समीरानन्द जी की "चिटठा भविष्यवाणी" 'वर्ष २०१० में आपके चिट्ठे का भविष्य' पढ़ रहा था| पूरी कथा पढ़ी और उसके बाद उस कथा की दक्षिणा देने के लिए "टिप्पणी भवन" में प्रवेश किया... जैसे ही मैं वहां पहुंचा मैंने देखा कि मुझसे पहले
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एक अद्भुत "'नई' 'दुनिया'"

ऑनलाइन डायरी यानि ब्लॉग... यह एक ऐसा शब्द है जिससे अब तक लगभग सभी शिक्षित लोग वाकिफ हो चुके हैं। कुछ लोग इसे 'चिट्ठा' का नाम देते हैं तो कुछ कहते हैं 'ब्लॉग'... कोई कुछ भी कहे लेकिन मतलब एक ही निकलता है। इसका उपयोग करने वाले या इसमें अपनी रचनाओं,
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फिर मिलेंगे चलते चलते...

अरे! तुम...मेरे दाहिने ओर से आई एक मीठी सी आवाज ने अचानक मेरा ध्यान उचटा दिया। तुम यहां कैसे? लोकल हो क्या? यहां कोई काम से आए हो? क्या करते हो?एक मिनट के भीतर ही इतने सारे सवालों ने मुझसे उस 24-25 की युवती का परिचय बढ़ाना शुरू कर दिया।मैं बिल्कुल बेवाक
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नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाए...

नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाएख़ुशी वह जो आए तो आकर न जाएख़ुशी यह हर एक व्यक्ति को रास आएमोहब्बत के नग़मे सभी को सुनाएरहे जज़ब ए ख़ैर ख़्वाही सलामतरहें साथ मिल जुल के अपने पराएजो हैँ इन दिनोँ दूर अपने वतन सेन उनको कभी यादें ग़ुर्बत सताएनहीँ खिदमते ख़ल्क़
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सपने में भगवान...

एक दिन मेरे आराध्य देव मेरे सपने में आए और कहने लगे - वत्स! तुम कैसे हो ? पहले तो मैं चौंका, फिर ज़रा संभला और बोला - आप कौन हैं? इतनी रात को कैसे? कोई विशेष काम है क्या? उन्होंने कहा - आज मुझे नींद नहीं आ रही थी, तो सोचा थोडा तफरीह हो जाए. सोचा किस
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Dec 27 2009 04:16 PM
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कुछ लाइनें माता-पिता के लिए...

शुक्रवार की रात को मैं एक किताब पढ़ रहा था। उस किताब का नाम है `एक पुस्तक माता पिता के लिए...। किताब के लेखक हैं सोवियत शिक्षाशास्त्री अंतोन सेम्योनोविच माकारेंको (1888-1939)। अंतोन माकारेंकों ने अपनी इस किताब को पारवारिक लालन पालन को समिर्पत किया है।
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पल दो पल की शायरी...

जो बीत गई वो बात गईसूरज निकला और रात गईअब जीने की ख्वाहिश क्या करनामरने की तमन्ना कौन करेजब प्यास बुझाने की खातिरप्यासा पनघट को जाता हैऐसे में प्यासा क्यों मरनाऔर... पानी-पानी कौन करे!...
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अपनी मर्जी से कहां अपनी मर्जी के हम हैं...

वक्त बदलता है और बदलता रहेगा... किसी के रोकने से न तो रुका है और न ही रुकेगा... जिसने भी रोकने की कोशिश की वह इसके प्रवाह में आकर बह गया।किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि इंसान पैदा होने के बाद बच्चा बनेगा, फिर जवान और अंत में बूढ़ा होकर वक्त की बनाई हुई
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Dec 12 2009 05:04 PM
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क्षणिकाएं

एक...कभी हवा के झोके से तेरे छूने का अहसास होता हैकभी दूर होने पर भी तू मेरे दिल के पास होता हैबेशक कलम मेरी, स्याही मेरी, ये अहसास मेरा हैपर कभी कभी इनमे तेरी आवाज़, तेरा ही हर अल्फाज़ होता है।दो...न कोई शिकवा है खुदा से और न ही जमाने सेदर्द और भी बढ़
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मुंबई ब्लॉगर मीट

पांचवा खम्बा: मुंबई ब्लॉगर मीट
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सिगरेट के डिब्बों में फ्री कूपन जल्द...

हाल ही में एक खबर आई है कि अब सिगरेट के पैकेटों में एक फ्री कूपन मिलेगा जो किसी भी कैंसर अस्पताल में फ्री कैंसर चैकअप में मददगार होगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह पहल सिगरेट के पैकेट्स के 40 प्रतिशत भाग में पूर्व दिए गए 'स्मोकिंग किल्स' के विज्
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मीडिया : द फोर्थ कॉलम!...

कुछ दिनों पहले तक लोकतंत्र के केवल तीन ही स्तंभ थे। उनके साथ कदम से मिलाकर जिम्मेदारपूर्वक कार्य करते हुए मीडिया ने अपने हाथ दिखाए और शामिल हुआ चौथे स्तंभ के रूप में! और... कहलाने लगा लोकतंत्र का चौथा स्तंभ... लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ ने देश, दुनिया
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अरे! तुम कब आए...

सुबह के लगभग सवा पांच बज रहे थे, हवा की सरसराहट सीधे कानों से टकरा रही थी, पक्षियों का झुण्ड नीले आसमान की सुन्दरता बढ़ा रही थी, सूरज की लालिमा अपने चरम पर थी और आसपास के वातावरण में स्वर्णिम प्रकाश फ़ैल रहा था, ऊपर आसमान में नज़रें उठाकर देखने पर एसा
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इन आंखों की मस्ती के...

जिनकी ये ख़ूबसूरत आँखें हैं, उन्हें आप सब बहुत बेहतरी से जानते हैं। अब जानना ये है कि क्या आप इन खूबसूरत आंखों की मलिका-ऐ-हुस्न का नाम बता पाते हैं या नही..?
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जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई...

कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत ना हुई! जिसको चाहा उसे अपना ना सके जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई!! जिससे जब तक मिले दिल ही से मिले दिल जो बदला तो फसाना बदला! रस्में दुनिया की निभाने के लिए हमसे रिश्तों की तिज़ारत [1] ना हुई!! दूर से था वो
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पहचानों तो जानें!...

हिंट : ये तस्वीर एक ख्यात फिल्म कलाकार की है!...
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बाप की कमाई...

मेरा एक दोस्त है, मेरे ही नाम का... सीधा-सादा... कोई तड़क भड़क नहीं... एकदम साधारण... अगर कोई व्यसन है तो वो है उसका सीधापन... वो उसे छोड़ ही नहीं पाता... कपडे भी एकदम साधारण ही पहनता है... अभी हाल ही में मेरे ही प्रयासों से उसने मोबाईल रखना शुरू किया
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गुलमुहर है ज़िन्दगी...

आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है ज़िन्दगी हम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िन्दगी भुखमरी की धूप में कुम्हला गई अस्मत की बेल मौत के लम्हात से भी तल्ख़तर है ज़िन्दगी डाल पर मज़हब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल ख़्वाब के साये में फिर भी बेख़बर है ज़िन्दगी
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यादें...

बात आज से लगभग पंद्रह साल पुरानी है। तब मैं महज़ आठ साल का था। उस वक़्त मैं अपने होम टाऊन (डिंडोरी) में अपने पिताजी के साथ रहता था। पिताजी के साथ था इसलिए सुबह जल्दी उठ जाता था या यूँ कही कि उठना पड़ना था। एक दिन तडके हमारा दूध वाला दूध देने आया। उस
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ज़िन्दगी अब एक अधूरी प्यास बनकर रह गई

ज़िन्दगी अब एक अधूरी प्यास बनकर रह गई हो सकी जो न वो मेरी आस बनकर रह गई कुछ दिनों तक ये थी मेरी बंदगी अब महज़ एक अनकही एहसास बनकर रह गई जुस्तजूं थी ये मेरी उम्मीद थी गुनगुनाता था जिसे वो गीत थी अब तमन्नाओं के फूल भी मुरझा गए नाउम्मीदी की झलक विश्वास ब
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तुम याद आए...

जब दिन निकला तुम याद आए जब सांझ ढली तुम याद आए जब चलूँ अकेले तन्हा मैं सुनसान सड़क के बीचों बीच धड़कन भी जोरों से भागे लगता मुझको कि यहीं कहीं अब भी तुम हो मेरे आसपास जब कोयल मेरे कानों में एक मधुर सी तान सुना जाए लगता मुझको ऐसा जैसे तुम याद आए तुम या
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इस जहाँ में मेरे सिवा पागल कई और भी हैं...

इस जहाँ में मेरे सिवा पागल कई और भी हैं खामोशियाँ हैं कहीं तो कहीं कहीं शोर भी हैं मनचला या आवारा बन जाऊँ ये सोचता हूँ लेकिन मेरे इस दिल में किसी और का ज़ोर भी है तन्हाइयों से टूटना शायद मैंने सीखा ही नहीं इसीलिए शायद मेरा ये दिल कठोर भी है हर रोज़ उस
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मुझे कुछ और कहना था...

वो सुनता तो मैं कुछ कहता, मुझे कुछ और कहना था। वो पल को जो रुक जाता, मुझे कुछ और कहना था। कहाँ उसने सुनी मेरी, सुनी भी अनसुनी कर दी। उसे मालूम था इतना, मुझे कुछ और कहना था। रवां था प्यार नस-नस में, बहुत क़ुर्बत थी आपस में। उसे कुछ और सुनना था, मुझे कु
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बोले तो! एकदम झक्कास...!

बहुत दिनों से सोच रहा था कि क्या लिखूं? कुछ सूझ ही नहीं रहा था. अभी कुछ दिन पहले ही मैंने रेडियो पर एफएम सुनना शुरू किया. जबसे सुन रहा हूँ तबसे दिन भर मज़े के साथ बस सुनता ही रहता हूँ. कभी रेड एफएम पर "बड़बोले चाचा" की "चाचा बतोले" सुनाई देता है तो क
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दिल की बात...

मैंने ज़माने के एक बीते दौर को देखा है, दिल के सुकून और गलियों के शोर को देखा है, मैं जानता हूँ की कैसे बदल जाते हैं इंसान अक्सर, मैंने कई बार अपने अंदर किसी और को देखा है!!!
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गिरीश जी का आभार...

आज से कुछ महीने पहले तक में अपने ब्लॉग पर एकदम निष्क्रिय सा हो गया था. ये कहा जा सकता है कि मैने ब्लॉगिंग लगभग बंद ही कर दी थी. एक दिन अचानक गिरीश जी (गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल') मेरे दफ़्तर आए. उन्होने मुझसे मुलाक़ात की और मेरे ब्लॉग पर निष्क्रियता का क
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चार दिन की ज़िन्दगी...

ये माना ज़िन्दगी है चार दिन की बहुत होते हैं यारों चार दिन भी खुदा को पा गया वाईज़, मगर है जरुरत आदमी को आदमी की मिला हूं मुस्कुरा कर उस से हर बार मगर आंखों में भी थी कुछ नमी सी मोहब्बत में कहें क्या हाल दिल का खुशी ही काम आती है ना गम ही भरी महफ़िल
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न अब हौसला है न अब रस्ते हैं

रुखसत होकर बैठे हैं ऐसे के खुशियाँ मिली हों ज़माने की जैसे, नुमाइश भी कोई नहीं करने वाला सूरत भी नहीं मेरी दीवाने के जैसे, मैं चुपचाप सहमा हूँ बैठा कहीं पे कोई भी नहीं है मुझे सुनने वाला, सभी पूछते हैं हुआ क्या है तुझको तेरी शक्ल क्यों है रुलाने के ज
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ज़हन में कौंधती एक सोच...

कहते हैं कि दुनिया में इंसानों को कभी भी मन माफ़िक चीज़ें नहीं मिलतीं क्योंकि इंसान एक सामाजिक प्राणी है. सामाजिक प्राणी होने का इंसानों के लिए यह दायरा बहुत सोच समझकर बनाया गया है. अगर इंसानों को उनकी मांग के हिसाब से चीज़ें मिलने लगें तो यह दायरा सिमट
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किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी...

इन आँखों से दिन-रात बरसात होगी अगर ज़िंदगी सर्फ़-ए-जज़्बात होगी मुसाफ़िर हो तुम भी, मुसाफ़िर हैं हम भी किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी सदाओं को अल्फाज़ मिलने न पायें न बादल घिरेंगे न बरसात होगी चराग़ों को आँखों में महफूज़ रखना बड़ी दूर तक रात ही रात ह
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देखा है ज़िन्दगी को...

देखा है ज़िन्दगी को कुछ इतना क़रीब से । चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से ।। कहने को दिल की बात जिन्हें ढूंढ़ते थे हम, महफ़िल में आ गए हैं वो अपने नसीब से । नीलाम हो रहा था किसी नाज़नीं का प्यार, क़ीमत नहीं चुकाई गई एक ग़रीब से । तेरी वफ़ा की लाश पर ला
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मौत तू एक कविता है...

मौत तू एक कविता है... मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझे डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे ज़र्द सा चेहरा लेकर जब चाँद उफ़क़ तक पहुंचे दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के क़रीब न अँधेरा न उजाला हो, न अभी रात न दिन ज़िस्म जब ख़त्म हो और रूह को
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कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया...

कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया । बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया ॥ हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को । क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया ? किस लिए जीते हैं हम, किसके लिए जीते हैं ? बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया ॥ कौन रोता है किसी और की ख़ा