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अनूप सेठी

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17 Jun 2010
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बारिश का स्‍वागत

सिर पर धर लो तन भीग न पाता हो जब धूप कड़ी तब छाया दे जाता छरहरी छड़ी बने डर पास न आता क्‍यों सखी साजन न सखी छातारेखांकन सुमनिका का और पंक्तियां अमीर खुसरो की याद में
 
अनूप सेठी
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कवि होना उतना ही कठिन है जितना एक अच्छा इन्सान होना

कवि मोहन साहिल की शिमला से करीब चालीस किलोमीटर दूर ठियोग कस्‍बे में चाय की दुकान है. पिछले दिनों कुल्‍लू में एक सेमिनार हुआ जिसमें एस आर हरनोट, अजेय, सुरेश सेन निशांत, मोहन साहिल, ईषिता गिरीश आदि की रचनाओं पर डिग्री कालेज के छात्र-छात्राओं ने परचे पढ़े.
 
अनूप सेठी
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किंतु परंतु लेकिन फिर भी आओ साथी सपना देखें

पृथ्‍वी थियेटर में कल शाम (21 मार्च 6 बजे का शो) एक नाटक देखा, आओ साथी सपना देखें. दो साल पहले पृथ्‍वी फैस्‍टीवल में जब यह पहली बार खेला गया था, तो देखना था पर छूट गया. कल मौका मिला. वह भी बच्‍चों के साथ. दस, चौदह और सत्रह साल के तीन बच्‍चे हमारे साथ थे.
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कुनबा

बाल कटाकर शीशा देखूं आंखों में आ पिता झांकते बाल बढ़ा लेता हूं जब दाढ़ी में नाना मुस्काते हैं कमीज हो या कुर्ता पहना पीठ से भैया जाते लगते हैं नाक पर गुस्सा आवे लौंग का चटख लश्कारा अम्मा का चटनी का चटखारा दादी का पोपले मुंह का हासा नानी का घिस घिस कर पति
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Feb 24 2010 01:56 PM
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हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम

हरबीर का खींचा हुआ भागसू नाथ मंदिर परिसर का यह चित्र साभार. चित्र में वल्‍लभ डोभाल कुछ पढ़ रहे हैं. 6 भागसूनाग बहुत दूर दिखता है जल प्रपात बहुत क्षीणकाय हो गया है जल प्रपात बहुत ज्यादा लोगों से घिरा है जल प्रपात फुहार इसकी आकाश में ही सूख-सूख जाती झरती
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हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम

5दलाईलामा का मैक्‍लोडगंज घाटी में पुरातत्ववेता ईसा से पहले के बौद्ध स्तूप के अवशेष पाता है ईसा के बहुत बाद भगाया गया बौद्धों का राजा एक चोटी पर शरण पाता है यहां बहुत सारे बौद्ध हैं शरणार्थी बाकी सारे अबौद्ध हैं निवासी और अनिवासी जो यहां आते हैं सिर्फ
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हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम

4 पहाड़ियां और झाड़ियां (कांगड़ा के मसरूर में प्रचीन शैल-खनित मंदिर का इलाका) हम ऐसी जगह पर उतर आए जहां चोटियों पर चढ़कर घाटियों में उतर कर जाना होता था बस्तियों में जहां सरकार को सड़क बनाना तो आसान था लोगों को पानी की सीर ढूंढना मुश्किल किसान बीज बोते
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हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम

3 जल जीवन की अनंत काया (मंडी के पुराने शहर की बावड़ी पर दिल कुर्बान) एक खींचकर लाई पहाड़ों की जड़ों से बहाई सदियों से अजस्र जलधार हद बाहर रहे आए कुएं बाबड़ियां नगर हुआ बेहद्द कुछ इस तरह गलियों मकानों छज्जे चौबारों के बीच ला बिठाई बावली पुरानी एक एक सीढ़ी
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अनूप सेठी

कुल्‍लू और मनाली के बीच नग्‍गर में निकोलिस रोरिक के खुले संग्रहालय में रखे लोकशिल्‍प 2रोहतांग से दुनिया में वापसीहवा कुछ बची है चोटियों परसांस भरो, हल्का कर देती हैपैदल चल कर आए थेपंख लगा कर टहलाती हैबची हुई फीकी गदगद हरियालीखुश्बू पत्तों कीअनछुई चांदी
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हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम

यह छः कविताओं की श्रृंखला है. मनाली से केलंग जाने के रास्‍ते में रोहतांग दर्रे से शुरु होकर धर्मशाला तक पहुंचाती हुई एक जमीनी उड़ान. बारी बारी से छहों कविताओं को पढ़ने का लुत्‍फ उठाइए. इस बार पहली कविता - 1 ओ मेरे रोहतांग! ओ मेर राल्हा! चलते चले आए नदी
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Akbar Padamsee

Couple Oil on canvas, 2005. Courtesy Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI MicrosoftInternetExplorer4 /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0;
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स्‍वागत 2010

पहली किरण पहली अंगड़ाईअभी आलस गया नहींपहला सजदाचलो अब उड़ें
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फुल मून

सन 2009 की अंतिम रात
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ईवेंट

चौब्‍ीस जून को जगदंबा प्रसाद दीक्षित 75 वर्ष के हो गए. कुछ संस्‍थाओं ने उनका अमृत महोत्‍सव मनाया. बीस जून को जलेस ने हबीब तनवीर की स्‍मृति में गोष्‍ठी की. तेरह जून को धीरेंद्र अस्‍थाना के उपन्‍यास का लोकापर्ण हुआ. इससे पहले, अप्रैल अंत या मई आरंभ में
Dec 29 2009 11:50 AM
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शहर को पीठ

पिछले पोस्‍ट में जहां से खड़े होकर निर्माल्‍य कलश दि‍ख रहा था, जहां कूड़ा कलश के बाहर था और कूड़ा बीनते बच्‍चे कलश में घुसे से हुए थे। मानो उनके महानगर में शामिल होने का रास्‍ता निर्माल्‍य कलशों से होकर ही जाता है। इसी जगह से नजर ऊपर उटाई जाए तो सड़क
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निर्माल्‍य कलश

यह चित्र मुंबई के वरली इलाके का है. समुद्र इस जगह से सटा हुआ है. थोड़ी थोड़ी दूर पर नेहरू सेंटर, स्‍पोर्ट्स स्‍टेडियम, रेस कोर्स है. गर्दन घुमाएंगे तो हाजी अली की दरगाह द‍िखेगी. ईंट की दीवार के उस तरफ सड़क है जो बहुत व्‍यस्‍त रहती है और ऐसी गाडि़यां
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अम्‍मा पुछदी

मोहित चौहान का एक मनमोहक पहाड़ी गीत अम्‍मा पुछदी कबाड़खाना पर रखा गया था. उसमें कुछ पाठ भेद हो रहा था. गीत मां बेटी के बीच संवाद है. मां पूछती है कि धीए तू इतनी बड़ी कैसे हो गई. बेटी कहती है कि पारली तरफ मोर बोलते हैं जिन्‍होंने नींद उड़ा दी है. मोर
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हिंदी का बुद्धिजीवी

लेखक संगठनों के पुनर्गठन का मसला इस संपादकीय के साथ जोड़ कर देखा जाएगा तो परिवर्तन की जरूरत और शिद्दत से महसूस होगी. माहौल को गरियाना , राजनीति को लतियाना , युवा पीढ़ी पर बिगड़ जाने के फतवे जारी करना और फिर व्यवस्था के मत्थे दोष मढ़ देना एक फैशन है।
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संगठन, लेखकों के कवच-कुंडल बनें

लेखन भले ही ऐकांतिक कार्य हो लेकिन उसकी एक महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका भी है। रचना का पाठक तक पहुंचना निश्चित रूप से एक सामाजिक गतिविधि है। आज हिंदी लेखक बहुत ज्यादा हाशिए पर आ गया है। उसकी प्रासंगिकता का भी संकट खड़ा हो रहा है , जबकि अगर आज की शब्दावल
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26 11

आज मुंबई पर आतंकी हमले की बरसी है. जिनकी शहादत हुई उनके दुख पता नहीं हम कितने बांट पाएंगे. दूसरे तक पहुंच पाना ही कितना मु‍श्‍िकल हो रहा है. हर कोई अकेले अकेले कंटीली तारों में उलझा हुआ सा है. अंदर बाहर रस्‍मअदायगी बहुत है. पिछले साल हादसे के बाद कवि
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हिमाचल मित्र का शरद अंक

हिमाचल मित्र का शरद छप गया है. इस अंक में हम आपके लिए लाए हैं लगभग पचास लेखकों और एक सौ सोलह पृष्‍ठों में महत्‍वपूर्ण और विवधितापूर्ण सामग्री. यदि आप इसे पढ़ना चाहते हैं तो कृपया अपना नाम पता हमें मेल कर दें, प्रतियां बच गईं तो आपको जरूर भेजेंगे. आर्
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भाषा को हमने जीवन में जगह नहीं दी

महाराष्ट्र की नवनिर्वाचित विधान सभा में शपथ लेने की भाषा के बारे में जो कुछ हुआ , वह भाषा विमर्श पर कुठाराघात ही है। महाराष्ट्र में हिंदी भाषा का विरोध पहले से एक राजनैतिक हथियार बना हुआ है। विधान सभा में हुई हाथापाई का मतलब है , यह हथियार और पैना हु
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अनुवाद पुरस्‍कार

अभी कुछ दिन पहले उदय प्रकाश ने अपने ब्‍लाग पर खबर दी थी कि उनकी पुस्‍तक अरेबा परेबा के मराठी अनुवाद को पुरस्‍कार मिला है. अनुवादक जय प्रकाश सावंत को यह पुरस्‍कार देने का मौका मुझे मिला. अपने अग्रज साहित्‍यकार की पुस्‍तक के मराठी अनुवाद के पुरस्‍कार स
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वर्तमान के सिरे

कुल् ‍ लू (हिमाचल प्रदेश) से ए ‍ क पत्रिका शुरू‍ हुई है , असिक् ‍ नी। सपांदकों को मैंने प्रतिक्रिया लिखी। इधर कथादेश में बद्रीनारायण का साहित् ‍ य का वर्तमान लेख छपा। बात को आगे बढ़ाने के लिए मैंने यह पत्र कथादेश को भेजा जो अक् ‍ तूबर अंक में छपा है।
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तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

संक्षिप्‍त परिचय 1921 में जन्मे पोलिश कवि , नाटककार और उपन्यासकार तदेउष रोज़ेविच बहुमुखी प्रतिभा के विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्यकारों में से एक हैं। रोज़ेविच कविता और नाटक के क्षेत्र में आवांगार्द के भी अग्रदूत माने जाते हैं। वे एक ऐसे नवपर्व
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तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

यहां पर विश्‍वप्रसिद्ध कवि तदेउष रोजेविच का परिचय दूं , उससे पहले उनकी यह कविता पढ़ ली जाए. इससे बात जरा पूरी सी हो जाएगी. कवि यहां बुरे कवि का मजाक उड़ा रहा है, कि मृत्‍यु किसी बुरे कवि को महान कवि नहीं बना देगी. इस श्रृंखला की पांचवी कविता में भी क
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तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

क्‍या किस्‍मत क्या किस्मत है, चुनूं रसभरियां जंगल में मैंने सोचा न है जंगल न रसभरियां क्या किस्मत है, जा सोऊं पेड़ की छांह तले मैंने सोचा पेड़ देते नहीं अब छाया क्या किस्मत है, मैं हूं संग तुम्हारे दिल धड़के मेरा मैंने सोचा आदमी के है नहीं दिल।
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तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

रूपांतरण मेरा छोटा बेटा आता है कमरे में और कहता है ' तुम गि द्ध हो तो मैं चूहा ' मैं अपनी किताब फेंकता हूं परे डैने और पंजे उग आते हैं मुझमें उनकी अपशगुनी छाया दीवारों पर दौड़ती है मैं हूं गि द्ध वह है चूहा ' तुम हो भेड़िया मैं हूं बकरा ' मैंने मेज क
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तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

जिंदगी की मझधार में संसार के खात्मे के बाद अपनी मौत के बाद मैंने पाया खुद को जिंदगी की मझधार में मैंने रचा खुद को घड़ी जिंदगानी लोग मवेशी और धरती के नजारे यह मेज है मैं कह रहा था यह एक मेज है मेज पर रखी है ब्रेड और छुरी छुरी से ब्रेड काटी जाती है लोग
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तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

एक मुलाकात मैं उसे पहचान नहीं पाया जब मैं यहां आया हो सकता है यह भी हुआ हो इन फूलों को सजाने में इतनी देर लगी इस बेडौल गुलदान में ' मुझे इस तरह न देखो ' उसने कहा मैंने छेड़ा कटे बालों को अपने खुरदुरे हाथ से ' उन्होंने काट दिए मेरे बाल ' उसने कहा ' दे
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तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

हमें माफ करो भूल जाओ हमें हमारी पीढ़ी को भूल जाओ इंसानों की तरह जीओ बिसर जाओ हमें हमने डाह की पेड़ों और पत्थरों से हम जले कुत्तों से बल्कि बन जाऊं मैं चूहा तब मैंने कहा उसे मैं तो बल्कि रहूं ही न और मैं जाऊं सो और जागूं जब यु द्ध हो चुका हो वो बोली आ
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तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

एक आवाज वे काट पीट डालते हैं वे यातना देते हैं एक दूसरे को चुप्पियों से लफ्जों से मानो कि एक और जीवन हो जीने को वे ऐसा करते हैं मानो कि वे भूल गए हों कि उनके शरीर मर जाएंगे एक दिन कि इंसान का अंतरमन जरा से में टूट जाता है एक दूसरे के लिए बेरहम वे कमज
Oct 14 2009 07:52 PM
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तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

बचा हुआ मैं चौबीस का हूं कसाईखाने में ले जाया गया मैं बच गया ये खोखले समानार्थी शब्द हैं इंसान और जानवर प्यार और नफरत दोस्त और दुश्मन अंधकार और प्रकाश एक सा तरीका है इंसानों और जानवरों को मारने का मैंने देखा है : कटे पिटे लोगों से लदे ट्रकों के ट्रक
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कविवर

मैं पहली पंक्ति लि‍खता हूं और डर जाता हूं राजा के सिपाहियों से पंक्ति को काट देता हूं मैं दूसरी पंक्ति लिखता हूं और डर जाता हूं गुरिल्‍ला बागियों से पंक्ति को काट देता हूं मैंने अपनी जान की खातिर अपनी हजारों पंक्तियों की इस तरह हत्‍या की है उन पंक्तियों
Sep 08 2009 05:32 PM
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कमीने से उठते सवाल

जो सवाल सच का सामना धारावाहिक के बारे में उठ रहे थे, वे कमीने फिल्म के संदर्भ में और तीखे होकर चुभ रहे हैं। फिल्म में हिंसा का खेल है। जमकर। फोटोफिनिश। बेहद रीयलिस्टिक। शायद इसी वजह से विशाल भारद्वाज के प्रशंसक इसकी तुलना हॉलीवुड की फिल्मों से कर रहे
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Aug 25 2009 12:33 PM
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क्‍यों करें हम सच का सामना

इधर सच का सामना हुआ और उधर नैतिक पुलिस के कान खड़े हो गए। टेलिविजन को हर वक्त कुछ न कुछ नया करने की जरूरत बनी रहती है। कथा कहानी से अगला कदम था रीयल्टी शो। यानी असल जिंदगी में होता ड्रामा आपको ड्रांइग रूम में दिखाया जाए। फिर रीयल्टी शो में भी एकरसता आने
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सब के लिए

कवि को देशनिकाला है कुदरत ने बनाए मिट्टी पानी पेड़ और पहाड़ इंसान ने कथनी करनी का फैलाया जंजाल कवि ने गाया कुदरत औ ' इंसान का गान दुख और राग रक्त में घुला मिट्टी में सना कवि ने छेड़ी जीवन की ऐसी खट मिट्ठी तान सुनने वालों का दिल दहला जी पिघला आंसू लुढ
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उदय प्रकाश के लिए

कवि की दुनिया दुनिया में कवि से ज्यादा उजड्ड कोई नहीं कवि से ज्यादा सभ्य कोई नहीं तमाम दुनिया पानी भरती है कवि के आगे इशारों पर नचाता फिरता है दिन रात दुनिया की ऐसी तैसी करता रहता है कवि दुनिया अपनी दुनिया में मगन हो दूसरी किसी दुनिया में निकल जाती क