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नन्हा मन

http://nanhaman.blogspot.com/
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16 Jun 2010
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सच्चा सपूत - baal-kavita

देश का प्रेम भरा हो जिसमें देश-भक्त कहलाता है , जो भावों से भरा हुआ हो देश भक्ति लिख पाता है ।अपनी मां अपनी मिट्टी से जिसका गहरा नाता हो बलिदानी वीरों सम्मुख जो नत-मस्तक हो जाता हो अपने वतन लिए अपने लिख-लिख कर भाव बहाता हो कुर्बानी सुन-सुन जिसके नयनों से
 
सीमा सचदेव
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कान्हा की बाल-लीलाएं-6 ( ब्रह्मण्ड दिखाना )

जब कान्हा बहुत छोटे थे तो बाल-स्वभाव वश वो भी मिट्टी खाते थे । मां उनको बहुत समझाती पर कान्हा मां के डर से छुप-छुपकर मिट्टी खाने लगे ।एक बार कान्हा जब सबसे चोरी छुप-छुपकर मिट्टी खा रहे थे तो उन्हें दाऊ भैया नें देख लिया और पकड कर मां के पास ले आए । मुंह
 
सीमा सचदेव
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बाल-श्रम को जड से मिटाएं - poem

नमस्कार बच्चो , क्या आपको पता है कल विश्व बाल-श्रम रोको दिवस है । दुनिया भर में लाखों ऐसे बच्चे हैं जिन्हें अपने बचपन को भुला कहीं न कहीं काम करना पडता है । ऐसे बच्चों को भी अपना बचपन पूरा जीने का हक है । चलो हम भी ऐसे नन्हे-मुन्ने प्यारे-प्यारे बचपन को
 
सीमा सचदेव
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कान्हा की बाल-लीलाएं-5 ( पूतना वध )

इधर कान्हा तो नन्द-बाबा और यशोदा मैया के घर गोकुल में रहने लगे लेकिन उधर कंस को पता चला कि देवकी का आठवां पुत्र श्री कष्ण है तो उसने श्री कष्ण को मारने के कई प्रयत्न किए । एक बार उसने पूतना राक्षसी को कान्हा को किसी भी तरह से मार देने के लिए गोकुल भेजा ।
 
सीमा सचदेव
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“श्यामपट (BLACK-BOARD” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

#fullpost{display:inline;} तीन टाँग के ब्लैकबोर्ड की, मूरत कितनी प्यारी है। कोकिल जैसे इस स्वरूप की, सूरत जग से न्यारी है। कालचक्र में बदल गया सब, पर तुम अब भी चमक रहे हो। समयक्षितिज पर ध्रुवतारा बन, नित्य नियम से दमक
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Jun 08 2010 07:57 AM
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दुनिया के लोग सुन लो,

इतिहास गा रहा है, दिन रात गुण हमारा । दुनिया के लोग सुन लो, यह देश है हमारा ॥ इस पर जनम लिया है, इसी का पिया है पानी । माता है यह हमारी और पिता भी है हमारा ॥ बीते समय से पूछो, इसका हमारा नाता । हिन्दुस्तान है कहलाता यह रामराज्य हमारा ॥ झेलम तू ही बता दे,
 
डा. अमर कुमार
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कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल'

कथा-गीत:मैं बूढा बरगद हूँ यारों...संजीव 'सलिल' **मैं बूढा बरगद हूँ यारों...है याद कभी मैं अंकुर था. दो पल्लव लिए लजाता था. ऊँचे वृक्षों को देख-देख-मैं खुद पर ही शर्माता था. धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ.शाखें फैलीं, पंछी आये.कुछ जल्दी छोड़ गए मुझको-कुछ बना
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Jun 07 2010 12:04 AM
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कान्हा की बाल-लीलाएं-4

मैया यशोदा जी की गोदि में आकर कान्हा वहीं पर पलने लगे । कोई भी यह न समझ पाया कि कान्हा तो स्वयं भगवान हैं । वे गोप-ग्वालों के संग मिलकर खेलते और खेल खेल में ही अपनी लीला भी दिखाते ।मां जसोदा का लाडला और बाबा नन्द की आंखों का तारा जो संपूर्ण स्र्ष्टि का
 
सीमा सचदेव
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मैं चाहूँ ख़ूब खेलना : रावेंद्रकुमार रवि का नया शिशुगीत

मैं चाहूँ ख़ूब खेलना मैं गाऊँ एक तराना, ख़ुशियों की बात बताना! मैं चाहूँ हर पल हँसना, फूलों की तरह महकना! फूलों से बातें करती, तितली के जैसे उड़ना! मेरा मन है नन्हा-सा, इसको मत कभी दुखाना! मैं गाऊँ ... ... . मैं चाहूँ ख़ूब खेलना, चिड़िया की तरह
 
रावेंद्रकुमार रवि
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किताबों की दुनिया में पाया खजाना

किताबों की दुनिया में पाया खजाना कमला भसीन किताबों कि दुनिया में पाया खज़ाना ये साथी मेरी औ मेरा आशियाना । किताबों के संग–संग जंगल मैं घूमी थे वाकई वो जंगल न दिखती थी भूमि । बोलती हवाओं के संग–संग मैं झूमी तितली ने आके नजर मेरी चूमी । कोयल और तोते सुनाते
 
सहज साहित्य
May 30 2010 04:01 PM
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नवगीत: सबकी साँसें...... --संजीव 'सलिल'

नवगीत:सबकी साँसें...संजीव 'सलिल' * क़ैद हुईं बुद्धू-बक्से में सबकी साँसें.....*नहीं धूप से अब है नाता.नहीं धूल का साथ सुहाता.नहीं हवा के संग झूमता-नहीं 'सलिल' में डूब तैरता.समय-पूर्व ही बच्चा भरताबड़ी उसाँसें.क़ैद हुईं बुद्धू-बक्से में सबकी साँसें.....*नहीं
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
टैग: kisoron ke liye
May 29 2010 11:06 AM
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काला-पानी की कहानी

प्यारे बच्चों, आजकल अंडमान-निकोबार दीप समूह में हूँ. वही अंडमान, जो काला पानी के लिए प्रसिद्द है. आप भी सोचते होंगे कि भला काला-पानी का क्या रहस्य है. तो आइये आज आपको उसी काला पानी की सैर कराते हैं-भारत का सबसे बड़ा केंद्रशासित प्रदेश अंडमान-निकोबार
 
Akanksha~आकांक्षा
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अब्राहम लिंकन का पत्र

अपने पुत्र के शिक्षक के नाम हे शिक्षक! मैं जानता हूँ और मानता हूँ कि न तो हर व्यक्ति सही होता है और न ही होता हैं सच्चा किंतु तुम्हें सिखाना होगा कि कौन बुरा है और कौन अच्छा। दुष्ट व्यक्तियों के साथ–साथ आदर्श प्रणेता भी होते हैं, स्वार्थी राजनीतिज्ञों के
 
सहज साहित्य
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किशोरों के लिए नवगीत: निर्माणों के गीत गुँजायें... संजीव वर्मा 'सलिल'

किशोरों के लिए नवगीत:निर्माणों के गीत गुँजायें...संजीव वर्मा 'सलिल'*निर्माणों के गीत गुँजायें...*मतभेदों के गड्ढें पाटें,सद्भावों की सड़क बनायें.बाधाओं के टीले खोदें,कोशिश-मिट्टी-सतह बिछायें.निर्माणों के गीत गुँजायें...*निष्ठां की गेंती-कुदाल
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
टैग: bitumen
May 18 2010 10:24 AM
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कान्हा की बाल-लीलाएं-3

http://www.shubhamsachdeva.blogspot.com/गोकुल में मुझे छोड के आओ नन्द बाबा की कन्या लाओ सूप में कान्हा को लिया डाल चला वासुदेव धीमी सी चाल बाहर वर्षा और तूफ़ान सिर पर बैठे स्वयं भगवान शान्त चित्त मन में विश्वास पहुंचा जब यमुना के पास तेज़ धार और पानी गहरा
 
सीमा सचदेव
May 12 2010 05:18 AM
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बैंगन पर दोहे: संजीव वर्मा 'सलिल'

 'बैंगन' हूँ बेगुन नहीं, मुझे बनाओ मीत. 'भटा' या कि 'भांटा' कहो, नहीं घटेगी प्रीत.. आलू मेरा यार है, मन भायी है सेम. साथ हमारा अनूठा, जैसे साहब-मेम.. काला नीला बैगनी, भाता रंग सफ़ेद. हिलमिल रहता सभी संग, यही खुशी का
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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सहेली रानी

सहेली रानी सुना रही हूँ एक कहानी , मैं बातों - बातों में बताती । परी- सी वह शहजादी था नाम उसका रानी सबको लगती प्यारी सहेली मेरी न्यारी । सुना रही हूँ एक कहानी ,मैं बातों - बातों में बताती ।करती सदा मनमानी रोटी उसे नहीं भाती पिजा चाव से खाती उसे हुई इससे
 
Manju Gupta
May 06 2010 07:28 AM
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कान्हा की बाल-लीलाएं-2

http://www.shubhamsachdeva.blogspot.com/जेल में देवकी और वासुदेव जपते रहते हरि सदैव एक- एक हुए सुत सातसौंप दिए सब कंस के हाथ वासुदेव नें वचन निभाया कंस नें उनको मार मुकाया अब थी आठवें सुत की बारी कर ली कंस नें खूब तैयारी किसी तरह बाहर न जाए जन्मते ही
 
सीमा सचदेव
May 05 2010 05:47 PM
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मुन्ना :मेरा दोस्त - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

जब से जंगल कटने शुरू हुए , हमारी तो मुसीबत ही हो गई । जंगल में शिकार नहीं मिलता तो बाघ और भेड़िए गाँव में घुस आते हैं। जो मिला ,उसे ही मारकर खा जाते हैं । चाहे बछड़ा मिले चाहे भेड़-बकरी , चाहे कुत्ता बिल्ली। हमारे गाँव में पिछले कई दिनों से कई वारदात हो
 
सीमा सचदेव
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बढ़िया बहुत पसीना : रावेंद्रकुमार रवि का एक बालगीत

बढ़िया बहुत पसीना गरमी के मौसम में लगता, बढ़िया बहुत पसीना! जब शरीर का ताप बढ़े यह, निकल-निकलकर आए! धीरे-धीरे भाप बने, फिर शीतलता पहुँचाए! यह ना आए, तो हो जाए मुश्किल सबका जीना! गरमी के ... ... . रोमछिद्र
 
रावेंद्रकुमार रवि
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मई दिवस : मानव-समता का त्योहार - महेंद्र भटनागर की कविता | हिन्दीकुंज

मई दिवस : मानव-समता का त्योहार - महेंद्र भटनागर की कविता | हिन्दीकुंजhttp://www.shubhamsachdeva.blogspot.com/
 
Dr. Mahendra Bhatnagar
May 01 2010 08:57 PM
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सच्ची मुच्ची उनकी मुट्ठियाँ बन्द ही थीं

 सुबह की बातों में हो गयी शाम  मैं कुछ ही पलों में लौटा, नन्हें मुन्ने बच्चे इँतज़ार जो कर रहे थे, सच्ची मुच्ची में उन सबकी मुट्ठियाँ बन्द ही थीं । आते ही मैंने लम्बी तान लगाई.. मछली जल की रानी है  जीवन उसका पानी है हाथ लगाओ, डर जायेगी बाहर
 
डा. अमर कुमार
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हम गाते-खेलते थे, खूब मज़ा लगता था

हुआ यह कि, आज क्लिनिक से 4.30 पर लौटा तो देखता हूँ कि हमारी बच्चा पार्टी वैभव के लॉन में क्रिकेट खेल रही है । मुझे देखते ही जया चिल्लायी.. अ..चपन जीऽऽ मैंने ज़वाब दिया, " हट गँदी, मैं तुम लोगों से नहीं बोलता ।" क्यॊं क्यॊं क्यॊं क्यॊं .. लीजिये
 
डा. अमर कुमार
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पंख उड़ाती कहाँ चली- आकांक्षा यादव

तितली रानी,तितली रानीपंख उड़ाती कहाँ चलीघूम रही हो गली-गलीअभी यहाँ थी,वहाँ चली.काश हमारे भी पंख होतेसंग तुम्हारे हम उड़ लेतेरंग-बिरंगे पंख तुम्हारेमन को भाते हैं ये सारे. जब भी तुमको चाहें छूना पास नहीं तुम आती होफूलों का रस लेकर झट से क्यूँ उड़ जाती
 
Akanksha~आकांक्षा
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कान्हा की बाल-लीलाएं

http://www.shubhamsachdeva.blogspot.com/नमस्कार बच्चो , गर्मी का मौसम और स्कूल में धेर सारी छुट्टियां , खूब मस्ती कर रहे हैं न । तो चलो इस मस्ती के मौसम में हम आपके लिए लाए हैं नटखट कान्हा की मस्त-मस्त बाल-लीलाएं , आप भी पढिए और खूब मस्ती कीजिए और हम भी
 
सीमा सचदेव
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घर की खोज

जंगल में सबसे अच्छा घर था चुनमुन खरगोश का।जितना प्यारा चुनमुन उतना ही प्यारा घर।एक दिन रामू हाथी घूमने निकला। उसने चुनमुन का घर देखा। उसे लगा उसका भी घर होना चाहिए चुनमुन के घर जैसा।रामू ने चुनमुन से कहा,“आज से मैं यहीं रहूँगा,तुम्हारे घर में।”“क्या मेरे
 
हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
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इक जंगल में लग गई आग

http://www.shubhamsachdeva.blogspot.com/इक जंगल में लग गई आग गए जानवर वहां से भाग पर अंदर इक रह गया शेर हो गई उसको बहुत ही देर कोई न कोई तरकीब निकालें किसी तरह से शेर बचा लें बंदर को ख्याल इक आया फ़ायर-ब्रिगेड को फ़ोन घुमाया साथ में उसनें पुलिस बुलाई
 
सीमा सचदेव
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बाल कविता: संजीव 'सलिल'

बाल कविता:  संजीव 'सलिल' अंशू-मिंशू दो भाई हिल-मिल रहते थे हरदम साथ. साथ खेलते साथ कूदते दोनों लिये हाथ में हाथ.. अंशू तो सीधा-सादा था, मिंशू था बातूनी.ख्वाब देखता तारों के, बातें थीं अफलातूनी..एक सुबह दोनों ने सोचा: 'आज करेंगे सैर'.जंगल
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Apr 22 2010 10:57 AM
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इक चूहे नें बिल्ली पाली

इक चूहे नें बिल्ली पाली आधी पीली आधी काली पीती दूध औ खाए मलाई अच्छी लगती उसे मिठाई मैगी नूडल्स पिज़्ज़ा बर्गर बातें करती वो फ़र्र-फ़र्रकरती वो दिन भर आराम नहीं आती वो किसी के काम चूहे नें कुछ दिन की सेवा दिया मलाई फ़ल औ मेवा खाकर बिल्ली हो गई मोटी हुई चूहे पर
 
सीमा सचदेव
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समीर लाल समीर ( उडन-तश्तरी) जी की बाल-कविता - चिड़िया!!!!!

नमस्कार बच्चो , उस दिन हमें अमर अंकल नें बताया कि उन्होंने नन्हामन पर उडन-तश्तरी उतारी है और हम सब उसमें बैठकर आसमान की सैर भी कर आए । अमर अंकल नें इतना तो बताया कि उन्हें इसमें बहुत मेहनत करनी पडी , अब यह समझ में आया कि उस उडन-तश्तरी को उतारने में इतनी
 
सीमा सचदेव
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कहानी एक बुढ़िया की(लोक कथा पर आधारित)

एक बुढ़िया थी बड़ी लालचीपाली थी उसने मुर्गीजो नित सोने के अंडे देतीबुढ़िया उनको बेचा करती।एक दिन उसके मन में आयामुर्गी देती रोज है अंडेदेखूं इसका पेट फ़ाड़करकितने हैं सोने के अंडे। खींच के मारा उसने डंडामुर्गी हो गयी टेंबुढ़िया रोई और चिल्लाईहाय क्या कर गयी
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मीठे बोल - आकांक्षा यादव

काली कोयल कू-कू बोलेमीठे-मीठे बोलमीठे-मीठे बोल देखोकितने हैं अनमोल।रंग पर इसके न जानादेख सदा इसे हर्षानामीठी वाणी, मीठा मनसबको यही सीख सिखाना।
 
सीमा सचदेव
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सुनो सुनो सुनो....उडन-तश्तरी नन्हामन पर , समीर अंकल प्लीज़ बताएं......

नमस्कार बच्चो , आज से आप देखेंगे नन्हामन पर अपना एक नया दोस्त--उडन तश्तरी । अमर अंकल नें बडी मुश्किल से मनाया है ....दो दिन की सख्त मेहनत के बाद आखिर उन्हें सफ़लता मिल ही गई , उडन-तश्तरी जी मान ही गए और पधारे नन्हामन पर और आते ही हमें आसमान की सैर भी करवा
 
सीमा सचदेव
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वैसाखी का मेला

नमस्कार बच्चो , आपको पता है आज कौन सा दिन है ?....आज है बैसाखी पर्व पंजाब का एक सुप्रसिद्ध त्योहार । आज हम आपको बताएंगे कि यह त्योहार मनाने के पीछे क्या मान्याताएं हैं और यह त्योहार कैसे मनाया जाता है ।वैसाखी का लगा है मेलाखुश सारे क्या गुरु क्या चेलाआओ
 
सीमा सचदेव
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बूझो तो जाने

बूझो तो जाने१.बीच चौराहे करे कमालरँग है इसका लाल-लालजब यह अपना रूप दिखाएतो चलते वाहन थम जाएँ२.बीच चौराहे खडी पुकारेदेखो मुझे सारे के सारेपीली परी है बीच बाज़ारहो जाओ चलने को तैयार३.हरे रँग की मै हू रानीमै तो हूँ तुम सबकी नानीजब भी मै कोई करूँ इशारेभाग पडे
 
सीमा सचदेव
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बूझो तो जाने

१.बीच चौराहे करे कमालरँग है इसका लाल-लालजब यह अपना रूप दिखाएतो चलते वाहन थम जाएँ२.बीच चौराहे खडी पुकारेदेखो मुझे सारे के सारेपीली परी है बीच बाज़ारहो जाओ चलने को तैयार३.हरे रँग की मै हू रानीमै तो हूँ तुम सबकी नानीजब भी मै कोई करूँ इशारेभाग पडे सारे के
 
सीमा सचदेव
Apr 13 2010 06:03 PM
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हितोपदेश 22 -हाथी और बाघ

जन्गल मे इक हाथी रहता और वो खुद को राजा कहता बडी है कितनी मेरी देह हूँ राजा ,न कोई सन्देह इक दिन बाघों का झुण्ड आया देख के हाथी मन ललचाया सोचेँ हाथी जो मर जाए तो सब मिलकर मजे से खाएँ हाथी तो बस एक मरेगा पर हम सबका पेट भरेगा सबने मिल लगाई युक्ति हो कैसे
 
सीमा सचदेव
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थैंक्यू अंकल अमर ( कविता )

नमस्कार ,नन्हामन की नई सजावट और परिकल्पना देखकर किसी की भी पहली आवाज निकलेगी....वा......ओ.ओ.ओ.ओ.ओ.ओ.ओ.ओ । और इसे सजाने संवारने का पूरा श्रेय है डा. अमर जी को , जिसके लिए हम उनके तहे दिल से आभारी हैं । आज की कविता नन्हे-मुन्नों की तरफ़ से अमर अंकल के
 
सीमा सचदेव
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"‘नन्हा-तारा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

 मैं अपनी मम्मी-पापा के,नयनों का हूँ नन्हा-तारा। मुझको लाकर देते हैं वो,रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।मुझे कार में बैठाकर,वो रोज घुमाने जाते हैं।पापा जी मेरी खातिर,कुछ नये खिलौने लाते हैं।।मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,वो फूले नही समाते हैं।जग के स्वप्न
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक