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03 Jun 2010
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एक पैरोडी : पल दो पल का ब्लॉगर

मैं पल दो पल का ब्लॉगर हूँ,पल दो पल मेरी कहानी है ||पल दो पल की फुर्सत है,महीनों में एक पोस्ट आनी है || मैं पल दो पल... मुझसे पहले कितने ब्लॉगर आये और आकर चले गए ..कुछ टिप्पणी खोजते रह गए कुछ पोस्ट डालकर चले गए ..वो भी एक एक पेज का किस्सा थे में भी एक
 
शोभित जैन
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हालात

जहाँ ठहरें कुछ देर , कोई डेरा नहीं दिखतादूर दूर तक हमें सरपे सेहरा नहीं दिखता..अभी हम सउदी में है, बस बुर्के ही दिखते हैंलाख कोशिश की मगर कोई चेहरा नहीं दिखता ...
 
शोभित जैन
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एक पाती : आनंद जी , समीर जी और कुवंर जी के नाम

निंदक निएरे राखिये, आँगन कुटी छबाए !! बिन पानी बिन साबुन, निर्मल करे सुभाए !!आदरणीय आनंद जी ,आपकी आलोचनात्मक टिपण्णी के लिए तहे दिल से आभारी हूँ , यूँ लगा की ब्लॉगजगत में मुझे भी कोई शुभचिंतक मिल गया है || आपकी टिपण्णी में चार बातें गौर करने लायक हैं
 
शोभित जैन
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उदास गज़ल

काफी दिन हो गए इधर आये हुए ... जाने क्यूँ ब्लॉग्गिंग से कुछ दिनों के लिए मोहभंग हो गया था ...लेकिन ये भी एक नशा है जिससे कोई ज्यादा दिन दूर नहीं रह ...तो लीजिए फिर से हाजिर हूँ एक उदास गज़ल के साथ ......शायद आप लोगो का साथ मिले तो उदासी कुछ कम हो जाये
 
शोभित जैन
टैग: nazm
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साल नया पर हाल पुराना

सब लोगों को नए साल की राम राम .... अब साल नया है तो कैलेंडर तो नया होगा ....पर तारीखें...... तारीखें तो वही पुरानी रहेंगी ... उन्हें कोई नहीं बदल सकता .... और ना ही बदली जा सकती हैं आदतें चाहे लाख "Resolutions" ले लो ..... तो लीजिये आदतन एक और नादान सी
 
शोभित जैन
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एक छोटी सी कविता.....

ब्लॉगजगत के कारण काफी दिनों से बहुत ही खूबसूरत रचनाएं, नज्में और गज़लें पढने को मिल रही हैं...पर जब भी मेरे जेहन में एक छोटी सी कविता कोंधती है, जो मुझे चार छोटी-छोटी प्यारी सी बच्चियों ने अपनी तोतली जुबान में सुनायी थी तो मैं यह सोचकर दंग रह जाता हूँ
 
शोभित जैन
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दो शेर चुराए हुए

कल शाम को पिछले कुछ महीने की जमा-पूंजी पर एक बार फिर से हमला हुआ, और एक बार फिर से मेरी तनख्वा अप्रत्याशित खर्चे की भेंट चढ़ गई और मेरे हाथ में रह गया मुझे मुहँ चिढाता हुआ "Zero Balance", तब मुझे मजबूर होकर हिन्दी फ़िल्म से ये शेर चुराना पड़ा (भावनाओं
 
शोभित जैन
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स्कूल की मस्ती

जब हम उदास या अकेले होते हैं तो यादों की टॉर्च लेकर बचपन के गलियारों में खो जाने को दिल करता है एक बार उनही गलियारों में भटकते- भटकते और जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल "वो कागज़ की कश्ती " गुनगुनाते हुए स्वतः ही हाथ चल पड़े और तुकबंदी हो गई अगर मेरी यह छोटी स
 
शोभित जैन
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गालियाँ

उस दिन जब 'चौथे स्तम्भ' ने बताया और दिखाया, अपने भाइयों का बहता खून , तो बहुत गालियाँ दी उन दहशतगर्दों को.... फिर अगले दिन 'सिर्फ़ उन्होंने' उजागर कीं वो खामियां जिनके कारण वो हमारे घर में घुस पाए, अब मेरी गालियाँ का रुख बदल गया था... फिर 'सबसे तेज़'
 
शोभित जैन
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मौतें और ख़बर

आज रह रह कर किसी कि कही हुई दो पंक्तियाँ जेहन में आ रही है :- इंसानियत का तकाज़ा किताबों में पढ़ा था आज किसी की मौत भी ख़बर बन गई है
 
शोभित जैन
Dec 29 2009 11:54 AM
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कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है...... (A Poem wrote in Bahrain)

पूरी बस्ती, हर मंजर , हर नज़ारा धुला सा है और साँस लेने को सारा , आसमा भी खुला सा है फिर जाने किस याद में साँस मेरी जमी सी है.... सब कुछ है यहाँ , पर शायद कुछ कमी सी है ................ जन्नत के सुख कदमों पर है , और अरमान सारे बाहों में कामयाबी का भी
 
शोभित जैन
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पहला स्पंदन.........

बहुत कशमकश के बाद आख़िर मैंने फ़ैसला किया की मेरा पहला नजराना उस नज़र की नजर होना चाहिए , जिसने मेरे जीवन को अहसास और अहसासों को लफ्ज़ दिए मैं तहे दिल से आभारी हूँ , उन दो निगाहों का जिसने मेरे जज्बातों की ज़मीन पर अहसासों के फूल खिलाये मेरी पहली कवित
 
शोभित जैन
Dec 29 2009 11:54 AM
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आगाज़

जय हिंद दोस्तों, आख़िर एक लंबे इंतज़ार और बहुत सी टालमटोल के बाद वो दिन आ ही गया जब मैं इस यात्रा की शुरूआत कर रहा हूं इस यात्रा का जिसका न तो आज कोई रास्ता निर्धारित है और ना ही कोई मंजिल का पता बस उद्देश है की आप सबके और करीब आ सकूँ आपका प्यार, आशीर
 
शोभित जैन
Dec 29 2009 11:54 AM
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जिद्दी दाग

क्रिसमस और नव - वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ २००९ की आखिरी पेशकश : जिम्मेदारी का पाउडर डाल, ज़माने की मशीन में घुमाया भी, चितवन की धुप, गेसुओं की हवा में सुखाया भी, 'अधूरेपन' के जिद्दी दाग से पीछा छुड़ा नहीं पाया, ज़िन्दगी, तेरा रंग कुछ उड़ा-उड़ा
 
शोभित जैन
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शाम के चार बजे , दिल के तार बजे

शाम के चार बजे , दिल के तार बजे ... हर ध्वनि लगे शहनाई मन मधुवन में मचले अमराई नवंकृत हो मचले तरुणाई रहस्यमयी मुस्कान अधरों पर सजे... शाम के चार बजे , दिल के तार बजे ... रुनझुन-रुनझुन करती धड़कन , सांसों में है अपनापन , दिल दिमाग में चलती अनबन, प्राण
 
शोभित जैन
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Love आजकल और हम आजकल

कुछ समय पहले एक फिल्म देखी थी "लव आजकल" तो सोचा उसी फिल्म को अपने शब्दों में अपने ब्लॉग पर रिलीज़ किया जाये ....वैसे भी आजकल रीमेक का समय चल रहा है तो क्यूँ ना हम भी अपने हाथ आजमां लें ...अपने अंदाज़ में .....बस उस फिल्म और इस फिल्म में इतना ही अंतर है
 
शोभित जैन
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नई ग़ज़ल : मुक्तिधाम

ईद मुबारक, बाकी लोगों का तो पता नहीं पर ये ईद मेरे शायद मुबारक होगी .. ९ दिन की छुट्टी मिली है तो इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती है ... Kingdom of Saudi Arabia में होने का ये फायदा तो है.. पुरे ९ दिन का आराम ... हाँ फायदे के साथ कुछ नुकसान भी हैं जैसे
 
शोभित जैन
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अफ़सोस सही जबाब

प्र . १ ) जोड़ी मिलाईये उ . १ ) कुकर और माँ भात और जज्बात भाप और घुटन सीटी और आँसू ...... अफ़सोस............................ सही जबाब
 
शोभित जैन
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बरसाती मेढक फिर टर्राने लगे

ये शीर्षक मेरी ग़ज़ल के लिए नहीं मेरे लिए है...क्यूंकि ब्लॉगजगत में मेरा आना जाना बरसाती मेढकों कि तरह ही है ...क्या करें इस खानाबदोश ज़िन्दगी में कभी कभार ही अपने लिए समय चुरा पाते हैं ॥ फिर भी लगता है ये बरसात अगले कुछ महीने चलती रहेगी ... उसके आगे
 
शोभित जैन
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शोले : गतांक से आगे (Deleted Sceen)

मौसी : जय बेटा , तो मैं ये शादी पक्की समझूँ ... जय : बुरा मत मानना मौसी पर जवान दोस्त का सवाल है ये तो पूछना ही पड़ता है की लड़की करती क्या है , खर्च कितना करती है .. मौसी : खर्च करने का जहां तक सवाल है बेटा , एक बार शादी हो जाये पति बच्चों की जिम्मेद
 
शोभित जैन
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हम सैनिक स्कूल के ....

२० जुलाई : ये तारीख आते ही BOSS लोगों को एक ही चीज याद आती है "आम" रसीले आम .... BOSS बोले तो "Boys Of Sainik School"... और इन BOSS लोगों में कई लोग ऐसे हैं जो दुनिया के किसी भी कोने में हों आज के दिन "Mango Party" ज़रूर Enjoy करते हैं क्यूंकि आज है
 
शोभित जैन
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नज़र की नजर

काफी दिन हो गए कुछ लिखे हुए, और इन दिनों में काफी कुछ हो भी गया .... जैसे दुबई ( UAE) से तबादला हो गया .. पिरामिडों और nile नदी के देश EGYPT में .. ... एक hindustaan का trip हो गया ..... कुछ दिन अपना शहर इंदौर भी घूम लिया और बहुत सी यादें भी समेट लाय
 
शोभित जैन
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दीदार (सिर्फ तुकबंदी)

आज यादों के झरोखे से फिर एक कविता (तुकबंदी) निकाल कर लाया हूँ...कालिज कि कैंटीन में चाय पीते पीते बस यूँ ही हाथ चले और कागज पर कुछ लिख दिया ... आज मन किया तो ब्लॉग पर भी छाप रहा हूँ... दीदार सावन के महीने में...जब दिल धड़का था सीने में, नशा बाकी न बच
 
शोभित जैन
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२३ मार्च १९३१ - एक और इन्कलाब...

२३ मार्च २००९ :- पूरा दिन बीत गया पर चंद ब्लोग्स को छोड़कर शहीद दिवस पर कोई हलचल नज़र नहीं आई ..... आती भी कैसे ये कोई वैलेंटाइन डे थोड़े ही था .... और अपने आस पास जिसको भी इस की अहमियत बताई किसी ने कान नहीं दिया .... तब सोचा की चलो शहीद दिवस भी youtu
 
शोभित जैन
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ट्रेन का सफ़र, निगाहें और नज़्म...

दो साल पुरानी बात है जब मैं रायपुर से एक दोस्त की बहन की शादी अटेंड करके लौट रहा था...बोरियत से बचाने के लिए एक किताब भी साथ में थी..पर किस्मत शायद मुझपर कुछ ज़्यादा ही मेहरबान थी.. क्योंकि कुछ ही स्टेशन के बाद पूरी ट्रेन पर विभिन्न राज्यों की बॅडमिं
 
शोभित जैन
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कैसे कह दूँ होली है ?

ना तो कोई नटखट चितवन, ना कोई हमजोली है , तुम उड़ालो रंग अबीरा , मैं कैसे कह दूँ होली है ? बदरंग है अबकी ये होली, भंग तलक नहीं घोली है, तुम उड़ालो रंग अबीरा , मैं कैसे कह दूँ होली है ? 'अनछुए रुखसार' , भाभी, जीजा, कहाँ गई वो टोली है, तुम उड़ालो रंग अबीरा
 
शोभित जैन
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काफिर नही होता...

कुछ समय पहले लिखी हुई ये नज़्म मुझे आज भी उतनी ही ताज़ा लगती है जितनी ये पहली बार पढने में लगी थी....आशा है आप लोगो को भी पसंद आएगी !!!! काफिर नही होता... जिस चेहरे को हया का रंग हासिल नहीं होता, वो नाम हुस्न वालो में शामिल नहीं होता !!१!! हुस्न की चाह
 
शोभित जैन
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मयस्सर नहीं था...(एक टिपण्णी के जबाब में)

पिछली पोस्ट पर आदरणीया संगीता पुरी जी की एक टिपण्णी मिली.... टिपण्णी क्या एक प्रश्न पुछा था बस उसी का जबाब देने की कोशिश की है इस पोस्ट में....... मयस्सर नहीं था... जिसके बिना ज़िंदगी में मेरा गुज़र नही था, बस वही तो इस जहाँ मे मयस्सर नहीं था !!१!! द
 
शोभित जैन
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पहली उड़ान : रूबरू ज़िन्दगी के

४ फरबरी २००८ : चेन्नई एअरपोर्ट लो भाई आख़िर एक किसान का बेटा आज एयरपोर्ट तक पहुँच ही गया...ट्रक्टर से एयरबस तक के सफर की कुछ खट्टी मीठी यादें अपने सूटकेस में भरकर, उसका एक हिस्सा हाथों में थामे हकीकत की ज़मीन पर घिसटते हुए मैं एअरपोर्ट की लॉबी मैं घु
 
शोभित जैन
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ज़िन्दगी-ऐ-ब्लॉग : नज़्म

ये है ब्लॉगजगत और हम सब ब्लॉगर.....पर ये है क्या और क्यूँ हम अपना समय यहाँ लगाते हैं....क्या ये एक ज़िम्मेदारी है ? या एक सुविधा ? या एक हथियार कुछ भी करने के लिए, कुछ भी कहने के लिए.......इसी उधेड़बुन में बहुत समय खपा दिया.....पर जब मंथन हुआ है तो गरल
 
शोभित जैन