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17 Jun 2010
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***जुनून***

पा लूँ तुझे ये थी आरजूहर सिम्त में ढूँढा कियेरहे भटकते हम दर-बदरजलाए आँखों के दिए .....तेरी जुस्तजू से "जु" लिया,तेरे नूर से मुझे "नू" मिला .तू नहीं मिला है यही गिला,इस बात का ये मिला सिला--मेरी आँखों में कुछ नमी-सी है,उस नमी से "न" को चुरा लियाएक "जु नू
 
ज्योत्स्ना पाण्डेय
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इरोम शर्मीला

बेक़सूर लहू धरती काआँचल रंग जाता है,और औरतों की अस्मतका खिलौना बन जाता है......किससे करे फरियाद..?ये प्रश्न सिर उठता है,जब रक्षक ही भक्षक कीतरह सामने आता है ......तब-जब दर्द हद से,गुज़र जाता है .....आँखों से बहता नहींसूख जाता है .....दिल में एक आक्रोश
 
Jyotsna Pandey
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***हर शय में था***

प्रस्तुत पंक्तियों की प्रेरणा किसी को हुक्का पीते देख कर मिली....हुक्के को पीते समय जो आवाज़ आती है ऐसा लगता है-----णाम..फिर जब ठहर जाते हैं तो आवाज़ कुछ ऐसी होती है ---णानक...और जब छोड़ते हैं तो........हू.मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारारही ढूँढती मैं हर सूँछिपा
 
Jyotsna Pandey
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माँ!

सूरज के जागने से पहले जागतीचिड़ियों के चहकने से पहले,आँगन बुहारतीमुझे नींद से जगाने के लिएदुलरातीअपने पद चिह्नों परचलने को प्रेरित करतीमर्यादा और संस्कार कि धरोहर समेटेआदर और स्नेह कि सीख देतीमैंने,उसे कर्तव्यों का निर्वहन करते भी देखा है--अपने अधिकारों
 
Jyotsna Pandey
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माँ का आँचल (II)

मैंने अपने नन्हे-नन्हेहाथ पैरों को फैलायाऔर अंगड़ाई लेकर मेराकिशोर वय बाहर आया-एक प्रश्न तब भीकुलबुलाता था..........और आज भीसर उठता है----आखिर.........मैंने माँ से पूंछ ही लिया ---"माँ! ये दुनिया कितनी बड़ी है ?"माँ ने मेरा माथा चूमा,सिर को गोद में रख
 
Jyotsna Pandey
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माँ का आँचल

मैंने अपने नन्हे-नन्हेहाथ पैरों को फैलायाऔर अंगड़ाई लेकर मेराकिशोर वय बाहर आया-एक प्रश्न तब भीकुलबुलाता था..........और आज भीसर उठता है----आखिर.........मैंने माँ से पूंछ ही लिया ---"माँ! ये दुनिया कितनी बड़ी है ?"माँ ने मेरा माथा चूमा,सिर को गोद में रख
 
Jyotsna Pandey
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महिला दिवस: एक विचार

मानव समाज रुपी गाड़ी स्त्री-पुरुष रुपी पहियों पर चलती है और अच्छी गति तभी होगी जब दोनों पहिये समान गति से चलें। स्त्री में वह गति है परन्तु पुरुष उसकी गति अवरुद्ध करने का प्रयास करता है, फिर भी स्त्री उन्नति के लिए प्रयासरत हैस्त्री तो निश्चित ही अपने
 
Jyotsna Pandey
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ज़रूरत

जाने कैसे,रातें उड़ जाती हैं,या परछाइयों की तरह,घटती बढती रहती हैं,दिन बंजर लगते हैंया सूखे की धरती जैसे,चटके-चटकेपर वक्त गुज़र ही जाता हैचांदनी बिखरी-बिखरीकुछ नमी छोड़ जाती हैखुश्क होते लबों परफिर एक एहसास भीग जाता हैये ख़याल और भी पुख्ता हो जाता हैकि
 
Jyotsna Pandey
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प्यार के मौसम

उसके आने की खबर- 'बसंत' को ले आती है हजारों ख्वाब रंगीन हो जाते हैं चेहरा खिल जाता है भावनाएं महक उठती हैं भँवरे तो नहीं, पर दिल गुनगुनाता है...... उसका आना - 'सर्दियों' की सरसराहट सा होता है जो मेरे पैरों को ठंडा कर देता है और दिल की धडकनों को बढ़ा द
 
Jyotsna Pandey
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इस दिसम्बर में.........

इस दिसम्बर से जीवन में अधकचरे रिश्तों की धुंध घने कोहरे सी छाई थी----- उमंगों का शिथिल होना, ठिठुरती ठण्ड के आभास जैसा विचारों को संकुचित करता, भावनाओं से उठती सिहरन से कोमल मन कंपकपाता था----- ऐसे में तुम काँधे पे झोली लटकाए, मेरे जीवन में रंग भरने
 
Jyotsna Pandey
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कुछ मीठा हो जाए

उसने कहा--'आज शाम कुछ मीठा हो जाए'"कुछ मीठा हो जाए" का मतलब ये बिलकुल नहीं कि-रंगीन रैपर में लिपटेचाकलेट उसे पसंद हैं---मिठाइयाँ----?नहीं-नहीं!!चालीस के दशक में,मिठाइयां उसकी सेहत के लिए ठीक नहीं........ख़ुदा उसे सेहत बख्शे, उम्रदराज़ करें----वो सड़कछाप
 
Jyotsna Pandey
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सिलसिले चाहतों के गाने लगे

आज फिर याद तुम मुझको आने लगे सिलसिले चाहतों के गाने लगे ........ मोहब्बतों के चिराग जलाये बहुत आँधियाँ बन अपने बुझाने लगे... तेरी राहों में दिल को बिछाए रहे राह-ए-दिल पर तुम लड़खडाने लगे.. मैं तो रूठी रही थी यही सोचकर कोई आये, आकर मनाने लगे.... चाँद
 
Jyotsna Pandey
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"दिवास्वप्न"

बहुत ज़रूरी है, जीवन में वह सांसों की तरह--- मैं उसे अंतर तक समा लेती हूँ, सांसों की ही तरह, पर उसे, मेरे अंतर में सिमटने से, घुटन होती है---- वह आकाश की ऊंचाइयों को छूना चाहता है, पक्षियों-सा उड़ना चाहता है, पर्वतों पर उछलना चाहता है, तितलियों के रं
 
Jyotsna Pandey
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कविता

भाव को संजोए वह शब्द से लिपट गयी कहीं छन्द सी खनकती प्रकृति के निकट गयी कभी शरमाई मन घूँघट से ताकती कभी सबकी पीड़ा के अंतर में झाँकती कभी सकुचाई सम-सामयिक को बांचती चिंतन के चितवन से देखती समाज को तोड़ छन्द - बँध काव्य रीति के अनुबंध धर्म-जाति , राज
 
Jyotsna Pandey
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शराबी आँखों ने......

गुलाबी रंग क्यों घोला शराबी आँखों नेबहुत रोये हो ये बोला शराबी आँखों नेउसके देखने में आग जाने थी कैसी ?चाँदनी को किया शोला शराबी आँखों नेतुम्हीं कहते थे कि मुझसे कोई रिश्ता नहींउतार फेंका ये चोला शराबी आँखों नेलबों पर तेरे तबस्सुम क्यों रोती रहीकब राज़
 
Jyotsna Pandey
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तुम्हारे लिए..........

पंक में थी, तूने कमल कर दिया जीवन को मेरे ग़ज़ल कर दिया खट्टे-मीठे जीवन की अनुभूति तुमसाथ ने तेरे मुझको सबल कर दिया तेरे प्यार से घर यूं सुवासित रहा झोपडी को जैसे महल कर दिया प्रश्न-बाणों से जीवन बिंधा था मेरा सभी को सहजता से हल कर दिया जन्म-दिन पर तेरे
 
Jyotsna Pandey
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चाँदनी हूँ

चाँद से मिलकर मैं निखर जाऊंगीचाँदनी हूँ छत पर उतर जाऊंगी ......सोचा न था लफ्जों में उतर सकती हूँएक दिन तेरी ग़ज़लों में भर जाऊंगी.....(साभार-- मासूम शायर)खाते हो झूठी क़समें भला क्योंक्या करोगे कभी जो गुज़र जाऊंगी......दूर तुमसे रहूँ भी तो कैसे सनम?अब
 
Jyotsna Pandey
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झटका!

बात उन दिनों की है जब मैं कक्षा 4 और मेरा भाई कक्षा 2 के विद्यार्थी थे. दादी-बाबा के अत्यधिक स्नेह के कारण हम लोगों को घर के भीतर ही खेलने की अनुमति थी. मैं और भाई बेडरूम में खेलते रहते थे. पड़ोस का एक छोटा बच्चा, जिसका नाम हर्ष था, वो भी हम लोगों के
 
Ish Priya
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मैं उसका ख़्याल हूँ

जानता हूँ कि, वो प्यार मुझसे करती है. मैं चाहता हूँ, उसको हमेशा घेरे रहूँ। पर वो है कि, अकेले में बात करती है। मुझसे बातें कर, उसको सुकून मिलता है। मुझ पर व्यंग्य भी कसती है, हँसती है वो, मुझे झूठा भी कहती है, और झगड़ती भी है। क्यों ना झगड़े ? मैं उस
 
Jyotsna Pandey
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कोई रिश्ता नहीं ...

दिल की सुर्ख गलियों में , वो आज भी धड़कता है --- बंद आँखों में, तस्वीर सा उभरता है --- उसकी बातों की वो, मीठी सी महक ...... .दर्द देने का हुनर भी खुदा ने बख्शा है ---- उसके हाथों की पकड़ , यादों को , जकड़ लेती हैं --- फिर भी -- ये सच है कि - उससे कोई
 
Jyotsna Pandey
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'निःशब्द'

कुछ विचलित करते प्रश्न, मुझे कर जाते हैं निःशब्द . मनन हो जाता तब मौन, मैं शांत और स्तब्ध. ढूंढती रहती सतत् वो शब्द, कि जो उत्तर बन जायें. पर स्पंदित निःशब्द, मेरे होठों तक आये. अनुत्तरित प्रश्नों का रख मान, मेरे होठों पर रख कुछ शब्द. स्वयं उत्तर करत
 
Jyotsna Pandey
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दिल के तहखाने में....

वो आता है- मेरी आँखों की खिड़कियों से झाँकता है, चला जाता है-- उन खिड़कियों पर छोड़ जाता है कुछ चीज़ें---- दो प्यार भरी आँखें, एक मुस्कान, एक चेक की शर्ट, उसके दो खुले बटन, वहाँ से झाँकती चौंडी छाती, एक भीनी खुशबू, बाँहों के घेरे, एक कसक में लिपटी मी
 
Jyotsna Pandey
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पाषाण हृदया

तुम---- सैकत-कणों पर कोई हस्ताक्षर नहीं जो वायु-वेग से उड़ जाओगे या कि---- समुद्र की उठती उर्मियाँ, तुम्हें मिटा देंगी---- हथौड़ी-सी चोट करते तुम्हारे शब्द---- और छेनी की तरह बेधते तुम्हारे व्यंग्य---- प्रस्तर कर शनैः - शनैः तुम्हारा नाम लिखते रहे बहुत
 
Jyotsna Pandey
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चाँद को चख के देख लेना ज़रा...

जब कभी भी रातों को तुम अकेले हो कोई बेचैनी जब करवटें बदलने लगे चाँद को चख के देख लेना ज़रा अगर मीठा लगे और चांदनी का दिल धडके समझ लेना कि मैं हूँ तुम्हारे पास कहीं यकीन न हो तो साँसे ज़रा आहिस्ता लो मेरी साँसों को खुद कि साँसों में घुला पाओगे
 
Jyotsna Pandey
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तुम हो मित्रता...

तुम हो एक सुंदर अनुभूति अनुभूति से उपजी, पावन स्मृति स्मृति में---- कुछ हँसी-खुशी, कुछ मीठे झगड़े और इन सबमें बहती निश्छलता निश्छलता प्रेम सी पवित्र और इसी पवित्रता को कहते हैं मित्रता तो सुनो मित्र! "मित्रता जब तुममें सिमट जाए, तो तुम मित्र से, ऊपर उ
 
Jyotsna Pandey
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नारी बनाम वृक्ष

नहीं जानती क्या अच्छा है, क्या बुरा और उसे जानने से पहले अपने को जानना चाहा तो पाया---- मैं हड्डियों की शाखों पर मांसल फलों से भरा एक वृक्ष हूँ जिसे माली ने बहुत ही प्यार से वात्सल्य के अवलम्ब से, ममता के पोषण से, फटकार की धूप से, प्रेरणा के जल से सि
 
Jyotsna Pandey
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मेरी भावना

मुझे नहीं मालूम की मैं इन्द्रधनुष पर झूलना चाहता हूँ या नहीं---- पर्वतों पर चढ़ कर आकाश पकड़ना चाहता हूँ या नहीं---- पर जब भी माँ का आँचल पकड़ता हूँ, इन्द्रधनुष के सारे रंग पाता हूँ जब मैं आकाश की और देखता हूँ पर्वत जैसे----अपने पिता के कन्धों पर खुद
 
Jyotsna Pandey
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दस्तक

जब भी कोई दस्तक होती है मैं दौड़ जाती हूँ कहीं तुम तो नहीं जाने क्यों? तुम्हारा ही इंतज़ार रहता है, इन आँखों को अब तो आदत सी हो गयी मुझको हर वक़्त एक दस्तक सुनायी देती है तुम्हारे आने की आहट खुशबू सी फैलाती मेरे मन मैं सिमट जाती है " तुम मेरे भीतर हो
 
Jyotsna Pandey
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नारी मन

तुम मेरे जैसी हो या मैं तुम्हारे भीतर कैसे जान लेती हो तुम मेरे सुख दुःख मैं मुस्कराती हूँ तो तुम्हें भी हँसता हुआ पाती हूँ मेरी पीड़ा की तड़प तुम्हारी आंखों से क्यों बह निकलती है? दर्पण कहता है---- मैं तुम जैसी बिल्कुल नही मैं थोडी छोटी, काली और मोट
 
Jyotsna Pandey
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विडम्बना

हे प्रभु! मन मर गया है, मस्तिष्क शिथिल हो गया है, ह्रदय जल रहा है, फ़िर क्या बचा इस शरीर में? अब विचारों का आना भी नही होता कि उनसे पूछ सकूँ". दुखी होकर नारी ने प्रभु से यह प्रश्न किया. "किसी पुरूष को सुख देने के लिए, इतना ही काफ़ी है -- यदि तुम्हारे
 
Jyotsna Pandey
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मन झाँक ज़रा मन के कोने...

मन झाँक ज़रा मन के कोने, कुछ पाकर, लगा बहुत खोने. मन के भीतर था प्रेम भरा एक बूँद ईर्ष्या क्यों डाली? ईर्ष्या का कालापन धोने को दिन देखो अभी लगें कितने? मन झाँक ज़रा..... निश्छल हो कर करता था कार्य एक स्वार्थ संग तू क्यों लाया? स्वारथ से तेरे देख ज़र
 
Jyotsna Pandey
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"भ्रम"

तुम कहते हो, वो सुनती है. जानती है तुम एक भ्रम में हो. जो सत्य जैसा दिखने का प्रयास करता है "भ्रम" सच है. ये सिद्ध करने के लिए प्रयास तुम्हारा संबल बन जाता है. परन्तु सत्य तो निर्मल है, शाश्वत है. उसे कितना भी बदलना चाहो, नही बदलेगा. फ़िर भी "भ्रम" का
 
Jyotsna Pandey
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आपके लिए...

तुम्हारी याद के तकिये पर सिर रख कर के सोती हूँ उठे गर दर्द दिल में तो तुम मुझको जगा देना तुम्हारी महकी राहों का उजाला मैं न बन पायी अंधेरे आयें राहों में तो तुम मुझको जला लेना कभी तुमको लगे कि बेवफाई हो गई तुमसे तो कहके बेवफा मुझको मोहब्बत को वफ़ा देन
 
Jyotsna Pandey
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आंसू...

मैं बहुत छोटा हूँ फ़िर भी मैं जानता हूँ तुम कब दुखी हो और कब खुश जब भी तुम दुखी होते हो, और सिसकियों से तुम्हारा गला रुंध जाता है, मैं तुम्हे संभालने के लिए दौड़ता हूँ तो गिर पड़ता हूँ जब तुम खुश होती हो, मैं भी खुश होता हूँ और उछलने लगता हूँ. कभी कभी
 
Jyotsna Pandey