धर्म यात्रा's Image

धर्म यात्रा

http://dharamjagat.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
20 May 2010
कुल प्रविष्टियां
41
पाठक भेजे
1843
पसंद
270
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
44.95
पसंद करें
5
नापसंद करें

नियति की ये अबूझ पहेली..............

जीवन पथ पर चलते चलते एक समय ऎसा भी आता है जब प्रत्येक व्यक्ति को ये सत्य स्वीकार करना ही पडता है कि नियति कि धूर्त आँखे हमारी हर दुर्बलता को बहुत अच्छे से पहचानती हैं। जब वे देखती हैं कि हमने अपने मन को इस अपूर्ण संसार के भी अनुकूल ढाल लिया है,तो हमें
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
4
नापसंद करें

अंतिम पाठ

बहुत पुराने जमाने की बात है। किसी देश के एक राजा ने अपने पुत्र को शिक्षा प्राप्ति के लिए ऋषि के आश्रम में भेजा। वहाँ रहकर राजकुमार ने आश्रम के नियम और कायदों का पालने करते हुए बहुत ही मेहनत से शिक्षा पूरी की। शिक्षा पूर्ण होने पर जब राजकुमार के घर जाने
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
6
नापसंद करें

दिल में ईंटे हैं भरी, लब पै खुदा होता है !!!

मानवी इतिहास साक्षी है कि आजतक संसार में कोई जाति बिना धर्म के नहीं रही और न ही कभी आगे रह सकती है। धर्म की भूख तो इन्सान के ह्रदय में है। जिस प्रकार भूखा इन्सान कभी उचित या अनुचित खाने से भी पेट भर लेता हैं, उसी प्रकार कभी कभी जातियाँ या कोई व्यक्ति
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
6
नापसंद करें

क्या वास्तव में धर्म एक अनावश्यक ढोंग है ?

धर्म एव हतो हन्ति धर्मोरक्षति रक्षत:। तस्माद धर्मो न: हन्तव्यो मा नो धर्मो हतो वधीत ।। प्राचीन कल के किसी ऋषि का यह श्लोक उस समय के मनुष्यों के भावों को भलीभान्ती व्यक्त करता है। इसका तात्पर्य यह है कि "मारा हुआ(नष्ट किया गया) धर्म ही मनुष्य के नाश का
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
1
नापसंद करें

इन्सान सिर्फ चिन्तन से ही वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति कर सकता है!!!!

मनुष्य एक चिन्तनशील प्राणी है। चिन्तन करना उसका स्वभाव भी है और धर्म भी। संसार के विषयों का चिन्तन मनुष्य का उन विषयों से परिचय बढाता है और उन्हे सांसारिक कार्यों में सफलता दिलाने में सहायक होता है, धार्मिक/आध्यात्मिक चिन्तन परमार्थ का साधन है। जो मनुष्य
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
1
नापसंद करें

जो जीवन में उतारा ही न गया तो वो कैसा धर्म ? (हम भी अंधों के शहर में चश्मों के खरीदार ढूंढने निकले हैं)

अक्सर हम यही देखते हैं कि जब हम किसी अन्ध मान्यता, अन्ध भावावेश अथवा बौद्धिक तर्कजाल को धर्म मानने की भूल करने लगते हैं तो उसमें कहीं अधिक बुरी तरह से उलझ जाते हैं। हम जिस जाति, जिस कुल, परिवार में जन्मे हैं, जिस परिवेश में पले हैं, उस वंश परम्परा की
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
Mar 06 2010 02:31 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

रंगोत्सव के इस पावन पर्व पर सबको अपने जीवन में अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति हो !!!!!

जीवन में कुछ कर गुजरने के लिए मनुष्य का धार्मिक होना बहुत जरूरी है। कारण, धर्म अपनी अमिट छाप हमारे व्यक्तित्व पर छोड़ता है। एवं सुसंस्कारों के रंग हमारे जीवन को ही एक उत्सव बना देते है।हमारा देश एक उत्सव प्रिय राष्ट्र है और इसलिए प्रत्येक ऋतु में कोई न
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
Mar 01 2010 01:47 PM
पसंद करें
1
नापसंद करें

धर्म न हिन्दू है, न जैन, न इस्लाम और न इसाई

धर्म का एकमात्र कार्य है--जीवनमूल्यों को ऊँचा उठाना। यदि धर्म के अभ्यास से जीवनमूल्य ऊँचे नहीं उठते,हमारा लोक व्यवहार नहीं सुधरता, हम अपने लिए तथा औरों के लिए मंगलमय जीवन नहीं जी सकते तो ऎसा धर्म फिर किस काम का?  धर्म इसलिए है कि हमारे पारिवारिक
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
Feb 12 2010 12:16 AM
पसंद करें
1
नापसंद करें

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया...........

आज वर्तमान के इस माहौल का अवलोकन करें तो पाएंगें कि चाहे घर-परिवार हो, चाहे समाज या फिर ये चिट्ठाजगत, हम लोग अपना कितना बहुमूल्य समय और ऊर्जा व्यर्थ के आपसी विवादों, मतभेदों तथा झगड़ों में यूँ ही व्यर्थ में गवाँते चले जा रहे हैं। आखिर ये झगड़े क्यों? एक
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
6
नापसंद करें

सनातन संस्कृ्ति और धर्म

हमारे यहाँ श्रृषियों नें धर्म की व्याप्कता तथा उदारता के विषय में कितनी सुन्दर बात कही है। धर्म यो बाधते धर्मो न स: धर्म: कुधर्मक: । अविरोधातु यो धर्म: स धर्म: सत्यविक्रम।। अर्थात हे सत्य विक्रम्!  जो धर्म दूसरे का बाधक हो,वह धर्म नहीं कुधर्म है
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
9
नापसंद करें

मेरा धर्म महान....तुम्हारा धर्म बकवास!!!

हम लोग अक्सर देखते है कि पैगम्बरों और मसीहाओं द्वारा प्रचारित धर्मों में कितनी अधिक भिन्नता दिखाई पडती है !  कईं बार तो विस्मय होने लगता है कि जीवन-मृ्त्यु,लोक परलोक, समाज या सृ्ष्टि सम्बंधित उनकी विचारधाराओं में इतना अधिक मतभेद क्यूं हैं । जो अ
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
8
नापसंद करें

आप सबको दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाऎँ!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

शुभम् करोति कल्याणं, आरोग्यम धन संपदा| शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योति नमोस्तुते ||
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
1
नापसंद करें

मानवजाति के इतिहास को धर्म का रूप क्यों????

यहीं ब्लागजगत में ही हमें कुछ दिन पहले किसी ब्लाग पर ये पढने को मिला कि सनातन धर्म में जो राजा मनु थे,वे ही वास्तव में हजरत नूह थे। नूह जिन्हे कि यहूदी, ईसाई और इस्लामिक धर्म में पैगंबर कहा गया हैं। कहते हैं कि कईं विद्वानों नें इस विषय पर कुछ शोध भी
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
0
नापसंद करें

शायद अतृ्प्ति ही मनुष्य का प्रारब्ध है!!!

विधाता ने जब इस सृ्ष्टि की रचना की तो एक अत्यंत सुन्दर देहधारी जीव का निर्माण किया और उसे नाम दिया मनुष्य। तब उससे बोले " जाओ भद्र्! ये पृ्थ्वी तुम्हारा क्रीडास्थल है,बुद्धि-ग्यान समर्थ दस इन्द्रियां तुम्हारे पास हैं;यथेष्ट सुखोपभोग करने के लिए जैसा उचित
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
टैग: सुख
Sep 06 2009 09:40 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

भिखारी कौन?

   वैशेषिक दर्शन के सूत्रधार ऋषि कणाद जंगल में एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहा करते थे। वह या तो कंद-मूल खाते या फिर अन्न के कण चुनकर लाते और उससे ही अपनी क्षुधा शांत करते। अन्नकणों से जीवन निर्वाह करने के कारण ही उनका नाम कणाद पडा। एक बार की बात
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
टैग: धन
Aug 18 2009 08:12 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

श्रद्धा और विश्वास

एक बार की बात है जब स्वामी विवेकानंद विदेश यात्रा पर गए हुए थे। भ्रमण के दौरान उनकी मुलाकात एक संत से हुई जो अपने इलाके में बहुत अधिक प्रसिद्ध थे। उन संत का एक बहुत बड़ा आश्रम भी था। उस आश्रम में उनके साथ बहुत से शिष्य भी रहा करते थे और संत के कमरे के
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
टैग: भगवान
Aug 07 2009 07:40 PM
पसंद करें
14
नापसंद करें

क्या हम सचमुच मनुष्य हैं ?

बहुत प्राचीन समय की बात है। अरब देश की एक मल्लिका थी जिसने मरते समय एक इच्छा प्रकट की कि मेरी मौत के बाद मेरी कब्र के पत्थर पर यह लिखवा दिया जाए कि -----" इस कब्र मे अपार धनराशि गढी हुई है, जो भी व्यक्ति अत्यंत निर्धन, दीन-दरिद्र और अशक्त हो, वह इसे
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
Jul 15 2009 08:21 PM
पसंद करें
10
नापसंद करें

मोक्षपट

आपको बचपन में खेले गए सांप-सीढी के खेल की तो अवश्य याद होगी। इस खेल का एक कमाल है, इसमें जितनी सीढियां हैं उतने ही सांप, फिर भी खेल में शामिल हर कोई ये मानता है की वो अपने हाथ के कमाल से इस बाज़ी को जीत सकता है। अब हम और आप में से जिसने भी ये खेल खेला
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
Jul 02 2009 08:52 PM
पसंद करें
10
नापसंद करें

नियति का खेल

एक बार देवलोक में किसी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा था | सभी देवी देवता अपने अपने वाहनों पर बैठकर इसमें सम्मिलित होने के लिए पधार रहे थे | महादेव भगवान शंकर जब नन्दी पर सवार होकर सभा स्थल में प्रवेश करने लगे तो अचानक द्वार के बाहर एक वृ्क्ष की शाख पर
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
Jun 27 2009 08:16 PM
पसंद करें
8
नापसंद करें

प्रयास.........

काशी नगरी में एक पंडित जी रहा करते थे, जिनकी धार्मिक पुस्तकों की एक छोटी सी दुकान थी। उसी की कमाई से परिवार का गुजर बसर चलता था। जिस जगह पंडित जी रहते थे, वहीं पास में एक ऐसा व्यक्ति भी रहता था जो कि पिछले कईं वर्षों से नियमित रूप से पंडित जी से पुस्
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
टैग: कौशिश
पसंद करें
14
नापसंद करें

धर्म की व्याख्या

श्रावस्ति के राजा चन्द्रचूड़ बहुत ही धार्मिक प्रवृ्ति के इन्सान थे। उनको विभिन्न धर्मो और उनके प्रवक्ताओ से बड़ा आन्तरिक लगाव था। राज-काज से बचा हुआ अधिकतर समय वे विभिन्न धर्म ग्रन्थों को पढ़ने और साधु-सन्त,महात्माओं के प्रवचन सुनने में ही व्यतीत करते थ
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
May 25 2009 08:07 PM
पसंद करें
14
नापसंद करें

जीने का तरीका

एक बूढ़ा आदमी जो कि सुबह से घास काटनें में लगा हुआ था। दिन ढलने तक वह इतनी घास काट सका था, जिसे सिर पर लाद कर घोड़े वाले की हाट में बेचने ले जा सके। दूर खडा एक सुशिक्षित नौजवान बहुत देर से उस बुढे आदमी के प्रयास को देख रहा था। जब बूढा आदमी घास की गठरी
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
May 09 2009 08:08 PM
पसंद करें
7
नापसंद करें

चार मित्र (महाराष्ट्र की एक् लोककथा)

बहुत समय पहले की बात है। एक छोटा सा नगर था जहां चार बहुत ही घनिष्ठ मित्र रहते थे। उनमें एक था राजकुमार, दूसरा मंत्री का पुत्र, तीसरा सहूकार का लड़का और चौथा एक किसान का बेटा। चारों साथ साथ खाते पीते और खेलते घूमते थे। एक दिन किसान ने अपने पुत्र से कह
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
11
नापसंद करें

देगा तो कपाल,क्या करेगा गोपाल? (छतीसगढ की एक लोककथा)

दो मित्र थे। एक ब्राह्राण और दूसरा भाट। भाट ने एक दिन अपने मित्र से कहा , “ चलो , राजा के दरबार में चलें। यदि गोपाल राजा खुश हो गया तो हमारे भाग्य खुल जायेंगे।” ब्राह्राण ने हंसकर उसकी बात टालते हुए कहा , “ देगा तो कपाल , क्या करेगा गोपाल ?  अर्
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
Mar 31 2009 07:01 PM
पसंद करें
3
नापसंद करें

अर्थ शुद्धि के लिए दान आवश्यक है

स्वर्गारोहण के समय यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से प्रश्न किया- मृत्यु के समय सब यहीं छूट जाता है, सगे-संबंधी, मित्र कोई साथ नहीं दे पाते, तब उसका साथी कौन होता है, कौन उसका साथ देता है? युधिष्ठिर ने कहा- मृत्यु प्राप्त करने वाले का मित्र दान है, वही उस
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
6
नापसंद करें

वैदिक चिन्तन------बीती बिसार और आगे की सोच

एक बार कन्फ्यूशियस से किसी ने पूछा कि यह कैसे मालूम हो कि भीतर से कौन महान है और कौन कायर। कन्फ्यूशियस ने हंस कर कहा, बहुत आसान है। महान व्यक्ति जो चीज ढूंढते हैं, वह अपने अंदर ही उन्हें प्राप्त हो जाती है, जबकि कमजोर दूसरों का मुंह ताका करते हैं। जि
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
13
नापसंद करें

खुश रहने के आ़ठ बहुमूल्य तरीके

खुश रहने के आ़ठ बहुमूल्य तरीके  भला खुश रहना कौन नहीं चाहता होगा! जो नहीं चाहता समझिए कि वह सामान्य नहीं है। लेकिन खुशी की परिभाषा सबके लिए एकदम अलग है। खुशी वस्तुत: ऐसी चीज है जो आपकी सोच पर निर्भर करती है। हो सकता है कि जितनी खुशी आप नौ हजार र
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
Mar 16 2009 09:43 PM
पसंद करें
6
नापसंद करें

सुसंस्कारों के रंग,भरे जीवन में उमंग........

जीवन में कुछ कर गुजरने के लिए मनुष्य का धार्मिक होना बहुत जरूरी है। कारण, धर्म अपनी अमिट छाप हमारे व्यक्तित्व पर छोड़ता है।एवं सुसंस्कारों के रंग हमारे जीवन को ही एक उत्सव बना देते है। आपको अपने जीवन में अभ्युदय और निःश्रेयस, दोनों की ही प्राप्ति हो,
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
7
नापसंद करें

ये जीवन चक्र है-------एक नीतिपरक कथा

आज आपको एक उपदेशपरक नीति कथा सुनाने जा रहा हूं, हो सकता है कि आप में से बहुत से लोगों ने इस कथा को अपने जीवन में कहीं न कहीं पढ अथवा किसी से सुन रखा हो। जब महाभारत के भीषण युद्ध के पश्चात, अपने सौ पुत्रों को खो देने के शोक से संतृप्त धृतराष्ट्र का दु
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
4
नापसंद करें

भारतीय संस्कृ्ति में वृ्क्षों,वनस्पतियों का महत्व

भारतवर्ष में आदिकाल से ही पीपल, आंवला, तुलसी, केला, बरगद इत्यादि विभिन्न वृ्क्षों तथा वनस्पतियों की पूजा का प्रचलन रहा है। भारतीय संस्कृति में वनस्पतियों में देवताओं का वास माना गया है, इसलिए पर्व-त्योहारों में उन्हें विशेष स्थान दिया गया है। यह उल्ल
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
3
नापसंद करें

जैसा भाव-वैसा ही प्रभाव

बचपन में एक कथा सुनी थी कि एक बार एक व्यक्ति किसी बियाबान् जंगल मे से गुजर रहा था।चलते चलते जब वो थक गया तो विश्राम हेतु एक वृ्क्ष के नीचे बैठ गया। वो वृ्क्ष वास्तव में एक कल्पवृक्ष था। कल्पवृक्ष की विशेषता यह होती है कि उसकी छांव में बैठ कर मन में ज
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
7
नापसंद करें

श्री: भतृ्र्हरि नीतिशतक

अज्ञ: सुखमाराध्य: सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ:। ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि तं नरं न रञ्जयति। अर्थात जो अज्ञानी है उसे सरलता से प्रसन्न किया जा सकता है। जो विशेष बुद्धिमान् है उसे और भी आसानी से अनुकूल बनाया जा सकता है।किन्तु जो मनुष्य अल्प ज्ञान से गर
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
8
नापसंद करें

मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है और फल पाने में परतंत्र

किसी काम के करने में जीव को पूर्ण अधिकार है कि उसे करे,या न करे या फिर गलत करे।मैं लिखूं या न लिखूं या फिर अपशब्द लिखूं. इन तीनों बातों का मुझे पूर्ण अधिकार है।परन्तु जब लिख चुका तो समझो काम हो चुका। परिस्थिति मेरे हाथ से निकल गई, उसका परिणाम मुझे भो
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
3
नापसंद करें

सत्य ज्ञान

व्यास मुनि ने अपने बेटे शुक को अच्छी शिक्षा-दीक्षा और सत्य ज्ञान देकर अंतिम दीक्षा के लिए राजा जनक के पास भेजा। राजा जनक को पहले ही मालूम हो गया था कि व्यास पुत्र शुक उनके पास अंतिम ज्ञान लेने आ रहे हैं। शुक आकर राजभवन के द्वार पर खड़े हो गए। राजभवन
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
2
नापसंद करें

बिना व्य‌वहारिकता के समस्त ज्ञान व्यर्थ है

शास्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा, यस्तु क्रियावान पुरुषः स विद्वान्। सुचिन्तितं चौषधमातुराणां , न नाममात्रेण करोत्यरोगम्।।" (कुछ लोग शास्त्र पढ कर भी सदैव मूर्ख ही रहते हैं,परन्तु जो व्यवहार में चतुर है वही व्यक्ति पंडित अर्थात विद्वान है.जिस प्रकार ए
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
3
नापसंद करें

मनुष्यता ही सर्वोतम धर्म

अक्सर जब हम धर्म शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, तो यह देखने की कोशिश करते हैं कि उनमें ईश्वर, आत्मा, जीवन, मृत्यु और लोक-परलोक के बारे में क्या लिखा है. उनमें हम यह भी देखते हैं कि हमारे लिए धर्म सम्मत आचरण क्या है. अभी पिछले दिनों एक पुस्तक पढने का अ
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
2
नापसंद करें

केवल धन की नहीं, धर्म की भी वृद्धि करें

महर्षि वेद व्यास जी ने कहा है कि जो व्यक्ति विशिष्ट सतपात्रों को दान देता है और जो कुछ अपनी दिनचर्या हेतु भोजन आच्छादन में प्रतिदिन व्यय करता है, उसी को मैं उस व्यक्ति का वास्तविक धन या सम्पत्ति मानता हूँ। अन्यथा शेष सम्पत्ति तो किसी और की है, जिसकी
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
4
नापसंद करें

सर्व सुख दाता : संतोष धन

संतोष अर्थात सभी सुखों का दाता। संतोष का गुण ही जीवन में सुख-शांति लाने की उत्तम औषधि है, और कहा भी जाता है जिस मनुष्य के पास संतोषरूपी गुण है, उसे पानी की बूँद भी समुद्र के समान प्रतीत होती है और जिसके पास यह गुण नहीं उसे समुद्र भी बूँद के समान प्रत
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
3
नापसंद करें

धैर्य:मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र

जीवन में प्रगति का एकमात्र मुख्य साधन है, 'अटल धैर्य'। जिसके पास धैर्य है, उसके पास संसार का हर सुख, शांति, आनंद, यश, कीर्ति और ऐश्वर्य है। और वे ही व्यक्ति जीवन में सफल भी हुए हैं। धैर्य शब्द का अर्थ है, किसी भी कठिन समय में विचलित न होने वाली शक्ति
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
पसंद करें
3
नापसंद करें

लोहडी पर्व की आप सबको हार्दिक शुभकामनाऎं

लोहडी वे लोहडी जीवें तेरी जोडी खोल माई कुन्डा जीवें तेरा मुन्डा तोरी दे विच दाना.......दाना असां लोहड़ी लै के जाना....जाना" कुछ इस तरह के लोक गीतों को जन्म देने वाला लोहड़ी का पावन त्योहार एक बार फिर हम सब भारतवासियों को अपनी सुंगध से महकाने आ गया है।
 
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"