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17 Jun 2010
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कर्ज़दार---2

कर्ज़दारपिछली कडी मे आपने पढा कि प्रभात की माँ ने अपने पति की मौत के बाद कितने कष्ट उठा कर बच्चों को पढाया प्रभात की शादी मीरा से होने के बाद प्रभात ने सोचा कि अब माँ के कन्धे से जिम्मेदारियों का बोझ उतारना चाहिये। इस लिये उसने अपनी पत्नि को घर चलाने के
 
निर्मला कपिला
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karzdar

जब तक नया कुछ लिख नही पाती तब तक अपनी पुस्तक मे से कहानियां  ही पोस्ट कर रही हूँ। ये कहानी मेरी पुस्तक  वीर्बहुटी मे से है और दैनिक जागरण समाचार पत्र मे भी छप चुकी है।कर्ज़दार--कहानी"माँ मैने तुम्हारे साम्राज्य पर किसी का भी अधिकार नही होने दिया
 
निर्मला कपिला
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apanee baat

अपनी बात पंजाबी मे एक कहावत है "जो सुख छजू दे चौबारे ओह[वो] न बल्ख ना बुखारे". कहीं भी घूम आओ मगर जो सुख अपने घर मे आ कर मिलता है वो कहीं नही।ापने वतन वापिस लौट आयी हूँ। एक बात बार बार मन मे आ रही है कि विदेश मे सब कुछ यहाँ से बडिया था मेरे बच्चे थे
 
निर्मला कपिला
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कैलिफोर्निया ब्लागरज़ मीट

कैलिफोर्निया ब्लागर मीट विदेश मे किसी हमवतन दोस्त मित्र् के मिलने पर जो खुशी  मिलती है वो शब्दों मे नहीं कही जा सकती। अमेरिका आने के बाद पता चला कि डा़ श्रीमती अजित गुप्ता जी भी अमेरिका आ रही हैं और वो भी जिस सिटी मे मै आयी हूँ वहाँ, तो खुशी का
 
निर्मला कपिला
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अपनी बात

अपनी बात  आज कुछ समय मिला है। सोचा ब्लाग पर हाजरी लगा लूँ। भारत की बहुत याद आ रही है सच कहूँ अपने देश जैसा सुख कहीं नही है न ही अपने देश जैसी आजादी। विदेश मे तो हर काम को अपनी सीमा मे करना होता है ।सुबह से शाम तक जितने भी व्यक्तिगत काम से ले कर आफिस
 
निर्मला कपिला
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खुशखबरी

मेरे घर आयी एक नन्ही परीआप सब को ये जान कर खुशी होगी कि मेरी बेटी के बेटी हुयी है। 4 अप्रेल को सिजेरियन करवाना पडा जब कि अभी ड्यू डेट 30 अप्रेल थी । खैर दोनो माँ बेटी स्कुशल हैं।मगर अभी अस्पताल मे हैं ।मेरी व्यस्तता और बढ गयी है। बस आप सब को खुशखबरी
 
निर्मला कपिला
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इधर उधर की

इधर उधर कीसोचा था अमेरिका जा कर रोज़ पोस्ट लिखा करूँगी, रोज़नामचे की तरह मगर कुछ दिन तो जेट लैग की वजह से नही लिख पाई फिर एक दो दिन घूमने चले गये और अब फ्लू ने घेर लिया। यहाँ फ्लू इतना भयानक फैला हुया है कि एक बार पकड ले तो छोडने का नाम नही लेता ।भारत की
 
निर्मला कपिला
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सुखदा ----कहानी---अन्तिम किश्त्

सुखदा-----कहानी भाग --4 बेशक माँ के कपडों से बू आ रही थी मगर आज सुखदा को वह भी भली लग रही थी। आखिर खून अपनी महक दे रहा था। उसे अभी भी याद है जिस दिन वो शारदा देवी के साथ जा रही थी माँ कितना रोई थी,तडपी थी उसे किस तरह जोर से सीने से लगाया था मगर पिता ने
 
निर्मला कपिला
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सुखदा ----कहानी---भाग --3

सुखदा    कहानी-- भाग ------ 3पिछले भाग मे आपने पढा कि कैसे सुखदाके पिता के बीमार होने पर उसे एक ओझा के पास ले गये उस ओझा ने सुखदा को घर के लिये मनहूस बताया और एक आश्रम का पता दिया कि इसे वहाँ छोड दें। मगर उसकी माँ नही मानी और उसे नानी के घर भेज
 
निर्मला कपिला
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सुखदा --- कहानी -भाग -2

 पिछले भाग मे आपने पढा कि सुखद के पिता को इलाज के लिये एक ओझा के पास ले जाया गया। कहा जाता था कि वि ओझा बिना चीर फाड किये कैंसर के मरीज का आप्रेशन करता था। वहाँ उस ओझा ने कहा कि सुखदा उनके घर का काल बन कर आयी है इस लिये इसे घर से दूर किसी आश्रम मे
 
निर्मला कपिला
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कहानी---- सुखदा

इस कहानी मे कुछ घटनायें सत्य हैं मगर पात्र आदि बदल दिये गये है। ओझा वाली घटना एक पढे लिखे और मेडिकल प्रोफेशन मे काम करने वाले आदमी के साथ घट चुकी है। मगर उसने जिस मरीज का ईलाज करवाया था वो 3-4 माह बाद ही मर गया था। उस बाबा का जम्मू मे आज भी लाखों का
 
निर्मला कपिला
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व्यंग-- बुढापे की चिन्ता समाप्त

व्यंग -- बुढापे की चिन्ता समाप्त आज कल मुझे अपने भविष्य की चिन्ता फिर से सताने लगी है। पहले 20 के बाद माँ बाप ने कहा अब जाओ ससुराल। हम आ गये। फिर 58 साल के हुये तो सरकार ने कहा अब जाओ अपने घर । हम फिर आ गये। फिर दामाद जी ने सोचा सासू मां अकेले मे हमे
 
निर्मला कपिला
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कविता--व्यंग महिला दिवस

दो दिन दिल्ली गयी थी इस लिये किसी ब्लाग पर नही आ सकी और न ही कुछ नया लिख सकी। फिर भी महिला दिवस हो तो सोचा कुछ तो लिखना ही चाहिये। इस लिये एक पुरानी कविता ठेळ रही हूँ। कल दिल्ली मे रंजू भाटिया जी और बेटे प्रकाश सिंह अर्श से मिली बहुत अच्छा लगा। मिलना तो
 
निर्मला कपिला
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गज़ल कविता नज़्म

इसे गज़ल कविता नज्म कुछ भी कह लीजिये बस मेरा मन्तव आज के ज्वलन्त मुद्दे पर कुछ कहने का है। आज कल टी वी पर आप देख रहे हैं इन साधू सन्तों की करतूतें अभी पता नही और कितने भेडिये साधुयों की खाल मे छुपे बैठे हैं हम केवल अपनी आस्था के चलते आस्तीन मे साँ पाल रहे
 
निर्मला कपिला
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Mar 05 2010 07:49 AM
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गज़ल

इस गज़ल को भी प्राण भाई साहिब ने संवारा है।उनके आशीर्वाद के लिये धन्यवादी हूँ। इसे होली के दिन पोस्ट नही कर सकी। सोचा होली का महौल कुछ दिन और चलता रहे तो अच्छा है।गज़ल आज होली के बहाने से बुलाया था मुझेगाल छू मेरा गुलाबी सा बनाया था मुझेभाभियाँ क्या
 
निर्मला कपिला
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Mar 04 2010 07:00 AM
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Veer Bahuti

सच्ची साधना{आखिरी किश्त } pपिछली किश्तों मे आपने पढा कि शिव दास कैसे साधू बना और उसे फिर भी सँतुष्टी नही मिली तो वापिस अपने गाँव लौटा। जहाँ उसे राम किशन { अपने बचपन के दोस्त} का जीवन और लोक सेवा देख कर उसे कैसे बोध हुया कि सच्ची साधना वो नही जो वो कर रहा
 
निर्मला कपिला
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Mar 02 2010 06:46 AM
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हज़ल

हज़ल होली की आप सब को हार्दिक शुभकामनायेंआज कहानी की आखिरी किश्त  बीच मे रोक कर  अपने छोटे भाई पंकज सुबीर के आदेश पर ये हज़ल पेश कर रही हूँ आप जानते हैं कि रिटायरी कालोनी मे तो होली मनाई नही जाती, तो हमने सोचा कि  पंकज सुबीर के मुशायरे मे
 
निर्मला कपिला
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Feb 28 2010 07:21 AM
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सच्ची साधना [कहानी]

सच्ची साधनाकल आपने पढा कि शिवदास अपनी जिम्मेदारियों से भाग कर साधु बन गया और 20-25 साल बाद वो साधु के वेश मे अपने गाँव लौटता है। उसका मन साधु के रूप मे भी अब नही लगता था।  eएक दिन उसका मन बहुत उदास हुया तो उसे अपने घर की याद आयी।वो अपने गाँव लौटता
 
निर्मला कपिला
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Feb 26 2010 07:15 AM
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Veer Bahuti

सच्ची साधना--- कहानीकल आपने पढा कि शिवदास अपनी जिम्मेदारियों से भाग कर साधु बन गया और 20-25 साल बाद वो साधु के वेश मे अपने गाँव लौटता है। उसका मन साधु के रूप मे भी अब नही लगता था।  आगे पढिये\---------शिवदास मेहनती नही था । बी.ए. करने के बाद उसने कई
 
निर्मला कपिला
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Feb 24 2010 06:42 AM
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सच्ची साधना [कहानी]

सच्ची साधना {कहानी}बस से उतर कर शिवदास को समझ नहीं आ रहा था कि उसके गांव को कौन सा रास्ता  मुड़ता है । पच्चीस वर्ष बाद वह अपने गाँव आ रहा था । जीवन के इतने वर्ष उसने जीवन को जानने के लिए लगा दिए, प्रभु को पाने के लिए लगा दिए । क्या जान पाया वह ? वह
 
निर्मला कपिला
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Feb 22 2010 06:40 AM
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कविता पँखनुचा

कविता--- पंखनुचाउसके अहं में छिपा विषउसकी मैं में,तू की अवहेलना,शोषण की बुभुक्शा,कामुक्ता कि लिप्सा,अभिमान की पिपासा,कर देती है आहततर्पिणी का अनुराग,सहनशीलता,सहिश्णुता,त्यागपंखनुचा की आहों सेसिसकता हैघर की दिवारों काहर कणक्योंकीउन दिवारों नेघुटते देखा
 
निर्मला कपिला
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रिटायरी कालोनी {अपनी बात}

रिटायरी कालोनी शायद अपना घर सब का ही सपना होता है। फिर जब आदमी अपने जीवन का सुनहरी समय सरकारी मकान मे रह कर गुज़ार दे तो उसके लिए तो अपना घर और भी अहम बात हो जाती है। फिर जब आदमी रिटायर होने के करीब आता है तो लोग अक्सर ये सवाल करने लगते हैं * अपना घर बना
 
निर्मला कपिला
Feb 17 2010 07:34 AM
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गज़ल

इस गज़ल को भी आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है। उन का बहुत बहुत धन्यवाद ।गज़ल ज़ख़्मी हैं चाहतें, खार सी ज़िन्दगीक्यों लगे मुझको दुश्वार सी ज़िन्दगीलाल रुखसार पर प्यारा सा काला तिलऔर है प्यारी गुलनार सी ज़िन्दगीसांवला  चेहरा  मुस्कराते हैं
 
निर्मला कपिला
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नई सुबह-- कहानी ]-

नई सुबह-- कहानी ]-- अगली कडीपिछली कडी मे आपने पढा कि नीतू घर परिवार ्र नैकरी के दो पाटौ मे पिस कर परेशान थी । एक दिन वो दफ्टर से लेट हो जाने पर कि बास की डाँट न खानी पडे अपनी एक आँटी के घर चली जाती है और उस से अपनी परेशानी बताती है। उसकी आँटी उसे समझाती
 
निर्मला कपिला
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Feb 12 2010 07:25 AM
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नई सुबह कहानी

नई सुबह - ----  कहानीआज मन बहुत खिन्न था।सुबह भाग दौड करते हुये काम निपटाने मे 9 बज गये। तैयार हुयी पर्स उठाया, आफिस के लिये निकलने ही लगी थी कि माँ जी ने हुकम सुना दिया *बहु एक कप तुलसी वाली चाय देती जाना।*मन खीज उठा , एक तो लेट हो रही हूँ किसी ने
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

विकल्प लघु कथारामू मालिक को सिग्रेट के धूँयें के छल्ले बनाते हुये देखता तो अपनी गरीबी और बेबसी का गुबार सा उसके मन मे उठने लगता। क्यों मालिक अपने पैसे को इस तरह धूयें मे उडाये जा रहे हैं? माना कि दो नम्बर का बहुत पैसा है मगर फिर भी----- उसके घर मे
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

भूख लघु कथामनूर जैसा काला, तमतमाया चेहरा,धूँयाँ सी मटमैली आँखें,पीडे हुये गन्ने जैसा सूखा शरीर ,साथ मे पतले से बीमार बच्चे का हाथ पकडे वो सरकारी अस्पताल मे डाक्टर के कमरे के आगेलाईन मे खडा अपनी बारी की इन्तज़ार कर रहा था। मैं सामने खडी बडे देर से उसकी
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

गज़लइस गज़ल को भी ादरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है । आखिरी 3-4 शेर बाद मे लिखे थे जिन्हें  अनुज प्रकाश सिंह अर्श ने संवारा है। धन्यवादी हूँ।गज़ल दर्द अपने सुनाना नहीं चाहतीज़ख्म दिल के दिखाना नहीं चाहतीअब न पूछो  कि क्या साथ मेरे हुआमैं 
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

गज़ल इस गज़ल को भी आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है।बेशक अभी गज़ल मे गज़ल जैसा निखार नहीं आया मगर सीखने की राह पर हूँ। आपसब के प्रोत्साहन से और भाई साहिब के आशीर्वाद से शायद कुछ कर पाऊँगी। तब तक पढते रहिये इन को । धन्यवाद्जो बनाये यूँ फसाने ये जवानी ठीक
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

पुस्तक समीक्षा द्वारा- श्रीमती निर्मला कपिला जीजब कि पुस्तक समीक्षा मेरी लेखन   विधा नही है मगर जब दीपक चौरसिया 'मशाल' की पुस्तक *अनुभूतियाँ* पढी तो अपने मन में उपजी अनुभूतिओं को लिखे बिना रह नहीं पाई। इस पुस्तक की जिस बात ने मुझे सबसे
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

जीना सीख लिया है। [कविता]चल रही है दोनोमखमली सी चाहतें औरऔर खार सी जिन्दगीसमानान्तर रेखाओं की तरहदूरी बना करउठता हैदोनो के बीचएक समुद्रकुछ अनुभूतियाँ और कुछ संवेदनाये लियेकभी कभी बह जाता हैकागज़ की पगडंडियों पर शब्दों की दो किरणेंउधार ले करशायद दोनो
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

संजीवनी [कहानी] अन्तिम  कडी पिछली कडियों मे आपने पढा कि सुधाँशू की मौत हो गयी। और किस तरह विकल्प ने उसे उन सभी बातों का एहसास करवाया जो उसने कभी सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं की। आज जल्दी जल्दी मे पोस्ट लिखी है टाईप की गलतिओं के लिये क्षमा चाहती
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

संजीवनी कहानी  अगली कडीपिछली कडियों मे आपने पढा मानवीएक महत्वाकाँक्षी ,अधुनिक विचारों की औरत है।\उसका करियर खराब न हो और फिगर खराब न हो इस लिये अपने बच्चे को जन्म न दे कर किराये की कोख से बच्चा लिया मगर उसे भी माँ जैसा प्यार न दे सकी । पूरी कहानी मे
 
निर्मला कपिला
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संजीवनी- - Veer Bahuti

पिछली कडियों मे  आपने पढा कि मानवी एक महत्वाकाँक्षी महिला हैं। जो अपने करियर और फिगर को बनाये रखने के लिये बच्चे को जन्म देना नहीं चाहती। मगर पति की इच्छा देखते हुये किराये की कोख से एक बच्चा लिया ।कैसे बच्चा माँ का प्यार दुलार
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

संजीवनी*इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन* जैसे अविष्कार ने आज कल जिस तरह एक व्यापार का रूप ले लिया है,जैसे कि कुछ लोग तो सही मे औलाद चाहते हैं इस लिये कोख किराये पर लेते हैं, मगर कुछ आधुनिक सोच की युवतियाँ जो केवल अपने करियर के लिये और अपने फिगर को बचाये रखने के
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

 संजीवनी { कहानी }जैसे ही मानवी आफिस मे आकर बैठी ,उसकी नज़र अपनी टेबल पर पडी डाक पर टिक गयी। डाक प्रतिदिन उसके आने से पहले ही उसकी टेबल पर पहुँच जाती थीपर वो बाकी आवश्यक काम निपटाने के बाद ही डाक देखती थी। आज बरबस ही उसकी नज़र एक सफेद लिफाफे पर टिक
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

क्या ये नशा है?सब ओर एक अजीब सा सन्नाटा। अभी बच्चों के जाने के बाद 2-3 दिन मे सब कुछ ठीक हो गया था फिर आज क्या हुया? समझ नहीं आ रही थी। घर की हर चीज़ जैसे मायूस सी थी । घर की हर चीज़ जैसे मुझ से नज़रें चुरा रही थी। सब कुछ अजनबी सा लग रहा था सोचा चलो आज फ्री
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

गज़ल इस गज़ल को भीादरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है। उनकी अति धन्यवादी हूँ।गज़ल हमारे नसीबां अगर साथ होतेबुरे वक़्त के यूँ न आघात होते.गया वक़्त भी अपना होता सुहानासुहाने हमारे भी दिन रात  होतेजलाते न हम आशियाँ अपने हाथोंसफ़र जिंदगानी के सौगात
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

कविता ऐसा पहली बार हुया है कि इतने दिनों बाद पोस्ट लिखी हो। बेटी और नातिन एक माह से  आयी हुये थीं,। उनके जाते ही घर मे उदासी सी छा गयी।  उनके जाने पर मन में कुछ भाव आये  कविता के रूप मे कह रही हूँ ।ममताकई दिनों से घर मे थीरोनक सी एक
 
निर्मला कपिला
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Veer Bahuti

सन 2009  तेरा शुक्रिया वर्ष 2009 का जाते हुये धन्यवाद न करूँ तो ये कृ्त्घ्नता होगी। अगर मैं कहूँ कि ये साल मेरी ज़िन्दगी का सब से खूबसूरत और खुशियाँ देने वाला साल रहा तो गलत न होगा। प्यार रिश्तों का मोहताज़ नहीं होता। अन्तर्ज़ाल जैसी आभासी दुनिया म
 
निर्मला कपिला