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12 Jun 2010
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फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !

सोचा था चलेगें सिन्धु की थाह लेने नीली अतल गहराइयों की स्वयं पर एक छाप लेने । था स्वप्न चलेंगे एक बार निरखने विशद अनुभूतियॊं के गहन कानन लता कुंज गह्वर , चुनेगें कुछ पुष्प चेतना की सजावट को संघनित आर्द्र भाव अवगुंठनों के। अजाने मन की हुलसती एक चाहना थी
 
आर्जव
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कविता के विरोध में

भाव पंचर हो गये हैं ! मन न जाने क्यों अपना मसौदा कविता को न देना नहीं चाहता है बहुत कुछ पास उसके कहने को , सुनाने को कविता को देने को कविता हो जाने को लेकिन वह दबाये बैठा है सटकाये बैठा है ! ! ! वह नाराज है शायद कविता से कि वह बड़ी डिप्लोमेट हो गयी है !
 
आर्जव
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निःशब्द

चलती हवा में झूमते पेड़ की खुशी का गीत मुझॆ पढ़ने नहीं आता ! तुम्हारे शब्द भी कहां पढ़ पाता हूं ! ! ! बसन्ती बयार में मचलती चिड़िया की चहकन मुझे लिखने नहीं आती ! तुम्हारी हंसी भी कहां लिख पाता हूं ! ! ! पहली फुहार में तर बतर भीजतें पलाश की बूंद बूंद खुशी
 
आर्जव
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दूभ

बिना जिल्द की वह फटी पुरानी कापी, अपनी सब किताब की ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं जिस पर बीच बीच में थककर मैं कुछ नया लिखा करता हूं । वैसे तो पढ़ने की इस मेज पर हैं बहुत कापियां जिस पर मैं धरती और नक्षत्र लिखा करता हूं लेकिन दबी किनारे सबसे नीचे बीते वर्ष
 
आर्जव
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May 24 2010 11:04 AM
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निर्मोही

तुम्हारे शब्दों में कुछ फूल हॊते हैं ! उन्हें छूकर मैं जाग जाता हूं ! जगाओगे नहीं मुझे ? निष्ठुर ! तुम्हारी चहकन में कुछ रंग होते हैं ! उनके परस से मैं बहक जाता हूं ! बहकाओगे नहीं मुझॆ ? पाथर ! इन रंग और शब्दों से मेरी सांस बनती है ! आंखॊं में चमक पिघलती
 
आर्जव
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दो मिनट की भॆंट

तुलसी – सलाम साब ! राम – हां ! तुलसी ! कैसे हो ? तुलसी – “ ….. “ (चुप)राम – “…..” (मुस्कुराये)तुलसी –“…….” (रो दिये !)
 
आर्जव
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प्रतीक्षा

ताजे नए हरे पत्तों में , ,,खूब मल कर मुंह धोयी और भी चटकार गोरी हो ली जैसे ................छोटे सफेद गमकते फूलों की लड़ियों से गढ़ी नीक नीक , ढेर -सी चांदी की बाली ,,,,,,,,,और अब अंग अंग धारे बैठी है जोहती बाट पहली मद्धिम बरसात की ! ! ! मै तो निरखूं
 
Aarjav
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जानता हूँ पर .......

जानता हूं यह रास्ता कहीं नहीं जाता फिर भी चल रहा हूं ।जानता हूं आगे कुछ नहीं है फिर भी इसी पर ढल रहा हूं ।है अस्वीकार का साहस ।प्रतिरोध की शक्ति है ।जानता हूं हासिल हर जोड़ का शून्य है फिर भी स्वयं को कर एक विलम्बित मौन-सा इस ही राह पर बिछ रहा
 
Aarjav
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दिनों बाद .........

चलूं आज दिनॊं बाद लिखूं कुछ ! कॊई कविता ! हेरूं मन को पुरूं गेहूं के टूण –सी छोटी गैरजरूरी बातों के टूटॆ धागे ! शब्दों को धोऊं, पॊछूं बांधू उनकॊ धागे में भावॊं के जुलहे की पूंछ में टांकू उसे छोड़ू उसे भागे वह द्वारे द्वारे फूले फूले नदी किनारे तीरे तीरे
 
Aarjav
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चेक

कुछ तो पूस्त हो
 
Aarjav
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प्रेम दीक्षा

शिशिर !न मालूम थामुझे किदिन दिनपल पलरव रवतुम्हारे दुलार केसान्द्र सोम मेंछका हैपगा हैडूबा ,उतराया है !यह आम्र वृक्ष !न मालूम थामुझे किस्नेहातुर लजीलेतुम्हीं नेफैलाकर बहुत बारगाढ़े शुभ्र कोहरेकी यवनिकाइस तृषित ढीठआम्र वृक्ष सेबहुत देर तक की हैएकान्तिक
 
Aarjav
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Mar 07 2010 01:44 AM
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केसरिया मन

सोचता हूं सो जाऊं !खो जाऊं !बोझिल तन !स्नेहिल मन !निढाल सब छोड़ू !मिट जाऊं !लेकिन फिर ……….सांझ थोड़ी देर तक कीतुम्हारी संगति याद आती है -------तुम्हारे सानिध्य का केसरअभी तकमन की देह पर बिखरा हुआ है !तुम्हारे सरल मधुर हास का चन्दनअभी भी झींना झींनाआती जाती
 
Aarjav
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Feb 25 2010 12:11 AM
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प्यार : एक डायाक्रोनिक स्टडी -2

प्यार : एक डायाक्रोनिक स्टडी -1एक प्यारधीरे धीरे होता है ।एकदम धीरे धीरे ।जैसे रात भिगोये गये चने सेधीरे धीरे निकलता हैचने में मौजूद पूरे प्रोटीन से बनाएक टुइंया-सा अंकुर !यह प्यारशुरु शुरु में प्यार नहीं होतालेकिन परत दर परतप्यार बनता जाता है ।आप पा
 
Aarjav
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Feb 13 2010 07:53 PM
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प्यार: एक डायाक्रोनिक स्टडी

प्यारतरह तरह के होते हैं ।किसी बीते हुये प्यार कोयाद करना , पुनः प्यार से भर उठनाएक अलग प्यार है ।किसी चल रहे प्यार को सोच करधीरे से मुस्कुराना , फिर तुरन्तकाम में व्यस्त हो जानाएक अलग प्यार है ।किसी दूसरे के प्यार कोदेखकर ,दो बूंदखुद के बारे में सोचनाएक
 
Aarjav
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बात

गर्म टहकार,कुनकुनी पीली ,चमकीली उत्फुल्ल,धूपसिर्फ धूप नहीं है । दरसल वह एक बात है ।बात –जो सूरज धरती से किया करता है ।रोज रोज , हर रोज ।उसके कई अर्थ हैं ।अनेक भाव ,गन्ध ,भंगिमाएं ,कहानियां हैं ।धरती की छाती पर टंकीछोटी से छोटी घास से लेकरवृहद देवदारू व
 
Aarjav
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सब कुछ शेयर कर लेता हूँ !

कलिंग युद्ध क्षेत्र पर छिड़ा घमासान अभी धीरे धीरे शान्त हो रहा है । वहां बहुत “कुछ” “लिया” गया और बहुत कुछ दिया गया । इन सब के बीच बहुत कुछ ऐसा भी रहा जो देते देते नहीं दिया गया ………..अतएव लेते लेते नहीं लिया गया । खैर , चल रही प्रक्रियाओं को देखते देखते
 
Aarjav
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सन्नाटा

अलग होते मुझ के साथ बहुत दूर तक टूटा नहीं तुम्हारी पुकार का स्वर ! ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,दूर निकल आये मुझ के साथ उस स्वर के पीछे बचा सन्नाटा अब भी है !,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सुनायी देता है लेकिन सुनता नहीं हूँ उस सन्नाटे का
 
Aarjav
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अन्यथा ..........

सब कुछ तुम्हारा ही है ! मेरी जीत , मेरी हार मेरी वासनाएं ,आकांक्षाए मेरे पाप ........... सब कुछ तुम्हारा ही है ! मेरे मद , मेरे मोह मेरी उद्विग्नताये , व्यग्रताएं मेरा अस्तित्व .......... सब तुम्हारा ही है ! मेरा क्रोध , मेरा प्रेम मेरी उदघोशनाए , गर
 
Aarjav
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अभी तो .......

अभी तो व्यथा के श्रृंगों का आयतन वर्तनी की आकृतियॊं में नापता हूं ! ! ! भावना के पारावार में खो जायेगें दुख भी जब तुम्हारे स्मरण की विस्मृत मधुकरी तब मन के वातायनॊं पर सजाउंगा ! खो चुके संसार के आर्द्र स्वप्नों को अभी तो संतप्त चेतना के ताप से भूंजता
 
Aarjav
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पुरस्कृत

भाव जो मन में रहे , कभी शब्द न बने , वृंत पर पुष्प -से खिले , साँझ झरे नही, अपने ही सौरभ में लीन हो गए....... उन्हें भी जान लिया तुमने , हतप्रभ , अकिंचन मै चढ़ा भी न सका उन्हें ठीक से , फिर भी मंदस्मित स्नेहिल स्वीकारोक्ति से अर्पित उन्हें बना लिया त
 
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शब्द यदि झुक गए !

शब्द जब बध गये छन्द में तो “घनत्व” कैसे करेंगे वहन ? शब्द जब ढल गये छन्द में तो झेलेगे कैसे अपने अर्थों की गुह्य अंतःक्रियायें ? शब्द जब झुक गये छन्द में तो सहेगें कैसे वाक्य विन्यास की कोठर--पैठी नयी विकसती अर्थ भंगिमायें ? तब की बात कुछ और थी , अब
 
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फिर से

तब तक एक पुरानी कविता फिर से पढ़ ले ! क्योकि समय कुछ शब्दों के अर्थ बदल देता है........ कविता की खोज में
 
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अ अस्वीकार

मैंने जाना कि वह करना, उसमें होना, गलत है । मैंने उसका निषेध किया । खुद को उसकी तरफ बहने से रोका । उसके प्रति भीतर अपने वह स्वभाव रचा जो अनुभव अनुभूतियों व निष्कर्षों पर आधारित था । मैंने विजय पायी क्योंकि अन्ततः उसके और अपने अर्न्तसम्बन्धों का निर्ध
 
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प्रेम गीत

सोचता हूं लिखूं मैं भी कोई प्रेम गीत ! लिखूं सांझ की उतरती उदास धूप में पीली रोशनी के वलय-सा जगमगाता कनेर ! लिखूं भॊर की पहली किरन को रंगों के गीत पढ़ाता जवांकुसुम ! लिखूं निशा- वियोग- व्याकुल, वृन्त-प्रछ्न्न उषा के नासापुटों का गन्धमादक श्वेत नारंगी
 
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मै बस देखूगा !

बस, हतप्रभ अकिंचन मैं देखूंगा , चुप ! विस्मित ! तुम हंसो ! ! ! अपनी वो पूरी खुली भरी और गाढ़ी हंसी ! मेघाछ्न्न गदराये आकाश से और न सम्हल सकी , उन्मुक्त, उत्फुल्ल, दिनों बाद यकायक भहरायी जोरदार बरसात-सी हंसी ! ! ! तुम हंसो ! ! मैं बस देखूंगा वह मोतियों
 
Aarjav
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अवसाद के दिनों में सच !

सच इतना अधिक है चहुं ओर हमारे खड़ा बैठा चलता दौड़ता कि हम सह नहीं पाते हैं फट फट जाते है माया मिथ्या आभास कह कह उसे टरकाते हैं ! किनारे बेवकूफॊं जैसा चुपचाप खड़ा अपने पातॊं पर बिलखले आसमान के घनीभूत दुखॊं को समोता न हसता न चिचियाता अनभिप्रेत खड़ा पेड़ ! !
 
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तुम्हें देखें !

हे प्रभु ! मुझे तो नहीं पता लेकिन लोग कहते हैं कि अब मैं कवि हो गया हूं ! मैं तो बिलकुल भी ठीक से नहीं जानता कि ये कविता क्या होती है लिखी कैसे जाती है लेकिन लोग कहते हैं कि अच्छा लिखते हो तुम ! तो जो कुछ भी हो असली मामला , वह छोड़ो ! बस, तुम किसी दिन
 
Aarjav
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सपने

टूटते हैं सपने बिखरते हैं सपने प्रतिकूलताओं के प्रस्थर खण्डों में दब कलपते हैं सपने तड़पते हैं सपने मरकर भी कहां मर पाते हैं सपने कभी भूत तो कभी जिन बन जाते हैं सपने तब अक्सर ही सच्चाई की लाशों डराते हैं ये भूत सपने धधक चुकी आग में अन्तिम चिनगारी- से
 
Aarjav
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प्रभाव

तत्क्षण ही खूब प्रभावित हो जाना कोई बड़ी अच्छी बात नहीं है । तुम अत्यन्त प्रतिभाशाली महान व विचारवान हो ! तो इससे मुझे कॊई फर्क नहीं पड़ जाता ! तुम्हारा यश एक दिन फैलेगा दुनिया के कोने कोने में और लाघं कर काल की सीमा सदैव जिन्दा रहोगे तुम अपने विचारों
 
Aarjav
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दोस्ती

आज मैंने अपने भगवान जी पर एक एहसान किया मन में फुदक आयी एक अनरगल इच्छा को भगवान जी से बिना कहे मन ही में खुरच खुरच कर , खिरच खिरच कर खत्म कर दिया ! शाम को रोज की बात चीत में यह सब उनसे कह खुश हुआ । रोज की तरह वे भी कुछ बोले नहीं बस थोड़ा सा मुस्कुराये
 
Aarjav
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क्यों धूप क्यों !

धूप ! आजकल हर सांझ जाने से पहले तुम , इतनी गहरी पीली जर्द क्यों हो उठती हो ? क्यॊं पेड़ों के मटमैले हरे झुरमुट से रिसकर पीछे दीवार के पर्दे पर पड़ते तुम्हारे निर्वाक व निमीलित बिम्ब इतने घने, प्रगल्भ व प्रगाढ़ पीत हो जाते हैं कि अनिमेष उन्हें देखते देखत
 
Aarjav
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बच्चे .....

बच्चे ! असंख्य जटिल कठिन प्रक्रियाऒं के कितने अच्छे सहज सरल परिणाम ! वाह ! ! ! !
 
Aarjav
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प्रतिदान

यदि कभी कुछ दूँ मैं तुम्हें तो तपाक से थैंक्यू न बोलना !!! (अच्छा नही लगता बिलकुल भी ! ) लेना ....... चुप रहना ......... फिर हल्का सा ....... बहुत धीरे से..... मुझे देखते हुए मुस्कराना ...... बस
 
Aarjav
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10 अप्रैल 2009 (डायरी से .......)

सब खाली खाली है.......... । परीक्षाएं खत्म हो गयी हैं ....। दस दिन हो गए .........। लगभग सब अच्छा ही गया है । कम्प्यूटेशनल लिग्विंस्टिक्स व लेक्सिकोग्राफी के पेपर में कुछ कठिनाईयों के अलावा । पिछले चार पांच दिनों में कुछ खास नहीं किया है । नींद ……….औ
 
Aarjav
Oct 14 2009 07:43 PM
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कृत्रिम.....नहीं ...सृजित !!!!

तुम्हारी अन्धेरी सुबकनों को अपने स्नेह की लय में डाल जिसने उन्हें धीमी मुस्कराहटों के संगीत में बदल दिया .... अपने इस क्षणिक उत्कर्ष में उसे यूं विस्मृत न करो ! यथार्थ की क्रूर वीथिकाओं में गतिशील, निर्मम कालगति से अनुबन्धित जीवन के गहन वात्याचक्रॊं
 
Aarjav
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गोल्डिग ! वे बच्चे नहीं थे ! *

विलियम गोल्डिंग अंग्रेजी के एक महान उपन्यासकार हैं । अपने प्रसिद्ध नोबल पुरस्कृत उपन्यास “लार्ड आफ़ द फ़्लाइज़” में इन्होंने दिखाया है कि बच्चे भी निर्दोष (Innocent) नहीं होते ।उपन्यास में एक स्कूल के बारह वर्ष तक की उम्र के बच्चों का एक दल छोटे से सुनस
 
Aarjav
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पहचान

कितना जरूरी है जीने के लिए किसी का यह कहना किसचमुच बड़े अच्छे हो तुम !
 
Aarjav
Oct 03 2009 01:55 PM
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जरूरी नहीं की.....

जरूरी नहीं किहर बारकुछ अच्छा ही लिखा जाय ।जरूरी नहीं किहर बारकुछ पूरा ही लिखा जाय ।जरूरी नहीं किहर बारकुछ प्रशसंसनीय ही लिखा जाय ।जरूरी नहीं किजो लिखा जायहर बार लोगों को दिखाया ही जाय ।और फिर ……..यह भी तो जरूरी नहीं कि हर बारलिखा ही जाय ……….! ! !
 
Aarjav
Oct 03 2009 01:48 PM
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क्योंकि तुमसे मैं प्रेम नही करता

यह समयतुम्हारे आने का था !और तुमनहीं आये !!!वैसे तो व्यस्त था मैंअपने कामों में –जैसे रोज रहा करता हूंलेकिन फिर भीमेरे अन्दर से कहींकोई भीतरी अदृश्य देहबार बारमेरी इस देह से निकलबाहर उस सीढी़ की तरफ़ढ़ुलक ढ़ुलक जा रही है !हर बार खुद को बांधता हूं कसकस
 
Aarjav
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सत्य के साथ प्रयोग अभी जारी है !

लकड़ी के डण्डों पर टिकी मुरचहे टीन की छत , पोलीथीन की दिवारें ! जुलाई महीने की सड़ी उमस भरी रातों में आसपास की बजबजाती नालियों में जवान हुये मोटॆ मटमैले मच्छर चीथड़ों से बार-बार उघर आती उसकी टांगॊ को बड़ी आसानी से सूंघ लेते है । सामने टाट पर बगल के भव्य
 
Aarjav