3
फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !
सोचा था चलेगें सिन्धु की थाह लेने नीली अतल गहराइयों की स्वयं पर एक छाप लेने । था स्वप्न चलेंगे एक बार निरखने विशद अनुभूतियॊं के गहन कानन लता कुंज गह्वर , चुनेगें कुछ पुष्प चेतना की सजावट को संघनित आर्द्र भाव अवगुंठनों के। अजाने मन की हुलसती एक चाहना थी
Jun 13 2010 01:08 AM


Shuffle








